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Author Topic: Bhakti  (Read 124087 times)

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  • साई राम اوم ساي رام ਓਮ ਸਾਈ ਰਾਮ OM SAI RAM
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Bhakti
« on: December 04, 2013, 05:37:53 AM »
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  • एक भक्त था वह हनुमान जी को
    बहुत मनाता था,

    बड़े प्रेम और भाव से उनकी सेवा किया
    करता था.

    एक दिन भगवान से
    कहने लगा–
    मैँ आपकी इतनी भक्ति करता हूँ
    पर आज तक मुझे आपकी अनुभूति
    नहीं हुई.

    मैं चाहता हूँ कि आप भले ही मुझे
    दर्शन ना दे पर ऐसा कुछ कीजिये
    की मुझे ये अनुभव हो की आप हो.
    भगवान ने कहा ठीक है.

    तुम रोज सुबह समुद्र के किनारे
    सैर पर जाते हो,
    जब तुम रेत पर चलोगे तो तुम्हे
    दो पैरो की जगह चार पैर दिखाई देँगे,

    दो तुम्हारे पैर होगे और दो पैरो के
    निशान मेरे होगे.

    इस तरह तुम्हे मेरी अनुभूति होगी.
    अगले दिन वह सैर पर गया,

    जब वह रेत पर चलने लगा तो उसे
    अपने पैरों के साथ-साथ दो पैर और
    भी दिखाई दिये वह बड़ा खुश हुआ,

    अब रोज ऐसा होने लगा.

    एक बार उसे व्यापार में घाटा हुआ
    सब कुछ चला गया,

    वह कंगाल हो गया उसके अपनो
    ने उसका साथ छोड दिया.

    (देखो यही इस दुनिया की समस्या है,
    मुसीबत मे सब साथ छोड देते है).

    अब वह सैर पर गया तो उसे
    चार पैरों की जगह दो पैर दिखाई दिये.
    उसे बड़ा आश्चर्य हुआ कि बुरे वक्त
    मेँ भगवान ने साथ छोड दिया.

    धीरे-धीरे सब कुछ ठीक होने लगा
    फिर सब लोग उसके पास वापस आने लगे.

    एक दिन जब वह सैर पर गया तो
    उसने देखा कि चार पैर वापस
    दिखाई देने लगे.

    उससे अब रहा नही गया,
    वह बोला-
    भगवान जब मेरा बुरा वक्त था तो
    सब ने मेरा साथ छोड़ दिया था पर
    मुझे इस बात का गम नहीं था
    क्योकि
    इस दुनिया में ऐसा ही होता है,
    पर आप ने भी उस समय मेरा साथ
    छोड़ दिया था,

    ऐसा क्यों किया?

    तो भगवान ने कहा – तुमने ये कैसे सोच लिया की मैँ तुम्हारा
    साथ छोड़ दूँगा, तुम्हारे बुरे वक्त में जो रेत पर तुमने दो पैरोँ के निशान देखे वे तुम्हारे
    पैरों के नहीं मेरे पैरों के थे।
    उस समय मैँ तुम्हे अपनी गोद में
    उठाकर चलता था और आज जब
    तुम्हारा बुरा वक्त खत्म हो गया तो मैंने तुम्हे नीचे उतार दिया है।
    इसलिए तुम्हे फिर से चार पैर
    दिखाई दे रहे हैं।

    Offline ShAivI

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    • बाबा मुझे अपने ह्र्दय से लगा लो, अपने पास बुला लो।
    Re: Bhakti
    « Reply #1 on: December 05, 2013, 01:56:32 AM »
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  • ॐ साई राम !!!

    भक्ति क्या है जानिए

    हे पुण्य आत्माओ भक्ति का अर्थ जानिए और समझिये कहीं कोई गलती तो नहीं हो रही है
    भक्ति का अर्थ है भावनाओं की पराकाष्ठा .प्रभु और उनके असंख्य रूपों के प्रति प्रेम ..
    ये प्रेम कोई सीमित नहीं होता बल्कि इसकी तो कोई सीमा ही नहीं होती ..
    जब प्रभु की सच्ची भक्ति मिलती है तो घट घट में प्रभु का ही वास नजर आता है .
    भक्ति का संगीत उसी दिल में बजता है जिसके अंतर में भूखे को देखकर करुणा जागती है ....
    किसी पीड़ित को देखकर उसकी पीड़ा दूर करने की चेष्टा करता है....
    जो किसी गलत राह पर जानेवाले को सन्मार्ग पर लाने की कोशिश करता है..
    जो भक्त होता है उसका भक्तिपूर्ण ह्रदय जगत को भगवान की तरह देखता है...
    और जिसके दिल में भक्ति नहीं उसका हृदय जगत को पत्थर की तरह देखता है...
    जगत में वही दिखाई पड़ता है, जो हम हैं...
    अगर भीतर भक्ति का भाव गहरा हुआ, तो जगत भगवान हो जाता है....
    फिर ऐसा नहीं है कि भगवान कहीं बैठा होता है किसी मंदिर में;
    फिर तो कण कण में भगवान् ही दीखते है ...
    जिसे सच्ची भक्ति मिल जाए ऐसे सच्चे भक्त को सब में भगवान् ही दिखाई देते है
    और शिवाय प्रभु के उसे कुछ चाहिए भी नहीं होता और प्रभु मिलते भी ऐसे ही भक्त को है ..
    सच्ची भक्ति भगवान् के मंदिर में करोडो का सोना चढाने से या ढोल मंजीरा बजने से नहीं होती
    बल्कि दीन दुखियो को उसी परम सत्ता का अंश मानकर उसकी सेवा करने से होती है..........

    ॐ साई राम, श्री साई राम, जय जय साई राम !!!

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    Offline ShAivI

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    • बाबा मुझे अपने ह्र्दय से लगा लो, अपने पास बुला लो।
    Re: Bhakti
    « Reply #2 on: December 08, 2013, 11:53:52 PM »
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  • ॐ साई राम !!!

    भक्ति क्या है जानिए

    एक बार एक राजा था.
    राजा ने एक संत से पूछा कि आप हमें ये बताईये कि लोग क्यों कहते हैं कि भक्ति करो.
    आखिर भक्ति में क्या है तो संत ने कहा कि मै तुम्हे बता सकता हूँ कि भक्ति में क्या है.
    पर तुम मुझे ये बताओ कि आम का स्वाद क्या है. राजा ने कहा कि आम का स्वाद मीठा है.
    तो संत ने कहा हाँ,हाँ चीनी भी तो मीठी होती है तो क्या वो आम है.
    राजा ने कहा - नही.
    तो फिर बताओ न आम का स्वाद क्या है.
    अब राजा को कुछ भी समझ नही आया कि क्या जबाव दे तो
    फिर संत ने कहा कि ठीक है मै तुम्हे जबाव देता हूँ.
    जाओ आम मंगाओ.
    आम लाया गया. राजा ने वो आम लिया और संत को दिया.
    संत ने कहा कि ये आप हमें मत दीजिए.
    इसे आप छीलिये और खाईये.
    राजा ने आम को छीला और उसे खाया.
    खाकर कहा कि हाँ अब समझ आया कि आम का स्वाद कैसा है.

    संत ने कहा-हाँ यही तो मै चाहता था.
    तुम इसे खाओ तभी समझ आएगा कि आम का स्वाद क्या है.
    आम का स्वाद कैसा है तुम इसे शब्दों में बयां नही कर सकते.
    इसीप्रकार से भक्ति में काया रस है.भगवान में क्या रस है,
    भगवान की भक्ति कैसे आपको विमल बना सकती है,
    ये शब्दों में बयां नही कर सकते.इसके लिए हमें भक्ति करनी होगी.

    ॐ साई राम, श्री साई राम, जय जय साई राम !!!
    « Last Edit: December 09, 2013, 12:05:19 AM by ShAivI »

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    Offline Anupam

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    Re: Bhakti
    « Reply #3 on: December 12, 2013, 11:11:09 AM »
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  • <<भगवान जब मेरा बुरा वक्त था तो
    सब ने मेरा साथ छोड़ दिया था पर
    मुझे इस बात का गम नहीं था
    क्योकि
    इस दुनिया में ऐसा ही होता है,
    पर आप ने भी उस समय मेरा साथ
    छोड़ दिया था,
    तो भगवान ने कहा – तुमने ये कैसे सोच लिया की मैँ तुम्हारा
    साथ छोड़ दूँगा, तुम्हारे बुरे वक्त में जो रेत पर तुमने दो पैरोँ के निशान देखे वे तुम्हारे
    पैरों के नहीं मेरे पैरों के थे।
    उस समय मैँ तुम्हे अपनी गोद में
    उठाकर चलता था और आज जब
    तुम्हारा बुरा वक्त खत्म हो गया तो मैंने तुम्हे नीचे उतार दिया है।
    इसलिए तुम्हे फिर से चार पैर
    दिखाई दे रहे हैं।>>

    ANY PRACTICAL PROOF OF THIS ABOVE CRAP.?? CHECK THE HISTORY SWAMI SHRADDHANANDA, GURU TEGH BAHADUR, SWAMI KESHWANANDA, NAMDEV, etc are examples of reverse, where was your God. Let us understand things rationally. God word itself falls short of GOOD by an O... When world is God means the entity is 99.999% evil

    <<भक्ति का अर्थ है भावनाओं की पराकाष्ठा >>

    Signs of Insanity...

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    Re: Bhakti
    « Reply #4 on: December 25, 2013, 03:40:20 AM »
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  • ॐ श्री साई नाथाय नमः

    भगवान् को अपने भक्त सदैव ही प्रिये है, और अपने भक्तो पर सदैव ही उनकी करुणा बरसती रहती है!

    ऐसा हीभक्त था, नाम था गोवर्धन!

    गोवर्धन एक ग्वाला था,बचपन से दूसरों पे आश्रित,क्योंकि उसका कोई नहीं था,
    जिस गाँव में रहता,वहां की लोगो की गायें आदि चरा कर जो मिलता,
    उसी से अपना जीवन चलाता!पर गाँव के सभी लोग उस से बहुत प्यार करते थे!

    एक दिन गाँव की एक महिला, जिसे वह काकी कहता था, के साथ उसे वृन्दावन जाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ!
    उसने वृन्दावन के ठाकुर श्री बांके बिहारी जी के बारे बहुत कुछ सुना था,
    सो दर्शन की इच्छा तो मन में पहले से थी! वृन्दावन पहुँच कर जब उसने बिहारी जी के दर्शन किये,
    तो वो उन्हे देखता ही रह गया,और उनकी छवि मेंखो गया!एकाएक उसे लगा के जैसे ठाकुर जी उसको कह रहे है..
    "आ गए मेरे गोवर्धन!मैं कब से प्रतीक्षा कररहा था,मैं गायें चराते थक गया हूँ,अब तू ही मेरी गायें चराने जाया कर!
    "गोवर्धन ने मन ही मन"हाँ"कही! इतनी में गोस्वामी जी ने पर्दा दाल दिया, तो गोवर्धन का ध्यान टूटा!

    जब मंदिर बंद होने लगा,तो एक सफाई कर्मचारी ने उसे बाहर जाने को कहा!गोवर्धन ने सोचा,
    ठीक ही तो कह रहा है,सारा दिन गायें चराते हुए ठाकुर जी थक जाते होंगे,सो अब आराम करेंगे!
    तो उसने सेवक से कहा,..ठीक है,पर तुम बिहारी जी से कहना,कि कल से उनकी गायें चराने मैं ले जाऊंगा!
    इतना कह वो चल दिया!सेवक ने उसकी भोली सी बात गोस्वामी जी को बताई,गोस्वामी जी ने सोचा,
    कोई बिहारी जी के लिए अनन्य भक्ति ले कर आया है,चलो यहाँ रह कर गायें भी चरा लेगा,और उसके खाने पीने,
    रहने का इंतजाम मैं कर दूंगा!गोवर्धन गोस्वामी जी के मार्ग दर्शन में गायें चराने लगा!सारा सामान
    और दोपहर का भोजन इत्यादि उसे वही भेज दिया जाता!

    एक दिन मंदिर में भव्य उत्सव था,गोस्वामी जी व्यस्त होने के कारण गोवर्धन को भोजन भेजना भूल गए!
    पर भगवान् को तो अपने भक्त का ध्यान नहीं भूलता!उन्होने अपने एक वस्त्र में कुछ मिष्ठान इत्यादि बांधे और
    पहुँच गए यमुना पे गोवर्धन के पास..गोवर्धन ने कहा,आज बड़ी देर कर दी,बहुत भूख लगी हैं!गोवर्धन ने जल्दी से
    सेवक के हाथ से पोटली ले कर भर पेट भोजन पाया!इतने में सेवक जाने कहाँ चला गया,अपना वस्त्र वहीँ छोड़ कर!

    शाम को जब गोस्वामी जी को भूल का एहसास हुआ,तो उन्होने गोवर्धन से क्षमा मांगी,तो गोवर्धन ने कहा.
    "अरे आप क्या कह रहे है,आपने ही तो आज नए सेवक को भेजा था,प्रसाद देकर,ये देखो वस्त्र,जो वो जल्दी
    में मेरे पास छोड़ गया!"गोस्वामी जी ने वस्त्र देखा तो गोवर्धन पर बिहारी जी की कृपा देख आनंदित हो उठे!
    ये वस्त्र स्वयं बिहारी जी का पटका(गले में पहनने वाला) था,जो उन्होने खुद सुबह उनको पहनाया था!..........
    « Last Edit: December 25, 2013, 03:43:34 AM by Mridul.IVAR »
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    • सबका मालिक एक
    Re: Bhakti
    « Reply #5 on: December 25, 2013, 03:42:40 AM »
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  • ॐ श्री साई नाथाय नमः

    "जो ये जानता है कि भौतिक सुख चाहे अच्छा हो या बुरा, इस जीवन में हो या अगले जीवन में,
    इस लोक में हो या स्वर्गलोक में हो,क्षणिक तथा व्यर्थ है और ये जानता है कि बुद्धिमान पुरुष को
    ऐसे ऐसी वस्तुओं को भोगने या सोचने का प्रयास नही करना चाहिए, वो आत्मज्ञानी है.

    ऐसा स्वरुपसिद्ध व्यक्ति अच्छी तरह से जानता है कि भौतिक सुख बारम्बार जन्म और
    अपने स्वाभाविक स्थिति के विस्मरण का एक मात्र कारण है." तो भगवान को जानने के लिए ही
    ये मानव जीवन मिला है हमे . उन्हें जानिये, उन्हें मानिए और उनके हो जाईये...........

     
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    Re: Bhakti
    « Reply #6 on: February 17, 2014, 11:46:21 PM »
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  • ॐ श्री साई नाथाय नमः

    --- यमराज और सरीर कि कहानी ---

    एक आदमी मर गया. जब उसे महसूस हुआ तो उसने देखा कि भगवान उसके पास आ रहे हैं
    और उनके हाथ में एक सूट केस है.

    भगवान ने कहा --पुत्र चलो अब समय हो गया.

    आश्चर्यचकित होकर आदमी ने जबाव दिया -- अभी इतनी जल्दी? अभी तो मुझे बहुत काम करने हैं.
    मैं क्षमा चाहता हूँ किन्तु अभी चलने का समय नहीं है.

    आपके इस सूट केस में क्या है?

    भगवान ने कहा -- तुम्हारा सामान.

    मेरा सामान? आपका मतलब है कि मेरी वस्तुएं, मेरे कपडे, मेरा धन?

    भगवान ने प्रत्युत्तर में कहा -- ये वस्तुएं तुम्हारी नहीं हैं. ये तो पृथ्वी से सम्बंधित हैं.

    आदमी ने पूछा -- मेरी यादें?

    भगवान ने जबाव दिया -- वे तो कभी भी तुम्हारी नहीं थीं. वे तो समय की थीं.

    फिर तो ये मेरी बुद्धिमत्ता होंगी?

    भगवान ने फिर कहा -- वह तो तुम्हारी कभी भी नहीं थीं. वे तो परिस्थिति जन्य थीं.

    तो ये मेरा परिवार और मित्र हैं?

    भगवान ने जबाव दिया -- क्षमा करो वे तो कभी भी तुम्हारे नहीं थे. वे तो राह में मिलने वाले पथिक थे.

    फिर तो निश्चित ही यह मेरा शरीर होगा?

    भगवान ने मुस्कुरा कर कहा -- वह तो कभी भी तुम्हारा नहीं हो सकता क्योंकि वह तो राख है.

    तो क्या यह मेरी आत्मा है?

    नहीं वह तो मेरी है --- भगवान ने कहा.

    भयभीत होकर आदमी ने भगवान के हाथ से सूट केस ले लिया और
    उसे खोल दिया यह देखने के लिए कि सूट केस में क्या है. वह सूट केस खाली था.

    आदमी की आँखों में आंसू आ गए और उसने कहा -- मेरे पास कभी भी कुछ नहीं था.

    भगवान ने जबाव दिया -- यही सत्य है. प्रत्येक क्षण जो तुमने जिया,
    वही तुम्हारा था. जिंदगी क्षणिक है और वे ही क्षण तुम्हारे हैं.

    इस कारण जो भी समय आपके पास है, उसे भरपूर जियें. आज में जियें. अपनी जिंदगी जिए.

    खुश होना कभी न भूलें, यही एक बात महत्त्व रखती है.

    भौतिक वस्तुएं और जिस भी चीज के लिए आप यहाँ लड़ते हैं, मेहनत करते हैं...
    आप यहाँ से कुछ भी नहीं ले जा सकते हैं.......
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    • सबका मालिक एक
    Re: Bhakti
    « Reply #7 on: March 04, 2014, 11:05:09 AM »
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  • ॐ श्री साई नाथाय नमः

    यहाँ बताया गया है कि भगवान बद्धजीवों के प्रति इतने दयालु हैं.बद्धजीव.आप जानते हैं कि
    हम बद्धजीव हैं. हम बंधे हुए हैं.देखिये न हमें कितने-कितने सपने बाँध के रखते हैं.कितनी
    इच्छाएं बाँध के रखती हैं.प्रकृति के तीन गुण और इनके कितने ही संयोजन.

    "भगवान बद्धजीव के प्रति इतने दयालु हैं कि यदि जीव अनजाने में भी उनका नाम लेकर
    उन्हें पुकारते है तो भगवान उनके हृदयों में असंख्य पापों को नष्ट करने के लिए उद्यत रहते हैं
    इसलिए जब उनके चरणों की शरण में आया हुआ भक्त प्रेमपूर्वक भगवान के पवित्र नामों का
    कीर्त्तन करता है तो भगवान ऐसे भक्त को कभी छोड़ नही पाते.इसतरह जिसने भगवान को
    अपने ह्रदय के भीतर बाँध रखा है वो भागवत प्रधान कहलाता है.".

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    Re: Bhakti
    « Reply #8 on: March 05, 2014, 04:17:36 AM »
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  • OM SAI RAM !!!

    There are people who visit a temple for a while for particular favours.
    If the favour is not granted or delayed, they stop going to the temple.
    They may even remove the photograph of God from the prayer room
    and keep it elsewhere.

    Bhakti is unconditional.

    God knows what you need; that will be given and that alone will be given...

    OM SAI RAM, SHREE SAI RAM, JAI JAI SAI RAM!!!

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    Re: Bhakti
    « Reply #9 on: March 17, 2014, 05:47:25 AM »
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  • भक्ति है संजीवनी बूटी

    भक्ति है संजीवनी बूटी जो देती है जीवन,
    भक्ति दान दो तुम भक्तों को भगवन,
    भक्ति की दौलत के आगे फीके फीके सब धन,
    भक्ति दान दो तुम भक्तों को भगवन.

    जब प्रह्लाद को मारना चाहा दुनिया की हर शक्ति ने,
    भक्ति शक्ति जब टकराई, जीती बाजी भक्ति ने.
    उसको कौन मिटाए जिसने किया है भक्ति धारण.

    भरी सभा में द्रोपदी की भक्ति ही तो काम आई,
    भक्ति की शक्ति से मीरा, विष को अमृत कर पायी,
    प्रभु को बस में कर लेता है, भक्ति भरा है जो मन.

    शबरी की भक्ति के आगे हार गए पंडित विद्वान्,
    सच्चे भक्तों की भक्ति पर बलिहारी जाते भगवान,
    मुख उजला है प्रभु भगत का, धन्य धन्य है वो जन.

    अगर, मगर, क्यों, किन्तु, लेकिन भक्ति में ये बाधक हैं,
    प्रभु रजा में राजी रहने वाला सच्चा साधक है,
    भक्ति वही कर पाया "जगत" में जिसने किया समर्पण.


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    Re: Bhakti
    « Reply #10 on: April 07, 2014, 04:49:59 AM »
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  • ॐ साई राम !!!

    भक्ति क्या है जानिए

    एक सूफी फकीर निरंतर कहा करता था,
    कि परमात्मा तेरा धन्यवाद। अहोभाग्य है मेरे,
    कि जब मेरी जो जरूरत होती है, तू तत्क्षण पूरी कर देता है।

    उसके शिष्य उससे धीरे-धीरे परेशान हो गए।
    यह बात सुन-सुन कर, क्योंकि वे कुछ देखते नहीं थे,
    कि कौन सी जरूरत पूरी हो रही है? फकीर गरीब था।
    शिष्य भूखे मरते थे। कुछ उपाय न था।
    और यह रोज सुबह सांझ पांच बार मुसलमान फकीर पांच बार प्रार्थना करे
    और पांच बार भगवान को धन्यवाद देता और ऐसे अहोभाव से!
    तो शिष्यों को लगता कि यह भी क्या मामला है?

    एक दिन हद हो गई।
    यात्रा पर थे, तीर्थ-यात्रा के लिए जा रहे थे।
    तीन दिन से भूखे-प्यासे थे।
    एक गांव में सांझ थके-मांदे आए।
    गांव के लोगों ने ठहराने से इनकार कर दिया।
    तो वृक्षों के नीचे, भूखे, थके-मांदे पड़े हैं।
    और आखिरी प्रार्थना का क्षण आया, कोई उठा नहीं।
    क्या प्रार्थना करनी है?
    किससे प्रार्थना करनी है?
    हो गई बहुत प्रार्थना!
    यह क्षण नहीं था प्रार्थना का।
    लेकिन गुरु उठा, उसने हाथ जोड़े।
    वही अहोभाव की धन्यवाद परमात्मा,
    जब भी मेरी जो भी जरूरत होती है,
    तू तभी पूरी कर देता है।

    एक शिष्य से यह बर्दाश्त न हुआ,
    उसने कहा, बंद करो बकवास।
    यह हम बहुत सुन चुके।
    अब आज तो यह बिलकुल ही असंगत है।
    तीन दिन से भूखे-प्यासे हैं,
    छप्पर सिर पर नहीं है।
    ठंडी रेगिस्तानी रात में बाहर पड़े हैं,
    किस बात का धन्यवाद दे रहे हो?

    उस फकीर ने कहा, आज गरीबी मेरी जरूरत थी।
    आज भूख मेरी जरूरत थी, वह उसने पूरी की।
    आज नगर के बाहर पड़े रहना मेरी जरूरत थी।
    आज गांव मुझे स्वीकार न करे, यह मेरी जरूरत थी।
    और अगर इस क्षण में उसे धन्यवाद न दे पाया,
    तो मेरे सब धन्यवाद बेकार हैं।
    क्योंकि जब वह तुम्हें कुछ देता है,
    जो तुम्हारी मन के अनुकूल है,
    तब धन्यवाद का क्या अर्थ?
    जब वह तुम्हें कुछ देता है,
    जो तुम्हारे मन के अनुकूल नहीं है,
    तभी धन्यवाद का कोई अर्थ है।

    और जब उसने दिया है,
    तो जरूर मेरी जरूरत होगी,
    अन्यथा वह देगा ही क्यों?
    आज यही जरूरी होगा मेरे जीवन-उपक्रम में,
    मेरी साधना में, मेरी यात्रा में कि आज मैं भूखा रहूं,
    कि गांव अस्वीकार कर दे,
    कि रेगिस्तान में खुली रात, ठंडी रात पड़ा रहूं।
    आज यही थी जरूरत।
    और अगर इस जरूरत को उसने पूरा किया है
    और मैं धन्यवाद न दूं, तो बात ठीक न होगी।

    ऐसे व्यक्ति को ही परमात्मा उपलब्ध होता है।
    तो तुम जब उदास हो तो समझ लो कि यही थी तुम्हारी जरूरत।
    आज परमात्मा ने चाहा है कि उदासी में नाचो।
    पर नाच रुके नहीं, धन्यवाद बंद न हो, उत्सव जारी रहे।

    ॐ साई राम, श्री साई राम, जय जय साई राम !!!

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    • बाबा मुझे अपने ह्र्दय से लगा लो, अपने पास बुला लो।
    ॐ साई राम !!!

    कभी भगवान की प्रार्थना से मुंह फेरने की गलती न करें....



    दुःख में भगवान को याद करना चाहिए, लोग गलती यह करते हैं कि जब बहुत दुखी होते हैं तो
    भगवान् को भी भूल जाते हैं। दुख किसके जीवन में नहीं आता। बड़े से बड़ा और छोटे से
    छोटा व्यक्ति भी दुखी रहता है। पहुंचे हुए साधु से लेकर सामान्य व्यक्ति तक सभी के
    जीवन में दुख का समय आता ही है। कोई दुख से निपट लेता है और किसी को दुख
    निपटा देता है। दुख आए तो सांसारिक प्रयास जरूर करें, पर हनुमानजी एक शिक्षा
    देते हैं और वह है थोड़ा अकेले हो जाएं और परमात्मा के नाम का स्मरण करें।

    सुंदरकांड में अशोक वाटिका में हनुमानजी ने सीताजी के सामने श्रीराम का गुणगान शुरू किया।
    वे अशोक वृक्ष पर बैठे थे और नीचे सीताजी उदास बैठीं हनुमानजी की पंक्तियों को सुन रही थीं।
    रामचंद्र गुन बरनैं लागा। सुनतहिं सीता कर दुख भागा।।

    वे श्रीरामचंद्रजी के गुणों का वर्णन करने लगे, जिन्हें सुनते ही सीताजी का दुख भाग गया।
    तब हनुमंत निकट चलि गयऊ। फिरि बैठीं मन बिसमय भयऊ।। तब हनुमानजी पास चले गए।
    उन्हें देखकर सीताजी मुख फेरकर बैठ गईं। हनुमानजी रामजी का गुणगान कर रहे थे।
    सुनते ही सीताजी का दुख भाग गया। दुख किसी के भी जीवन में आ सकता है।

    जिंदगी में जब दुख आए तो संसार के सामने उसका रोना लेकर मत बैठ जाइए।
    परमात्मा का गुणगान सुनिए और करिए, बड़े से बड़ा दुख भाग जाएगा।
    आगे तुलसीदासजी ने लिखा है कि हनुमानजी को देखकर सीताजी मुंह फेरकर बैठ गईं।
    यह प्रतीकात्मक घटना बताती है कि हम भी कथाओं से मुंह फेरकर बैठ जाते हैं
    और यहीं से शब्द अपना प्रभाव बदल लेते हैं। शब्दों के सम्मुख होना पड़ेगा,
    शब्दों के भाव को उतारना पड़ेगा, तब परिणाम सही मिलेंगे।
    इसी को सत्संग कहते हैं।

    ॐ साई राम, श्री साई राम, जय जय साई राम !!!



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    • बाबा मुझे अपने ह्र्दय से लगा लो, अपने पास बुला लो।
    Re: Bhakti
    « Reply #12 on: August 28, 2014, 04:25:15 AM »
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  • ॐ साई राम !!!

    भक्ति क्या है जानिए

    एक गरीब बालक था जो कि अनाथ था।
    एक दिन वो बालक एक संत के आश्रम मेँ
    आया और बोला के बाबा आप सबका ध्यान
    रखते है,मेरा इस दुनिया मेँ कोई नहीँ हैँ
    तो क्या मैँ यहाँ आपके आश्रम मेँ रह सकता हूँ?
    बालक की बात सुनकर संत बोले बेटा तेरा नाम क्या है?
    उस बालक ने कहा मेरा कोई नाम नहीँ हैँ।
    तब संत ने उस बालक का नाम रामदास
    रखा और बोले की अब तुम यहीँ आश्रम मेँ रहना।

    रामदास वही रहने लगा और आश्रम के सारे काम
    भी करने लगा।उन संत की आयु 80 वर्ष
    की हो चुकी थी।

    एक दिन वो अपने शिष्यो से बोले की मुझे
    तीर्थ यात्रा पर जाना हैँ तुम मेँ से कौन कौन
    मेरे मेरे साथ चलेगा और कौन कौन आश्रम मेँ
    रुकेगा? संत की बात सुनकर सारे शिष्य बोले
    की हमआपके साथ चलेंगे.!

    क्योँकि उनको पता था की यहाँ आश्रम मेँ
    रुकेंगे तो सारा काम करना पड़ेगा इसलिये
    सभी बोले की हम तो आपके साथ
    तीर्थयात्रा पर चलेंगे। अब संत सोच मेँ पड़ गये की किसे साथ
    ले जायेऔर किसे नहीँ क्योँकि आश्रम पर
    किसी का रुकना भी जरुरी था।

    बालक रामदास संत के पास आया और
    बोला बाबा अगर आपको ठीक लगे तो मैँ
    यहीँ आश्रम पर रुक जाता हूँ। संत ने
    कहा ठीक हैँ पर तुझे कामकरना पड़ेगा आश्रम
    की साफ सफाई मे भले ही कमी रह जाये
    पर ठाकुरजी की सेवा मेकोई कमी मत रखना।

    रामदास ने संत से कहा की बाबा मुझे
    तो ठाकुर जी की सेवा करनी नहीँ आती आप
    बता दिजीये के ठाकुर जी की सेवा कैसे
    करनी है? फिर मैँ कर दुंगा।

    संत रामदास को अपने साथ मंदिर ले गये
    वहाँ उस मंदिर मे राम दरबार
    की झाँकी थी। श्रीराम जी,सीता जी,
    लक्ष्मणजी और हनुमान जी थे।

    संत ने बालक रामदास को ठाकुर
    जी की सेवा कैसे करनी है सब
    सिखा दिया। रामदास ने गुरु जी से
    कहा की बाबा मेरा इनसेरिशता क्या होगा
    ये भी बता दो क्योँकि अगर रिशता पता चल
    जाये तो सेवा करने मेँ आनंद आयेगा।

    उन संत ने बालक रामदास कहा की तु
    कहता था ना की मेरा कोई नहीँ हैँ तो आज
    से ये रामजी और सीताजी तेरे
    माता-पिता हैँ।

    रामदास ने साथ मेँ खड़े लक्ष्मण
    जी को देखकर कहा अच्छा बाबा और
    ये जो पास मेँ खड़े है वो कौन है?

    संत ने कहा ये तेरे चाचा जी है और हनुमान
    जी के लिये कहा की ये तेरे बड़े भैय्या है।

    रामदास सब समझ गया और फिर उनकी सेवा करने लगा।

    संत शिष्योँ के साथ यात्रा पर चले गये।
    आज सेवा का पहला दिन था रामदास ने सुबह
    उठकर स्नान किया और भिक्क्षा माँगकर
    लाया और फिर भोजन तैयार किया फिर
    भगवान को भोग लगाने के लिये मंदिर आया।

    रामदास ने श्रीराम सीता लक्ष्मण और
    हनुमान जी आगे एक-एक थाली रख दी और बोला
    अब पहले आप खाओ फिर मैँ भी खाऊँगा।

    रामदास को लगा की सच मेँ भगवान बैठकर
    खायेंगे. पर बहुत देर हो गई रोटी तो वैसी की वैसी थी।

    तब बालक रामदास ने सोचा नया नया रिशता बना हैँ
    तो शरमा रहेँ होँगे।

    रामदास ने पर्दा लगा दिया बाद मेँ खोलकर देखा तब
    भी खाना वैसे का वैसा पडा था।

    अब तो रामदास रोने लगा की मुझसे सेवा मे
    कोई गलती हो गई इसलिये खाना नहीँ खा रहेँ हैँ!

    और ये नहीँ खायेंगे तो मैँ भी नहीँ खाऊँगा और
    मैँ भुख से मर जाऊँगा..!

    इसलिये मैँ तो अब पहाड़ से कूदकर ही मर
    जाऊँगा।

    रामदास मरने के लिये निकल जाता है तब
    भगवान रामजी हनुमान जी को कहते हैँ
    हनुमान जाओ उस बालक को लेकर आओ और बालक से
    कहो की हम खाना खाने के लिये तैयार हैँ।

    हनुमान जी जाते हैँ और रामदास कूदने
    ही वाला होता हैँ की हनुमान जी पिछे से
    पकड़ लेते हैँ और बोलते हैँ क्याँ कर रहे हो?

    रामदास कहता हैँ आप कौन?

    हनुमान जी कहते है मैँ तेरा भैय्या हूँ
    इतनी जल्दी भूल गये?

    रामदास कहता है अब आये हो इतनी देर से
    वहा बोल रहा था की खाना खालो तब
    आये नहीँ अब क्योँ आ गये?

    तब हनुमान जी बोले पिता श्री का आदेश हैँ
    अब हम सब साथ बैठकर खाना खायेँगे।

    फिर रामजी,सीताजी, लक्ष्मणजी ,हनुमान
    जी साक्क्षात बैठकर भोजन करते हैँ।

    इसी तरह रामदास रोज उनकी सेवा करता और भोजन करता।

    सेवा करते 15 दिन हो गये एक दिन रामदास ने
    सोचा की कोई भी माँ बाप हो वो घर मेँ काम तो करते ही हैँ.
    पर मेरे माँ बाप तो कोई काम नहीँ करते सारे दिन खाते रहते हैँ.

    मैँ ऐसा नहीँ चलने दूँगा। रामदास मंदिर जाता हैँ
    ओर कहता हैँ पिता जी कुछ बात करनी हैँ आपसे।

    रामजी कहते हैँ बोल बेटा क्या बात हैँ?

    रामदास कहता हैँ की अब से मैँ अकेले काम
    नहीँ करुंगा आप सबको भी काम
    करना पड़ेगा, आप तो बस सारा दिन खाते रहते हो
    और मैँ काम करता रहता हूँ अब से ऐसा नहीँ होगा।

    राम जी कहते हैँ तो फिर बताओ बेटा हमेँ क्या काम करना है?

    रामदास ने कहा माता जी (सीताजी) अब से रसोई आपके हवाले.

    और चाचा जी(लक्ष्मणजी) आप सब्जी तोड़कर लाओँगे.
    और भैय्या जी (हनुमान जी) आप लकड़ियाँ लायेँगे.

    और पिता जी(रामजी) आप पत्तल बनाओँगे।

    सबने कहा ठीक हैँ।

    अब सभी साथ मिलकर काम करते हुऐँ एक
    परिवार की तरह सब साथ रहने लगेँ।

    एक दिन वो संत तीर्थ यात्रा से लौटे तो सिधा मंदिर मेँ गये
    और देखा की मंदिर सेप्रतिमाऐँ गायब हैँ.

    संत ने सोचा कहीँ रामदास ने प्रतिमा बेच
    तो नहीँ दी?

    संत ने रामदास को बुलाया और पुछा भगवान कहा गये?

    रामदास भी अकड़कर बोला की मुझे क्या पता
    रसोई मेँ कही काम कर रहेँ होंगे।

    संत बोले ये क्या बोल रहा?

    रामदास ने कहा बाबा मैँ सच बोल रहा हूँ जबसे आप गये हैँ
    ये चारोँ काम मेँ लगे हुऐँ हैँ।

    वो संत भागकर रसोई मेँ गये और सिर्फ एक झलक
    देखी की सीता जी भोजन बना रही हैँ

    राम जी पत्तल बना रहे है और फिर वो गायब
    हो गये और मंदिर मेँ विराजमान हो गये।

    संत रामदास के पास गये और बोले आज तुमने मुझे
    मेरे ठाकुर का दर्शन कराया तु धन्य हैँ।

    और संत ने रो रो कर रामदास के पैर पकड़ लिये...!

    भक्त मित्रोँ कहने का अर्थ यही हैँ की ठाकुरजी तो
    आज भी तैयार हैँ दर्शन देने के लिये
    पर कोई रामदास जैसा भक्त भी तो होना चाहीये ...!

    ॐ साई राम, श्री साई राम, जय जय साई राम !!!

    « Last Edit: August 28, 2014, 05:20:29 AM by ShAivI »

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    • बाबा मुझे अपने ह्र्दय से लगा लो, अपने पास बुला लो।
    Re: Bhakti
    « Reply #13 on: April 22, 2015, 11:49:16 AM »
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  • ॐ साई राम !!!

    भक्ति क्या है जानिए

    भक्ति जब भोजन में प्रवेश करती है,
    भोजन 'प्रसाद' बन जाता है।

    भक्ति जब भूख में प्रवेश करती है,
    भूख 'व्रत' बन जाती है।

    भक्ति जब पानी में प्रवेश करती है,
    पानी 'चरणामृत' बन जाता है।

    भक्ति जब सफर में प्रवेश करती है,
    सफर 'तीर्थयात्रा' बन जाता है।

    भक्ति जब संगीत में प्रवेश करती है,
    संगीत 'कीर्तन' बन जाता है।

    भक्ति जब घर में प्रवेश करती है,
    घर 'मन्दिर' बन जाता है।

    भक्ति जब कार्य में प्रवेश करती है,
    कार्य 'कर्म' बन जाता है।

    भक्ति जब क्रिया में प्रवेश करती है,
    क्रिया 'सेवा' बन जाती है।

    और...

    भक्ति जब व्यक्ति में प्रवेश करती है,
    व्यक्ति 'मानव' बन जाता है।



    ॐ साई राम, श्री साई राम, जय जय साई राम !!!

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    Re: Bhakti
    « Reply #14 on: June 05, 2015, 05:58:46 AM »
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  • ॐ साई राम !!!

    टेढ़े मेढ़े नटखट कान्हा की कहानी

    एक बार की बात है बॄन्दावन का एक साधु अयोध्या की गलियों मे
    राधेकृष्ण राधेकृष्ण जप रहा था
    तो एक अयोध्या का साधु बोला
    - अरे भाई क्या राधेकृष्ण लगा रखा है,
    अरे नाम ही जपना है तो सीताराम, सीताराम जपो ना।
    क्या उस टेढ़े मेढ़े का नाम लेते हो?


    यह सुन कर बृंदावन वाला साधु भड़क गया और बोला,
    भाई जुबान संभाल कर बात कीजिए,
    ये जुबान पान भी खिलाती है और लात भी खिलाती है,
    आपने मेरे इष्टदेव को टेढ़ा कैसे बोला?

    अयोध्या का साधु बोला :-भाई ये बिल्कुल सत्य है कि सच्चाई
    बहूत कड़वी होती है, लोग सहन नही कर पाते हैं,
    देखिए ना सच सुन कर आप कितने बौखला गये?
    लेकिन,
    सच्चाई छुप नही सकती बनावट के उसूलों से ,
    कि खुश्बू आ नही सकती कभी कागज के फूलों से।

    भाई हम यह साबित कर सकते हैं कि आपके कृष्ण तो टेढ़े मेढ़े हैं ही,
    उनका कुछ भी सीधा नही है।

    उसका नाम टेढ़ा, उसका धाम टेढ़ा, उसका काम टेढ़ा,
    और वो खुद भी टेढ़ा है, और मेरे राम को देखो
    कितने सीधे और कितने सरल हैं?

    बृंदावन वाला साधु -अरे..अरे, ये आपने क्या कह दिया !
    नाम टेढ़ा, धाम टेढ़ा, काम टेढ़ा।?

    अयोध्या वाला साधु :- बिल्कुल, आप खुद ये काग़ज़ और कलम लो
    और कृष्ण लिख कर देख लो………
    अब बताओ ये नाम टेढ़ा है कि नही?

    बृंदावन वाला साधु:- सो तो है!

    अयोध्या वाला साधु :- ठीक इसी तरह उसका धाम भी टेढ़ा है
    विश्वास नहीं है तो बृंदावन लिख कर देख लो।

    बृंदावन का साधु बोला- चलो हम मानते हैं कि नाम और धाम
    टेढ़ा है लेकिन उनका काम टेढ़ा है और
    वो खुद भी टेढ़े है ये आपने कैसे कहा?

    अयोध्या का साधु बोला-प्यारे……….ये भी बताना पड़ेगा,

    अरे भाई जमुना मे नहाती गोपियों के वस्त्र चुराना,रास रचाना,
    माखन चुराना ये सब कोई शरीफों का सीधा सादा काम है क्या,
    और आज तक कोई हमें ये बता दें कि किसी ने भी
    उनको सीधे खड़े देखा है क्या?

    फिर क्या था, बृंदावन के साधु को अपने कृष्ण से बहुत नाराज़गी हुई।
    वो सीधे बृंदावन पहुँचा और बाँकेबिहारी से लड़ाई तान दी।
    बोला खूब ऊल्लू बनाया मुझे इतने दिनों तक,
    यह लो अपनी लकुट कमरिया, यह लो अपनी सोटी।
    अब हम तो चले अयोध्या सीधे सादे राम की शरण में।

    कृष्ण मंद मंद मुस्कुराते हुए बोले-लगता है
    तुम्हें किसी ने भड़का दिया है, ठीक है जाना चाहते हो तो
    जाओ पर यह बता तो दो कि हम टेढ़े और राम सीधे कैसे हुए ?

    और कृष्ण कुँए पर नहाने के लिए चल पड़े

    बृंदावन वाला साधु बोला:-अजी आपका नाम टेढ़ा है
    आपका धाम टेढ़ा है और आपका तो सारा काम भी टेढ़ा है
    आप खुद भी तो टेढ़े हो कभी आपको किसी ने सावधान में खड़े नही देखा होगा।

    कृष्ण मंद मंद मुस्कुराते हुए कुँए से पानी निकाल रहे थे
    कि अचानक पानी निकालने वाली बाल्टी कुएँ में गिर जाती है,
    कृष्ण अपने नाराज भक्त को आश्रम से एक सरिया लाने को कहते है,
    साधु सरिया लाकर देता है, और कृष्ण उस सरिए से बाल्टी को
    निकालने की कोशिश करते हैं।

    यह देखकर बृंदावन का साधु बोला- आज मुझे मालूम हुआ कि
    आप को अक्ल भी कोई खास नही है।अजी सीधे सरिए से
    बाल्टी कैसे निकलेगी, इतनी देर से परेशान हो रहे हो,
    सरिए को थोड़ा टेढ़ा कर लो, फिर देखो बाल्टी कैसे बाहर आ जाती है?

    कृष्ण अपने स्वाभाविक रूप से मंद मंद मुस्कुराते हुए बोले :-
    जरा सोचो जब सीधापन इस छोटे से कुएँ से एक छोटी सी बाल्टी
    को नही निकाल सकता, तो तुम्हें इतने बड़े भवसागर से कैसे निकाल पायेगा।

    अरे आजकल के इंसानो तुम सब तो इतने गहरे पाप के सागर मेँ
    गिर चुके हो कि इससे तुम्हें निकाल पाना मेरे जैसे टेढ़े का ही काम रह गया है।

    ॐ साई राम, श्री साई राम, जय जय साई राम !!!


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