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Author Topic: आज का चिन्तन  (Read 162985 times)

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Offline Ramesh Ramnani

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Re: आज का चिन्तन
« Reply #60 on: April 21, 2007, 12:11:13 AM »
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  • जय सांई राम

    पृथ्वी कहती है, मुझ से कुछ लो तो कुछ वापस भी करो

    हम पृथ्वी से केवल लेते हैं, उसे वापस कुछ नहीं लौटाते। प्रकृति एक पूर्ण चक्र है : एक हाथ से लो, तो दूसरे हाथ से दो। इस वर्तुल को तोड़ना ठीक नहीं है। लेकिन हम यही कर रहे हैं -सिर्फ लिये चले जा रहे हैं। इसीलिए सारे स्त्रोत सूखते जा रहे हैं। धरती विषाक्त होती जा रही है। नदियां प्रदूषित हो रही हैं, तालाब मर रहे हैं। हम पृथ्वी से अपना रिश्ता इस तरह से बिगाड़ रहे हैं कि भविष्य में इस पर रह नहीं पाएंगे।

    आधुनिक विज्ञान का रवैया जीतने वाला है। वह सोचता है कि धरती और आकाश से दोस्ती कैसी, उस पर तो बस फतह हासिल करनी है। हमने कुदरत का एक करिश्मा तोड़ा, किसी नदी का मुहाना मोड़ दिया, किसी पहाड़ का कुछ हिस्सा काट लिया, किसी प्रयोगशाला में दो-चार बूँद पानी बना लिया और बस प्रकृति पर विजय हासिल कर ली।

    जैसे प्लास्टिक को देखो। उसे बना कर सोचा, प्रकृति पर विजय हासिल कर ली। कमाल है, न जलता है, न गीला होता है, न जंग लगती है - महान उपलब्धि है। उपयोग के बाद उसे फेंक देना कितना सुविधाजनक है। लेकिन मिट्टी प्लास्टिक को आत्मसात नहीं करती। एक वृक्ष जमीन से उगता है। मनुष्य जमीन से उगता है। तुम वृक्ष को या मनुष्य को वापस जमीन में डाल दो तो वह अपने मूल तत्वों में विलीन हो जाते हैं। लेकिन प्लास्टिक को आदमी ने बनाया है। उसे जमीन में गाड़ दो और बरसों बाद खोदो तो वैसा का वैसा ही पाओगे।

    अमेरिका के आसपास समुद्र का पूरा तट प्लास्टिक के कचरों से भरा पड़ा है। और उससे लाखों मछलियां मर जाती हैं, उसने पानी को जहरीला कर दिया है। पानी की सजीवता मर गई। और यह खतरा बढ़ता जा रहा है कि दिन ब दिन और अधिक प्लास्टिक फेंका जाएगा और पूरा जीवन मर जाएगा।

    पर्यावरण का अर्थ है संपूर्ण का विचार करना। भारतीय मनीषा हमेशा 'पूर्ण' का विचार करती है। पूर्णता का अहसास ही पर्यावरण है। सीमित दृष्टि पूर्णता का विचार नहीं कर सकती। एक बढ़ई सिर्फ पेड़ के बारे में सोचता है। उसे लकड़ी की जानकारी है, पेड़ की और कोई उपयोगिता मालूम नहीं है। वे किस तरह बादलों को और बारिश को आकर्षित करते हैं। वे किस तरह मिट्टी को बांध कर रखते हैं। उसे तो अपनी लकड़ी से मतलब है।

    वैसी ही सीमित सोच ले कर हम अपने जंगलों को काटते चले गए और अब भुगत रहे हैं। अब आक्सीजन की कमी महसूस हो रही है। वृक्ष न होने से पूरा वातावरण ही अस्तव्यस्त होता जा रहा है। मौसम का क्रम बदलने लगा है और फेफड़ों की बीमारियाँ बढ़ती जा रही हैं।

    सुना है कि पुराने जमाने में प्रशिया के राजा फ्रेडरिक ने एक दिन देखा कि खेत-खलिहानों में पक्षी आते हैं और अनाज खा जाते हैं। वह सोचने लगा कि ये अदना से पंछी पूरे राज्य में लाखों दाने खा जाते होंगे। इसे रोकना होगा। तो उसने राज्य में ऐलान कर दिया कि जो भी पक्षियों को मारेगा उसे इनाम दिया जाएगा। बस प्रशिया के सारे नागरिक शिकारी हो गए और देखते ही देखते पूरा देश पक्षी विहीन हो गया। राजा बड़ा प्रसन्न हुआ। उत्सव मनाया -उन्होंने प्रकृति पर विजय पा ली।

    पर अगले ही वर्ष गेहूँ की फसल नदारद थी। क्योंकि मिट्टी में जो कीड़े थे और जो टिड्डियां थीं, उन्हें वे पक्षी खाते थे और अनाज की रक्षा करते थे। इस बार उन्हें खाने वाले पंछी नहीं थे सो उन्होंने पूरी फसल खा डाली। उसके बाद राजा को विदेशों से चिडि़याएँ मंगानी पड़ीं।

    यह सृष्टि परस्पर निर्भर है। उसे किसी भी चीज से खाली करने की कोशिश खतरनाक है। न हम निरंकुश स्वतंत्र हैं, और न परतंत्र हैं। यहाँ सब एक दूसरे पर निर्भर हैं। पृथ्वी पर जो कुछ भी है, वह हमारे लिए सहोदर के समान है। हमें उन सबके साथ जीने का सलीका सीखना होगा।

    अपना सांई प्यारा सांई सबसे न्यारा अपना सांई

    ॐ सांई राम।।।
    अपना साँई प्यारा साँई सबसे न्यारा अपना साँई - रमेश रमनानी

    Offline Ramesh Ramnani

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    Re: आज का चिन्तन
    « Reply #61 on: April 21, 2007, 09:21:55 AM »
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  • जय सांई राम।।।

    दिल दुखाना पाप से कमतर नहीं

    मनुष्य को प्रयत्‍‌न करना चाहिए कि उसके कर्म से किसी दूसरे प्राणी का दिल दुखी न हो, क्योंकि किसी के दिल को दुखाना सबसे बड़े पाप का भागीदार बनना है। दूसरे प्राणी को दुखी करने की बजाए सदा दूसरों को सुख देने के लिए प्रयत्न करना चाहिए।

    मनुष्य को अहंकार में वशीभूत होकर कभी भी दूसरों को नीचा दिखाने की कोशिश नहीं करनी चाहिए, क्योंकि समय किसी का इंतजार नहीं करता और कभी भी बुरा समय अच्छे में और अच्छा समय बुरे में बदल सकता है। जीवन संघर्ष में केवल प्रभु के सहारे में ही आस्था रखनी चाहिए, क्योंकि बाकी सब सहारे झूठे हैं जिन पर भरोसा करना उचित नहीं जबकि भगवान का द्वार ऐसा द्वार है जो किसी को निराश नहीं करता। समाज में पनप रही अधिकतर बुराईयों का मुख्य कारण अविश्वास  व स्वार्थ की भावना है जिसका त्याग करके मनुष्य जहां आदर्श समाज की नीव रख सकता है। वहीं अपने जीवन में भी खुशियों की बहार ला सकता है। मनुष्य को दूसरे प्राणी को दुखी करने की बजाए सदा दूसरों को सुख देने का प्रयत्न करना चाहिए। आज लोगों की रुचि अपने विकास की बजाए दूसरे की बुराईयां ढूंढने व उसे नीचा दिखाने में बढ़ती जा रही हैं लेकिन ऐसी भावना रखने वाले इंसान न समाज में लोकप्रिय हो सकते हैं और न ही अपने जीवन में सच्ची शांति व सुख का अनुभव कर सकते हैं।

    धर्म कोई भी हो सभी भाईचारे व प्रेम का संदेश देते हैं और सभी की मंजिल एक है, केवल मंजिल तक पहुंचने के रास्तों में फर्क हो सकता है। वचन और कर्म में मनुष्य को नम्रता लानी चाहिए, क्योंकि नम्र व्यवहार से दोस्त तो प्रसन्न होते ही हैं बल्कि विरोधी को भी अपने पक्ष में किया जा सकता है। कटु वचन का इस्तेमाल करने वाले इंसान को कोई पसंद नहीं करता और एक दिन वह जीवन में अपने आपको बिना सहारे के अकेला ही पाता है। जीवन संघर्ष में केवल प्रभु के सहारे में ही आस्था रखनी चाहिए क्योंकि बाकी सब सहारे झूठे हैं जिन पर भरोसा करना उचित नहीं जबकि भगवान का द्वार ऐसा द्वार है जो किसी को निराश नहीं करता।
                                     
    अपना सांई प्यारा सांई सबसे न्यारा अपना सांई

    ॐ सांई राम।।।
    अपना साँई प्यारा साँई सबसे न्यारा अपना साँई - रमेश रमनानी

    Offline Ramesh Ramnani

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    Re: आज का चिन्तन
    « Reply #62 on: April 21, 2007, 11:34:13 PM »
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  • जय सांई राम

    जीव और जीवन  

    जीव परमात्मा का ही चेतन अंश है। प्रभु ही जीवन के रूप में शरीर में निवास करते हैं। प्रभु जीव के शरीर का निर्माण कर उसे गतिमान एवं क्रियाशील बनाने हेतु स्वयं उस शरीर में प्राण रूप में विराजमान रहते हैं। अत: शरीररूपी मंदिर में आत्मा रूप में परमात्मा सदैव उपस्थित रहते हैं। यह तथ्य जानते हुए हमें लोक व्यवहार करना चाहिए,  इसी में अपना और जगत का कल्याण निहित है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने भी कहा है- ईश्वर अंश जीव अविनाशी। अब प्रश्न उठता है कि जब जीव परमात्मा का ही अंश है और इतना शक्तिशाली है तो फिर क्यों गलत कार्य करता है। इसका एक ही उत्तर है कि वह अपने को शरीर मानकर उसी की सुख-सुविधा के लिए संसाधनों के संग्रह हेतु उचित-अनुचित, भलाई-बुराई की अनदेखी करते हुए स्वार्थवश गलत मार्ग पर चल पड़ता है जिसके परिणामस्वरूप वह कष्ट पाता है और अपमानित होता है। ऐसा आज के आपाधापी के युग में प्राय: देखने को मिल रहा है।

    निर्मल हृदय में परमात्मा का वास होता है। जीव के दु:ख पाने का एकमात्र कारण है उसकी अज्ञानता। मनुष्य में जब अपने को केवल शरीर मानकर कर्तापन का भाव आ जाता है और वह भौतिकता से वशीभूत होकर उसमें अहंकार का प्रादुर्भाव होने लगता है, तभी वह घोर कष्ट पाता है। मानव चाहे तो अपने विवेक का इस्तेमाल करके ऐसी स्थितियों से बच सकता है। वह अपने हित-अनहित के विषय में पर्याप्त जानकारी रखने में सर्वदा समर्थ है। यह साम‌र्थ्य भी बाबा की ही दी हुई है, किंतु वह इसके प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करने के बजाय दंभ वश अपने को ही सर्वशक्तिमान मानने लगता है। जिससे कदम-कदम पर उसे निराशा देखने को मिलती है। मन की प्रवृत्ति चंचल होने के कारण मनुष्य विषयों के प्रति आकर्षित होता रहता है। यह स्थिति व्यक्तित्व में विकार उत्पन्न करती है। मानव अपने वास्तविक स्वरूप को भूल जाता है कि वह परमात्मा का अंश है और वह आत्मा को भूलकर शरीर को ही सब कुछ समझता है। जिस कारण वह घोर कष्ट पाता है और तब वह बाबा को याद करता है। यदि वह सदैव इस बात का आभास करता रहे कि बाबा सांई हमारे अंत:करण में विराजमान हैं, वह हमारे प्रत्येक कार्य को देख रहे हैं तो वह गलत मार्ग पर जाने से बच सकता है।

    अपना सांई प्यारा सांई सबसे न्यारा अपना सांई

    ॐ सांई राम।।।
    अपना साँई प्यारा साँई सबसे न्यारा अपना साँई - रमेश रमनानी

    Offline Ramesh Ramnani

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    Re: आज का चिन्तन
    « Reply #63 on: April 23, 2007, 05:32:48 AM »
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  • जय सांई राम

    लोक सुधरने पर ही परलोक की बात अच्छी लगती है

    जिसका सांसारिक जीवन सुखी और शांतिपूर्ण नहीं है, उसका परलोक कभी आनंद और शांति से भरा नहीं हो सकता। इंसान की सांसारिक जिंदगी कैसे खुशनुमा बने, इसके लिए अथर्ववेद में बहुत बढ़िया बात कही गई है। उसके एक मंत्र में कहा गया है कि मेहनत करने के बाद जो चीज हिस्से में आए उसे ही अमृत समझना चाहिए। मतलब चतुराई या बेईमानी से दूसरे के हिस्से को कभी न हासिल करो। सांसारिक जीवन को सुखी बनाने का पहला फॉर्मूला और सीढ़ी यही है। जो इस फॉर्मूले (सूत्र) पर अमल करता है, वही जिंदगी में सुख की सीढ़ी चढ़ता है।

    हमारी जिंदगी की खुशियाँ हर तरह से महफूज रहें, इसकी इच्छा तो हम सब हमेशा करते हैं, लेकिन उन सावधानियों पर अमल करना नहीं चाहते जिनसे परेशानियाँ उन सुखों पर झपट्टा न मारें। हम दूसरे का हिस्सा जबरन लेकर, किसी का शोषण कर या बगैर मेहनत किए सुखी होना चाहते हैं। यह कैसी विडंबना है। ऐसा सुख किस काम का, जिससे दूसरे की परेशानी बढ़े।

    दूसरी बात जो लोक सुधारने की है, वह है सबके हित के लिए अपने छोटे हित को छोड़ देना। महाराज भर्तृहरि ने ऐसे विचार व कार्य को ही धर्म माना है। इस पर जो अमल करता है, वही सही मायने में पंडित, देव, संत या ऋषि है। ऐसे लोग और उनका कर्म ही इस धरती को स्वर्ग बनाता है। तीसरी बात जो हमारे दोनों लोक सुधारने के लिए महत्वपूर्ण है, वह है हमारा आहार-विहार और आचार। इन तीनों को बढि़या होना चाहिए। पहला सुख निरोगी काया और दूसरा सुख घर में हो माया। सेहत अच्छी तभी हो सकती है जब हमारी वृत्ति (व्यवहार व आदत) अच्छी होगी। शास्त्र में कहा गया है कि हमारे कार्य शुभ होंगे तो सेहत भी बढ़िया होगी। इसीलिए वेदों में धर्म के साथ धन कमाने की सलाह दी गई है। धर्म का मतलब सृष्टि के नियमों का पालन। धर्म मतलब ऐसा कर्म जो सब के लिए शुभकारी हो। इंसान यदि धर्म से चले, कुदरत के हिसाब से चले तो दुनिया में हिंसा, अन्याय, असत्य (झूठ) नफरत और दुख (अशांति) हो नहीं सकते। इसलिए इस लोक में सुख-शांति का पहला सूत्र है मर्यादा की रक्षा, कर्तव्य का पालन, सीमा की प्रतिष्ठा, चरित्र का निर्माण। यही फॉर्मूला परलोक सुधारने के लिए भी है।

    लोक सुधार के लिए महत्वपूर्ण है सत्यव्रत का पालन। अपनी क्षमता, योग्यता, ऊर्जा और विश्वास पर लगातार चलते रहना। हर उस कर्म को करना और ज्ञान को बढ़ाना जिससे अपना भी भला हो और समाज का भी भला होता चले। सैकड़ों साल पहले इन बातों पर ऋषि-मुनियों ने विशेष जोर दिया था। उन सबने लोकहित को ही सबसे बड़ा धर्म-कर्म माना था।

    लोकहित और लोक सुधार में ही अपना भी हित और सुधार है। सब की उन्नति में ही अपनी उन्नति समझनी चाहिए। सब की उन्नति में अपनी-अपनी उन्नति का विचार इंसान की हर पहल के लिए फायदेमंद है। आधुनिक विज्ञान भी यह मानने लगा है कि परोपकार करते वक्त मन और हृदय में जो शांति और सहजता का भाव बनता है, उससे सेहत अच्छी बनती है, उम्र बढ़ती है। और अनेक मानसिक ग्रंथियां उससे खत्म हो जाती हैं।

    सांसारिक जीवन सुखी और संतोषजनक होने पर ही इंसान को ईश्वर, मुक्ति, स्वर्ग और परमधाम की बातें करनी चाहिए। यदि इंसान भूखा, नंगा, अभावग्रस्त, परेशान, फटेहाल, बीमार, दुखी, अशांत और भयभीत होगा तो वह किसी भी तरीके से अपना परलोक नहीं सुधार सकता। सांसारिक अभाव होते हुए पारलौकिक भाव मिल ही नहीं सकता। इसलिए वैदिक जीवन शैली में ब्रह्मचर्य और गृहस्थ (सांसारिक जीवन) के बाद ही वानप्रस्थ और संन्यास आश्रम बनाए गए हैं। यानी गृहस्थी सुधारने-संवारने के बाद ही परलोक सुधारने की इच्छा या उपाय करनी चाहिए। जो लोग बिना सांसारिक जीवन सुधारे डायरेक्ट परलोक सुधारने जाते हैं, वे जल्दी ही अपने रास्ते से भटक जाते हैं। 
                         
    अपना सांई प्यारा सांई सबसे न्यारा अपना सांई
    ॐ सांई राम।।।

    अपना साँई प्यारा साँई सबसे न्यारा अपना साँई - रमेश रमनानी

    Offline Ramesh Ramnani

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    Re: आज का चिन्तन
    « Reply #64 on: April 26, 2007, 12:24:30 AM »
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  • जय सांई राम।।।

    एक कप चाय बनाने में भी सृजन का सुख
     
    ऐसी मान्यता है कि आनंद ऐसी दुर्लभ अनुभूति है जो घर में रहते नहीं हो सकती। मानो वह कोई वस्तु है जो किसी खास जगह, खास लोगों को ही उपलब्ध होती है और उसके लिए घर-बार छोड़कर कहीं दूसरी जगह जाना पड़ता है। आमतौर से लोग सोचते हैं कि गृहस्थ जीवन कठिन है, उसमें दुख ही दुख है, क्लेश और संताप ही है और आनंद इत्यादि आध्यात्मिक उपलब्धियों के लिए तो इन सब का परित्याग करना पड़ता है। यह बहुत बड़ी गलतफहमी है। यह जो आम अवधारणा है कि सांसारिक जीवन आध्यात्मिक जीवन से विपरीत है, इसने मानवता को स्किजोफ्रेनिक बना दिया। यह धारणा हमारे सामूहिक मन में इस कदर दृढ़ हो गई है कि आम आदमी की आनंद या शांति पाने की सारी संभावना ही विलुप्त हो गई।

    आनंद को बाहर से पाना नहीं पड़ता, आनंद हमारा स्वभाव है। सुख और दुख को अवश्य पैदा करना पड़ता है। दुख पैदा करने में तो हम माहिर हैं। अधिकतर लोग सुख और दुख में गोते लगाते रहते हैं। फिर सुख की उमर बहुत कम होती है, दुख की लंबी मालूम होती है, क्योंकि मन दुखी रहने का अभ्यस्त है। लेकिन यथार्थत: इन दोनों की अपने आप में कोई हस्ती नहीं होती, ये किसी परिस्थिति की हमारी अपनी व्याख्याएं हैं।

    सुख तथा दुख नितांत व्यक्तिगत नजरिया है। इसी कारण जो बात एक व्यक्ति के लिए सुखद मालूम पड़ती है, दूसरे के लिए वही दुखद सिद्ध होती है। और हर व्यक्ति के साथ उसका सुख दुख में और दुख सुख में लगातार बदलता भी रहता है, क्योंकि जीवन एक बहाव है- अनवरत बहता ही रहता है। मान लें किसी को लड्डू खाने का शौक है, तो उसमें उसे सुख मालूम होता है। मगर कोई कितने लड्डू खा सकता है? 8 या 10 - उसके बाद वे भयंकर दुख पैदा करेंगे। किसी का हाथ, हाथ में लेना सुखद लगता है और फिर वह व्यक्ति हाथ छोड़े ही न, दबाता ही चला जाए तो पुलिस को बुलाने की नौबत आ जाएगी। सुख और दुख मन की तरंगें हैं। जो जिसके अनुकूल वह सुख, जो जिसके प्रतिकूल वह दुख।

    लेकिन आनंद के साथ ऐसा नहीं है। आनंद का कोई विपरीत भाव नहीं है, क्योंकि आनंद मूलत: भाव ही नहीं है। आनंद चेतना की स्थिति है- जो सुख और दुख दोनों को स्वीकार करने के बाद प्रगट होती है। आधुनिक मनुष्य के साथ एक दुर्घटना यह हुई है कि वह अपनी ही चेतना से कट गया है -जैसे डाल वृक्ष से कट जाए। इस कारण जीवन बड़ा यांत्रिक और रूखा-सूखा प्रतीत होता है। क्योंकि जीवन में रस आता है हृदय से, अंतरात्मा से। उसी स्त्रोत से हम कट गए हैं। और फिर बाहरी वस्तुओं- पद, प्रतिष्ठा और पैसों से उसकी पूर्ति करना चाहते हैं।

    आनंदमय होने का छोटा सा गुर यह है कि दैनिक जीवन को गहराई से जीया जाए। सतह पर जीना सुख-सुख की लहरों में डूबना उतराना है, गहरे पानी पैठना आनंद से ओत-प्रोत होना है। छोटे से छोटा काम हो, उसे इतना डूबकर करें कि वह काम ध्यान बन जाए। ओशो की महत्वपूर्ण सिखावन है कि आप क्या करते हैं यह महत्वपूर्ण नहीं है, वरन उसे कैसे करते हैं इससे आपकी गुणवत्ता तय होती है। यह आनंद प्राप्त करने का सबसे बड़ा सूत्र है। इसे आत्मसात करें तो आनंद का द्वार खुल जाएगा। एक कप चाय बनाना भी महान सृजन हो जाएगा।

    दूसरी बात सांसारिक परिवेश में रहने के बावजूद कुछ समय स्वयं के लिए निकालें। हमारे परिवारों में व्यक्तिगत स्पेस की कोई अहमियत नहीं है और यही क्लेश का कारण है। लोग लगातार एक दूसरे के जीवन में हस्तक्षेप करते रहते हैं। हर व्यक्ति अपने एकांत का हकदार है। संसार है परिधि, उसका केन्द्र है स्वयं। यदि केन्द्र का स्मरण रहे तो परिधि पर घर है या आश्रम है या बाजार, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। सारे कामकाज करते हुए इतना स्मरण रखें कि 'मैं हूं', बस इतने से ख्याल से इतना सुकून मिलेगा, जैसे बीमार को बेवजह करार आ गया। 

    अपना सांई प्यारा सांई सबसे न्यारा अपना सांई

    ॐ सांई राम
    अपना साँई प्यारा साँई सबसे न्यारा अपना साँई - रमेश रमनानी

    Offline Ramesh Ramnani

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    Re: आज का चिन्तन
    « Reply #65 on: May 05, 2007, 07:21:19 AM »
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  • जय सांई राम

    आखिरी क्षण  

    पूरी ताकत से जलता है बुझता हुआ दीया। उसकी वह आखिरी लपट देखिए। लगता है कि जीवन की सारी शक्ति सोखकर वह दीया उस अंतिम क्षण में, विदाई की उस वेला में पूरे संसार को रोशन कर जाना चाहता है। जला तो वह पूरे जीवन है, पर आखिरी वक्त में उसकी लौ में चमक कई गुना बढ़ जाती है। कहने को यह उसका आखिरी पल है, पर इस आखिरी पल में देखिए कि कितना जीवन है, कितना स्पंदन है। जितनी चमक पूरे जीवन में बिखेरी, शायद उतनी ही या शायद उससे ज्यादा चमक जाते-जाते वह बिखेर जाना चाहता है। बेशक, उसका ईंधन चुक गया है, उसे यह भी मालूम है कि हवा का कोई मामूली झोंका उसका अंत कर देगा, पर वह इन आखिरी लम्हों को इस दुख में रीता नहीं जाने देता। वह जलता है, पूरी ताकत से जलता है। हम मान लें कि जो यह पल है, आखिरी पल है, और तब जीएं। तब महसूस होगा कि साधारण ढंग से जीने और पूरे जोश के साथ जीने में क्या फर्क है। 

    अपना सांई प्यारा सांई सबसे न्यारा अपना सांई

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    Re: आज का चिन्तन
    « Reply #66 on: May 13, 2007, 07:26:18 AM »
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  • जय सांई राम।।।

    पृथ्वी पर जनसंख्या का नहीं, पापियों का भार होता है।
         नम्रता सदगुणों की सुदृढ़ बुनियाद है।
    दुनिया में रहो, दुनिया को अपने में मत रहने दो।
         धैर्य मनुष्य की वीरता है।
    क्रोध मनुष्य को पशु बनाता है।
         अभिमानी मनुष्य प्रभु भक्त नहीं हो सकता।
    विनोद पर हमेशा विवेक का अंकुश रहना चाहिये।
          जो मनचाहा बोलता है, उसे अनचाहा सुनना पड़ता है।
    हारना है तो दुष्कर्म से हारो। 

    अपना सांई प्यारा सांई सबसे न्यारा अपना सांई

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    Offline Radha

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    Re: आज का चिन्तन...for Subhaji and Kavita ji.
    « Reply #67 on: May 14, 2007, 08:46:14 PM »
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  • जय सांई राम।।।

    पृथ्वी पर जनसंख्या का नहीं, पापियों का भार होता है।
         नम्रता सदगुणों की सुदृढ़ बुनियाद है।
    दुनिया में रहो, दुनिया को अपने में मत रहने दो।
         धैर्य मनुष्य की वीरता है।
    क्रोध मनुष्य को पशु बनाता है।
         अभिमानी मनुष्य प्रभु भक्त नहीं हो सकता।
    विनोद पर हमेशा विवेक का अंकुश रहना चाहिये।
          जो मनचाहा बोलता है, उसे अनचाहा सुनना पड़ता है।
    हारना है तो दुष्कर्म से हारो। 

    अपना सांई प्यारा सांई सबसे न्यारा अपना सांई

    ॐ सांई राम।।।


    Jai Sai Ram!!!
    Earth is burdened not by mere bodies, but by sinful souls.
    Courtesy is the essence which forms the strongest base of Good values.
    Live in this world and dont let the world live on you.
    Life is a constant struggle between faith and doubt.
    Resentment and anger are the worst enemy which turns a man into a beast.
    Pride and ego are the barriers which keeps you away from attaining the Supreme.
    All our desires should be well analysed.
    Words once spoken cannot be taken back.
    What you give comes back to you in return.
    Lose if you have to..but do so with a clean consciousness.
    Om Sai Ram.

    Offline SS91

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    Re: आज का चिन्तन...for Subhaji and Kavita ji.
    « Reply #68 on: May 15, 2007, 06:52:18 AM »
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  • SaiRam Radha ji

    Fantastic and Sai bless you.Todays message looks very apt to me.Thanks.Jaisairam.SS

    जय सांई राम।।।

    पृथ्वी पर जनसंख्या का नहीं, पापियों का भार होता है।
         नम्रता सदगुणों की सुदृढ़ बुनियाद है।
    दुनिया में रहो, दुनिया को अपने में मत रहने दो।
         धैर्य मनुष्य की वीरता है।
    क्रोध मनुष्य को पशु बनाता है।
         अभिमानी मनुष्य प्रभु भक्त नहीं हो सकता।
    विनोद पर हमेशा विवेक का अंकुश रहना चाहिये।
          जो मनचाहा बोलता है, उसे अनचाहा सुनना पड़ता है।
    हारना है तो दुष्कर्म से हारो। 

    अपना सांई प्यारा सांई सबसे न्यारा अपना सांई

    ॐ सांई राम।।।


    Jai Sai Ram!!!
    Earth is burdened not by mere bodies, but by sinful souls.
    Courtesy is the essence which forms the strongest base of Good values.
    Live in this world and dont let the world live on you.
    Life is a constant struggle between faith and doubt.
    Resentment and anger are the worst enemy which turns a man into a beast.
    Pride and ego are the barriers which keeps you away from attaining the Supreme.
    All our desires should be well analysed.
    Words once spoken cannot be taken back.
    What you give comes back to you in return.
    Lose if you have to..but do so with a clean consciousness.
    Om Sai Ram.

    A Person, who has controlled his mind, can achieve any success in his life. How far you are trying to control your mind?
    The mind that judges not others ever remains tension-free.
    http://lh5.ggpht.com/_lOgd1uS-wX0/TCOlFNMxIBI/AAAAAAAAE88/GpxUgxnwioE/why_fear_when_i_am_here.jpg

    Offline Ramesh Ramnani

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      • Sai Baba
    Re: आज का चिन्तन
    « Reply #69 on: May 15, 2007, 08:15:13 AM »
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  • जय सांई राम

    दुख़ औषधियां हैं, सुख़ रोग है क्योंकि दुख़ आदमी को नम्र करते हैं और सुख़ उसे अभिमानी बनाते हैं।

    जिसको सन्तोष नहीं, वे धनवान भी निर्धन हैं

    जीवन का पौधा प्रेम के पानी से हरा भरा रहता है।

    दुनिया में हमेशा विद्धार्थी बन कर रहो, जो शिक्षक बना, वह विद्या के आन्नद से वंचित रहा।

    चेहरे को हंसमुख़ रखो। हंसमुख़ चेहरे से वे पदार्थ ख़रीदे जा सकते हैं जो असंख्य धन से भी नहीं मिलते।

    अपना सांई प्यारा सांई सबसे न्यारा अपना सांई

    ॐ सांई राम।।।
    अपना साँई प्यारा साँई सबसे न्यारा अपना साँई - रमेश रमनानी

    Offline Radha

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    Re: आज का चिन्तन...for Subha ji and Kavita ji
    « Reply #70 on: May 15, 2007, 04:46:43 PM »
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    दुख़ औषधियां हैं, सुख़ रोग है क्योंकि दुख़ आदमी को नम्र करते हैं और सुख़ उसे अभिमानी बनाते हैं।

    जिसको सन्तोष नहीं, वे धनवान भी निर्धन हैं

    जीवन का पौधा प्रेम के पानी से हरा भरा रहता है।

    दुनिया में हमेशा विद्धार्थी बन कर रहो, जो शिक्षक बना, वह विद्या के आन्नद से वंचित रहा।

    चेहरे को हंसमुख़ रखो। हंसमुख़ चेहरे से वे पदार्थ ख़रीदे जा सकते हैं जो असंख्य धन से भी नहीं मिलते।

    अपना सांई प्यारा सांई सबसे न्यारा अपना सांई

    ॐ सांई राम।।।

    Jai Sai Ram!!!
    Grief heals while enjoyment hurts ; its only the grief that makes a man humble.
    Wealthy one might be, but not a happy soul untill he is satisfied.
    Life is a sapling which should be nourished with love.
    Life is the best teacher; learn by remaining a student always.
    A happy face goes a long way;it will fetch you what boundless wealth cannot.
    Om Sai Ram!!!
    Radha.

    Offline Ramesh Ramnani

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    Re: आज का चिन्तन
    « Reply #71 on: May 15, 2007, 09:14:03 PM »
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    ग्लोबल वार्मिंग से बचने के लिए वट सावित्री की पूजा करें

    आज ज्येष्ठ अमावस्या है- जेठ मास की अमावस। हिंदू विवाहित स्त्रियाँ आज के दिन वट सावित्री का व्रत करती हैं। प्रात:काल वे बरगद की पूजा करती हैं और फिर पूरे दिन व्रत रखती हैं। पूजा के दौरान वे नए वस्त्र धारण कर बरगद की जड़ में जल और मौसम का नया फल कच्चा आम चढ़ाती हैं। बरगद के तने के चारों ओर रक्षा सूत्र लपेटती हैं। फिर वे तने को हाथों से इस तरह दबाती हैं, जैसे बैकुंठ में शेषनाग पर विश्राम कर रहे विष्णु के चरण लक्ष्मी द्वारा दबाने की मिथकीय कल्पना है। वे सावित्री व्रत कथा सुनती हैं और अपने पति के स्वास्थ्य, यश, दीर्घायु आदि की कामना करती हैं।

    प्रकृति में ऐसी बहुत सारी चीजें हैं जो धर्म और आस्था की प्रतीक हैं, जैसे- सूर्य, चन्द्रमा, जल, अग्नि, मिट्टी, हवा, वृक्ष आदि। हमारे पुराणों के अनुसार ये सब ईश्वर के रूप हैं। इनमें से वृक्षों का अपना महत्व है। हिन्दू कई वृक्षों की पूजा करते हैं, जिनमें से एक है वटवृक्ष या बरगद। यह वृक्ष भी उतना ही धार्मिक है जितना पीपल, केला, आम, नीम, आँवला आदि के वृक्ष।

    महाभारत की कथा के अनुसार, जब सावित्री के पति सत्यवान की मृत्यु हो गई तो सावित्री ने बरगद के ही वृक्ष के नीचे यमराज से अपने पति का पुनजीर्वन प्राप्त किया था। इसीलिए लोक परंपरा में यह वृक्ष महिलाओं के लिए सुहाग का प्रतीक बन गया। संभव है जेठ-वैसाख की तपती धूप में किसी पथिक को गर्मी या लू लगी हो और वह मरणासन्न हो गया हो। फिर इसी बरगद की घनी और शीतल छाया में आराम करने के बाद उसमें जीवन का संचार हुआ हो। पूजा के तौर पर उसे जल देने और उसके चारों ओर सूत लपेटने का अर्थ है उस वृक्ष की देखभाल और हिफाजत।

    पर्यावरण की दृष्टि से बरगद मानसूनी और बरसाती जंगलों का वृक्ष होने के कारण काफी विशाल व छायादार होता है। धर्म शास्त्रों और लोक परंपरा में किसी भी चीज में आस्था का कारण उसकी इसी तरह की उपयोगिता और हमारे जीवन से उसका संबंधित होना होता है। पौराणिक कथा के अनुसार पार्वती के श्राप के कारण ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश को क्रमश: पलाश, पीपल और बरगद के वृक्ष के रूप में मृत्युलोक में आना पड़ा। विष्णु पुराण के अनुसार जब प्रलय हुआ और संपूर्ण सृष्टि जलमग्न हो गई तो भगवान भगवान विष्णु बरगद के पत्तों पर सोए। बरगद के फल के बीज की तुलना विष्णु से की जाती है। इस विश्वास का कारण वट वृक्ष की विशालता, आँधी-तूफान में उसके टिके रहने की क्षमता और दीर्घ जीवन रहा हो। यह वृक्ष मृदा संरक्षण के लिए भी काफी उपयोगी है।

    आयुर्वेद में औषधीय महत्व के कारण भी बरगद के प्रति लोगों में आस्था है। इसे घर की पूर्व दिशा में लगाने से घर को शुद्ध हवा मिलती है। बरगद के बारे में एक मान्यता यह भी है कि एक नवजात शिशु को इसके पत्तों से निकले दूध के सहारे पाला जा सकता है। अर्थात वह इतना पौष्टिक और गुणकारी होता है। इसकी छाल, जड़ें तथा पत्तों से निकलने वाला दूध औषधीय उपयोग में लाया जाता है। इसकी पत्तियाँ पशुओं के लिए पौष्टिक आहार हैं।

    आयुर्वेद और यूनानी पद्धति में इस वृक्ष का उपयोग आँत की बीमारी, दस्त, चिड़चिड़ापन, फोड़ा, मुँहासा, उल्टी, ज्वर, सूजन, कुष्ठ आदि रोगों के इलाज के लिए किया जाता है। देखा जाए तो यह वृक्ष जहां मन को पवित्रता, सुख और शांति प्रदान करता है, वहीं अपनी औषधीय विशेषता के कारण जीवनदाता का भी काम करता है। हमारे धर्म शास्त्रों में वृक्षों के महत्व को जिस तरह से धर्म-कर्म से जोड़ा गया है, वह कुछ और नहीं, बल्कि प्रकृति संरक्षण का ही एक रूप है। इसलिए ग्लोबल वार्मिंग से बचना है तो आप भी वट सावित्री की पूजा करें। 

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    Offline Ramesh Ramnani

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    Re: आज का चिन्तन
    « Reply #72 on: May 16, 2007, 01:23:32 AM »
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    अहंकार से ही होता है नाश

    आज न केवल हमारे देश में बल्कि पूरे संसार में तनाव,  दुख व अशांति का वातावरण है। समाज में लगातार बढ़ती जा रही हिंसा, अत्याचार और आतंक के कारण हर मानव भयभीत है। चारों ओर धार्मिक और सांप्रदायिक बदले की आग में मानवता जल रही है।

    यदि गहराई से इन समस्याओं पर विचार किया जाए तो ज्ञात हो जाएगा कि अशांति का कारण मूल्यों में गिरावट है। मनुष्य चाहे हिंदु हो या मुसलमान, सिक्ख हो या ईसाई उसका प्राथमिक गुण, धर्म अथवा मानव मूल्य शांति और प्रेम है। आज इन्सान धर्म और संप्रदाय की स्थूल परंपराओं और थोथी मान्यताओं के पीछे परस्पर हिंसा पर आमादा है परन्तु वह अपने वास्तविक स्वधर्म अथवा मानवता के मूल धर्म शांति और प्रेम आदि का पालन नहीं कर रहा है। इन मूल्यों के अभाव ने ही आपस में नफरत और द्वेष की बीज बोए है। व्यक्ति आज व्यक्ति का ही दुश्मन नहीं वास्तव में घृणा,  ईष्र्या,  क्रोध व अभिमान ही मनुष्य के सबसे बड़े शत्रु है। और इसी के वशीभूत संसार में कुछ गलत कार्य भी हो रहें है। मनुष्य का स्थूल धर्म, जाति और संप्रदाय से ऊपर उठकर प्रेम शांति, भाईचारे और सद्भावना जगाने के लिए सारे विश्व में आध्यात्मिक सेवा करे और केंद्रों में मूल्यनिष्ठ जीवन बनाने की प्रेरणा दी जा रही है।

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    Re: आज का चिन्तन
    « Reply #73 on: May 18, 2007, 10:14:10 AM »
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    प्रकृति तथा मानव का आपस में गहरा सम्बन्ध है। यह प्रकृति अनेक रुपों में मानव को प्रभावित करती है। ऋतु परिवर्तन का प्रभाव प्राणी जगत पर अवश्य पड़ता है। प्रकृति का मोहक रुप संयोगी जनों के उल्लास में वृद्धि करता है। इसके विपरीत वियोगी जनों के लिये यही मोहक रुप दुख़दायी बन जाता है। उसका कारण यह है कि प्रकृति हमें मनःस्थिती के अनुकूल प्रभावित करती है। वर्षा ऋतु का संयोगी जनों पर अनुकूल प्रभाव पड़ता है।

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    Re: आज का चिन्तन
    « Reply #74 on: May 19, 2007, 03:03:12 AM »
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    दुख मिलने से पहले ही हम अपना दुख चुन लेते हैं
     
    खलील जिब्रान ने कहा, हम अपने सुखों और दुखों का अनुभव करने से बहुत पहले ही उनका चुनाव कर लेते हैं।

    कर्मफल के सिद्धांत के अनुसार हम जैसा कर्म करते हैं वैसा ही फल पाते हैं। जो बीज हम बोते हैं उसी बीज से उत्पन्न पेड़ के फल हमें प्राप्त होते हैं। कुछ बीज ऐसे होते हैं जो बोने के बाद जल्दी बड़े होकर फूल-फल देने लगते हैं, जबकि कुछ बीज धीरे-धीरे अंकुरित हाते हैं और धीरे-धीरे ही उनकी वृद्धि होती है। फूल फल भी वे बहुत देर में देते हैं। जिस प्रकार हमें अपने बोए गए बीजों के फूल-फल मिलते हैं, उसी प्रकार हमारे कर्म रूपी बीजों के फल भी अवश्य ही हमें देर- सवेर मिलते हैं। यही कर्म रूपी बीज हमारे सुख-दुख या हर्ष-विषाद का मूल हैं। हमारा वर्तमान इन्हीं के कारण इस अवस्था में हैं।

    किसी भी कार्य की पहली रूपरेखा हमारे मन में बनती है। किसी भवन के निर्माण से पहले उसका नक्शा बनाया जाता है, लेकिन भवन का नक्शा कागज पर बनने से पहले किसी के मन में बनता है। कोई भी विचार सबसे पहले मन में आकार ग्रहण करता है। उसी के बाद वह विचार वास्तविकता में परिवर्तित होता है।

    जैसा कि हम सभी जानते हैं कि सोच अच्छी या बुरी कैसी भी हो सकती है। सकारात्मक सोच या नकारात्मक सोच में से सही का चुनाव करना व्यक्ति पर निर्भर करता है। और यह निर्भर करता है व्यक्ति के परिवेश, शिक्षा-दीक्षा और संस्कारों पर। लेकिन इतना निश्चित है कि सकारात्मक सोच से उत्पन्न कर्म हमारी भौतिक उन्नति के साथ-साथ हमारी आध्यात्मिक उन्नति में भी सहायक होते हैं, जबकि नकारात्मक सोच से उत्पन्न कर्म हमें पीछे की ओर ले जाते हैं।

    मनुष्य की स्थिति किसी दोपहिया वाहन के समान होती है। दोपहिया वाहन पैडल या मोटर के सहारे केवल आगे की ओर चलते हैं, पीछे की ओर नहीं। स्कूटर, मोटर-साइकल अथवा साइकल में पिछला गीयर नहीं होता। साइकल में सही दिशा में पैडल मारेंगे तो आगे बढे़गे। गलत दिशा में पैडल मारेंगे तो संतुलन बिगड़ जाएगा, साइकल समेत जमीन पर आ गिरेंगे। इसी प्रकार अपनी सकारात्मक या नकारात्मक सोच द्वारा अपने सुख-दुख का सामान जुटाने वाले हम स्वयं हैं, अन्य कोई नहीं।

    एक बार एक व्यक्ति चूहे मारने की दवा खरीदने बाजार गया। दुकानदार से दवा ली, पैसे दिए और घर की तरफ चल दिया। रास्ते में मन में न जाने क्या खयाल आया कि वापस दुकान पर गया और दुकानदार से पूछा, भाई एक बात बताओ। दवा से चूहे मरेंगे तो पाप लगेगा। अब ये बताओ कि पाप तुम्हें लगेगा या मुझे? दुकानदार ने कहा कि पाप-पुण्य तो तब लगेगा जब चूहे मरेंगे, क्योंकि आज तक इस दवा से कोई चूहा नहीं मरा है।

    मनुष्य से अपेक्षा की जाती है कि वह कर्म करे और फल अथवा परिणाम की चिंता न करे। लेकिन हमारे मन में परिणाम की आशंका पहले से ही घर कर जाती है, जिससे न तो कर्म का मूल अर्थात विचार ही सहज रह पाता है और न ही सहज रूप से कर्म का निष्पादन हो पाता है। एक भाव और हमारे मन में व्याप्त रहता है और वह है कर्ता भाव। मैं ही अमुक कार्य करता हूँ और मैं ही अमुक कार्य नहीं करता। मैं सबको खिलाता-पिलाता हूँ। मैं किसी का नहीं खाता। मैं सब को आमंत्रित करता हूँ और सबकी खातिरदारी करता हूँ, लेकिन मैं हर ऐरे-गैरे के यहाँ नहीं जाता।

    अहंकार और कर्ता भाव की पराकाष्ठा है ये। कर्ता भाव में लाभ हानि का आकलन पहले से हो जाता है। जिस क्रिया में लाभ हानि का आकलन किया जाता है, वह व्यवसाय के अतिरिक्त अन्य कुछ नहीं हो सकता। कर्म व्यापार न बनें तो अच्छा है। कर्म जब व्यापार बनता है तो दुख की उत्पत्ति का कारण बनते हैं, क्योंकि उसमें लाभ हानि का भाव आ जाता है। 

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