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Author Topic: आज का चिन्तन  (Read 162624 times)

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Offline tana

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Re: आज का चिन्तन
« Reply #135 on: March 17, 2008, 10:29:34 PM »
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  • ॐ साईं राम~~~

    चिन्तन~~~प्रसन्न ~~~

    निराशा भले ही कुछ भी हो़ लेकिन कोई धर्म नहीं है। सदा मुस्कराते हुए प्रसन्न रहकर तुम ईश्वर के समीप पहुच सकते हो । क्या खोया क्या पाया इससे ऊपर उठकर मन को सदा हल्का रखने में एक परम आनन्द है । यह काम किसी भी प्रार्थना से अधिक शक्तिशाली है ।

    जय साईं राम~~~
    "लोका समस्ता सुखिनो भवन्तुः
    ॐ शन्तिः शन्तिः शन्तिः"

    " Loka Samasta Sukino Bhavantu
    Aum ShantiH ShantiH ShantiH"~~~

    May all the worlds be happy. May all the beings be happy.
    May none suffer from grief or sorrow. May peace be to all~~~

    Offline meghadeep

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    Re: आज का चिन्तन
    « Reply #136 on: March 17, 2008, 10:45:36 PM »
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  • JISKE SIR UPER TUM SWAMI

    SO DUKH KAISA PAAYE

    Offline Ramesh Ramnani

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    Re: आज का चिन्तन
    « Reply #137 on: March 17, 2008, 11:30:43 PM »
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  • जय सांई राम।।।

    अमावस किस माह में नहीं आती
    थकावट किस राह में नहीं आती
    दुनिया में मुझे कोई बताये तो सही
    रूकावट किस चाह में नहीं आती

    अपना सांई प्यारा सांई सबसे न्यारा अपना सांई

    ॐ सांई राम।।।
    अपना साँई प्यारा साँई सबसे न्यारा अपना साँई - रमेश रमनानी

    Offline tana

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    Re: आज का चिन्तन
    « Reply #138 on: March 18, 2008, 12:03:15 AM »
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  • ॐ साईं राम~~~


    सन्तोष~~~

    सुख व्यक्ति के सामने अपने सिर पर दुख का ताज पहनकर आता है। जो सुख का स्वागत करना चाहता है उसे दुख का स्वागत करने के लिए भी सदा तैयार रहना चाहिये। सुख को मात्र सुख मानकर चलने वाला भविष्य में अधिक दुखी भी हो सकता है।अत: ऐसे सुख की कामना करो जो सभी के लिए कल्याणकारी हो ।

    जय सांई राम~~~
    "लोका समस्ता सुखिनो भवन्तुः
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    " Loka Samasta Sukino Bhavantu
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    Offline Ramesh Ramnani

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    Re: आज का चिन्तन
    « Reply #139 on: March 18, 2008, 09:49:31 PM »
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  • जय सांई राम।।।

    जैसा भोजन खाईये,  तैसा ही मन होय
    जैसा पानी पीजिए,  तैसी बानी होय

    जैसा भोजन करोगे, वैसा ही मन का निर्माण होगा और जैसा जल पियोगे वैसी ही वाणी होगी अर्थात शुद्ध-सात्विक आहार तथा पवित्र जल से मन और वाणी पवित्र होते हैं इसी प्रकार जो जैसी संगति करता है उसका जीवन वैसा ही बन जाता है।

    अपना सांई प्यारा सांई सबसे न्यारा अपना सांई

    ॐ सांई राम।।।
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    Offline sairuby

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    Re: आज का चिन्तन
    « Reply #140 on: March 18, 2008, 09:55:43 PM »
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  • ॐ सांई राम।।।
    BAHUT SAHI LIKHA HAI
    I APRAISE IT
    ॐ सांई राम।।।
    Sasmita

    Offline tana

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    Re: आज का चिन्तन
    « Reply #141 on: March 18, 2008, 11:44:40 PM »
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  • ॐ साईं राम~~~

    संघर्ष~~~

    पवित्र रहने के लिए संघर्ष करते हुए समाप्त हो जाओ। हजार बार मृत्यु का स्वागत करो । निराश मत होओ । कष्ट के समय में भी धैर्य रखते हुए आशा का पल्ला मत छोड़ो । घबराकर गलत मार्ग पर मत बढ़ो । यदि अमृत प्राप्त नहीं हो सका तो कोई कारण नहीं कि विष ही पी लिया जाये ।

    जय सांई राम~~~
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    Offline Ramesh Ramnani

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    Re: आज का चिन्तन
    « Reply #142 on: March 20, 2008, 02:23:33 AM »
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  • जय सांई राम।।।

    एक लम्बा रास्ता है,  अंत का कुछ पता नहीं बस चलते जाना है ,
    दूर बहुत दूर तक रस्ते के किनारों पर कतार में खड़े पेड़
    ऐसे लगते हैं मानो एक दूसरे में जुड़े हुए हों
    पर ये क्या?  जैसे-जैसे कदम आगे बढ़ते हैं
    तो साफ दिखायी देने लगती हैं पेड़ों के बीच की दूरियां
    और कुछ ऐसे ही होते हैं रिश्ते
    बहुत दूर खड़े होकर देखने पर लगता है जैसे वो कितने करीब हैं
    और एक दूसरे के सुख दुःख से वाकिफ हैं
    पर ज़रा सा पास जा कर देखने से पता चल जाता है
    वो उतने ही अजनबी हैं जितने की वो पेड़
    और आसमान में बिखरे हजारों लाखों तारो की तरह.......

    अपना सांई प्यारा सांई सबसे न्यारा अपना सांई

    ॐ सांई राम।।।
    अपना साँई प्यारा साँई सबसे न्यारा अपना साँई - रमेश रमनानी

    Offline Ramesh Ramnani

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    Re: आज का चिन्तन
    « Reply #143 on: March 20, 2008, 11:13:36 PM »
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  • जय सांई राम।।।

    दोपहर की शांति। उजली धूप और पौधे सोये-सोये से एक जामुन की छाय तले दूब पर आ बैठा हूं। रह-रह कर पत्ते ऊपर गिर रहे हैं- अंतिम,  पुराने पत्ते मालूम होते हैं। सारे वृक्षों पर नई पत्तियां आ गई हैं। और नई पत्तियों के साथ न मालूम कितनी नई चिडि़यों और पक्षियों का आगमन हुआ है। उनके गीतों का जैसे कोई अंत ही नहीं है। कितने प्रकार की मधुर ध्वनियां इस दोपहर को संगीत दे रही हैं, सुनता हूं और सुनता रहता हूं और फिर मैं भी एक अभिनव संगीत-लोक में चला जाता हूं।

    'स्व' का लोक, संगीत का लोक ही है।

    यह संगीत प्रत्येक के पास है। इसे पैदा नहीं करना होता है। यह सुन पड़े,  इसके लिए केवल मौन होना होता है। चुप होते ही कैसे एक परदा उठ जाता है! जो सदा से था,  वह सुन पड़ता है और पहली बार ज्ञात होता है कि हम दरिद्र नहीं हैं। एक अनंत संपत्ति का पुनराधिकार मिल जाता है। फिर कितनी हंसी आती है - जिसे खोजते थे, वह भीतर ही बैठा था!

    अपना सांई प्यारा सांई सबसे न्यारा अपना सांई

    ॐ सांई राम।।।
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    Re: आज का चिन्तन
    « Reply #144 on: April 02, 2008, 03:16:40 AM »
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  • ॐ सांई राम~~~

    बुद्धिमान~~~

    मृतक वापस नहीं लौटते ,बीती रातें फिर नहीं आतीं ,उतरी हुई लहर फिर नहीं उभरती । मनुष्य फिर से वही शरीर नहीं धारण कर सकता । इसलिए बीती हुई बातों को भूलकर वर्तमान को पूजो । नष्ट और खोई हुई शक्ति अथवा वस्तु का चिन्तन करने की अपेक्षा नये रास्ते पर चलो । जो बुद्धिमानन होगा वह इस बात को अवश्य समझेगा ।

    जय सांई राम~~~
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    Offline Ramesh Ramnani

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    Re: आज का चिन्तन
    « Reply #145 on: April 07, 2008, 08:03:03 AM »
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  • जय सांई राम।।।

    सूर्य की तरफ मुँह करो और तुम्हारी छाया तुम्हारे पीछे होगी
    जो व्यक्ति सोने का बहाना कर रहा है उसे आप उठा नहीं सकते

    अपना सांई प्यारा सांई सबसे न्यारा अपना सांई

    ॐ सांई राम।।।
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    Offline tana

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    Re: आज का चिन्तन
    « Reply #146 on: April 24, 2008, 12:00:40 AM »
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  • ॐ सांई राम~~~

    एक राजा था। उसने आज्ञा दी कि संसार में इस बात की खोज की जाय कि कौन से जीव-जंतु निरुपयोगी हैं। बहुत दिनों तक खोज बीन करने के बाद उसे जानकारी मिली कि संसार में दो जीव जंगली मक्खी और मकड़ी बिल्कुल बेकार हैं। राजा ने सोचा, क्यों न जंगली मक्खियों और मकड़ियों को ख़त्म कर दिया जाए।

    इसी बीच उस राजा पर एक अन्य शक्तिशाली राजा ने आक्रमण कर दिया, जिसमें राजा हार गया और जान बचाने के लिए राजपाट छोड़ कर जंगल में चला गया। शत्रु के सैनिक उसका पीछा करने लगे। काफ़ी दौड़-भाग के बाद राजा ने अपनी जान बचाई और थक कर एक पेड़ के नीचे सो गया। तभी एक जंगली मक्खी ने उसकी नाक पर डंक मारा जिससे राजा की नींद खुल गई। उसे ख़याल आया कि खुले में ऐसे सोना सुरक्षित नहीं और वह एक गुफ़ा में जा छिपा। राजा के गुफ़ा में जाने के बाद मकड़ियों ने गुफ़ा के द्वार पर जाला बुन दिया।

    शत्रु के सैनिक उसे ढूँढ ही रहे थे। जब वे गुफ़ा के पास पहुँचे तो द्वार पर घना जाला देख कर आपस में कहने लगे, "अरे! चलो आगे। इस गुफ़ा में वह आया होता तो द्वार पर बना यह जाला क्या नष्ट न हो जाता।"

    गुफ़ा में छिपा बैठा राजा ये बातें सुन रहा था। शत्रु के सैनिक आगे निकल गए। उस समय राजा की समझ में यह बात आई कि संसार में कोई भी प्राणी या चीज़ बेकार नहीं। अगर जंगली मक्खी और मकड़ी न होतीं तो उसकी जान न बच पाती।
    इस संसार में कोई भी चीज़ या प्राणी बेकार नहीं। हर एक की कहीं न कहीं उपयोगिता है।

    जय सांई राम~~~
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    Offline Ramesh Ramnani

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    Re: आज का चिन्तन
    « Reply #147 on: April 24, 2008, 09:05:58 AM »
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  • जय सांई राम।।।

    मनुष्य के तीन मूल्य...

     एक खिलौने वाला तीन बहुत ही सुंदर और आकर्षक गुड़िया बनाकर राजा के पास बेचने के लिए गया। तीनों गुड़िया देखने में एक ही जैसी थी, कोई अन्तर मालूम नही चलता था, पर उनके दाम अलग-अलग थे।

    खिलौने वाले राजा से कहा, एक के दाम एक सौ, दूसरे के चार सौ, और तीसरे के पूरे पन्द्रह सौ। राजा सोच में पड़ गया कि आख़िर तीनों गुडिया तों देखने में एक ही जैसी है तों फिर दाम अलग-अलग क्यों?  राजा ने उस खिलौने वाले से कहा की तुम अभी इन सबको यही छोड़कर जाओ, पैसे तुम्हें कल मिलेगे। वह जब चला गया तों राजा इसकी चर्चा अपने मंत्रियों से की,  पर यह बात किसी के समझ में नही आ रही थी। पर उसके मंत्रिपरिषद में एक मंत्री बहुत ही समझदार था। उसने राजा से उन गुड़ियो को अपने घर ले जाने की ईजाजत मांगी, और कहा की कल वो इस रहस्य को सबके सामने सुलझा देगा। राजा ने उसे गुडियों को घर ले जाने की अनुमति दे दी।

    मंत्री के घर पर उसकी पत्नी और बेटी थी, दोनों ही इतने गुणी और समझदार थीं की उन के चर्चे शहर में भी होते रहते थे ।

    तीनो मिलकर रातभर उन गुडियों को जांचते और परखते रहे और आखिरकार उन लोगों ने रहस्य का पता लगा ही लिया, सुबह मंत्री राजा के पास पहुँचा और उसने राजा को बताया कि उसने वो रहस्य खोज लिया है,  तों राजा ने मंत्रिमंडल की बैठक बुलाई और सबके सामने उसे बताने को कहा।

    मंत्री ने कहा, "पहली वाली गुड़िया (सौ वाली ) के एक कान में जब कोई सीक डालो तों वह सीधे दूसरे कान से निकल जाती थी, दूसरी वाली (चार सौ ) के कान में जब कोई सीक डालो तों वह कान से न निकल कर मुख से निकल जाती थी, और जब तीसरी वाली (पन्द्रह सौ) के कान में जब कोई सीक डाली जाती थी तों वह न मुख से निकलती थी और न ही कान से बल्कि वह उसके पेट में जा कर अटक जाती थी।"

    मंत्री ने राजा से कहा, जो मनुष्य सहनशील एवं गंभीर होते है, वह मनुष्य मूल्यवान होता है,  जो एक कान से सुने और मुख से तुरंत प्रचारित करने लगे वह उससे कम दर्जे का होता है, पर वह व्यक्ति जो किसी भी बात को एक कान से सुनकर हमेशा दूसरे कान से निकल देता है वह बहुत ही घटिया इन्सान होता है,  ऐसे लोगो का मूल्य अधिक नही होता। अब राजा को सारी बात समझ में आ गयी थी। उसने खुश होकर मंत्री को पुरस्कार भी दिया।

    गौरतलब : कोई भी बात सुनकर अपने भीतर ही सीमित रखना समझदारी है, किसी बात को हँसी में उड़ा देने वाले लोग या चुगली करने वाले लोगों की समाज में क़द्र नही होता।
    अपना सांई प्यारा सांई सबसे न्यारा अपना सांई

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    Offline tana

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    Re: आज का चिन्तन
    « Reply #148 on: April 25, 2008, 10:48:23 PM »
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  • ॐ सांई राम~~~

    हीरे का मूल्य~~~
     
    महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले के काटलुक गांव में एक प्राईमरी स्कूल था। कक्षा चल रही थी।
    अध्यापक ने बच्चों से एक प्रश्न किया यदि तुम्हें रास्ते में एक हीरा मिल जाए तो तुम उसका क्या करोगे?
    मैं इसे बेच कर कार खरीदूंगा एक बालक ने कहा।
    एक ने कहा, मैं उसे बेच कर धनवान बन जाउंगा।
    किसी ने कहा कि वह उसे बेच विदेश यात्रा करेगा।
    चौथे बालक का उत्तर था कि, मैं उस हीरे के मालिक का पता लगा कर लौटा दूंगा।
    अध्यापक चकित थे, फिर उन्होंने कहा कि, मानो खूब पता लगाने पर भी उसका मालिक न मिला तो?
    बालक बोला, तब मैं हीरे को बेचूंगा और इससे मिले पैसे को देश की सेवा में लगा दूंगा।
    शिक्षक बालक का उत्तर सुन कर गद्गद् हो गये और बोले, शाबास तुम बडे होकर सचमुच देशभक्त बनोगे।

    शिक्षक का कहा सत्य हुआ और वह बालक बडा होकर सचमुच देशभक्त बना,
    उसका नाम था, गोपाल कृष्ण गोखले।

    जय सांई राम~~~
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    Offline Ramesh Ramnani

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    Re: आज का चिन्तन
    « Reply #149 on: April 28, 2008, 03:15:26 AM »
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    लकडहारा और सन्यासी...

    एक गांव में एक लकडहारा रहा करता था।वह हर रोज जंगल में जाकर लकडी काटता और उसे बाजार में बेच देता। किन्तु कुछ समय से उसकी आमदनी घटती चली जा रही थी क्योंकि स्पर्धा और जंगलकटाई की वजह से उसके धंधे में लगातार कमी आने लगी थी।ऐसी परिस्थिति में उसकी एक संन्यासी से भेंट हुई। लकडहारे ने संन्यासी से विनम्र बिनती की और बोला ''महाराज कृपा करें।मेरी समस्या का कोई उपाय बताइये।''

    इसपर उस सन्यासी ने लकडहारे को कहा ''आगे जा।''

    उस सन्यासी के आदेश पर या तो कहें, शब्दों पर विश्वास रख आगे की ओर निकल चला। तब कुछ समय पश्चात सुदूर उसे चंदन का वन मिला। वहां की चंदन की लकडी बेच-बेच कर लकडहारा अच्छा-खासा धनी हो गया। ऐसे सुख के दिनों में एक दिन लकडहारे के मन में विचार आया कि ''सन्यासी ने तो मुझे आगे जा कहा था। लेकिन मैं तो मात्र चंदन के वन में ही घिर कर रह गया हूं। मुझे तो और आगे जाना चाहिये।''

    यह विचार करते-करते वह और आगे निकल गया तो इसमें क्या आश्चर्य की बात है! आगे उसे एक सोने की खदान दिखाई दी। सोना पाकर लकडहारा और अधिक धनवान हो गया। उसके कुछ दिन के पश्चात लकडहारा और आगे चल पडा। अब तो हीरे और माणिक-पाचू और मोती उसके कदम चूम रहे थे। उसका जीवन बहुत सुखी और समृध्द हो गया।

    किंतु लकडहारा फिर सोचने लगा ''उस सन्यासी को इतना कुछ पता होने के बावजूद वह क्यों भला इन हीरे माणिक का उपभोग नहीं करता।'' इस प्रश्न का समाधानकारक उत्तर लकडहारे को नहीं मिला। तब वह फिर उस सन्यासी के पास गया और जाकर बोला ''महाराज आप ने मुझे आगे जाने को कहा और धनसमृध्दी का पता दिया लेकिन आप भला इन सब सुखकारक समृध्दि का लाभ क्यों नहीं उठाते?

    इसपर संन्यासी ने सहज किन्तु अत्यंत सटीक उत्तर दिया। वह बोले ''भाई तेरा कहना उचित है, लेकिन और आगे जाने से ऐसी बहुत ही खास उपलब्धि हाथ लगती है जिसकी तुलना में ये हीरे और माणिक केवल मिट्टी और कंकर के बराबर महसूस होते हैं। मैं उसी खास चीज की तलाश में प्रवृत्त हूं।''

    सन्यासी के इस साधारण मगर गहरे अर्थ वाले कथन से लकडहारे के मन में भी विवेक-विचार जागृत हुआ। उसने सन्यासी को गुरू मानकर उसका शिष्यत्व स्वीकार लिया और वह साधक बन गया।

    गौरतलब: सबसे मूल्यवान चीज का नाम ही तो है ईश्वरलाभ । कोई भी तलाश ईश्वर के बिना पूर्ण नही होती ।

    अपना सांई प्यारा सांई सबसे न्यारा अपना सांई

    ॐ सांई राम।।।
    अपना साँई प्यारा साँई सबसे न्यारा अपना साँई - रमेश रमनानी

     


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