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Author Topic: आज का चिन्तन  (Read 140023 times)

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Offline Ramesh Ramnani

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Re: आज का चिन्तन
« Reply #30 on: March 10, 2007, 02:36:55 AM »
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  • जय सांई राम।।।

    समय कीमती है व्यर्थ न गवाएं

    समय बहुमूल्य है, जो इस की कदर नहीं करता समय भी उसका साथ नहीं देता जिससे इन्सान जिंदगी की दौड़ में पिछड़ जाता है और अंत में पश्चाताप के अलावा कोई चारा नहीं बचता। जीवन में हर पल का महत्व समझते हुए समय का सदुपयोग करना चाहिए क्योंकि विश्व में जितने भी महापुरुष हुए है उनकी सफलता के पीछे कठोर परिश्रम व लगन की कहानी है।

    इन्सान को केवल मेहनत करने और विकास के कार्यो में ध्यान लगाना चाहिए, बाकी सब बाबा सांई की कृपा के ऊपर छोड़ देना चाहिए। चिंता किसी चीज का समाधान नहीं है और यह दुख के अलावा कुछ नहीं देती इसलिए किसी बात को व्यर्थ सोचने की बजाय मनुष्य को निरंतर संघर्षरत रहना चाहिए, क्योंकि सफलता आज नहीं तो कल अवश्य मिलेगी और कठिन परिश्रम के बाद मिली सफलता का आनंद ही कुछ और है। धर्म के नाम पर जहर फैलाने वाले महा मूर्ख है क्योंकि उन्हें ये नहीं पता की जाने-अनजाने वे अपने ही पतन का कारण बन रहे है। समाज में अगर अस्वस्थ सोच पनपेगी तो इसका नुकसान हर वर्ग को उठाना पड़ेगा। प्रत्येक व्यक्ति अगर कुछ समय के लिए ध्यान लगाकर आत्मिक मंथन करे और अपने अंदर की अच्छाईयां व बुराईयां टटोले तो जहां उसकी मानसिक सोच में आश्चर्यज नक परिवर्तन होगा वहीं असीम शांति भी प्राप्त होगी।

    किसी भी कार्य को करने से पहले मनुष्य को कुछ समय के लिए उसके फायदे नुकसान की तुलना कर लेनी चाहिए क्योंकि इससे जीवन में सफलता का मार्ग प्रशस्त होगा। जल्द बाजी व क्रोध वश लिया हुआ हर निर्णय मनुष्य के लिए नुकसान दायक साबित होता है जिसके लिए बाद में पछतावे के सिवाए और कोई चारा नहीं बचता। इन्सान को केवल मेहनत करने और विकास के कार्यो में ध्यान लगाना चाहिए, बाकी सब बाबा सांई की कृपा के ऊपर छोड़ देना चाहिए।   

    अपना सांई प्यारा सांई सबसे न्यारा अपना सांई

    ॐ सांई राम।।।
    अपना साँई प्यारा साँई सबसे न्यारा अपना साँई - रमेश रमनानी

    Offline Ramesh Ramnani

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    Re: आज का चिन्तन
    « Reply #31 on: March 11, 2007, 10:21:20 PM »
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  • जय सांई राम।।।

    दु:खदायी है अहंकार  

    हमारा जीवन वैसा ही है जैसा हम उसे बनाते हैं। मैं जैसा हूं वैसा ही अपने को जानना नितांत आवश्यक है। सत्य की खोज में व्यक्तित्व का मोह नहीं, अज्ञात को जानने का साहस चाहिए। व्यक्तित्व की सुरक्षा के लिए पहने गए मुखौटों से मुक्त होना इस खोज का प्रारंभ है। हम सुरक्षा के निमित्त ही वह बने हुए हैं जो नहीं हैं। अहंकारी विनयी बना है, शोषक दानी।

    हिंसक ने अहिंसक के वस्त्र पहन रखे हैं, घृणा से भरा हुआ प्रेम की भाषा बोलने का अभिनय कर रहा है। यह आत्म-वंचना सुगम तो है, पर व्यक्ति स्वयं से सत्य से दूर होता चला जाता है। व्यक्ति जैसा देखता है, उसी से भर जाता है। सत्य-साक्षात्कार के लिए भयभीत चित्त शत्रु है। भयभीत व्यक्ति शक्तिहीन होता है। स्वयं में होना ही स्वस्थ होना है। शांति और प्रसन्नता स्वयं में होने के ही फल हैं। व्यक्ति अपनी आंतरिक रिक्तता को वाह्य उपलब्धि से भरने की चेष्टा में लगा रहता है, जो असंभव है। जो ऐसा नहीं करता, उसका शून्य ही पूर्ण बन जाता है। उसे कुछ नहीं में ही सब कुछ है।

    अहंकारी व्यक्तित्व की पहचान है-हर समय व हर स्थान पर अपने को ही सही समझना और सही सिद्ध करने का प्रयास करना। दूसरों को ध्यान से नहीं सुनना व उचित महत्व न देना। अपने सभी निर्णय स्वयं न लेना, अहं को लेने देना। दूसरों के समक्ष अपनी लुभाने वाली अथवा उत्तेजित करने वाली छवि प्रस्तुत करना। अपनी वास्तविक छवि को मुखौटा लगाकर छिपाना। क्षणिक असफलताओं से अपना आत्म-विश्वास खो देना। सत्य एवं विश्वास से अधिक महत्व उपलब्धि को देना। अपनी कमियों के लिए दूसरों को दोष देना। अपनी असफलता के लिए स्वयं को जिम्मेदार न मानना। दूसरों पर शासन करना अथवा दूसरों को अपने पर शासन करने देना। आवश्यक परिवर्तन को स्वीकार न करना। प्राकृतिक विधान में आस्था न रखना। नहीं समझना कि हर चीज का एक समय है। अपने अतीत से नहीं सीखना, वर्तमान में नहीं जीना, और भविष्य के प्रति सजग नहीं रहना। सदा चिंतित रहना। स्वार्थ-भाव रखना, केवल अपनी परवाह करना। प्राप्त बल, योग्यता, साम‌र्थ्य का दुरुपयोग करना। भोगयुक्त जीवन को ही अपना जीवन मानना। प्रकृति में सौंदर्य का, कार्य में आनंद का, संबंधों में आत्मीयता का और जीवन में रस का अनुभव न करना।


    अपना सांई प्यारा सांई सबसे न्यारा अपना सांई

    ॐ सांई राम।।।
    « Last Edit: March 11, 2007, 10:28:37 PM by Ramesh Ramnani »
    अपना साँई प्यारा साँई सबसे न्यारा अपना साँई - रमेश रमनानी

    Offline Ramesh Ramnani

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    Re: आज का चिन्तन
    « Reply #32 on: March 12, 2007, 08:23:21 PM »
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    न मैं टकसाल का हूं और न आसमान का
     
    मौलाना रूमी की मसनवी से

    ' ऐ मुसलमानो! मैं क्या करूं? मैं तो अपने आप को ही नहीं पहचान पा रहा हूं। मैं न ईसाई हूं, न यहूदी, न गबर हूं और न मुसलमान। मैं न पूरब का हूं, न पश्चिम का, न जमीन का और न ही सागर का। मैं प्रकृति की टकसाल का भी नहीं हूं और न अपने आप में सबको लपेट लेने वाले आसमान का। न मैं पृथ्वी का हूं, न जल का, न पवन का, न पावक का। मैं न तेजोलोक का हूं और न मिट्टी का, न अस्तित्व का और न सत्ता का।

    मैं न भारतवर्ष का हूं न चीन का, न बल्गेरिया का और न सक्सीन देश का। न मैं इसकैन साम्राज्य का हूं और न खुरासान देश का। मैं न इस जगत का हूं और न उस जगत का। मैं न स्वर्ग का हूं, न नर्क का। न यहाँ मेरा शरीर ही है न आत्मा ही, क्योंकि मैं प्रियतम की आत्मा का हूं। मैंने गुणों को दूर हटा दिया है, क्योंकि मैं जानता हूं कि दोनों जगत एक ही हैं। मैं उसी एक को खोजता हूं, उसी एक को जानता हूं, उसी को देखता हूं, उसी को पुकारता हूं। वह आदि है, वह अन्त है। वह वहम है, वह अन्तर है।'

    एक दूसरी कविता में रूमी अपना परिचय देते हुए बतलाते हैं:

    ' ऐ मुसलमानो! इस दुनिया में अगर कोई प्रेमी है तो वह मैं हूं। अगर कोई ईमान लाने वाला है अथवा काफिर है, अथवा ईसाई संत है तो वह मैं हूं। शराब की तलछट, साकी, गायक, वीणा, संगीत, माशूक, शमा, शराब और मदिरा की मस्ती, सब कुछ मैं ही हूं। संसार के बहत्तर धर्म और संप्रदाय, वास्तव में सभी एक ही हैं। मैं उस परम पिता परमात्मा की कसम खा कर कहता हूं कि प्रत्येक धर्म और प्रत्येक सम्प्रदाय मैं हूं।

    पृथ्वी, हवा, जल और अग्नि- तुम जानते हो ये क्या हैं? पृथ्वी, हवा, जल और अग्नि ही नहीं, बल्कि शरीर और आत्मा भी मैं हूँ। सत्य-असत्य, भला-बुरा, आराम और तकलीफ, शुरू से आखिर तक मैं ही हूं। मैं ही ज्ञान, विद्या, फकीरी, पुण्य और ईमान हूं। तुम निश्चय जान लो कि लपटों सहित नरकाग्नि और हाँ, स्वर्ग का नन्दनकानन तथा जन्नत की हूरें मैं ही हूं। इस पृथ्वी और आसमान में जितना कुछ भी है- देवदूत, परी, जिन्न, पिशाच और मनुष्य मैं ही हूं।'

    प्रियतम का पाना कब और कैसे सम्भव हो सकता है, इसका एक अति सुन्दर वर्णन जलालुद्दीन रूमी ने अपनी मसनवी में दिया है:

    ' प्रियतम के दरवाजे को किसी ने बाहर से खटखटाया। भीतर से आवाज आई, कौन है? उसने जवाब दिया, मैं हूं! भीतर से आवाज आई, इस घर में तेरे और मेरे, दो के लिए स्थान नहीं है। प्रेमी चला गया। उसने एकान्त सेवन किया, उपवास किया, प्रार्थना में डूब गया। वर्ष भर के बाद वह फिर लौटा। उसने पुन: दरवाजा खटखटाया। आवाज आई, कौन है? प्रेमी ने उत्तर दिया, तू है।

    और तब दरवाजा खुल गया। जब तक आदमी इस 'मैं' और 'तू' के बन्धन से अपने को मुक्त नहीं करता, तब तक प्रियतम को पाना संभव नहीं है। प्रेम की गली बहुत संकरी है। इसमें से एक साथ दो लोग जा नहीं सकते। जब तक अहं बना हुआ है, तब तक उसका पाना कठिन है, नामुमकिन है। जब वह मिल जाता है, तब फिर अहं नहीं रह जाता।'

    रूमी फारस (ईरान) के सबसे महान अध्यात्मवादी कवि थे। उनकी मनसवी को फारसी भाषा की कुरान कहते हैं। मौलाना जलाल-उल-दीन रूमी ऊर्फ मुहम्मद अल-बल्खी अर-रूमी का जन्म 30 सितम्बर सन् 1207 ई. को बल्ख (अब अफगानिस्तानी इलाका) में हुआ था। वह एकेश्वरवादी थे और 'ब्रह्मा सत्य जगत मिथ्या' के सिद्धांत में विश्वास करते थे। वह कवि से बड़े साधक थे और उनकी मसनवियों में इस्लाम की रहस्यवादी विचारधारा के भिन्न-भिन्न पहलुओं पर गहन विचार गया गया है।


    अपना सांई प्यारा सांई सबसे न्यारा अपना सांई

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    अपना साँई प्यारा साँई सबसे न्यारा अपना साँई - रमेश रमनानी

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    Re: आज का चिन्तन
    « Reply #33 on: March 13, 2007, 08:39:07 AM »
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    स्वार्थरहित सेवा का प्रतीक है नारियल

    कुदरत की हर व्यवस्था निराली है। जैसी जगह वैसा उपहार। अब नारियल को लें। पीने को तो नारियल पानी तटीय इलाकों के साथ-साथ मैदान और पठार के लोग भी पी रहे हैं, लेकिन मैदानी और पठारी इलाकों के लोग अगर नारियल पानी न भी पीएं तो उनका काम चल जाएगा। यह तो तटीय इलाकों की भौगोलिक स्थिति के हिसाब की चीज है। प्राकृतिक चिकित्सा विज्ञान में तो यही माना जाता है।

    नारियल पानी आर्द्रता (ह्यूमिडिटी) के कारण होने वाली बीमारियों में बहुत लाभकारी होता है और इस प्रकार की परेशानियां तटीय इलाकों में ही आती हैं, क्योंकि वहां आर्द्रता बहुत ज्यादा होती है। नारियल पानी को कीटाणु-जीवाणु से रहित भी माना जाता है। इसीलिए इसका उपयोग चिकित्सा विज्ञान में स्टराइल फ्लुइड के रूप में भी हो रहा है।

    विज्ञान ही नहीं, धार्मिक कर्मकांडों में भी नारियल काफी महत्व रखता है। शादी-ब्याह हो या फिर कोई तीज-त्योहार, या फिर किसी ने कोई नई गाड़ी ही क्यों न खरीदी हो, नारियल फोड़ने की परंपरा है। भगवान की पूजा के दौरान भी सबसे पहले नारियल फोड़ने और बाद में उसे प्रसाद के रूप में बांटने की परंपरा है।

    नारियल के रूप से हम सभी परिचित हैं। इसके फल के ऊपरी हिस्से पर खिंची रेखाएं एक तरह से मस्तिष्क का रेखाचित्र बनाती हैं। नारियल फोड़ने को अहम को छोड़ने का प्रतीक भी माना जाता है। इसका ऊपरी छिलका शरीर का प्रतिनिधित्व करता है तो अंदर मौजूद पानी वासनाओं का और सफेद फल मस्तिष्क का। एक व्यक्ति को नारियल के ऊपरी हिस्से की तरह ही दृढ़ होना चाहिए और अंदरूनी फल की तरह मुलायम।

    नारियल और श्रीफल (भगवान का फल) को पूजा-पाठ के दौरान भगवान का प्रतीक भी माना जाता है। नारियल तो पूजा के कलश पर रखा जाता है। जल से भरे कलश के मुंह पर आम की पत्तियां, उसके ऊपर ढक्कन और ढक्कन के ऊपर नारियल। यहां कलश धरती का प्रतीक है तो पानी जीवनदाता का। पत्तियां जीवन का प्रतीक मानी जाती हैं, तो नारियल दैविक चेतना का। सारे धार्मिक कर्मकांड कलश की पूजा के साथ ही शुरू होते हैं। कलश के ऊपर धरे नारियल को भगवान गणेश का प्रतीक भी माना जाता है।

    नारियल की पूजा भगवान के सिर के रूप में भी की जाती है। इसकी तीन आंखों को भगवान शिव के त्रिनेत्र का प्रतीक माना जाता है। माना जाता है कि संत विश्वामित्र ने अपने तप से पहली बार धरती पर नारियल उगाया था।

    नारियल को स्वार्थरहित सेवा का प्रतीक भी माना जाता है। पेड़ का एक-एक हिस्सा व्यक्ति के काम आता है। फल के भीतर का पानी जहां आयुर्वेदिक दवाइयों में इस्तेमाल होता है, वहीं इसका तेल बालों के लिए लाभकारी माना जाता है। इसमें ग्लूकोज, फॉसफोरस और कार्बोहाइड्रेट पाया जाता है।

    पुराने जमाने में इसकी छाल को जला कर दंतमंजन और जली त्वचा के लिए मलहम का निर्माण भी करते थे। कोकोनट मिल्क का इस्तेमाल हम सभी जानते हैं। एशियाई देशों में तमाम व्यंजन तैयार करने में इसका इस्तेमाल होता है।

    पश्चिमी भारत में तो रक्षाबंधन के दिन समुद्र में नारियल फेंकने की प्रथा है। वरुण देवता की पूजा के इस अवसर को नारियल पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है। स्वामी कृष्णानंद ने छांदोग्य उपनिषद में आध्यात्मिक प्रतीक के रूप में नारियल का जो वर्णन किया है, उसके अनुसार कच्चा नारियल कड़े कवच से चिपका रहता है। यह बंधन की स्थिति है और उसी प्रकार है जैसे शरीर से चेतना चिपकी रहती है। लेकिन मोह-माया से मुक्त चेतना या स्वतंत्र आत्मा के साथ ऐसी स्थिति नहीं होती। शरीर में इसका वजूद होता है, इसमें कोई संशय नहीं है। लेकिन शरीर के साथ बंधी हुई नहीं होती।
     

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    Re: आज का चिन्तन
    « Reply #34 on: March 14, 2007, 10:13:07 AM »
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    संत की कीमत
     
    तुर्कों और ईरानियों के बीच युद्ध छिड़ा हुआ था। तुर्कों की निरंतर पराजय होती जा रही थी। एक दिन ईरान के सूफी संत फरीदुद्दीन अत्तार तुर्कों के हाथ पड़ गए। तुर्कों ने जासूसी का अभियोग लगा कर उन्हें फांसी की सजा दे दी। एक ईरानी रईस ने संत के प्राणों के बदले उनके वजन के बराबर हीरे-जवाहरात देने की पेशकश की। अनेक लोगों ने अपने जीवन की पेशकश की, पर तुर्कों ने उनकी एक न सुनी।

    आखिरकार ईरान के शाह ने तुर्क सुलतान से प्रार्थना की, 'आप संत को छोड़ने के एवज में राज्य ले लें, पर संत को छोड़ दें।' सुलतान ने आश्चर्य से पूछा, 'क्या आप एक आदमी के लिए अपना पूरा राज्य देने को तैयार हैं, जिसे हम लड़कर भी न ले सके?' शाह ने उत्तर दिया, 'राज्य तो नश्वर है, किंतु संत अविनाशी हैं। यदि हमने संत खो दिया तो ईरान हमेशा के लिए कलंकित हो जाएगा।' सुलतान ने कहा, 'जिस देश में संतों का इतना सम्मान हो उसे कोई नहीं जीत सकता।' और उसने फरीदुद्दीन को मुक्त कर दिया।
     

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    Re: आज का चिन्तन
    « Reply #35 on: March 14, 2007, 08:15:40 PM »
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    समदर्शन  

    मानव जीवन बाबा सांई को पा लेने के बाद आनंदमय, ज्ञानमय और सन्मय बन जाता है। इसकी प्राप्ति के अनेक साधनों में समदर्शन सबसे सरल और सुगम है। बाबा का आनंदमय, ज्ञानमय और सन्मय रूप सतत् सम रहता है। विषम संसार के पदार्थ में बाबा को देखना यही समदर्शन है। जड़, मानव, पशु-पक्षी, वृक्ष आदि चेतन में, शत्रु मित्र उदासीन में, बाबा को देखते रहना समदर्शन है। समदर्शन में सारे दोष स्वयं दूर हो जाते हैं। ईष्र्या, लोभ, अहं नहीं रहता। मन में कल्पित मनोरम भगवान का सौन्दर्यमय रूप देखकर हृदय में रस संचार हो जाता है। ब्रह्मानंद उल्लासित हो उठता है। प्रेम में देखा देखी का खेल चलता है। समदर्शी बाबा को कण-कण में देखता है। जिस प्रकार समदर्शी सभी में ईश्वर को देखता है उसी प्रकार ईश्वर भी समदर्शी को देखता है। प्रेम में यह देखा देखी दोनों ओर से चलती है। इससे दोनों रसमय हो जाते हैं। प्रिय को कण कण में देखकर प्रसन्नता होती है।

    समदर्शन में साधक और बाबा दोनों परस्पर को देखते हैं। प्रेम का अंश आ जाने पर साधक आनंदित हो जाता है। लीला प्रकृति से दो आंखें प्राप्त होती हैं। इन आंखों से देखा गया बाबा का सौंदर्य आनंद में सब‌र्द्धन करता है। भगवत्पे्रम किसी साधन से साध्य नहीं, अपितु कृपा से साध्य है। वह समदर्शन से भी साध्य नहीं उसके लिए बाबा की कृपा प्राप्त करनी पड़ती है। ब्रह्मानंद में अत्यधिक तल्लीनता के कारण देह का भान न होने पर विदेह की स्थिति आ जाती है। प्रेम स्वरूप ईश्वर को देखने पर प्रेमानंद के उल्लास में ब्रह्मानंद मिलता है। यह उल्लास  से होता है। सौंदर्य विदेह को प्रेममय बनाता है। समदर्शी को बाबा का प्रेम प्राप्त करने के लिए  बाबा से प्रार्थना करनी पड़ती है। इस प्रकार प्रेम की याचना करनी पड़ती है। समदर्शन साधन सम्यक् गतिमान रखने के लिए ईश्वर की कृपा अपेक्षित है। जब भगवान अपने मोहक सौंदर्य को लेकर अवतरित होते हैं तो उन्हें देखकर प्राणी भूल जाता है। भगवान समदर्शी संतों के लिए ही शरीर को धारण करते हैं। चिन्मय शरीर धारण कर संतों को गले लगाते हैं। जब प्रभु स्व अपने कोमल अंक में अपने प्रेमास्पद को आंखों की छाया से सहलाते हैं तब प्रेमास्पद को ब्रह्मानंद में असीम उल्लास की अनुभूति होने लगती है।

    अपना सांई सबसे प्यारा, सबसे न्यारा अपना सांई

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    Re: आज का चिन्तन
    « Reply #36 on: March 15, 2007, 08:31:12 AM »
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    संत जनों का संग ही सत्संग है:

    जो मनुष्य झूठ,  ईष्र्या,  द्वेष की भावना त्याग कर सच्चाई का मार्ग अपना लेता है, उसी मनुष्य को सत्संग का लाभ मिलता है।

    हमें अपने परिवार के लोगों को संस्कार युक्त बनाना चाहिए और सत्संग ही इसका एकमात्र उपाय है। सत्संग का संबंध किसी विशेष विधि की पूजा अर्चना से नहीं है बल्कि सत्य को अपने जीवन में अपनाने से है और उसे अपने जीवन में लागू करने से है। सत्संग का सही अर्थ संत जनों के संग से है। संत यानी अच्छे व महान व्यक्ति। अच्छे व महान व्यक्ति के साथ रहने से मनुष्य उत्तम विचार सीखता है। जोकि आखिरकार उस आम व्यक्ति के जीवन निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। एक  माता-पिता का कर्तव्य बनता है कि वह अपनी संतान को एक सुसंस्कृत परिवेश देकर एक योग्य व्यक्ति बनाए। उसे अच्छी शिक्षा दे परंतु वह शिक्षा ऐसी न हो जो माता-पिता को ही समझाने लगे उन्हीं के साथ कुतर्क करने लगे। यही सत्संग का वास्तविक अर्थ है। सच्चाई को छोड़कर मानव आज भौतिक साधनों में सच्चाई तलाशने की कोशिश कर रहा है जो मानव का सांस्कृतिक ह्रास नहीं बल्कि उसका मानवीय मूल्यों से विमुख होकर एक मशीनी युग का प्रमाण है। आज मानव दुखों में फंसता जा रहा है। इससे मुक्ति का सबसे सरल मार्ग सत्संग हैं, सत्संग में जाने से मन को शांति व दिल को सुकून मिलता है।

    अपने जीवन में सत्संग को अपनाकर अपने जीवन व अपने परिवार का कल्याण सुनिश्चित करें। साथ ही जीवन को सुसंस्कृत बनाकर बाबा सांई की भक्ति में समय लगाए जिससे आप सभी को परम आनंद की प्राप्ति होगी।

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    ॐ सांई राम।।।
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    Re: आज का चिन्तन
    « Reply #37 on: March 16, 2007, 10:21:35 PM »
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    सत्य का बोध  

    प्राय: आंखों देखी और कानों सुनी को सत्य माना जाता है, किंतु वास्तविकता इसके विपरीत है। इस विश्व की संरचना अत्यंत जटिल है। हम जिस पृथ्वी नामक ग्रह पर निवास करते हैं, इसके भीतर निरंतर असंख्य ज्वालामुखियों का विस्फोट होता है। हमारी श्रवण-शक्ति उनकी ध्वनियों को नहीं पकड़ पाती है। इसी तरह अन्य अनेक घटनाएं घटित होती रहती हैं जिनसे हम अनजान बने रहते हैं। जिन जीवधारियों को एक सीमा से कम अथवा अधिक आवृतियों को सुनने की शक्ति प्राप्त है वे सहज रूप में इस जीवनानुभव से दो-चार होते हैं। इसलिए यदि हम यह कहें कि धरती शांत है, अचला है तो यह सत्य और तथ्य के विपरीत होगा। हमें पृथ्वी स्थिर ज्ञात होती है और सूर्य चलता हुआ दिखलाई पड़ता है। यह ही जीवन-जगत का भ्रम है। वास्तविकता यह है कि पृथ्वी गतिशीत है और सूर्य स्थिर है। इस वैज्ञानिक तथ्य से विचलन असंभव है। तथापि हमारी दृष्टि और अनुभव करने की क्षमता की अपनी सीमाएं हैं।

    चूंकि हम अनेक तथ्यों को देख और समझ पाने में असमर्थ होते हैं इसी कारण हम सत्य को असत्य और असत्य को सत्य समझते रहते हैं। यद्यपि विश्व में ऐसे तमाम उदाहरण मिलते हैं, जब लोगों को सत्य की प्राप्ति अनायास ही हो गई। बिना किसी तपस्या या अध्ययन के ही सहज रूप में उन्हें सत्य के दर्शन हो गए। तथापि सहज मार्ग बिरलों को ही उपलब्ध होता है। यह मार्ग अनायास ही साध्य नहीं है।

    अपना सांई प्यारा सांई सबसे न्यारा अपना सांई

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    Re: आज का चिन्तन
    « Reply #38 on: March 17, 2007, 10:46:14 PM »
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  • सांई राम।।।

    धर्म तोड़ना नहीं, जोड़ना सिखाता है:
     
    समभाव में ही धर्म है और विषमता में हमेशा अधर्म होता है। मानव कभी खेत में पैदा नहीं होता है। वह तो मानव की आत्मा में पैदा होता है। हमें यह विश्व बंधुता व मानव से आपस में प्यार करना सिखाता है।

    धर्म हमें कभी लड़ना, भिड़ना, झगड़ना आपस में किसी प्रकार की हिंसा करना नहीं सिखाता है। मानव हर समय माला जाप, मंदिरों में घंटे बजाकर व नारे लगाकर अपने को धार्मिक दिखाता है। सही मायने में वह धर्म नहीं है। आज धर्म को संप्रदायों में बाट दिया है। भगवान के नाम पर लड़ना, मजहब के नाम पर लड़ना इंसान की प्रवृत्ति बन गई है। धर्म के नाम पर हमारे विचारों में भेद तो हो सकते हैं, लेकिन हमारे मनों के अंदर भेद नहीं होना चाहिए। धर्म हमारे घरों के अंदर क्लेश नहीं सिखाता, हमें भाई-भाई को अलग होना नहीं सिखाता। आज हम भगवान को भी बांट रहे हैं। यह मेरा भगवान है यह तेरा भगवान है।

    जैसे संतरा बाहर से एक दिखाई देता अंदर से अलग-अलग होता है। उसी प्रकार हमें भी बनना है। हमें कैंची की तरह नहीं जो हमेशा काटने का काम करती है, सूई की तरह बनना है जो हमेशा दूर हुए को मिलाती है। धर्म गुरु हमारे अंदर से अंधकार को दूर करते हैं। मुस्लिम जायरीन हज करते समय सफेद कपड़े पहनते हैं व नंगे पैर चलते हैं, सिर में खुजाते तक नहीं कहीं कोई जूं न मर जाए। हमें अपने प्राणों की बलि देकर भी सत्य व धर्म की रक्षा करनी चाहिए। धर्म संगठन में नहीं है। संगठन तो चार का भी होता है। आतंकवादियों का भी होता है। हमें नेक बनना है। बिनोबा जी ने कहा था कि अगर इंसान अपने धर्म में दृढ़ हो व दूसरों के धर्म में सम्मान की भावना हो और अधर्म से घृणा करता हो वह सही मायने में धार्मिक है। कोई भी धर्म हमें किसी का दिल तोड़ना नहीं जोड़ना सिखाता है।

    अपना सांई प्यारा सांई सबसे न्यारा अपना सांई

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    Re: आज का चिन्तन
    « Reply #39 on: March 19, 2007, 08:27:18 PM »
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    एक बार संत एकनाथ तीर्थयात्रा पर निकले। वह त्रिवेणी से गंगाजल की कांवर भर कर रामेश्वर भगवान के मंदिर में चढ़ाने का संकल्प लिए चले जा रहे थे। रास्ता लगभग कट चुका था और वह मंदिर के समीप पहुंचने ही वाले थे कि तभी उन्होंने देखा कि रेत पर प्यास से एक गधा तड़प रहा है। एकनाथ से रहा नहीं गया। उन्होंने अपनी कांवर से जल लेकर गधे की प्यास बुझाई। त्रिवेणी का गंगाजल पीकर तृप्त हुआ गधा नवजीवन प्राप्त कर उठ बैठा और प्रसन्न होकर चला गया। तब तक पीछे से कुछ अन्य तीर्थयात्री भी वहां आ गए थे।

    एकनाथ के साथियों में से एक ने कहा, 'तुम्हारी यह यात्रा विफल हो गई। एक गधे का उच्छिष्ट जल अब भगवान को चढ़ाने योग्य नहीं रहा।' एकनाथ ने कहा, 'मैं समझता हूं कि मेरी यात्रा सफल हो गई है। चराचर तथा कण-कण में व्याप्त भगवान ने आगे बढ़कर मेरी सेवा स्वीकार कर ली है। अब मुझे वहां जाने की भी आवश्यकता नहीं है।'
     
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    Re: आज का चिन्तन
    « Reply #40 on: March 21, 2007, 08:20:31 PM »
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    फकीर की बात

    किसी समय मालवा में एक जमींदार था, बड़ा ही कंजूस और क्रूर। उसके बारे में मशहूर था कि वह दान-पुण्य नहीं करता और न कभी किसी की मदद ही करता है। एक दिन एक फकीर ने उसके दरवाजे पर पहुंचकर फरियाद की, मगर जमींदार ने उसे खाली हाथ लौटा दिया। दूसरे दिन फिर फकीर उसके दरवाजे पर पहुंचा, लेकिन वह खाली हाथ लौटा दिया गया। एक दिन जब जमींदार खेतों में काम कर रहा था, तब फकीर वहीं पहुंच गया और बोला, 'मुझे तुझसे कुछ नहीं चाहिए, पर मैं तुझसे कुछ कहना चाहता हूं, सुन तो ले।' मगर जमींदार कुछ सुनने को तैयार नहीं था। फकीर यही कहते-कहते जमींदार के पीछे हो लिया। जमींदार को बड़ा गुस्सा आया। उसके हाथ में जो छड़ी थी उसने वही खींचकर फकीर पर दे मारी। फकीर पतला-दुबला और कमजोर था। चोट लगते ही बेहोश हो गया।

    फकीर के बेहोश हो जाने पर जमींदार कुछ नरम पड़ा। पानी के छींटे देकर वह फकीर को होश में लाया और बोला, 'कहो बाबा क्या कहना चाहते हो।' फकीर बोला, 'कुछ नहीं। अब कुछ नहीं कहना है।' यह कहकर फकीर चला गया। पर जमींदार के हृदय में तो यह जानने की इच्छा जाग चुकी थी। उसके बाद से वह फकीर की बात के बारे में सोचने लगा। उसके मन में तरह-तरह की आशंकाएं आने लगीं। अब उसका मन जमींदारी के काम से ऊबने लगा। धीरे-धीरे धन का लोभ भी जाता रहा। उसका दिल सदा आत्मग्लानि से भरा रहता। अपनी कुंठा दूर करने के लिए वह परमार्थ के कार्यों में लगा रहने लगा। गरीबों और जरूरतमंदों की मदद करने लगा। उसकी दानवीरता और सेवाभाव की चर्चा दूर-दूर तक होने लगी। लोग अब उससे डरते नहीं थे, बल्कि और इज्जत करने लगे। कई वर्षों बाद वही फकीर जमींदार के दरवाजे पर पहुंचा। इस बार नजारा बदला हुआ था। जमींदार ने देखते ही उसके पांव पकड़ लिए और बोला, 'बाबा! अब तो बता दो क्या कहना चाहते थे।' फकीर बोला,' अब कुछ कहने की आवश्यकता नहीं है। जो कहना था तुमने कर दिखाया।' यह कहकर फकीर वापस लौट गया।

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    Re: आज का चिन्तन
    « Reply #41 on: March 31, 2007, 11:14:59 PM »
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    रस, आनंद, प्रकाश और समदृष्टि है धर्म
     
    अर्थशास्त्र का सामान्य सिद्धांत यह है कि जिस चीज की मांग न हो, वह बाजार से गायब हो जाती है। इसी तरह जिस चीज की जरूरत हो, उसकी पूर्ति के लिए कोई न कोई आ ही जाता है। चूंकि वर्तमान युग में सचाई नदारद हो गई लगती है, इसलिए कहा जा सकता है कि अब इसके ग्राहक नहीं रहे और इसकी पूर्ति करने वाले एक तरफ हो गए। माहौल ऐसा है कि ईश्वर की खोज की तड़प रखने वाले अब खुद को दुनिया की निगाह से बचाए रखना चाहते हैं। वे पीछे हटते हैं, पीछे बैठते हैं, पीछे ही रहते हैं। अहंकार को पीछे रखना ठीक बात है, पर अब समय आ गया लगता है कि परोपकार को आगे रखना पड़ेगा।

    बेशक,  धार्मिक रस व्यक्तिगत सुख का विषय है। यह जबरन किसी की झोली में नहीं डाला जा सकता। भक्त प्रह्लाद के पास धार्मिक रस था, लेकिन उसका परिवार प्रह्लाद के इन गुणों का ग्राहक नहीं था। गुरु घर (अर्थात गुरु रामदास के परिवार) के सदस्य होते हुए भी बाबा प्रिथीचंद आत्मिक रस से वंचित रहे। अपने परिवार में मीरा अकेले ही धर्म के गीत अलापती रही। मुहम्मद साहिब के चाचा अबू तालिब ने इस्लाम कबूल नहीं किया।

    जैसे बुखार में जलते हुए व्यक्ति को भूख नहीं लगती। बुखार उतरने पर उसे भोजन की इच्छा होती है, उसी तरह सत्संग करके जब विकारों का ताप उतर जाता है, तो मनुष्य भजन करने के लिए तत्पर हो जाता है। धार्मिक रस किसी को जबरन नहीं पिलाया जा सकता। अत्यंत विनयशील, सहनशील और क्षमाशील व प्रेम रस से भरे हृदयों से ही हमेशा धर्म का प्रचार हुआ है। जब भी किसी व्यक्ति के हृदय में धर्म का फूल खिलता है, उसके रसिक भंवरे आ ही जाते हैं। इसी तरह जब भी किसी हृदय में धर्म की रोशनी पैदा हुई है, उससे संसार प्रकाशवान हुआ है।

    धर्म एक रस है, आनंद है, प्रकाश है, समदृष्टि और निरवैर यानी किसी से भी शत्रुता नहीं रखने की भावना है। पर यह रस, यह आनंद, यह प्रकाश भीड़ में नहीं जगता। आम इंसान की कमजोरी यह है कि वह भीड़ से प्रभावित होता है। महात्मा बुद्ध के कथनानुसार, बहुत बड़ी भीड़ में अच्छे मनुष्य नहीं होते और अच्छे मनुष्यों की कतई भीड़ नहीं होती। धार्मिक क्रांति हमेशा व्यक्तिगत रही है और पाखंड हमेशा संगठित रहा है।

    पर अक्सर देखा गया है कि धार्मिक क्रांतियां अपनी मंजिल तक नहीं पहुंच पातीं। धर्म की जो अच्छी बातें हैं, उनका उचित प्रचार नहीं हो पाता। इसका कारण यह है कि निर्मल हाथों से निकल कर ये क्रांतियां कई बार गलत और अपवित्र हाथों में पहुंच जाती हैं। इस तरह वे दिशाहीन हो जाती हैं। धर्म से प्रेरित कोई क्रांति सही दिशा में बढ़े, इसके लिए बहुत सावधानी रखनी पड़ेगी। दरिया में डुबकी लगा कर जिस तरह मनुष्य तरोताजा होकर निकलता है, निवेदन है कि उसी प्रकार धर्मस्थानों से निकलते हुए मनुष्य धर्म की अच्छी बातों को दूसरों तक पहुंचाने का जरिया बनें।

    एक बहस धर्म और राजनीति के परस्पर संबंध की होती है। पर ध्यान रहे कि धर्म का राजनीति से दूर-दूर तक कोई रिश्ता नहीं है। राजनीति तो असल में दूसरों पर जीत दर्ज करने पर आधारित है, जबकि धर्म की नीति अपने मन को जीतने की बुनियाद पर खड़ी है। एक जगत को जीत कर अपनी जीत समझता है और एक मन को जीत कर अपनी जीत मानता है। धर्म 'सरबत' यानी सभी लोगों के भले पर खड़ा है, जबकि राजनीति हुकमरानी अर्थात शासन करने की नीति पर खड़ी है। धार्मिक मनुष्य अपनी मुक्ति सब की चरणधूलि बनने में देखता है, जबकि राजनीतिज्ञ लोगों के सिर पर बैठ कर खुश होता है।

    धार्मिक मनुष्य ही अपना जीवन उत्तम ढंग से चलाता है। ऐसा मनुष्य समाज के लिए पथप्रदर्शक हो सकता है और राजा जनक तथा महाराजा रणजीत सिंह की तरह राजनीति को सही ढंग से चलाने वाला भी हो सकता है। जिंदगी के हर क्षेत्र में आगे आने के लिए धार्मिक होना सबसे अधिक श्रेष्ठ है।

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    Re: आज का चिन्तन
    « Reply #42 on: April 01, 2007, 04:24:31 AM »
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    आत्म ज्ञान के बिना ज्ञान अधूरा

    मनुष्य को अपने अंदर आत्मविश्वास पैदा करना चाहिए क्योंकि बिना आत्म विश्वास के इन्सान कितना भी ज्ञान क्यों न अर्जित कर ले उसका व्यक्तित्व अधूरा ही रह जाता है।

    थोड़े ज्ञान वाले व्यक्ति के पास भी अगर आत्मविश्वास हो तो वह जीवन में सफल हो सकता है। आत्म विश्वास के लिए योग साधना व प्रभु भक्ति का महत्व है कयोंकि मन को एकाग्र करते हुए मनुष्य अपने अन्दर आत्मविश्वास पैदा कर सकता है। जीवन के संघर्ष में अच्छे रास्ते पर चलते हुए सिर्फ प्रभु से डरना चाहिए क्योंकि पृथ्वी पर जन्म लेने वाला हर मनुष्य कमजोरियों का पुतला है और दुख के समय जब अपने रिश्तेदार व साथी भी साथ छोड़ देते हैं तो ऐसे समय में प्रभु ही अपने भक्त की मदद के लिए पहुंचते है, चाहे वे किसी रूप में ही क्यों न पहुंचे।

    दिक्कतें हर आदमी के जीवन में आती हैं और सुख-दुख का आना जाना सृष्टि का नियम है लेकिन कठिनाईयों से घबराकर प्रभु में आस्था व साहस का दामन नहीं छोड़ना चाहिए क्योंकि एक बार साहस का दामन छूट गया तो हर मुश्किल बड़ी हो जाती है। हर मनुष्य अपने कर्म अनुसार ही फल भोगता है और इस दुनिया से कूच कर लेने के बाद भी व्यक्ति के बोले गए अच्छे शब्द व सत् कर्म ही दुनिया याद रखती है। लालच व क्रोध इन्सान का सबसे बड़ा दुश्मन है। यह दोनो अवगुण एक अच्छे इन्सान को भी बरबादी की राह पर खड़ा कर देते हैं। क्रोध में उठाया गया हर कदम विनाशकारी ही सिद्ध होता है। जो लोग अपनी संस्कृति व परम्पराओं को भूल जाते है वह कितनी भी तरक्की क्यों न कर लें अन्त में कष्ट ही पाते हैं।

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    Re: आज का चिन्तन
    « Reply #43 on: April 02, 2007, 03:21:05 AM »
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    इंद्रियों पर काबू पाना ही अश्वमेध यज्ञ  

    ध्यान से देखने पर हम पाते हैं कि प्रकृति के हर रूप, हर व्यवस्था में आध्यात्मिकता के रहस्य मौजूद हैं। प्रकृति की हर संरचना, हर फूल-पत्ती, हर जीवजंतु अपने आप में कोई आध्यात्मिक प्रतीक है। जैसे कि अश्व यानी घोड़े को देखें। आमतौर पर हम घोड़े को एक ताकतवर जानवर के रूप में जानते हैं, पर धार्मिक ग्रंथों में, वेदों-उपनिषदों में इसे त्याग का प्रतीक माना जाता है। रामायण, श्रीमद् भगवद्गीता और कठोपनिषद् तक में घोड़े की चर्चा मिलती है।

    उपनिषदों और वेदों में घोड़े को त्याग का प्रतीक बनाने के कुछ स्पष्ट कारण हैं। घोड़े में रफ्तार, ताकत, स्वामिभक्ति और समर्पण जैसे गुण होते हैं। कोई महान लक्ष्य हासिल करने के लिए इन गुणों की जरूरत होती है। अश्व और लक्ष्य प्राप्ति का एक दूसरे से गहरा संबंध है। अगर व्यक्ति कोई बड़ा लक्ष्य लेकर चल रहा है, तो उसे अश्व के गुणों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। प्रयास यह होना चाहिए कि वे गुण हम में आ सकें।

    बहुधा हम कोई मकसद हासिल करने में इसलिए चूक जाते हैं, क्योंकि उस राह में आगे बढ़ते हुए हमारा मन विचलित हो जाता है। हमारे मन का भटक जाना यानी आंतरिक विचलन भी घोड़े की एक प्रवृत्ति के समान हैं। घोड़े चंचल होते हैं। इसी प्रकार जब हमारा मन चंचलता दिखाता है, तो हम एक जगह ध्यान केंद्रित नहीं कर पाते।

    बृहदारण्यक उपनिषद् में अश्वमेध यज्ञ के घोड़े का वर्णन किया गया है। उसके अंगों की तुलना प्राकृतिक तत्वों के साथ की गई है। यज्ञ के घोड़े के सिर को प्रात:काल के रूप में देखा गया है। उसकी आंखों को सूर्य माना गया है। खुले मुंह को आग (वैश्वानर) की तरह माना गया है। धड़ को वर्ष, शरीर के पिछले हिस्से को स्वर्ग, पेट को आकाश, खुर को धरती, चारों किनारों को चार दिशाएं, पसलियों को दो दिशाओं के बीच का स्थान, जोड़ों को महीना-पखवाड़ा, पांवों को दिन-रात, हड्डियों को तारा, मांस को बादल, उसके पेट में मौजूद अधपचे खाने को रेत, शिराओं और धमनियों को नदी, लीवर को पहाड़, बाल को पेड़ और झाड़ी, अगले हिस्से को उगता हुआ सूर्य और पिछले हिस्से को डूबते हुए सूर्य के समतुल्य बताया गया है। इसके मुंह खोलने को बादलों की चमक और इसके कांपते शरीर को उनकी गर्जना के रूप में वर्णित किया गया है।

    कठोपनिषद् में मस्तिष्क और इंद्रियों पर नियंत्रण की चर्चा की गई है। इसके अनुसार शरीर एक रथ के समान है। स्वार्थ इसका स्वामी है। बुद्धि-विवेक को इसका सारथी बताया गया है और मस्तिष्क को लगाम। इंद्रियों को घोड़े की तरह माना गया है। घोड़ों (इंद्रियों) की अलग-अलग संख्या को भी अलग अलग प्रकार से दर्शाया गया है।

    श्रीमद् भगवद्गीता में जिस रथ का वर्णन है, उसमें चार या पांच घोड़े जोतने की बात की गई है। अर्जुन उस रथ में सवार होते थे और श्रीकृष्ण उसके सारथी हुआ करते थे। रथ मानवीय शरीर का प्रतीक था, तो अर्जुन आत्मा के एकल स्वरूप के प्रतीक थे। कृष्ण सर्वोच्च सत्ता के प्रतीक थे। उस रथ के तीन पहिए माने गए: सत्व, रजस और तमस। उसकी गतियां भी तीन प्रकार की मानी गईं। एक ऊपर की दिशा में, दूसरी नीचे के दिशा में और तीसरी क्षैतिज। इनके द्वारा परोक्ष रूप से जन्म-मरण के चक्र को दर्शाया गया है। ऊपर की दिशा की गति अच्छे कर्मों की सूचक है और नीचे के दिशा की गति बुरे कर्मों की सूचक है। क्षैतिज गति बीच की स्थिति है। इसके जरिए यह बताने की कोशिश की गई है कि व्यक्ति के जन्म पर कर्मों का असर पड़ता है।

    समग्रता में देखने से पता चलता है कि असल में अश्वमेध यज्ञ तो इंद्रियों पर विजय का यज्ञ है। वह हमारे अंदर का यज्ञ है। प्राचीनकाल के राजा जो अश्वमेध यज्ञ करते थे, उसमें तो एक प्रकार के अहंकार का भाव होता था, लेकिन इस यज्ञ का वास्तविक उद्देश्य अहंकार खत्म करना है। इसमें अहं का कोई स्थान नहीं होता। यह तो हमारे अहंकार को नष्ट करता है। जिस व्यक्ति ने अपने अंदर के घोड़ों को काबू कर लिया, समझो अश्वमेध यज्ञ कर लिया। 

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    « Reply #44 on: April 02, 2007, 09:23:44 PM »
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    कर्मो के आधार पर व्यक्तित्व का होता है

    जिस तरह हम अपने व्यक्तित्व को प्रभावशाली बनाने के लिए अच्छे परिधानों और संसाधनों का प्रयोग करते हैं उसी प्रकार आत्मा की शुद्धि के लिए सत् कर्म करते हुए हमें सदा बाबा सांई का स्मरण करते रहना चाहिए क्योंकि किसी के व्यक्तित्व का आकलन उसके बाहरी रूप से नहीं बल्कि उसके द्वारा किए गए कर्मो के के आधार पर किया जाता है।

    यदि हम बाहर से अच्छा दिख रहे हैं पर हमारा स्वभाव, हमारा आचरण निम्न स्तर का है तो उसका प्रभाव निश्चित रूप से हमारे व्यक्तित्व को प्रभावित करता है। जहां हमें सत्य पथ पर चलते हुए सत कर्म करने वाला होना चाहिए वहीं हमें संतोषी और आत्मविश्वासी भी होना चाहिए। इन दोनो गुणों का तेज चेहरे पर स्पष्ट रूप से रहता है। जिस व्यक्ति में आत्म विश्वास की कमी होती है वह स्वत: हीन-भावना से ग्रसित हो जाता है,  डरा सहमा रहता है और अज्ञात तनाव से घिर जाता है ऐसे व्यक्ति के उन्नति के मार्ग अवरुद्ध हो जाते हैं। ध्यान व अच्छे कर्मो द्वारा आत्मविश्वासी बनकर हम इस स्थिति से उबर सकते हैं। लगातार अभ्यास से हिम्मत व विश्वास के साथ आत्मबल का विकास किया जा सकता है। जब आत्मविश्वास का हमारे व्यक्तित्व में समावेश हो जाएगा तो हमारी सोच सकारात्मक हो जाएगी। सकारात्मक दृष्टिकोण से सुनिश्चित भाव जन्मेगा और मन में व्याप्त डर व आतंक स्वत: खत्म हो जाएगा। जब मन में दृढ़ निश्चय व इच्छा शक्ति होती है तो सफलता अवश्य मिलती है।

    आत्म विश्वास और हिम्मत प्राप्त करना, आतंक की भावना पर विजय पाना, शांति और निश्चितता की अनुभूति को प्राप्त कराना उतना कठिन नहीं है जितना कि हम सोचते हैं। इसके लिए विशेष प्रकार के यत्न करने की आवश्यकता नहीं है बल्कि इसके लिए हमें केवल बार-बार अभ्यास करके अनुभव प्राप्त करने की जरूरत है। जब हम किसी कार्य को पूर्ण करने की इच्छा व कार्य में लगे रहने का निश्चय कर लेते हैं तो वह कार्य निश्चित रूप से पूरा हो जाता है और इस तरह व्यक्ति के आत्म विश्वास को आत्मबल मिलता है। आत्मविश्वास का एक पहलू प्रसन्नता भी है। प्रसन्न रहने से हमारे अंदर पुन: नई ऊर्जा के साथ आत्मविश्वास जन्म लेता है। यदि हमें जीवन में सफलता प्राप्त करनी है तो इच्छा को उत्कृष्ट बनाते हुए निडरता, विश्वास तथा साहस पूर्वक कार्य में जुट जाना होगा। 

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