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Author Topic: आज का चिन्तन  (Read 162656 times)

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Offline Ramesh Ramnani

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Re: आज का चिन्तन
« Reply #165 on: June 07, 2008, 09:23:01 AM »
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  • जय सांई राम।।।

    सुखी जीवन के मन्त्र - "भावना मिट जाए मन से द्वेष अत्याचार की"

    द्वेष मानव का सब से बड़ा शत्रु है.  द्वेष हमारे जीवन से सारी खुशी छीन लेता है. दूसरों के सुख से हम दुखी होते हैं. दूसरों को दुखी देख कर ही हम खुश हो पाते हैं. अपना सुख तो हमारे पास रहता नहीं. कुछ व्यक्तियों को तो द्वेष इस हद तक प्रभावित करता है कि वह दूसरों को दुःख पहुँचने के लिए स्वयं को ही दुःख पहुँचने से भी नहीं हिचकिचाते.

    द्वेष से प्रभावित व्यक्ति में अत्याचार की प्रवृत्ति पैदा हो जाती है. दूसरों से उन का सुख छीनना ही उस के जीवन का उद्देश्य बन जाता है. वह हर समय इसी जोड़-तोड़ में लगा रहता है कि कैसे दूसरों का सुख छीना जाए या दूसरों को दुःख पहुँचाया जाए. धीरे-धीरे ऐसे व्यक्ति का सोच इतना बिगड़ जाता है कि वह दूसरों कि हत्या तक कर देता है.

    अगर हम चाहते हैं कि हमारे जीवन में सुख बना रहे और उस में लगातार वृद्धि होती रहे तब हमें द्वेष को अपने जीवन में आने से रोकना होगा. हम सुख पाना चाहते हैं तब दूसरों को सुख देना होगा. हम जैसा बोएँगे वैसा ही काटेंगे. यह साँईश्वर का नियम है.

    अपना सांई प्यारा सांई सबसे न्यारा अपना सांई

    ॐ सांई राम।।।
    अपना साँई प्यारा साँई सबसे न्यारा अपना साँई - रमेश रमनानी

    Offline Ramesh Ramnani

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    Re: आज का चिन्तन
    « Reply #166 on: June 09, 2008, 11:57:24 PM »
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  • जय सांई राम।।।

    "चित्त की पूर्ण स्वतंत्रता "

    सत्य को चाहते हो, तो चित्त को किसी 'मत' से मत बांधो। जहां मत है, वहां सत्य नहीं आता। मत और सत्य में विरोध है।

    सत्य की खोज के लिए मुक्त-जिज्ञासा पहली सीढ़ी है। और, जो व्यक्ति स्वानुभूति के पूर्व ही किन्हीं सिद्धांतों और मतों से अपने चित्त को बोझिल कर लेता है, उसकी जिज्ञासा कुंठित और अवरुद्ध हो जाती है।

    जिज्ञासा- खोज की गति और प्राण है। जिज्ञासा के माध्यम से ही विवेक जाग्रत होता और चेतना ऊ‌र्ध्व बनती है। लेकिन, जिज्ञासा आस्था से नहीं, संदेह से पैदा होती है और इसलिए मैं आस्था को नहीं, सत्य-पथ के राही का पाथेय मानता हूं। संदेह स्वस्थ चिंतन का लक्षण है और उसके सम्यक अनुगमन से ही सत्य के ऊपर पड़े परदे क्रमश: गिरते जाते हैं और एक क्षण सत्य का दर्शन होता है।

    यह भी स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि आस्तिक और नास्तिक दोनों ही आस्थावान होते हैं। आस्था विधायक और नास्तिक दोनों ही प्रकार की होती है। संदेह चित्त की एक तीसरी ही अवस्था है। वह अविश्वास नहीं है और न ही विश्वास है। वह तो दोनों से मुक्त खोज के लिए स्वतंत्रता है।

    और, सत्य की खोज वे कैसे कर सकते हैं, जो कि पूर्व से ही किन्हीं मतों से आबद्ध हें? मतों के खूंटों से विश्वास या अविश्वास की जंजीरों को जो खोल देता है, उसकी नाव ही केवल सत्य के सागर में यात्रा करने में समर्थ हो पाती है।

    सत्य के आगमन की शर्त है : चित्त की पूर्ण स्वतंत्रता। जिसका चित्त किन्हीं सिद्धांतों में परतंत्र है, वह सत्य के सूर्य के दर्शन से वंचित रह जाता है।

    अपना सांई प्यारा सांई सबसे न्यारा अपना सांई

    ॐ सांई राम।।।
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    Re: आज का चिन्तन
    « Reply #167 on: June 10, 2008, 12:17:56 AM »
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  • ॐ सांई राम~~~

    'मैं' का ताला~~~

    मैं से बड़ी और कोई भूल नहीं। प्रभु के मार्ग में वही सबसे बड़ी बाधा है। जो उस अवरोध को पार नहीं करते, सत्य के मार्ग पर उनकी कोई गति नहीं होती।

    एक साधु किसी गांव से गुजरता था। उसका एक मित्र-साधु भी उस गांव में था। उसने सोचा कि उससे मिलता चलूं। रात आधी हे रही थी, फिर भी वह मिलने गया। एक बंद खिड़की से प्रकाश को आते देख उसने उसे खटखटाया। भीतर से आवाज आई, 'कौन है?' उसने यह सोचा कि वह तो अपनी आवाज से ही पहचान लिया जावेगा, कहा, 'मैं।' फिर भीतर से कोई उत्तर नहीं आया। उसने बार-बार खिड़की पर दस्तक दी उत्तर नहीं आया। ऐसा ही लगने लगा कि जैसे कि वह घर बिलकुल निर्जन है। उसने जोर से कहा, 'मित्र तुम मेरे लिये द्वार क्यों नहीं खोल रहे हो और चुप क्यों हो?' भीतर से कह गया, 'यह कौन ना समझ है, जो स्वयं को 'मैं' कहता है, क्योंकि 'मैं' कहने का अधिकार सिवाय परमात्मा के और किसी को नहीं है।'

    प्रभु के द्वार पर हमारे 'मैं' का ही ताला है। जो उसे तोड़ देते हें, वे पाते हैं कि द्वार तो सदा से ही खुले थे!

    जय सांई राम~~~
    "लोका समस्ता सुखिनो भवन्तुः
    ॐ शन्तिः शन्तिः शन्तिः"

    " Loka Samasta Sukino Bhavantu
    Aum ShantiH ShantiH ShantiH"~~~

    May all the worlds be happy. May all the beings be happy.
    May none suffer from grief or sorrow. May peace be to all~~~

    Offline Ramesh Ramnani

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    Re: आज का चिन्तन
    « Reply #168 on: June 13, 2008, 04:08:41 AM »
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  • जय सांई राम़।।।

    स्वयं के भीतर जो है, उसे जानने से ही जीवन मिलता है। जो उसे नहीं जानता, वह प्रतिक्षण मृत्यु से और मृत्यु के भय से घिरा रहता है।

    एक साधु को उसके मित्रों ने पूछा, ''यदि दुष्टजन आप पर हमला कर दें, तो आप क्या करेंगे?'' वह बोला, ''मैं अपने मजूत किले में जाकर बैठा रहूंगा।'' यह बात उसके शत्रुओं के कान तक पहुंच गई। फिर, एक दिन शत्रुओं ने उसे एकांत में घेर लिया और कहा, ''महानुभाव! वह मजबूत किला कहां है?'' वह साधु खूब हंसने लगा और फिर अपने हृदय पर हाथ रखकर बोला, ''यह है मेरा किला। उसके ऊपर कभी कोई हमला नहीं कर सकता है। शरीर तो नष्ट किया जा सकता है- पर जो उसके भीतर है- वह नहीं। वही मेरा किला है। मेरा उसके मार्ग को जानना ही मेरी सुरक्षा है।''

    जो व्यक्ति इस मजबूत किले को नहीं जानता है, उसका पूरा जीवन असुरक्षित है। और, जो इस किले को नहीं जानता है, उसका जीवन प्रतिक्षण शत्रुओं से घिरा है। ऐसे व्यक्ति को अभी शांति और सुरक्षा के लिए कोई शरणस्थल नहीं मिला है। और, जो उस स्थल को बाहर खोजते हैं, वे व्यर्थ ही खोजते हैं, क्योंकि वह तो भीतर है।

    जीवन का वास्तविक परिचय स्वयं में प्रतिष्ठित होकर ही मिलता है, क्योंकि उस बिंदु के बाहर जो परिधि है, वह मृत्यु से निर्मित है।

    अपना सांई प्यारा सांई सबसे न्यारा अपना सांई

    ॐ सांई राम।।।
    अपना साँई प्यारा साँई सबसे न्यारा अपना साँई - रमेश रमनानी

    Offline Ramesh Ramnani

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    Re: आज का चिन्तन
    « Reply #169 on: June 19, 2008, 09:18:08 AM »
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  • जय सांई राम़।।।

    The train has started moving. It is packed with people of all ages, mostly with the working men and women and young college guys and gals. Near the window, seated a old man with his 30 year old son. As the train moves by, the son is overwhelmed with joy as he was thrilled with the scenory outside..

    " See dad, the scenory of green trees moving away is very beautiful"

    This behaviour from a thirty year old son made the other people feel strange about him. Every one started murmuring something or other about this son."This guy seems to be a krack.." newly married Anup whispered to his wife.

    Suddenly it started raining... Rain drops fell on the travellers through the opened window. The Thirty year old son , filled with  joy " see dad, how beautiful the rain is .."

    Anup's wife got irritated with the rain drops spoiling her new suit.

    Anup ," cant you see its raining, you old man, if ur son is not feeling well get him soon to a mental asylum..and dont disturb public henceforth"

    The old man hesitated first and then in a low tone replied " we are on the way back from hospital, my son got discharged today morning , he was a blind by birth,last week only he got his vision,  these rain and nature are new to his eyes.. Please forgive us for the inconvenience caused..."

    The things we see may be right from our prespective until we know the truth. Bt when we know the truth our reaction to that will hurt even us. So try to understand the problem better before taking a harsh action...

    अपना सांई प्यारा सांई सबसे न्यारा अपना सांई

    ॐ सांई राम।।।
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    Re: आज का चिन्तन
    « Reply #170 on: June 24, 2008, 11:22:21 PM »
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  • जय सांई राम।।।

    सत्य की एक किरण ही बहुत है। ग्रंथों का भार जो नहीं करता है, सत्य की एक झलक भी वह कर दिखाती है। अंधेरे में उजाला करने को प्रकाश के ऊपर बड़े-बड़े शास्त्र किसी काम के नहीं,  एक मिट्टी का दीया जलाना आना ही पर्याप्त है।

    राल्फ वाल्डे इमर्सन के व्याख्यानों में एक बूढ़ी धोबिन निरंतर देखी जाती थी। लोगों को हैरानी हुई : एक अनपढ़ गरीब औरत इमर्सन की गंभीर वार्ताओं को क्या समझती होगी!  किसी ने आखिर उससे पूछ ही लिया कि उसकी समझ में क्या आता है?  उस बूढ़ी धोबिन ने जो उत्तर दिया, वह अद्भुत था। उसने कहा,  ''मैं जो नहीं समझती,  उसे तो क्या बताऊं।  लेकिन, एक बात मैं खूब समझ गई हूं और पता नहीं कि दूसरे उसे समझे हैं या नहीं। मैं तो अनपढ़ हूं और मेरे लिए एक ही बात काफी है। उस बात ने मेरा सारा जीवन बदल दिया है। और वह बात क्या है?  वह यह है कि मैं भी प्रभु से दूर नहीं हूं,  एक दरिद्र अज्ञानी स्त्री से भी प्रभु दूर नहीं है। प्रभु निकट है - निकट ही नहीं, स्वयं में है। यह छोटा सा सत्य मेरी दृष्टि में आ गया है और अब मैं नहीं समझती कि इससे भी बड़ा कोई और सत्य हो सकता है!''

    जीवन बहुत तथ्य जानने से नहीं,  किंतु सत्य की एक छोटी - सी अनुभूति से ही परिवर्तित हो जाता है। और,  जो बहुत जानने में लग रहते हैं, वे अक्सर सत्य की उस छोटी-सी चिंगारी से वंचित ही रह जाते हें, जो कि परिवर्तन लाती है और जीवन में बोध के नये आयाम जिससे उद्घटित होते हैं।
     
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    Re: आज का चिन्तन
    « Reply #171 on: June 26, 2008, 02:38:09 AM »
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  • ॐ सांई राम~~~
     
    'सीखनी है गर फकीरी'~~~   
    विवेक हिरदे~~


    आबिदा अपने संजीदा सूफी अंदाज में जब राबिया की पंक्तियाँ गाती है, तो जीवन-दर्शन के नितांत नवीन अर्थ सामने आते हैं। आबिदा गाती है,

    'सीखनी है गर फकीरी
    तो पनिहारन से सीख
    बतियाती है सहेलियों से
    ध्यान गागर के बिच।'


    यहाँ पनिहारन है गृहस्थाश्रम की तमाम जिम्मेदारियाँ उठाता और साथ-साथ परमपिता के पूजन-आराधन में लिप्त एक गृहस्थ, सहेलियाँ हैं जीवन-यात्रा में संपर्क में आने वाले विविध लोग, क्रियाकलाप, जबकि गागर है सिर पर साक्षात प्रभु का साया। मनुष्य-योनि में सर्वाधिक महत्वपूर्ण और नाजुक दौर है गृहस्थाश्रम।

    सभी समस्याओं और जिम्मेदारियों से तालमेल बिठाते हुए प्रभुभक्ति में लीन रहना एक गृहस्थ हेतु अत्यंत महत्वपूर्ण कार्य है। भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है कि कलियुग में मनुष्य संसार के भवसागर में अपनी जीवनरूपी नैया यदि भौतिकता की एक पतवारसे खेता रहेगा तो गोल-गोल ही घूमता रहेगा, परंतु जैसे ही वह अपने दूसरे हाथ में अध्यात्म या प्रभुभक्ति की पतवार भी थाम लेगा तो तत्काल तर जाएगा।

    इसलिए गृहस्थाश्रम में रहते हुए भी गृहस्थ को कुछ हद तक फकीरी भी सीखना चाहिए, जिससे उसका जीवन संयमित, संतुलित और स्थिर रह सके। कबीरदास जैसे फकीर जो बुनते-बुनते फकीर बन गए। रैदास जैसे फकीर जो जूते सीते-सीते फकीर बन गए और यहाँ तक कि मीराबाई जैसी भक्त जो कृष्ण को भजते हुए फकीरी से भी आगे निकल गई थीं। सही मायने में मीरा की भक्ति में जो आलौकिक शक्ति है उसमें भी भवपार लगाने का संजीवनी सामर्थ्य है।

    मीराबाई ने अपनी काव्य रचना में लौकिक प्रतीकों और रूपकों को शामिल किया, लेकिन उनका उद्देश्य पारलौकिक चिंतन धारा के अनुकूल है। यही कारण है कि वह दोनों ही दृष्टियों से अपनाने योग्य के साथ- साथ रुचिपूर्ण और हृदयस्पर्शी भी है। मीराबाई के काव्य के भावपक्ष में यह भी भाव विशेष का दर्शन या अनुभव हमें प्राप्त होता है कि वे श्रीकृष्ण के वियोग में बहुत ही विरहाकुल अवस्था को प्राप्त हो चुकी थीं।

    सतगुरु की कृपा पर मीराबाई को अटूट विश्वास था। उनका कहना था कि इस भवसागर से सतगुरु ही उसे पार लगा सकता है।

    पायो जी मैंने राम रतन धन पायो।
    वस्तु अमोलक दी मेरे सतगुरु,
    किरपा करि अपनायो।
    जन्म-जन्म की पूँजी पाई,
    जग में सभी परुवायो।
    खरचै नहिं, कोई चोर न लेवै,
    दिन-दिन ब़ढ़त सवायो।
    सत की नाव,
    खवेटिया सतगुरु,
    भवसागर तर आयो।
    मीरा के प्रभु गिरधर नागर,
    हरख, हरख जस गायो।


    वर्तमान परिप्रेक्ष्य में यद्यपि हम कबीरदास, राबिया, रैदास या मीरा की उत्तुंग ऊँचाइयों को नहीं छू सकते, फिर भी कलियुग की समस्त आपाधापियों के मध्य भी अपना ध्यान गागररूपी ईश्वर पर केंद्रित कर हम कुछ हद तक अपना जीवन सार्थक कर सकते हैं। 

    जय सांई राम~~~
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    Offline Ramesh Ramnani

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    Re: आज का चिन्तन
    « Reply #172 on: June 30, 2008, 12:42:06 AM »
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  • जय सांई राम़।।।

    सूर्य की ओर जैसे कोई आंखें बंद किये रहे, ऐसे ही हम जीवन की ओर किये हैं। और, तब हमारे चरणों का गड्ढों में चले जाना, क्या आश्चर्यजनक है? आंखें बंद रखने के अतिरिक्त न कोई पाप है, न अपराध है। आंखें खोलते ही सब अंधकार विलीन हो जाता है।
    एक साधु का स्मरण आता है। उसे बहुत यातनाएं दी गई, किंतु उसकी शांति को नहीं तोड़ा जा सका था। और, उसे बहुत कष्ट दिये गये थे, लेकिन उसकी आनंद मुद्रा नष्ट नहीं की जा सकी थी। यातनाओं के बीच भी वह प्रसन्न था और गालियों के उत्तर में उसकी वाणी मिठास से भरी थी। किसी ने उससे पूछा, ''आप में इतनी अलौकिक शक्ति कैसे आई?'' वह बोला, ''अलौकिक? कहां? इसमें तो कुछ भी अलौकिक नहीं है। बस, मैंने अपनी आंखों का उपयोग करना सीख लिया है।'' उसने कहा, ''मैं आंखें होते अंधा नहीं हूं।'' लेकिन , आंखों से शांति का और साधुता का और सहनशीलता का क्या संबंध? जिससे ये शब्द कहे गये थे, वह नहीं समझ सका था। उसे समझाने के लिये साधु ने पुन: कहा, ''मैं ऊपर आकाश की ओर देखता हूं, तो पाता हूं कि यह पृथ्वी का जीवन अत्यंत क्षणिक और स्वप्नवत् है। और, स्वप्न में किया हुआ व्यवहार मुझे कैसे छू सकता है? और अपने भीतर देखता हूं, तो उसे पाता हूं, जो कि अविनश्वर है- उसका तो कोई भी कुछ भी बिगाड़ने में समर्थ नहीं है! और, जब मैं अपने चारों ओर देखता हूं, तो पाता हूं कि कितने हृदय हैं, जो मुझ पर दया करते और प्रेम करते हैं, जबकि उनके प्रेम को पाने की पात्रता भी मुझ में नहीं। यह देख मन में अत्यंत आनंद और कृतज्ञता का बोध होता है। और, अपने पीछे देखता हूं, तो कितने ही प्राणियों को इतने दुख और पीड़ा में पाता हूं कि मेरा हृदय करुणा और प्रेम से भर आता है। इस भांति मैं शांत हूं और कृतज्ञ हूं, आनंदित हूं और प्रेम से भर गया हूं। मैंने आंखों का उपयोग सीख लिया है। मित्र, मैं अंधा नहीं हूं।''

    और, अंधा न होना कितनी बड़ी शक्ति है? आंखों का उपयोग ही साधुता है। वही धर्म है। आंखें सत्य को देखने के लिये हैं। जागो- और देखो। जो आंखें होते हुए भी उन्हें बंद किये हैं, वह स्वयं अपना दुर्भाग्य बोता है।

    अपना सांई प्यारा सांई सबसे न्यारा अपना सांई

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    Re: आज का चिन्तन
    « Reply #173 on: July 01, 2008, 10:35:31 AM »
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  • जय सांई राम।।।

    मो को कहां तू ढूंढे बंदे

    एक रानी नहाकर अपने महल की छत पर बाल सुखाने के लिए गई। उसके गले में एक हीरों का हार था, जिसे उतार कर वहीं आले पर रख दिया और बाल संवारने लगी। इतने में एक कौवा आया। उसने देखा कि कोई चमकीली चीज है, तो उसे लेकर उड़ गया। एक पेड़ पर बैठ कर उसे खाने की कोशिश की, पर खा न सका। कठोर हीरों पर मारते-मारते चोंच दुखने लगी। अंतत: हार को उसी पेड़ पर लटकता छोड़ कर वह उड़ गया।

    जब रानी के बाल सूख गए तो उसका ध्यान अपने हार पर गया, पर वह तो वहां था ही नहीं। इधर-उधर ढूंढा, परन्तु हार गायब। रोती-धोती वह राजा के पास पहुंची, बोली कि हार चोरी हो गई है, उसका पता लगाइए। राजा ने कहा, चिंता क्यों करती हो, दूसरा बनवा देंगे। लेकिन रानी मानी नहीं, उसे उसी हार की रट थी। कहने लगी, नहीं मुझे तो वही हार चाहिए। अब सब ढूंढने लगे, पर किसी को हार मिले ही नहीं।

    राजा ने कोतवाल को कहा, मुझ को वह गायब हुआ हार लाकर दो। कोतवाल बड़ा परेशान, कहां मिलेगा? सिपाही, प्रजा, कोतवाल- सब खोजने में लग गए। राजा ने ऐलान किया, जो कोई हार लाकर मुझे देगा, उसको मैं आधा राज्य पुरस्कार में दे दूंगा। अब तो होड़ लग गई प्रजा में। सभी लोग हार ढूंढने लगे आधा राज्य पाने के लालच में। तो ढूंढते-ढूंढते अचानक वह हार किसी को एक गंदे नाले में दिखा। हार तो दिखाई दे रहा था, पर उसमें से बदबू आ रही थी। पानी काला था। परन्तु एक सिपाही कूदा। इधर-उधर बहुत हाथ मारा, पर कुछ नहीं मिला। पता नहीं कहां गायब हो गया। फिर कोतवाल ने देखा, तो वह भी कूद गया। दो को कूदते देखा तो कुछ उत्साही प्रजाजन भी कूद गए। फिर मंत्री कूदा।

    तो इस तरह उस नाले में भीड़ लग गई। लोग आते रहे और अपने कपडे़ निकाल-निकाल कर कूदते रहे। लेकिन हार मिला किसी को नहीं- कोई भी कूदता, तो वह गायब हो जाता। जब कुछ नहीं मिलता, तो वह निकल कर दूसरी तरफ खड़ा हो जाता। सारे शरीर पर बदबूदार गंदगी, भीगे हुए खडे़ हैं। दूसरी ओर दूसरा तमाशा, बडे़-बडे़ जाने-माने ज्ञानी, मंत्री सब में होड़ लगी है, मैं जाऊंगा पहले, नहीं मैं तेरा सुपीरियर हूं, मैं जाऊंगा पहले हार लाने के लिए।

    इतने में राजा को खबर लगी। उसने सोचा, क्यों न मैं ही कूद जाऊं उसमें? आधे राज्य से हाथ तो नहीं धोना पडे़गा। तो राजा भी कूद गया। इतने में एक संत गुजरे उधर से। उन्होंने देखा तो हंसने लगे, यह क्या तमाशा है? राजा, प्रजा, मंत्री, सिपाही -सब कीचड़ में लथपथ, क्यों कूद रहे हो इसमें?

    लोगों ने कहा, महाराज! बात यह है कि रानी का हार चोरी हो गई है। वहां नाले में दिखाई दे रहा है। लेकिन जैसे ही लोग कूदते हैं तो वह गायब हो जाता है। किसी के हाथ नहीं आता।

    संत हंसने लगे, भाई! किसी ने ऊपर भी देखा? ऊपर देखो, वह टहनी पर लटका हुआ है। नीचे जो तुम देख रहे हो, वह तो उसकी परछाई है।

    इस कहानी का क्या मतलब हुआ? जिस चीज की हम को जरूरत है, जिस परमात्मा को हम पाना चाहते हैं, जिसके लिए हमारा हृदय व्याकुल होता है -वह सुख शांति और आनन्द रूपी हार क्षणिक सुखों के रूप में परछाई की तरह दिखाई देता है और यह महसूस होता है कि इस को हम पूरा कर लेंगे। अगर हमारी यह इच्छा पूरी हो जाएगी तो हमें शांति मिल जाएगी, हम सुखी हो जाएंगे। परन्तु जब हम उसमें कूदते हैं, तो वह सुख और शांति प्राप्त नहीं हो पाती।

    इसलिए सभी संत-महात्मा हमें यही संदेश देते हैं कि वह शांति, सुख और आनन्द रूपी हीरों का हार, जिसे हम संसार में परछाई की तरह पाने की कोशिश कर रहे हैं, वह हमारे अंदर ही मिलेगा, बाहर नहीं।
     
    अपना सांई प्यारा सांई सबसे न्यारा अपना सांई

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    Re: आज का चिन्तन
    « Reply #174 on: July 01, 2008, 11:25:34 PM »
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  • जय सांई राम़।।।

    स्व-सत्ता ही सर्वोपरि!

    जो स्वयं को खोकर सब-कुछ भी पा ले,  उसने बहुत महंगा सौदा किया है। वह हीरा देकर कंकड़ बीन लाया है। उससे तो वही व्यक्ति समझदार है,  जो कि सब-कुछ खोकर भी स्वयं को बचा लेता है।

    एक बार किसी धनवान के महल में आग लग गई थी। उसने अपने सेवकों से बड़ी सावधानी से घर का सारा सामान निकलवाया। कुर्सियां, मेजें, कपड़े की संदूकें, खाते बहियां, तिजोरियां और सब कुछ। इस बीच आग चरों ओर फैलती गई। घर का मालिक बाहर आकर सब लोगों के साथ खड़ा हो गया था। उसकी आंखों में आंसू थे और किंकर्तव्यविमूढ़ वह अपने प्यारे भवन को अग्निसात होते देख रहा था। अंतत: उसने लोगों से पूछा, ''भीतर कुछ रह तो नहीं गया है?'' वे बोले, ''नहीं, फिर भी हम एकबार और जाकर देख आते हैं। ''उन्होंने भीतर जाकर देखा, तो मालिक का एकमात्र पुत्र कोठरी में पड़ा देखा। कोठरी करीब-करीब जल गई थी और पुत्र मृत था। वे घबड़ाकर बाहर आए और छाती पीट-पीटकर रोने-चिल्लाने लगे, ''हाय! हम अभागे, घर का सामान बचाने में लग गये,  किंतु सामान के मालिक को खो दिया है।''

    क्या यह घटना हम सबके संबंध में भी सत्य नहीं है। और क्या किसी दिन हमें भी यह नहीं कहना पड़ेगा कि हम अभागे न मालूम क्या-क्या व्यर्थ का सामान बचाते रहे और उस सबके मालिक को- स्वयं अपने आप को खो बैठे? मनुष्य के जीवन में इससे बड़ी कोई दुर्घटना नहीं होती है। लेकिन, बहुत कम ऐसे भाग्यशाली हैं, जो इससे बच पाते हैं।

    एक बात स्मरण रखना कि स्वयं की सत्ता से ऊपर ओर कुछ नहीं है। जो उसे पा लेता है, वह सब पा लेता है। और, जो उसे खोता है, उसके कुछ - भी पा लेने का कोई मूल्य नहीं है।

    अपना सांई प्यारा सांई सबसे न्यारा अपना सांई

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    Re: आज का चिन्तन
    « Reply #175 on: July 01, 2008, 11:36:59 PM »
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  • ॐ सांई राम~~~

    ईसा मसीह अपने अनुयायियों के साथ किसी गांव में उपदेश देने जा रहे थे। उस गांव सें पूर्व ही मार्ग मे उन्हें 15-20 गड्ढे खुदे हुए मिले। ईसा मसीह के एक शिष्य ने उन गड्ढो को देखकर जिज्ञासा प्रकट की।
    ईसा मसीह बोले, पानी की तलाश में किसी व्यकित ने इतनें गड्ढे खोदे है। यदि वह धैर्यपूर्वक एक ही स्थान पर गड्ढा खोदता तो उसे पानी अवश्य मिल जाता, आशय यह है कि व्यक्ति को परिश्रम करने के साथ-साथ धैर्य भी रखना चाहिए।

    जय सांई राम~~~
    "लोका समस्ता सुखिनो भवन्तुः
    ॐ शन्तिः शन्तिः शन्तिः"

    " Loka Samasta Sukino Bhavantu
    Aum ShantiH ShantiH ShantiH"~~~

    May all the worlds be happy. May all the beings be happy.
    May none suffer from grief or sorrow. May peace be to all~~~

    Offline Ramesh Ramnani

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    Re: आज का चिन्तन
    « Reply #176 on: July 07, 2008, 05:31:25 AM »
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  • जय सांई राम।।।

    मैं जानता हूँ कि राहें बहुत हैं
    कटीली, पथरीली उबड़-खाबड़,
    खूबसूरत और रंगीन भी हैं
    मै जानता हूँ कि
    ये सब मन्ज़िल तक ले जाने वाली हैं
    मै यह भी जानता हूँ कि
    मेरे पास टुकड़ों मे बांटा हुआ समय है
    और दो ही पैर है लेकिन
    इस मन के ना जाने कितने पैर है
    भागता है हर राह के पीछे और
    चलने ही नही देता किसी एक राह पर
    बैचारे लड़खड़ाते कदमों को
    इस भागते हुए मन को और
    लड़खड़ाते हुए कदमों को
    कोई कैसे समझाये?
     
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    ॐ सांई राम।।।
    अपना साँई प्यारा साँई सबसे न्यारा अपना साँई - रमेश रमनानी

    Offline Ramesh Ramnani

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    Re: आज का चिन्तन
    « Reply #177 on: July 10, 2008, 03:13:59 AM »
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  • जय सांई राम।।।

    आज का चिंतन - ईर्ष्‍या

    आज का विचार... हम अनजाने मे ही अपना बुरा करते जाते हैं, और दूसरे का बुरा करना चाहते हैं, जिसे सीधे शब्दो मे हम जलन कहते हैं। दूसरो कॊ हर बात से जलाना,  ईर्ष्‍या करना,  इस से अन्य व्यक्ति का कोई नुक्सान तो नही होता बल्कि हम अपना ही नुकसान करते जाते हैं...।तो आयें विचार करे इस बात पर और बचे इस नुकसान से..... तो यह पढे आज का विचार

    दो भाईयो की दुकान एक ही बाजार मे थी और थी भी बिलकुल आमने सामने। दोनो भाई बेचते भी एक ही तरह का समान थे। दोनो की दुकाने भी भगवान की दया से चलती भी खूब थी। पैसे की कमी भी दोनो को नही थी।  लेकिन इस के वावजूद दोनो भाईयो की सेहत दिन पर दिन गिरती जाती थी। बहुत दवा दारु किया। झाड पूंछ भी करवाया। पूजा पाठ यानि सब कुछ करवाया लेकिन दोनो भाईयो की सेहत मे कोई भी फ़र्क नही आया।  थक हार कर अब दोनो भाई जादू टोने वालो के पास भी गये लेकिन बात फ़िर भी ना बनी। और दोनो भाई यह सोच कर बैठ गये कि कोई लाइलाज बीमारी लग गई है। .समय बीतता रहा, एक दिन एक रिश्तेदार जब उनसे मिलने आया तो दोनो भाईयो को देख कर हैरान हुआ।  फ़िर दो चार दिन उन के साथ रहा और जाने से पहले बोला मेरे पास एक ईलाज है आप दोनो की बीमारी का।  लेकिन थोड़ा कठिन है। दोनो भाई सुन कर खुश हुऐ और बोले बताओ हम सब कुछ करने को तैयार है। तो उस रिश्तेदार ने कहा ईलाज शुरु करने से पहले आप दोनो को अपना स्थान बदलना पडेगा। दोनो भाई कुछ समझ नही सके तो  रिशतेदार बोला तुम दोनो भाई एक महीने तक अपनी दुकान मे मत जाना, बल्कि एक महीना दूसरे की दुकान ईमानदारी से संभालाना। उस के बाद तुम्हारा ईलाज शुरू करुंगा। दूसरे दिन से ही भाई एक दूसरे की दुकान सम्भालने लगे।

    एक महीने के बाद जब वह रिश्तेदार इन से मिलने आया तो दोनो भाई काफ़ी स्वस्थ दिख रहे थे  और काफ़ी खुश भी थे।  तब रिश्तेदार ने कहा कि आप दोनो को कोई भी बीमारी नही है बस तुम दोनो मे ईर्ष्‍या थी। जब तुम अपनी अपनी दुकान पर बैठे दूसरे की दुकान मे ग्राहक को जाते देखते थे तो जलते थे और यह बात मैने दो दिन तुम्हारे साथ रह कर देखी थी ओर उसी ईर्ष्‍या से तुम अपना ही नुकसान करते रहे थे।  अब तुम दूसरे की दुकान पर बैठकर अपनी दुकान मे जाते ग्राहक देख कर खुश होते हो। यही तुम्हारे स्वस्थ होने का राज़ है।

    तो हमे कभी भी दूसरों से ईर्ष्‍या या जलन नही करनी चाहिये
     
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    Re: आज का चिन्तन
    « Reply #178 on: July 11, 2008, 03:19:17 AM »
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    जीवन में ही मृत्यु

    प्रभु को पाना है, तो मरना सीखो। क्या देखते नहीं कि बीज जब मरता है, तो वृक्ष बन जाता है!

    एक बाउल फकीर से कोई मिलने गया था। वह गीत गाने में मग्न था। उसकी आंखें इस जगत को देखती हुई मालूम नहीं होती थीं और न ही प्रतीत होता था कि उसकी आत्मा ही यहां उपस्थित है। वह कहीं और ही था- किसी और लोक में, और किसी और रूप में। फिर, जब उसका गीत थमा और उसकी चेतना वापस लौटती हुई मालूम हुई, तो आगंतुक ने पूछा, ''आपका क्या विश्वास है कि मोक्ष कैसे पाया जा सकता है?'' वह सुमधुर वाणी का फकीर बोला, ''केवल मृत्यु के द्वारा।''

    कल किसी से यह कहता था। वे पूछने लगे, ''मृत्यु के द्वारा?'' मैंने कहा, ''हां, जीवन में ही मृत्यु के द्वारा। जो शेष सबके प्रति मर जाता है, केवल वही प्रभु के प्रति जागता और जीवित होता है।''

    जीवन में ही मरना सीख लेने से बड़ी और कोई कला नहीं है। उस कला को ही मैं योग कहता हूं। जो ऐसे जीता है कि जैसे मृत है, वह जीवन में जो भी सारभूत है, उसे अवश्य ही जान लेता है।
     
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    « Last Edit: July 11, 2008, 05:07:28 AM by Ramesh Ramnani »
    अपना साँई प्यारा साँई सबसे न्यारा अपना साँई - रमेश रमनानी

    Offline Ramesh Ramnani

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    Re: आज का चिन्तन
    « Reply #179 on: July 13, 2008, 08:40:06 AM »
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    रेत के घरों से खेलते बच्चे.....

    मृण्मय घरों को ही ही बनाने में जीवन को व्यय मत करो। उस चिन्मय घर का भी स्मरण करो, जिसे कि पीछे छोड़ आये हो और जहां कि आगे भी जाना है। उसका स्मरण आते ही ये घर फिर घर नहीं रह जाते हैं।

    ''नदी की रेत में कुछ बच्चे खेल रहे थे। उन्होंने रेत के मकान बनाये थे और प्रत्येक कह रहा था, 'यह मेरा है और सबसे श्रेष्ठ है। इसे कोई दूसरा नहीं पा सकता है।' ऐसे वे खेलते रहे। और जब किसी ने किसी के महल को तोड़ दिया, तो लड़े-झगड़े भी। फिर, सांझ का अंधेरा घिर आया। उन्हें घर लौटने का स्मरण हुआ। महल जहां थे, वहीं पड़े रह गये और फिर उनमें उनका 'मेरा' और 'तेरा' भी न रहा।''

    यह प्रबोध प्रसंग कहीं पढ़ा था। मैंने कहा, '' यह छोटा सा प्रसंग कितना सत्य है। और, क्या हम सब भी रेत पर महल बनाते बच्चों की भांति नहीं हैं? और कितने कम ऐसे लोग हैं, जिन्हें सूर्य के डूबते देखकर घर लौटने का स्मरण आता हो! और, क्या अधिक लोग रेत के घरों में 'मेरा' 'तेरा' का भाव लिये ही जगत से विदा नहीं हो जाते हैं!''

    स्मरण रखना कि प्रौढ़ता का उम्र से कोई संबंध नहीं। मिट्टी के घरों में जिसकी आस्था न रही, उसे ही मैं प्रौढ़ कहता हूं। शेष सब तो रेत के घरों में खेलते बच्चे ही हैं।

    अपना सांई प्यारा सांई सबसे न्यारा अपना सांई

    ॐ सांई राम।।।

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