tana
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« on: August 31, 2008, 07:34:54 AM » |
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ॐ सांई राम~~~
गणेशोत्सव~~~
ॐ गं गणपतये नमः~~~ॐ गं गणपतये नमः~~~ॐ गं गणपतये नमः~~~
गणेशोत्सव 3 सितंबर से शुरू होगा~~~
बुद्धि, विवेक के देवता होने के कारण बुध ग्रह के अधिपति तो ये हैं ही, जगत का मंगल करने, साधक को निर्विघ्नता पूर्ण कार्य स्थिति प्रदान करने, विघ्नराज होने से बृहस्पति भी इनसे तुष्ट होते हैं। धन, पुत्र, ऐश्वर्य के स्वामी गणेशजी हैं, जबकि इन क्षेत्रों के ग्रह शुक्र हैं। इस तथ्य से आप भी यह जान सकते हैं कि शुक्र में शक्ति के संचालक आदिदेव हैं। माँ-पिताजी के आशीर्वाद से प्रथम पूजन के पदाधारी देव अपने जन्मदिवस पर विघ्न का नाश करके सुख, समृद्धि व सुमति की कृपा प्रदान करें। इन्हीं मंगलकामनाओं के साथ गणेशोत्सव 3 सितंबर से शुरू होगा~~~
सर्वग्रह शांति के लिए गणेश आराधना~~~
गजाननजी को ज्योतिष शास्त्र में बुध ग्रह से संबद्ध किया जाता है। इनकी उपासना नवग्रहों की शांतिकारक व व्यक्ति के सांसारिक-आध्यात्मिक दोनों तरह के लाभ की प्रदायक है। अथर्वशीर्ष में इन्हें सूर्य व चंद्रमा के रूप में संबोधित किया है। सूर्य से अधिक तेजस्वी प्रथम वंदनदेव हैं। इनकी रश्मि चंद्रमा के सदृश्य शीतल होने से एवं इनकी शांतिपूर्ण प्रकृति का गुण शशि द्वारा ग्रहण करके अपनी स्थापना करने से वक्रतुण्ड में चंद्रमा भी समाहित हैं। पृथ्वी पुत्र मंगल में उत्साह का सृजन एकदंत द्वारा ही आया है।
बुद्धि, विवेक के देवता होने के कारणबुध ग्रह के अधिपति तो ये हैं ही, जगत का मंगल करने, साधक को निर्विघ्नता पूर्ण कार्य स्थिति प्रदान करने, विघ्नराज होने से बृहस्पति भी इनसे तुष्ट होते हैं। धन, पुत्र, ऐश्वर्य के स्वामी गणेशजी हैं, जबकि इन क्षेत्रों के ग्रह शुक्र हैं। इस तथ्य से आप भी यह जान सकते हैं कि शुक्र में शक्ति के संचालक आदिदेव हैं। धातुओं व न्याय के देव हमेशा कष्ट व विघ्न से साधक की रक्षा करते हैं, इसलिए शनि ग्रह से इनका सीधा रिश्ता है। गणेशजी के जन्म में भी दो शरीर का मिलाप (पुरुष व हाथी) हुआ है। इसी प्रकार राहु-केतु की स्थिति में भी यही स्थिति विपरीत अवस्था में है अर्थात गणपति में दो शरीर व राहु-केतु के एक शरीर के दो हिस्से हैं।
जय सांई राम~~~
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« Last Edit: September 01, 2008, 01:48:25 AM by tana »
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" Loka Samasta Sukino Bhavantu Aum ShantiH ShantiH ShantiH"~~~
May all the worlds be happy. May all the beings be happy. May none suffer from grief or sorrow. May peace be to all~~~
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« Reply #1 on: August 31, 2008, 07:44:39 AM » |
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ॐ सांई राम~~~
गणेशोत्सव~~~
ॐ गं गणपतये नमः~~~ॐ गं गणपतये नमः~~~ॐ गं गणपतये नमः~~~
गणेश चतुर्थी व्रत~~~
भाद्रपद शुक्ल की चतुर्थी ही गणेश चतुर्थी कहलाती है। श्री गणेशजी विघ्न विनाशक हैं। इन्हें देवसमाज में सर्वोच्च स्थान प्राप्त है। भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को मध्याह्न के समय गणेशजी का जन्म हुआ था। श्री गणेशजी बुद्धि के देवता हैं। गणेशजी का वाहन चूहा है। ऋद्धि तथा सिद्धि इनकी दो पत्नियाँ हैं। इनका सर्वप्रिय भोग मोदक (लड्डू) है। इस दिन रात्रि में चंद्रमा का दर्शन करने से मिथ्या कलंक लग जाता है।
गणेश चतुर्थी व्रत कैसे करें~~ ~~इस दिन प्रातःकाल स्नानादि से निवृत्त हो जाएँ। ~~पश्चात 'मम सर्वकर्मसिद्धये सिद्धिविनायक पूजनमहं करिष्ये' मंत्र से संकल्प लें। ~~इसके बाद सोने, तांबे, मिट्टी अथवा गोबर से गणेशजी की प्रतिमा बनाएँ। ~~गणेशजी की इस प्रतिमा को कोरे कलश में जल भरकर मुँह पर कोरा कपड़ा बाँधकर उस पर स्थापित करें। ~~पश्चात मूर्ति पर सिंदूर चढ़ाकर षोड्शोपचार से उनका पूजन करें। ~~इसके बाद आरती करें। आरती के लिए क्लिक करें। ~~फिर दक्षिणा अर्पित करके 21 लड्डुओं का भोग लगाएँ। इनमें से पाँच लड्डू गणेशजी की प्रतिमा के पास रखकर शेष ब्राह्मणों में बाँट दें।
गणेश चतुर्थी व्रत में सावधानियाँ~~ ~~गणेशजी की पूजा सायंकाल के समय की जानी चाहिए। ~~पूजनोपरांत नीची नजर से चंद्रमा को अर्घ्य देकर ब्राह्मणों को भोजन कराकर दक्षिणा भी देनी चाहिए। नीची नजर से चंद्रमा को अर्घ्य देने का तात्पर्य है कि जहाँ तक संभव हो, इस दिन (भाद्रपद चतुर्थी को) चंद्रमा के दर्शन नहीं करने चाहिए। इस दिन चंद्रमा के दर्शन करने से कलंक का भागी बनना पड़ता है। यदि सावधानी बरतने के बावजूद चंद्र दर्शन हो ही जाएँ तो फिर स्यमन्तक की कथा सुनने से कलंक का प्रभाव नहीं रहता।
गणेश चतुर्थी व्रत फल~~ वस्त्र से ढंका हुआ कलश, दक्षिणा तथा गणेश प्रतिमा आचार्य को समर्पित करके गणेशजी के विसर्जन का उत्तम विधान माना गया है। गणेशजी का यह पूजन करने से बुद्धि और ऋद्धि-सिद्धि की प्राप्ति तो होती ही है, विघ्न-बाधाओं का भी समूल नाश हो जाता है।
जय सांई राम~~~
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« Reply #2 on: August 31, 2008, 07:46:47 AM » |
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ॐ सांई राम~~~
ॐ गं गणपतये नमः~~~ॐ गं गणपतये नमः~~~ॐ गं गणपतये नमः~~~
गणेश चतुर्थी व्रत कथा~~~
एक बार महादेवजी पार्वती सहित नर्मदा के तट पर गए। वहाँ एक सुंदर स्थान पर पार्वतीजी ने महादेवजी के साथ चौपड़ खेलने की इच्छा व्यक्त की। तब शिवजी ने कहा- हमारी हार-जीत का साक्षी कौन होगा? पार्वती ने तत्काल वहाँ की घास के तिनके बटोरकर एक पुतला बनाया और उसमें प्राण-प्रतिष्ठा करके उससे कहा- बेटा! हम चौपड़ खेलना चाहते हैं, किन्तु यहाँ हार-जीत का साक्षी कोई नहीं है। अतः खेल के अन्त में तुम हमारी हार-जीत के साक्षी होकर बताना कि हममें से कौन जीता, कौन हारा?
खेल आरंभ हुआ। दैवयोग से तीनों बार पार्वतीजी ही जीतीं। जब अंत में बालक से हार-जीत का निर्णय कराया गया तो उसने महादेवजी को विजयी बताया। परिणामतः पार्वतीजी ने क्रुद्ध होकर उसे एक पाँव से लंगड़ा होने और वहाँ के कीचड़ में पड़ा रहकर दुःख भोगने का शाप दे दिया।
बालक ने विनम्रतापूर्वक कहा- माँ! मुझसे अज्ञानवश ऐसा हो गया है। मैंने किसी कुटिलता या द्वेष के कारण ऐसा नहीं किया। मुझे क्षमा करें तथा शाप से मुक्ति का उपाय बताएँ। तब ममतारूपी माँ को उस पर दया आ गई और वे बोलीं- यहाँ नाग-कन्याएँ गणेश-पूजन करने आएँगी। उनके उपदेश से तुम गणेश व्रत करके मुझे प्राप्त करोगे। इतना कहकर वे कैलाश पर्वत चली गईं।
एक वर्ष बाद वहाँ श्रावण में नाग-कन्याएँ गणेश पूजन के लिए आईं। नाग-कन्याओं ने गणेश व्रत करके उस बालक को भी व्रत की विधि बताई। तत्पश्चात बालक ने 12 दिन तक श्रीगणेशजी का व्रत किया। तब गणेशजी ने उसे दर्शन देकर कहा- मैं तुम्हारे व्रत से प्रसन्न हूँ। मनोवांछित वर माँगो। बालक बोला- भगवन! मेरे पाँव में इतनी शक्ति दे दो कि मैं कैलाश पर्वत पर अपने माता-पिता के पास पहुँच सकूं और वे मुझ पर प्रसन्न हो जाएँ।
गणेशजी 'तथास्तु' कहकर अंतर्धान हो गए। बालक भगवान शिव के चरणों में पहुँच गया। शिवजी ने उससे वहाँ तक पहुँचने के साधन के बारे में पूछा।
तब बालक ने सारी कथा शिवजी को सुना दी। उधर उसी दिन से अप्रसन्न होकर पार्वती शिवजी से भी विमुख हो गई थीं। तदुपरांत भगवान शंकर ने भी बालक की तरह 21 दिन पर्यन्त श्रीगणेश का व्रत किया, जिसके प्रभाव से पार्वती के मन में स्वयं महादेवजी से मिलने की इच्छा जाग्रत हुई।
वे शीघ्र ही कैलाश पर्वत पर आ पहुँची। वहाँ पहुँचकर पार्वतीजी ने शिवजी से पूछा- भगवन! आपने ऐसा कौन-सा उपाय किया जिसके फलस्वरूप मैं आपके पास भागी-भागी आ गई हूँ। शिवजी ने 'गणेश व्रत' का इतिहास उनसे कह दिया।
तब पार्वतीजी ने अपने पुत्र कार्तिकेय से मिलने की इच्छा से 21 दिन पर्यन्त 21-21 की संख्या में दूर्वा, पुष्प तथा लड्डुओं से गणेशजी का पूजन किया। 21वें दिन कार्तिकेय स्वयं ही पार्वतीजी से आ मिले। उन्होंने भी माँ के मुख से इस व्रत का माहात्म्य सुनकर व्रत किया।
कार्तिकेय ने यही व्रत विश्वामित्रजी को बताया। विश्वामित्रजी ने व्रत करके गणेशजी से जन्म से मुक्त होकर 'ब्रह्म-ऋषि' होने का वर माँगा। गणेशजी ने उनकी मनोकामना पूर्ण की। ऐसे हैं श्री गणेशजी, जो सबकी कामनाएँ पूर्ण करते हैं।
जय सांई राम~~~
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« Reply #3 on: August 31, 2008, 07:49:58 AM » |
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ॐ सांई राम~~~
ॐ गं गणपतये नमः~~~ॐ गं गणपतये नमः~~~ॐ गं गणपतये नमः~~~
गणेश चतुर्थी को चन्द्र दर्शन दोष से बचाव~~~
प्रत्येक शुक्ल पक्ष चतुर्थी को चन्द्रदर्शन के पश्चात् व्रती को आहार लेने का निर्देश है, इसके पूर्व नहीं। किंतु भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को रात्रि में चन्द्र-दर्शन (चन्द्रमा देखने को) निषिद्ध किया गया है।
जो व्यक्ति इस रात्रि को चन्द्रमा को देखते हैं उन्हें झूठा-कलंक प्राप्त होता है। ऐसा शास्त्रों का निर्देश है। यह अनुभूत भी है। इस गणेश चतुर्थी को चन्द्र-दर्शन करने वाले व्यक्तियों को उक्त परिणाम अनुभूत हुए, इसमें संशय नहीं है। यदि जाने-अनजाने में चन्द्रमा दिख भी जाए तो निम्न मंत्र का पाठ अवश्य कर लेना चाहिए-
'सिहः प्रसेनम् अवधीत्, सिंहो जाम्बवता हतः। सुकुमारक मा रोदीस्तव ह्येष स्वमन्तकः॥'
उक्त मंत्र बोलकर कल्याण की कामना से श्रद्धापूर्वक नमस्कार कर लें। यह शास्त्र का दोष शमनार्थ निर्देश है।
जय सांई राम~~~
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« Reply #4 on: August 31, 2008, 07:52:41 AM » |
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ॐ सांई राम~~~
ॐ गं गणपतये नमः~~~ॐ गं गणपतये नमः~~~ॐ गं गणपतये नमः~~~
स्यमन्तक मणि कथा~~~
एक बार नंदकिशोर ने सनतकुमारों से कहा कि चौथ की चंद्रमा के दर्शन करने से श्रीकृष्ण पर जो लांछन लगा था, वह सिद्धि विनायक व्रत करने से ही दूर हुआ था। ऐसा सुनकर सनतकुमारों को आश्चर्य हुआ। उन्होंने पूर्णब्रह्म श्रीकृष्ण को कलंक लगने की कथा पूछी तो नंदकिशोर ने बताया-एक बार जरासन्ध के भय से श्रीकृष्ण समुद्र के मध्य नगरी बसाकर रहने लगे। इसी नगरी का नाम आजकल द्वारिकापुरी है। द्वारिकापुरी में निवास करने वाले सत्राजित यादव ने सूर्यनारायण की आराधना की। तब भगवान सूर्य ने उसे नित्य आठ भार सोना देने वाली स्यमन्तक नामक मणि अपने गले से उतारकर दे दी।
मणि पाकर सत्राजित यादव जब समाज में गया तो श्रीकृष्ण ने उस मणि को प्राप्त करने की इच्छा व्यक्त की। सत्राजित ने वह मणि श्रीकृष्ण को न देकर अपने भाई प्रसेनजित को दे दी। एक दिन प्रसेनजित घोड़े पर चढ़कर शिकार के लिए गया। वहाँ एक शेर ने उसे मार डाला और मणि ले ली। रीछों का राजा जामवन्त उस सिंह को मारकर मणि लेकर गुफा में चला गया।
जब प्रसेनजित कई दिनों तक शिकार से न लौटा तो सत्राजित को बड़ा दुःख हुआ। उसने सोचा, श्रीकृष्ण ने ही मणि प्राप्त करने के लिए उसका वध कर दिया होगा। अतः बिना किसी प्रकार की जानकारी जुटाए उसने प्रचार कर दिया कि श्रीकृष्ण ने प्रसेनजित को मारकर स्यमन्तक मणि छीन ली है। इस लोक-निन्दा के निवारण के लिए श्रीकृष्ण बहुत से लोगों के साथ प्रसेनजित को ढूंढने वन में गए। वहाँ पर प्रसेनजित को शेर द्वारा मार डालना और शेर को रीछ द्वारा मारने के चिह्न उन्हें मिल गए। रीछ के पैरों की खोज करते-करते वे जामवन्त की गुफा पर पहुँचे और गुफा के भीतर चले गए। वहाँ उन्होंने देखा कि जामवन्त की पुत्री उस मणि से खेल रही है। श्रीकृष्ण को देखते ही जामवन्त युद्ध के लिए तैयार हो गया।
युद्ध छिड़ गया। गुफा के बाहर श्रीकृष्ण के साथियों ने उनकी सात दिन तक प्रतीक्षा की। फिर वे लोग उन्हें मर गया जानकर पश्चाताप करते हुए द्वारिकापुरी लौट गए। इधर इक्कीस दिन तक लगातार युद्ध करने पर भी जामवन्त श्रीकृष्ण को पराजित न कर सका। तब उसने सोचा, कहीं यह वह अवतार तो नहीं जिसके लिए मुझे रामचंद्रजी का वरदान मिला था। यह सोचकर उसने अपनी कन्या का विवाह श्रीकृष्ण के साथ कर दिया और मणि दहेज में दे दी। श्रीकृष्ण जब मणि लेकर वापस आए तो सत्राजित अपने किए पर बहुत लज्जित हुआ। इस लज्जा से मुक्त होने के लिए उसने भी अपनी पुत्री का विवाह श्रीकृष्ण के साथ कर दिया।
कुछ समय के बाद श्रीकृष्ण किसी काम से इंद्रप्रस्थ चले गए। तब अक्रूर तथा ऋतु वर्मा की राय से शतधन्वा यादव ने सत्राजित को मारकर मणि अपने कब्जे में ले ली। सत्राजित की मौत का समाचार जब श्रीकृष्ण को मिला तोवे तत्काल द्वारिका पहुँचे। वे शतधन्वा को मारकर मणि छीनने को तैयार हो गए। इस कार्य में सहायता के लिए बलराम भी तैयार थे। यह जानकर शतधन्वा ने मणि अक्रूर को दे दी और स्वयं भाग निकला। श्रीकृष्ण ने उसका पीछा करके उसे मार तो डाला, पर मणि उन्हें नहीं मिल पाई।
जय सांई राम~~~
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« Reply #5 on: September 01, 2008, 07:25:48 PM » |
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ॐ सांई राम~~~
ॐ गं गणपतये नमः~~~ॐ गं गणपतये नमः~~~ॐ गं गणपतये नमः~~~ गणपति बप्पा मोर्या ~~~श्री गणेश चतुर्थी~~~ ~डॉ. नारायण तिवारी पंचदेवों में सम्मिलित गणाध्यक्ष, पार्वतीनंदन भगवान श्री गणेश के जन्म-प्रसंग की भी कई अलग-अलग रोचक और प्रेरक कथाएँ उपलब्ध हैं। 10 हजार वर्षों के सुखद सान्निध्य के बाद भी जब भगवती पार्वती को संतान लाभ नहीं हुआ तो उन्होंने एक बार बड़े निकट क्षणों में भूतभावन आशुतोष भगवान शिव से अपनी समस्या निवेदित की।
भगवान ने लोक-मर्यादा, जनशिक्षण, परंपरा-निर्वहन एवं धर्मानुशासन बनाए रखने के लिए सर्वसमर्थ होकर भी उन्हें पुत्र प्राप्ति के लिए भगवान श्रीकृष्ण को प्रसन्न कर उनसे वर माँगने की सलाह दी। कथा है कि सर्वेश्वरी भगवती पार्वती ने अपने योग्य पुत्र की प्राप्ति के लिए भगवान श्रीकृष्ण को प्रसन्न करने के लिए कठोर अनुष्ठान एवं तप किया।
लीला पुरुषोत्तम भगवान श्रीकृष्ण प्रसन्न हो गए व देवी पार्वती से वर माँगने को कहा। भगवान श्रीकृष्ण को साक्षात देख देवी तो चकित रह गईं और उनका मातृभाव जागृत होकर बोला, 'मुझे आपके जैसा ही पुत्र चाहिए।' यहाँ भी नटवर नंदकिशोर अपनी भुवन मोहिनी छबि काजादू दिखाने से नहीं चूके और बड़े भोले बनकर भगवती से कहा, 'यह वरदान देना असंभव है, क्योंकि सृष्टि में मेरे जैसा तो बस मैं ही हूँ, कोई दूसरा कैसे हो सकता है। पर मैं आपकी निष्ठा और स्नेह से प्रसन्न होकर स्वयं आपके गर्भ से जन्म लेकर आपका पुत्र होकर जन्मूँगा।' भगवती तो इस अलभ्य दुर्लभ वरदान को प्राप्त कर धन्य-धन्य हो गईं।
कालक्रम से भगवती के यहाँ स्वयं श्रीकृष्ण ने गणपति के रूप में जन्म लिया। उनके सौंदर्य की कौन बात कहे। भगवान शनि को शाप है कि वे जिसे दृष्टि भरकर देखते, उसका सिर कटकर गिर पड़ता है।
भगवान शंकर और देवी पार्वती के इस अलौकिक सुंदर पुत्र की चर्चा त्रिलोक में थी अतः शनिदेव भी उनका दर्शन करने पधारे, पर शापवश उन्होंने श्रीगणेश के दर्शन से खुद को दूर रखा। पर होता तो वही है जो श्रीहरि ने नियत कर रखा है, इसीलिए तो उसे नियति कहते हैं।
देवी पार्वती के बहुत आग्रह पर शनिदेव ने उनके बेटे के दर्शन किए और अमोघ शाप की वजह से बेटे का सिर कटकर जमीन पर गिर गया। इस अनहोनी से देवी तो चीत्कार कर उठीं। तब भगवान शंकर ने देवताओं, ऋषियों, यक्षों, गंधर्वों, सभी की प्रार्थना पर हाथी का सिर भगवान गणपति के धड़ से जोड़कर उन्हें 'गजानन' नाम दिया। इस स्वरूप से भी अत्यंत मोहक एवं देवताओं में प्रथम पूज्य का पद प्रदान किया, तभी भगवती संतुष्ट हुईं।
जय सांई राम~~~
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« Reply #7 on: September 03, 2008, 03:25:09 AM » |
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OM SAI RAM~~~
Astavinayak Darshan~~~~
1) Mahad
2) Morgaon
3) Theur
4) Siddhatek
5) Pali
6) Ozar
7) Lenyadri
8 ) Ranjangaon
~~~~~~~~~~~~
108 Names of Ganesha~~~
OM GANESHWARAI NAMAH
OM GANKRIDYA NAMAH
OM GANNATHAYA NAMAH
OM GANADHIPAYA NAMAH
OM EKDRISHTAYA NAMAH
OM VAKRATUNDAYA NAMAH
OM GAJVAKRAYA NAMAH
OM MAHODARAYA NAMAH
OM LAMODARAYA NAMAH
OM DHUMRAVARANAYA NAMAH
OM VIKTAYA NAMAH
OM VIGHNANAYAKAYA NAMAH
OM SUMUKHAYA NAMAH
OM DUMU NAMAH
OM BUDDHAYA NAMAH
OM VIGHNARAJAYA NAMAH
OM GAJANAYA NAMAH
OM BHIMAYA NAMAH
OM PRAMODAYA NAMAH
OM AANODAYA NAMAH
OM SURAN NANDAYA NAMAH
OM MOHATKATAYA NAMAH
OM HAYRAMBHAYA NAMAH
OM SHAMBARAYA NAMAH
OM SHAMBHAVEY NAMAH
OM LAMBAKARNAYA NAMAH
OM MAHABALAYA NAMAH
OM NANDANAYA NAMAH
OM ALAMPATAYA NAMAH
OM ABHIRVEY NAMAH
OM MEGHNADAYA NAMAH
OM GANGAJAYA NAMAH
OM VINAYKAYA NAMAH
OM VIRUPAKSHAYA NAMAH
OM DHIRSHURAYA NAMAH
OM VARPRADAYA NAMAH
OM MAHA GANPATYE NAMAH
OM BUDDHIPRIYAYA NAMAH
OM SHIPRA PRASADNAYA NAMAH
OM RUDRA PRIYAYA NAMAH
OM GANADHYAKSHAYA NAMAH
OM UMA PUTRAYA NAMAH
OM AAGHNASHAYA NAMAH
OM KUMAR GURVE NAMAH
OM EESHAN PUTRAYA NAMAH
OM MUSHAK VAHANAYA NAMAH
OM SIDDHI PRIYAYA NAMAH
OM SIDDHA VINAYAKAYA NAMAH
OM SIDDHAYA NAMAH
OM AVIGHAYA NAMAH
OM TUMBARVE NAMAH
OM SIMHAVANAYA NAMAH
OM MOHINI PRIYAYA NAMAH
OM KATAGKANTAYA NAMAH
OM RAJ PUTRAYA NAMAH
OM SHAALKAYA NAMAH
OM SAMMITAYA NAMAH
OM AMITAYA NAMAH
OM KUSHMA MANDSAMSAMBHOOTHYE NAMAH
OM DURJAYA NAMAH
OM DHURJAYA NAMAH
OM JAYAYA NAMAH
OM BHOOPATYE NAMAH
OM BHOOVANPATYE NAMAH
OM AVYAYA NAMAH
OM VISHWAKATRE NAMAH
OM VISHWA MUKHAYA NAMAH
OM VISHWA RUPAYA NAMAH
OM NIDHYE NAMAH
OM GHRUNYE NAMAH
OM KRAYE NAMAH
OM KAVINA MRUSHBHAYA NAMAH
OM BHRAMANAYA NAMAH
OM BHRAMANASPATYE NAMAH
OM JYESHTA RAJAYA NAMAH
OM NIDDHI PRIYA PATI PRIYAYA NAMAH
OM SURYA MANDAL MADHYA GAYAY NAMAH
OM KARAHATIDHAVSTA SINDHU SALILAYA NAMAH
OM PUSHDANTABHIDE NAMAH
OM UMANGKELIKUTUKINE NAMAH
OM MUKTIDAYA NAMAH
OM KUKPALNAYA NAMAH
OM KIRITINE NAMAH
OM KUNDALINE NAMAH
OM HARINE NAMAH
OM VANMALINE NAMAH
OM MANOMAYAY NAMAH
OM VYUUKHYAHATYDTYATSHRIYE NAMAH
OM PADAHATIJITSHITYE NAMAH
OM SADHYOJAATSVARNAMUJYAMEKILINE NAMAH
OM DUDIRMITHRITE NAMAH
OM DUSWAPNAHRITE NAMAH
OM PRASHANAYA NAMAH
OM GUNINE NAMAH
OM NAADPRATITHISTAYA NAMAH
OM SURUPAYA NAMAH
OM SARVANETRADHIVASAYA NAMAH
OM VIVASANA SHRAVAYA NAMAH
OM PITAMBARAYA NAMAH
OM KHANDARDAYA NAMAH
OM KHANDENDUKRUTSHEKHARYA NAMAH
OM CHITRANGDASHYAMDASHNAYA NAMAH
OM BHAALCHANDRAYA NAMAH
OM CHATURBHURJAYA NAMAH
OM YOGADHIPAYA NAMAH
OM TARKSTAYA NAMAH
OM PURSHAYA NAMAH
OM GAJKARNAKAYA NAMAH
JAI SAI RAM~~~
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« Reply #8 on: September 03, 2008, 08:00:03 PM » |
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ॐ सांई राम~~~
श्री गणेश चालीसा~~~
जय गणपति सदगुणसदन, कविवर बदन कृपाल ।
विघ्न हरण मंगल करण, जय जय गिरिजालाल ।।
जय जय जय गणपति गणराजू । मंगल भरण करण शुभ काजू ।।
जै गजबदन सदन सुखदाता । विश्व विनायक बुद्घि विधाता ।।
वक्र तुण्ड शुचि शुण्ड सुहावन । तिलक त्रिपुण्ड भाल मन भावन ।।
राजत मणि मुक्तन उर माला । स्वर्ण मुकुट शिर नयन विशाला ।।
पुस्तक पाणि कुठार त्रिशूलं । मोदक भोग सुगन्धित फूलं ।।
सुन्दर पीताम्बर तन साजित । चरण पादुका मुनि मन राजित ।।
धनि शिवसुवन षडानन भ्राता । गौरी ललन विश्व-विख्याता ।।
ऋद्घि-सिद्घि तव चंवर सुधारे । मूषक वाहन सोहत द्घारे ।।
कहौ जन्म शुभ-कथा तुम्हारी । अति शुचि पावन मंगलकारी ।।
एक समय गिरिराज कुमारी । पुत्र हेतु तप कीन्हो भारी ।
भयो यज्ञ जब पूर्ण अनूपा । तब पहुंच्यो तुम धरि द्घिज रुपा ।।
अतिथि जानि कै गौरि सुखारी । बहुविधि सेवा करी तुम्हारी ।।
अति प्रसन्न है तुम वर दीन्हा । मातु पुत्र हित जो तप कीन्हा ।।
मिलहि पुत्र तुहि, बुद्घि विशाला । बिना गर्भ धारण, यहि काला ।।
गणनायक, गुण ज्ञान निधाना । पूजित प्रथम, रुप भगवाना ।।
अस कहि अन्तर्धान रुप है । पलना पर बालक स्वरुप है ।।
बनि शिशु, रुदन जबहिं तुम ठाना । लखि मुख सुख नहिं गौरि समाना ।।
सकल मगन, सुखमंगल गावहिं । नभ ते सुरन, सुमन वर्षावहिं ।।
शम्भु, उमा, बहु दान लुटावहिं । सुर मुनिजन, सुत देखन आवहिं ।।
लखि अति आनन्द मंगल साजा । देखन भी आये शनि राजा ।।
निज अवगुण गुनि शनि मन माहीं । बालक, देखन चाहत नाहीं ।।
गिरिजा कछु मन भेद बढ़ायो । उत्सव मोर, न शनि तुहि भायो ।।
कहन लगे शनि, मन सकुचाई । का करिहौ, शिशु मोहि दिखाई ।।
नहिं विश्वास, उमा उर भयऊ । शनि सों बालक देखन कहाऊ ।।
पडतहिं, शनि दृग कोण प्रकाशा । बोलक सिर उड़ि गयो अकाशा ।।
गिरिजा गिरीं विकल है धरणी । सो दुख दशा गयो नहीं वरणी ।।
हाहाकार मच्यो कैलाशा । शनि कीन्हो लखि सुत को नाशा ।।
तुरत गरुड़ चढ़ि विष्णु सिधायो । काटि चक्र सो गज शिर लाये ।।
बालक के धड़ ऊपर धारयो । प्राण, मन्त्र पढ़ि शंकर डारयो ।।
नाम गणेश शम्भु तब कीन्हे । प्रथम पूज्य बुद्घि निधि, वन दीन्हे । ।
बुद्घि परीक्षा जब शिव कीन्हा । पृथ्वी कर प्रदक्षिणा लीन्हा ।।
चले षडानन, भरमि भुलाई । रचे बैठ तुम बुद्घि उपाई ।।
चरण मातु-पितु के धर लीन्हें । तिनके सात प्रदक्षिण कीन्हें ।।
तुम्हरी महिमा बुद्घि बड़ाई । शेष सहसमुख सके न गाई ।।
मैं मतिहीन मलीन दुखारी । करहुं कौन विधि विनय तुम्हारी ।।
भजत रामसुन्दर प्रभुदासा । जग प्रयाग, ककरा, दर्वासा ।।
अब प्रभु दया दीन पर कीजै । अपनी भक्ति शक्ति कछु दीजै ।।
दोहा~~
श्री गणेश यह चालीसा, पाठ करै कर ध्यान । नित नव मंगल गृह बसै, लहे जगत सन्मान ।।
सम्बन्ध अपने सहस्त्र दश, ऋषि पंचमी दिनेश । पूरण चालीसा भयो, मंगल मूर्ति गणेश ।।
जय सांई राम~~~
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"लोका समस्ता सुखिनो भवन्तुः ॐ शन्तिः शन्तिः शन्तिः"
" Loka Samasta Sukino Bhavantu Aum ShantiH ShantiH ShantiH"~~~
May all the worlds be happy. May all the beings be happy. May none suffer from grief or sorrow. May peace be to all~~~
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tana
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~सांई~~ੴ~~सांई~
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« Reply #9 on: September 05, 2008, 07:38:13 PM » |
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Om Sai Ram~~~
श्रीगणेशस्तोत्र~~~
श्रीगणेशाय नमः ~~~ श्रीगणेशाय नमः ~~~ श्रीगणेशाय नमः ~~~
प्रणम्य शिरसा देवं गौरीपुत्रं विनायकम् ~ भक्तावासं स्मरेनित्यं आयुःकामार्थसिद्धये ~~~
प्रथमं वक्रतुण्डं च एकदन्तं द्वितीयकम् ~ तृतीयं कृष्णपिङ्गाक्षं गजवक्त्रं चतुर्थकम् ~~~
लम्बोदरं पञ्चमं च षष्ठं विकटमेव च ~ सप्तमं विघ्नराजेन्द्रं धूम्रवर्णं तथाष्टमम् ~~~
नवमं भालचन्द्रं च दशमं तु विनायकम् ~ एकादशं गणपतिं द्वादशं तु गजाननम् ~~~
द्वादशैतानि नामानि त्रिसंध्यं यः पठेन्नरः ~ न च विघ्नभयं तस्य सर्वसिद्धिकरः प्रभुः ~~~
विद्यार्थी लभते विद्यां धनार्थी लभते धनम् ~ पुत्रार्थी लभते पुत्रान्मोक्षार्थी लभते गतिम् ~~~
जपेद्गणपतिस्तोत्रं षड्भिर्मासैः फलं लभेत् ~ संवत्सरेण सिद्धिं च लभते नात्र संशयः ~~~
अष्टेभ्यो ब्राह्मणेभ्यश्च लिखित्वा यः समर्पयेत् ~ तस्य विद्या भवेत्सर्वा गणेशस्य प्रसादतः ~~~
इति श्रीनारदपुराणे संकटनाशनं गणेशस्तोत्रं संपूर्णम्~~~
Jai Sai Ram~~~
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tana
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~सांई~~ੴ~~सांई~
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« Reply #10 on: September 06, 2008, 09:41:51 PM » |
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ॐ सांई राम~~~
वक्रतुंड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ, निर्विघ्नं कुरुमे देव सर्व कार्येषु सर्वदा ॥
ॐ गं गणपतयै नमः~~~ॐ गं गणपतयै नमः~~~ॐ गं गणपतयै नमः~~~ ॐ गं गणपतयै नमः~~~ॐ गं गणपतयै नमः~~~ॐ गं गणपतयै नमः~~~ ॐ गं गणपतयै नमः~~~ॐ गं गणपतयै नमः~~~ॐ गं गणपतयै नमः~~~ ॐ गं गणपतयै नमः~~~ॐ गं गणपतयै नमः~~~ॐ गं गणपतयै नमः~~~ ॐ गं गणपतयै नमः~~~ॐ गं गणपतयै नमः~~~ॐ गं गणपतयै नमः~~~
जय सांई राम~~~
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