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Author Topic: आज का चिन्तन  (Read 163067 times)

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Offline Ramesh Ramnani

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Re: आज का चिन्तन
« Reply #75 on: May 21, 2007, 05:23:27 AM »
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  • जय सांई राम

    भ्रम होता है तो मन की आंखों से देखें
     
    जीवन में कई बार हम भ्रम का शिकार हो जाते हैं, पर ऐसा नहीं है कि हमेशा इससे नुकसान ही होता हो। बल्कि इसका अपना प्रभाव और फायदे भी हैं। जब आप सच को धोखा समझते हैं, तो मेडिकल लैंग्वेज में इसे इल्यूजन या भ्रम कहा जाता है। असलियत का पता चलने पर आप गलती सुधार लेते हैं।

    मोह की स्थिति भी भ्रम जैसी ही है। मोह में रहते हुए भी व्यक्ति सचाई से दूर रहता है, पर फर्क यह है कि मोह में वह खुद को उस स्थिति से बाहर निकालने की कोशिश नहीं करता। उदाहरण के लिए कई बार व्यक्ति गलती से सांप को रस्सी समझ लेता है, पर मानसिक डिसऑर्डर से ग्रस्त कोई साइकॉटिक कहेगा कि यह तो सांप ही है, रस्सी नहीं। ऐसे में जिसे सिर्फ भ्रम होगा, वह उसे कुछ पास से देखेगा और बता देगा कि यह सांप है। हालांकि भ्रम की भी एक बीमारी होती है, जिसे सिजोफेनिया या साइकोसिज कहा जाता है।

    भ्रम का सबसे बड़ा उदाहरण है रेगिस्तान में पानी का छलावा होना। यानी मरीचिका। इसके अलावा भ्रम का प्रभाव हम फिल्म देखते हुए महसूस करते हैं। वास्तव में हम तस्वीरें देख रहे होते हैं, जो हमारी आंखों के सामने से बहुत तेजी से गुजरती हैं, पर हमें लगता है कि कार चल रही है या पानी बह रहा है। इसलिए भ्रम हमेशा गलत ही नहीं होता, कई बार यह बहुत काम का साबित होता है।

    आदर्श स्थिति तो यही है कि जो बाहर से जैसा हो, वैसा ही भीतर से भी हो। लेकिन भ्रम की तकनीक ही यह है कि जब कोई चीज बाहर से अच्छी दिखे, तो हमें आभास हो कि यह भीतर से भी अच्छी होगी। प्लास्टिक सर्जन का काम होता है किसी को बाहर से अच्छा दिखने लायक बनाना, लेकिन प्लास्टिक सर्जन किसी व्यक्ति को भीतर से खूबसूरत नहीं बना सकता, क्योंकि यह उस व्यक्ति के दिमाग और आत्मा पर निर्भर करता है। भीतर से खूबसूरत बनने की कोशिश व्यक्ति को खुद करनी चाहिए।

    इसका बहुत बढ़िया उदाहरण वैदिक विज्ञान में ऋषि अष्टावक्र का मिलता है, जिन्होंने अष्टावक्र गीता लिखी और उसकी शिक्षा राजा जनक को दी। अष्टावक्र का शरीर आठ जगहों से मुड़ा हुआ था और वे काफी हास्यास्पद दिखते थे। लेकिन वे बहुत ज्ञानवान थे। राजा जनक के दरबारी उनके इस रूप को देखकर हंसने लगे, तो जनक के चेहरे पर भी मुस्कराहट तैर गई। अष्टावक्र बोले, राजा! लगता है मैं गलती से उस देश में आ गया हूं, जहां के सारे लोग शायद चमरे के व्यापारी है,किसी व्यक्ति का आकलन केवल उसके बाहरी रंग-रूप के आधार पर करते हैं, उसे बुद्धिमत्ता, दिमाग और आत्मा के आधार पर नहीं देखते, जो शरीर के भीतर मौजूद होते हैं। इसलिए भ्रम से प्रभावित होने की जगह दूसरों को देखने के लिए व्यक्ति को अपने मन और आत्मा की आंखों का ही इस्तेमाल करना चाहिए।

    अपना सांई प्यारा सांई सबसे न्यारा अपना सांई

    ॐ सांई राम।।।
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    Offline Ramesh Ramnani

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    Re: आज का चिन्तन
    « Reply #76 on: May 25, 2007, 02:58:30 AM »
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    आध्यात्मिकता के लिए जरूरी नहीं गृह त्याग
     
    अक्सर कहा जाता है कि अगर आपको आध्यात्मिकता की तलाश है, तो यह संसार यानी सांसारिक मोह-माया छोड़नी पड़ेगी। पर क्या यह सच है? अध्यात्म मार्ग पर कदम बढ़ाने के लिए संसार का त्याग जरूरी है या नहीं, इस पर विचार करने से पहले यह जानना बहुत जरूरी है कि आखिर अध्यात्म क्या है?

    मौटे तौर पर अध्यात्म से तात्पर्य है अपनी आत्मा अथवा चेतना के स्रोत से एकाकार होना। मनुष्य मात्र भौतिक शरीर नहीं है। इस शरीर को कई भागों अथवा कई परतों में बांटा गया है। प्रमुख रूप से शरीर को तीन हिस्सों में विभाजित किया है : भौतिक शरीर, मानसिक शरीर तथा आध्यात्मिक शरीर। इन तीन शरीरों को क्रमश: स्थूल शरीर, कारण शरीर तथा सूक्ष्म शरीर भी कहा गया है। स्थूल शरीर, जो दृष्टिगोचर होता है। सूक्ष्म शरीर अर्थात चेतना, जो अदृश्य है तथा कारण शरीर अर्थात मन। भौतिक शरीर हमारा बाहरी आवरण है, तो आत्मा अथवा चेतना अंतरतम बिंदु है और मन के नियंत्रण तथा इसकी गति द्वारा चेतना से एकाकार होना ही आध्यात्मिकता है। यही वास्तविक ज्ञान है। बाहरी चीजों की जानकारी होने की बजाय खुद का सही ज्ञान होना ही आध्यात्मिकता है।

    आत्मिक ज्ञान अथवा आध्यात्मिक उन्नति के लिए साधना जरूरी है और साधना के लिए जरूरी है अपेक्षित परिवेश। इसलिए जरूरी नहीं कि घरबार यानी संसार का त्याग ही किया जाए। संसार में रहते हुए अगर हम अपेक्षित साधना करें अथवा मन पर उचित नियंत्रण और इसके संस्कार द्वारा अपनी चेतना से एकाकार हो पाएं, तो संसार के त्याग की जरूरत ही क्या है? जिन लोगों ने आध्यात्मिक मार्ग पर चलने के लिए संसार का त्याग किया है अथवा उनसे ऐसा कराया गया है, वे कहां तक अपने मकसद में सफल हुए हैं- यह भी विचारणीय है। हर तथाकथित साधु संन्यासी अथवा योगी कहां तक अध्यात्म का आस्वादन कर पाया है? योग में ब्रह्माचर्य को बहुत अधिक महत्व दिया गया है, लेकिन साथ ही यह भी माना गया है कि एक सद्गृहस्थ भी ब्रह्माचारी ही होता है।

    संसार में रहते हुए अगर इंसान ठान ले कि मुझे आध्यात्मिक पथ पर अग्रसर होना ही है, तो उसे सफलता जरूर मिलेगी। सबसे अधिक महत्वपूर्ण मन की निर्मलता और निष्कपटता है। आध्यात्मिकता के विकास में बाधक घर-संसार नहीं, अपितु मनुष्य के मन में व्याप्त घातक नकारात्मक वृत्तियां बाधक हैं। राग, द्वेष, घृणा आदि नकारात्मक भाव घर को भी घर नहीं रहने देते और फिर यदि इन भावों के साथ संसार का त्याग भी कर दिया, तो ऐसा त्याग किस काम का? अनेक महान साधु, संत, कवि, विचारक, चिंतक- जो सही अर्थों में आध्यात्मिक व्यक्ति भी हुए हैं, सद्गृहस्थ ही थे। संत कवि तिरुवल्लुवर और कबीर जुलाहे थे। रविदास चमड़े से जूते बनाते थे। नामदेव दर्जी का काम करते थे। ऐसे महान संतों की लंबी सूची है।

    सांसारिक कठिनाइयों से घबराकर पलायन करने वाला व्यक्ति ऊपरी तौर पर चाहे कितना ही परिवर्तन कर ले, भगवा वस्त्र धारण कर ले अथवा मठ में रहने लग जाए, अध्यात्म पथ का यात्री नहीं हो सकता। कर्म भी एक साधना है और कर्म योग का साधक निष्काम कर्म द्वारा अध्यात्म मार्ग का ही अनुसरण करता है। राग, द्वेष, लाभ, हानि, सुख, दुख आदि परस्पर विरोधी भावों से ऊपर उठ जाना ही सच्ची आध्यात्मिकता है।

    भौतिक शरीर को कष्ट देने से आध्यात्मिक मार्ग प्रशस्त नहीं होता। बुद्ध ने घोर तपस्या की, लेकिन बात नहीं बनी। जब उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ, तो उन्होंने कहा कि बीच का रास्ता ही ठीक है। साधना शरीर की नहीं, मन ही होनी चाहिए। मन को रिक्त होना चाहिए। इस संसार को देखो और देखकर आगे बढ़ जाओ। संसार में रहो, लेकिन इस तरह जैसे नाव नदी के जल में रहती है। नाव नदी के जल में तो रहती है, पर जल नाव के अंदर नहीं आने पाता। हम संसार में तो रहें, पर घोर सांसारिकता हम में व्याप्त न होने पाए। इसके लिए सबसे ज्यादा जरूरी यह है कि हम अपने पर मन अनिवार्य कंट्रोल करें और उसे उचित दिशा दें। इसके लिए घर बार और संसार छोड़ने की कोई जरूरत नहीं।
     
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    Re: आज का चिन्तन
    « Reply #77 on: May 29, 2007, 03:45:43 AM »
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    सकारात्मक चिंतन  

    सकारात्मक चिंतन सफलता का मूलमंत्र है। यह कठिन परिस्थितियों या कठिन समय से बाहर निकालता है। आशावाद सृष्टि का कोई दर्शन, तत्वज्ञान या कला नहीं है जिसे सीखा जाये। सकारात्मक और नकारात्मक व्यवहार के बीच एक बहुत पतली रेखा है। आशा करना मानव का सबसे महान अधिकार है। यह हल्का आहार परंतु अत्यंत स्फूर्तिपूर्ण है। प्रतिकूल परिस्थितियों में आशा संभालती है। साथ ही इच्छाशक्ति को सुदृढ़ करती है। संकट में बचे रहने के लिए प्रेरणा देती है। आगे बढ़ने का मार्ग प्रशस्त करती है। नकारात्मक दृष्टि विपरीत परिस्थितियों में संघर्ष करने की इच्छाशक्ति घटाती है। सफलता के पथ पर बाधाएं उत्पन्न करती है। सकारात्मक दृष्टि वाले लोग हर संकट में अवसर तलाशते हैं, जबकि नकारात्मक दृष्टि वाले हर अवसर में एक संकट पाते हैं। जितने भी महान और सफल लोग हुए हैं वे सकारात्मक दृष्टि रखते थे। दु:ख सहने के बावजूद असफलता पाकर कठिनाइयों से जूझते हुए उनसे बचने के मार्ग की खोज में लगे रहे। अंत में सफलता उन्हें ही मिली।

    प्रसन्नचित्त रहने वालों की आंखों में सदा चमक रहती है। उनकी मुस्कान आकर्षित करके सर्वत्र मित्र बनाती है। कठिनाई में मुस्कराते हैं। सुंदर वही है जिसके विचार सुंदर हैं। अंदर चलने वाले विचारों की अभिव्यक्ति मुखमंडल पर परिलक्षित होती है। सुंदर दिखने के लिए सकारात्मक विचार अनिवार्य हैं। नकारात्मक दृष्टि पनपने नहीं देती। जो जैसा सोचते हैं वैसे बनते हैं। पवित्र विचार इच्छित दिशा में मोड़ने में समर्थ रहते हैं। आत्मविश्वासी कोई कार्य असंभव नहीं मानते। विपरीत परिस्थितियों से बिना घबराए श्रेष्ठतर स्थिति पाने का प्रयास रहता है। प्रत्येक निराशा में आशा की खोज करके लक्ष्य पाने का उपाय मिलता है। मार्ग में आने वाली बाधाओं पर विजय पाने का उपाय दिखाई पड़ने लगता है। नकारात्मक चिंतन वालों से प्रतिदिन दूर रहकर श्रेष्ठ विचारों के उत्साही लोगों का साथ करना चाहिए। नकारात्मक सलाह दूसरों के विचारों को हराती है। आशावादी और दृढ़ व्यक्ति दूसरे की नकारात्मक सलाह पर हँसता है। सकारात्मक इच्छाशक्ति कभी भी दूसरों की नकारात्मक दृष्टि से पराजित नहीं होती। आशावाद संघर्ष में सहायक है और सकारात्मक ऊर्जा का स्त्रोत है।

    मनुष्य से अपेक्षा की जाती है कि वह कर्म करे और फल अथवा परिणाम की चिंता न करे। लेकिन हमारे मन में परिणाम की आशंका पहले से ही घर कर जाती है, जिससे न तो कर्म का मूल अर्थात विचार ही सहज रह पाता है और न ही सहज रूप से कर्म का निष्पादन हो पाता है। एक भाव और हमारे मन में व्याप्त रहता है और वह है कर्ता भाव। मैं ही अमुक कार्य करता हूँ और मैं ही अमुक कार्य नहीं करता। मैं सबको खिलाता-पिलाता हूँ। मैं किसी का नहीं खाता। मैं सब को आमंत्रित करता हूँ और सबकी खातिरदारी करता हूँ, लेकिन मैं हर ऐरे-गैरे के यहाँ नहीं जाता।

    अहंकार और कर्ता भाव की पराकाष्ठा है ये। कर्ता भाव में लाभ हानि का आकलन पहले से हो जाता है। जिस क्रिया में लाभ हानि का आकलन किया जाता है, वह व्यवसाय के अतिरिक्त अन्य कुछ नहीं हो सकता। कर्म व्यापार न बनें तो अच्छा है। कर्म जब व्यापार बनता है तो दुख की उत्पत्ति का कारण बनते हैं, क्योंकि उसमें लाभ हानि का भाव आ जाता है। 

    अपना सांई प्यारा सांई सबसे न्यारा अपना सांई

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    Re: आज का चिन्तन
    « Reply #78 on: May 30, 2007, 02:53:22 AM »
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    आत्मा और सद्गुण सैकड़ों बार भटक चुके  

    जब से मनुष्य की सृष्टि हुई उसे अच्छा आनन्द भोगना प्राप्त नहीं हुआ। यही हमारा मौलिक पाप है। और जब हम अच्छी तरह आनंद भोगना सीख जाएंगे, तो दूसरों को दुख पहुँचाना तथा पीड़ा की परिकल्पना करना स्वत: भूल जाएंगे। जिस अन्त:करण में कोई कांटा खटकता हो वह बाहर भी कांटे ही बोया करता है।

    नीच और क्षुद्र विचारों वाले मनुष्य सबसे अधम होते हैं। क्षुद्र विचार की अपेक्षा दुराचार कहीं अच्छा है। बुरा काम एक फोड़े के समान होता है, उसमें खुजली होती है, चुभन होती है और वह फूट कर बहता है। वह छिपता नहीं, दयानतदारी से बोल उठता है। वह कहता है, देखो मैं एक रोगी हूँ और यह उसकी दयानतदारी है। किंतु नीच विचार तो विषैले कीटाणुओं के समान होते हैं, जो बढ़ते रहते हैं, फैलते रहते हैं और दिखाई नहीं देते। इनसे सारा शरीर भर जाता है और अंत में गल-सड़कर नष्ट हो जाता है।

    जिस के सिर पर शैतान सवार हो, मैं उसके कान में यही कहना चाहता हूं, अपने शैतान की सेवा कर कि वह बढ़ कर महान हो जाए, तेरे लिए यही उचित है। तेरे लिए भी महानता का द्वार खुला हुआ है।

    प्रत्येक मनुष्य दूसरे मनुष्य के संबंध में कुछ जरूरत से ज्यादा ही जानकारी रखता है और बहुत से तो ऐसे हैं जिनके आर- पार शीशे की तरह स्पष्ट देखा जा सकता है, किंतु उनके भीतर नहीं। ऐसा नहीं कि उनके मन की बात का पता लगाया जा सके।

    मनुष्यों के बीच रह सकना अत्यन्त कठिन है, क्योंकि मौन रह सकना दु:साध्य तपस्या है। हमारा घोरतम अन्याय अपने विरोधियों के प्रति नहीं होता, यह होता है उन लोगों के प्रति जिनसे हम उदासीन हों और जिनसे किसी प्रकार का कोई संबंध न रखते हों।

    यदि तेरा कोई मित्र पीड़ित हो तो उसकी पीड़ा के लिए शय्या बन जा। किंतु एक कठोर शय्या जैसी शिविर शय्या होती है- यही उसकी सबसे बड़ी सेवा है। और यदि तेरा कोई मित्र तेरे साथ बुराई करे तो उसे कह, जो कुछ तूने मेरे साथ किया है उसके लिए मैं तुम्हें क्षमा करता हूँ। किंतु ऐसा करके जो बुराई तूने अपने साथ की है, उसके लिए मैं तुझे कैसे क्षमा कर सकता हूँ।

    प्रत्येक महान प्रेम की यही गाथा है, यह क्षमा और दया से भी बढ़कर है।

    मनुष्य के लिए यह आवश्यक है कि वह अपने हृदय पर नियंत्रण रखे, जहाँ एक बार इसे ढील मिली तो फिर मस्तिष्क भी, तुरंत ही नियंत्रण से बाहर हो जाता है।

    एक बात और समझ लो और वह यह कि प्रत्येक महान प्रेम अपनी दया से ऊपर उठकर ही महान प्रेम बनता है, क्योंकि वह अपना प्रेमपात्र स्वयं ही निर्मित किया करता है। प्रत्येक निर्माता कठोर होता है।

    आत्मा और सद्गुण -ये दोनों सैकड़ों बार भटक चुके हैं। अनेक विभ्रम और मृग तृष्णाएं अभी तक हमारे भीतर जीवित हैं और वहाँ इन्होंने देह और संकल्प का रूप धारण कर लिया है। आत्मा और सद्गुण -दोनों ने सैकड़ों बार विकसित होने के प्रयास किए, किंतु हर बार वे विभ्रम में फंसते गए। ओह, मनुष्य स्वयं ही एक प्रयास बनकर रह गया है। अफसोस, ढेरों अज्ञानताएं और विभ्रम हमारे अन्दर मूर्तिमान होकर प्राणों में बस गए हैं। युग-युगांतर का संचित ज्ञान ही नहीं, बल्कि उसका उन्माद और भ्रांति भी हमारे भीतर प्रस्फुटित हो उठती है। कितना भयानक है उत्तराधिकारी बनना।

    हम अभी तक उस दैत्य के साथ पग-पग पर जूझ रहे हैं, जिसका नाम संयोग है। और मानव समाज पर अभी तक उसी का साम्राज्य स्थापित है जिसे विभ्रम और मूर्खता कहते हैं।

    तुम्हारी आत्मा और तुम्हारे सद्गुणों को धरती के महत्व और सार्थकता की सेवा में लग जाना चाहिए, अपने सद्गुणों को धरती की सेवा में अर्पित कर दो।

    ज्ञान की सहायता से शरीर अपने आप को स्वच्छ बनाता है और ज्ञान का सहारा लेकर उत्कर्ष की ओर अग्रसर होता है। ज्ञानशील मनुष्य के निकट समस्त अनुभूतियां और प्रवृत्तियां निर्दोष और पावन होती हैं और जिस व्यक्ति की आत्म उत्कर्ष प्राप्त कर चुकी हो, वह सदैव आनंद विभोर और हर्षमग्न रहता है। 

    अपना सांई प्यारा सांई सबसे न्यारा अपना सांई

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    अपना साँई प्यारा साँई सबसे न्यारा अपना साँई - रमेश रमनानी

    Offline Ramesh Ramnani

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    Re: आज का चिन्तन
    « Reply #79 on: June 08, 2007, 09:00:44 AM »
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    कर्मकाण्ड और समर्पण में ही सुख है
     
    यदि आप रोज सुबह नहाने के बाद पाठ करने के आदी हैं तो कभी हिसाब लगाकर देखें कि क्या आपके जीवन में एक भी ऐसा दिन आया है जब पाठ करते समय आपका सारा ध्यान पाठ पर ही केंद्रीत रहा हो, आपका दिमाग कहीं और न दौड़ा हो? पाठ करते-करते आप दिन भर के क्रिया- कलाप का निर्णय कर लेते हैं। दफ्तर पहुँचते ही किसे फोन करना है, किसे पत्र लिखना है, किससे मिलने का समय निश्चित करना है, किसे घर पर बुलाना है आदि- आदि।

    यदि आपको अचानक बीच में टोक दिया जाए तो आपको यह तक याद नहीं रहता कि अभी- अभी पाठ की किस पंक्ति पर थे। इससे आप क्रुद्ध हो उठते हैं। क्रोध का कारण यह नहीं होता कि आपकी आत्मा ब्रह्मानंद में डूबी हुई थी और बुलाने वाले ने अचानक उसका रस भंग कर दिया, बल्कि यह है कि अब सारा पाठ शुरू से करना होगा। क्योंकि याद ही नहीं कि कहां तक बोल लिया था। एक तरह से आपका वह पाठ आदतन या मानों नींद में हो रहा था। जाग्रत या चेतन अवस्था में तो आप दिन भर के कार्यों का निर्णय ले रहे थे और उनकी सूची बना रहे थे।

    हमारी प्रार्थनाएं रटी- रटायी और बासी हो गई हैं, जो सिर्फ पाना चाहती हैं, देना नहीं। वे हृदय से नहीं, मस्तिष्क से जन्म लेती हैं। लेकिन सच्ची प्रार्थना ईश्वर के सम्मुख पूर्ण और ईमानदार समर्पण है।

    समर्पण कुछ पाने का नाम नहीं है, वरन सब कुछ दे देने का भाव है। जब व्यक्ति समर्पित होता है, तब वह कुछ मांग कैसे सकता है? उलटे, वह तो दे ही रहा है और जो दे रहा है वह भरा हुआ है, रिक्त नहीं। तभी तो अर्पण कर रहा है। फिर वह दुखी कैसे हो सकता है। देने वाले को दुख कहाँ, उसे तो देने में ही सच्चा सुख प्राप्त हो जाता है।

    संसार के व्यवहार में भी समर्पण किए बगैर सुख नहीं मिलता। जब एक स्त्री अपने बच्चे के लिए तन-मन से पूरे नौ महीने समर्पित रहती है, तभी वह माँ बनने का सौभाग्य पाती है। इसी तरह पति- पत्नी, भाई- बहन, मित्र- रिश्तेदार और गुरु- शिष्य आदि प्रत्येक सम्बन्ध में समर्पण की ही मांग निहित है। जब सच्चा समर्पण नहीं होता, तो दुख का जन्म होने लगता है।

    आप मंदिर जाते हैं। भगवान की मूर्ति पर पैसे चढ़ाते हैं। चरणामृत और प्रसाद लेते हैं और हाथ जोड़कर, आंखें बंद करते ही प्रभु से कुछ मांगना शुरू कर देते हैं। आपको मालूम है कि जिस भगवान से आप यह सब मांग रहे हैं, उसी ने आपको यह जीवन, यह शरीर -इतना सब कुछ बिना माँगे ही दे दिया है। जिसने आप को शरीर दिया है, चलने- फिरने की शक्ति दी है, जिसने आपको धन दिया है, वह भगवान आपसे पच्चीस या पचास पैसे लेकर क्या करेगा? और फिर जो कुछ आप मांग रहे हैं, वह यदि बिना पैसे चढ़ाए भी आप मांगेंगे तो क्या वह मना कर देगा?

    आप जानते हैं कि उसे पैसों की जरूरत नहीं, लेकिन फिर भी आप हटते नहीं, पैसे चढ़ाने से। वास्तव में आप मंदिर में पैसे चढ़ाते हैं, मंदिर की व्यवस्था में योगदान देने के लिए। लोग मंदिरों में पैसा न चढ़ाएं तो पुजारी का निर्वाह कैसे हो? कहाँ से लाएगा वह धन धूप- बत्ती खरीदने के लिए? कहाँ से चुकाएगा वह मंदिर के बिजली- पानी का बिल? तो फिर आप यह पैसा सीधे पुजारी को ही क्यों नहीं दे देते? भगवान की मूर्ति को माध्यम बनाने की क्या आवश्यकता है?

    यह सब कुछ आप इसलिए करते हैं, क्योंकि मंदिर जाने और पैसे चढ़ाने की सारी क्रिया आप आदतन करते हैं, मशीनी ढंग से करते हैं, उसमें श्रद्धा और समर्पण का सच्चा भाव नहीं होता।

    समर्पण और सुख का संबंध धागे और मोती की तरह है, जिसमें समर्पण का एक- एक मोती मिलकर प्रेम के धागे में पिरोया जाता है। 

    अपना सांई प्यारा सांई सबसे न्यारा अपना सांई

    ॐ सांई राम।।।
    अपना साँई प्यारा साँई सबसे न्यारा अपना साँई - रमेश रमनानी

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    Re: आज का चिन्तन
    « Reply #80 on: June 14, 2007, 07:39:50 AM »
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  • ॐ सांई राम...

    सब से बङा रोग ~~~ क्या कहे गें लोग ~~~

    जय सांई राम...
           
    "लोका समस्ता सुखिनो भवन्तुः
    ॐ शन्तिः शन्तिः शन्तिः"

    " Loka Samasta Sukino Bhavantu
    Aum ShantiH ShantiH ShantiH"~~~

    May all the worlds be happy. May all the beings be happy.
    May none suffer from grief or sorrow. May peace be to all~~~

    Offline Ramesh Ramnani

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    Re: आज का चिन्तन
    « Reply #81 on: June 18, 2007, 08:31:43 AM »
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  • जय सांई राम।।।

    पूजा, नाम स्मरण, ध्यान- सब प्रेम की परछाई हैं
     
    ध्यान से सुनो और इसे जीवन में याद रखना, सत्संग पुरुषार्थ का फल नहीं, बल्कि वह भगवत कृपा से मिलता है। यत्न से नहीं अनुग्रह से प्राप्त होता है। इंसान प्लान तो बहुत कुछ करता है लेकिन होता है वही जो ईश्वर की इच्छा होती है। आप ही वृंदावन क्यों आए, आने का कार्यक्रम तो अन्य लोगों ने भी बनाया था।

    तुलसीदास जी कहते हैं कि बिनु सत्-संग विवेक न होई, राम कृपा बिनु सुलभ न सोई।। हृदय की भूमि उपजाऊ है, ऊसर भूमि नहीं। और ऐसी उपजाऊ भूमि पर भगवान की वृष्टि की कृपा के कारण सत्-संग मिलता है। सत्संग ईश्वर प्राप्ति की प्राथमिक पाठशाला है। भगवान की कृपा के कारण ही तो सत्संग में आए हैं आप सब लोग।

    मेरा अनुभव कहता है कि मन वहीं लगता है जहां उसे रस मिलता है। जिससे रस मिलता है, तृप्ति का अनुभव होता है उसमें मन सदा लुभाया रहता है, जिस प्रकार कमल में भ्रमर। भगवान में जब प्रेम हो जाएगा तब मन भगवान में ही लगा रहेगा। जिसका दर्शन, स्मरण, वाणी सब हमको तृप्त करे वही प्रिय होता है। जब तक मन का राग संसार में है तब तक मन का मैल मिटेगा नहीं। जब तक मन का मैल नहीं मिटेगा, मन की चंचलता नहीं मिटेगी।

    विशुद्ध मन ही वासुदेव है। मन से रजोगुण और तमोगुण मिट जाए और मन सत्व से पूर्ण हो जाए तो मन की स्थिरता स्वाभाविक हो जाती है। रजोगुण से चंचलता और तमोगुण से जड़ता आती है, जो कि भजन में बाधक है। लेकिन सत्व को पाएँ कैसे, मन को वासुदेव बनाएँ कैसे?

    इसीलिए भक्त जन भोर का वक्त चुनते हैं, सुबह ब्रह्मा-मुहूर्त में तब मन सतोगुणी होता है, उस पर सत्व का विशेष प्रभाव रहता है, इसलिए उस समय को भजन-साधना के लिए श्रेष्ठ माना गया है। तब मन सरलता से जप, ध्यान आदि में लग जाता है। सत्संग, कथा-श्रवण आदि से राग की दिशा बदल जाती है, जो संसार में है, वह राग भगवान में हो जाता है। प्रभु में हुआ राग, अनुराग बन जाता है। संसार और सांसारिक भोग्य पदार्थों से विराग सहज ही हो जाता है। श्रीमद्भागवत में रुक्मिणी का श्रीकृष्ण में अनुराग इसी तरह हुआ है, नारद जी से कृष्ण कथा सुनकर।

    प्रीति कभी सौंदर्य में, कभी स्वभाव के औदार्य में, कभी शौर्य को देखकर, कभी स्वर-माधुर्य से प्रभावित होकर होती है। यह सब श्रीकृष्ण में ही पूर्ण और श्रेष्ठ रूप से है। इस विवेक से प्रेम श्रीकृष्ण में हो जाएगा और तब मन भगवान में ही सहज रूप से लगा रहेगा।

    गोपियों का मन भगवान में नहीं लगता, नहीं वह स्थिर रहता है। लेकिन यह समस्या ही नहीं है। उनका मन श्रीकृष्ण में ही स्थिर है, क्योंकि उनका श्रीकृष्ण में अनन्य प्रेम है। गोपी का मन संसार में लगता ही नहीं। स्तेय योग से श्रीकृष्ण ने ही गोपी के मन को चुरा लिया है। गोपी तो उलटा प्रयास करती है अपने मन को श्रीकृष्ण से हटाने का, किंतु उसमें वह विफल रहती है। यही है प्रेम की महिमा।

    पूजा, नाम-स्मरण, ध्यान आदि सब प्रेम की परछाई है। ऐसा मैं मानता हूं। जिसमें प्रेम होता है उसकी पूजा, सेवा के लिए हम सदा लालायित रहते हैं। जिसमें प्रेम होता है उसी के विचारों से मन भरा रहता है। बार-बार उसी प्रियतम के नामों को प्रेमपूर्वक पुकारते रहते हैं। उसी का ध्यान हमेशा रहता है जिसमें प्रेम है।

    एक अभिप्राय से नाम-संकीर्तन से पापों का नाश होता है। इसलिए चाहे भाव, कुभाव, अनख, आलस कुछ भी आए, किंतु नाम जप, संकीर्तन करते रहो। पापों का नाश होगा और धीरे-धीरे प्रभु में प्रेम बढ़ता जाएगा। फिर मन सहज भगवान में स्थिर हो जाएगा।

    शास्त्रों और संतों के अनुसार बताए गए उपरोक्त मार्गों, उपायों में से जो प्रकृति के अनुसार रुचे, जँचे, साधन कीजिए और जीवन को धन्य बनाइए। 

    अपना सांई प्यारा सांई सबसे न्यारा अपना सांई

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    Re: आज का चिन्तन
    « Reply #82 on: June 19, 2007, 08:11:38 AM »
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  • ॐ साईं राम...

    इस संसार में दाता का स्थान ग्रहण करो । सब कुछ दे डालो और बदले में कोई चाह ना रखो ।
    प्रेम दो , सहयोग दो , सेवा अर्पित करो , जो कुछ तुम से बन सकता है वही दो , पर दुकानदारी के भाव से बचे रहो । ना कोई शर्त रखो और ना कोई तुम पर शर्त डालेगा ।
    जिस प्रकार स्वेच्छा से भगवान हमें देते है उसी प्रकार हम स्वेच्छा से दें ।

    जय साईं राम....
    "लोका समस्ता सुखिनो भवन्तुः
    ॐ शन्तिः शन्तिः शन्तिः"

    " Loka Samasta Sukino Bhavantu
    Aum ShantiH ShantiH ShantiH"~~~

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    May none suffer from grief or sorrow. May peace be to all~~~

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    Re: आज का चिन्तन
    « Reply #83 on: June 19, 2007, 09:33:30 PM »
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  • जय सांई राम।।।

    कर्त्तव्य की उपेक्षा
     
    एक बार एक अमीर आदमी ने बहुत सारी भेडे़ खरीदीं। उसने सोचा कि ऊन बेचकर वह खूब पैसे बनाएगा, हालांकि उसे इस धंधे का पूरा ज्ञान न था। उसने भेड़ चराने के लिए 2 नौकर रखे। उन नौकरों की उसने अच्छी तरह परीक्षा ली। फिर कई तरह की हिदायतें देकर काम पर भेजा। वे दोनों नौकर सुबह-सुबह भेड़ों को चराने ले जाते और फिर देर शाम तक लौटकर लाते।

    कुछ दिनों तक तो सब कुछ ठीकठाक चला, लेकिन कुछ समय के बाद उस आदमी ने गौर किया कि उसकी भेड़ें दुबली होती जा रही हैं। उसने नौकरों से पूछताछ की पर उन्होंने बताया कि वे बखूबी अपने काम में लगे हुए हैं। कुछ दिनों बाद उसकी कुछ भेड़ें मर गईं। अब उस अमीर आदमी को शक हुआ। उसने उन नौकरों के पीछे आदमी लगा दिए। उस आदमी ने कुछ दिनों के बाद जो सच्चाई बताई उसे सुनकर वह व्यापारी हैरत में पड़ गया। बात यह थी कि एक नौकर को जुआ खेलने की आदत थी। वह भेड़ों को छोड़कर जुआ खेलने बैठ जाता था। लेकिन दूसरे नौकर का स्वभाव एकदम अलग था। वह भेड़ों को छोड़कर पूजा पाठ में लग जाता था। वह किसी मंदिर में चला जाता और हवन करने लगता या किसी बाबा के पास बैठकर धर्म चर्चा करने लगता। इस बीच भेड़ें भूखी-प्यासी भटकती रहती थीं।

    दोनों पकड़े गए और न्यायाधीश के समक्ष पेश किए गए। सबको उम्मीद थी कि धार्मिक प्रवृत्ति वाला नौकर जरूर बच जाएगा, मगर ऐसा नहीं हुआ। न्यायाधीश ने दोनों नौकरों के तर्कों को सुना। यद्यपि दोनों में भेद था, लेकिन विद्वान न्यायाधीश ने दोनों को ही समान रूप से दोषी पाया और समान रूप से दंड भी दिया। उन्होंने कहा, 'कर्त्तव्यभाव के बिना जो किया जाता है वह व्यसन है। अब इस व्यसन में नौकर जुआ खेलें या पूजा करें, बात एक ही है। अपने दायित्वों की उपेक्षा के दोषी तो दोनों ही हैं इसलिए उन्हें समान रूप से कर्त्तव्य पालन की उपेक्षा के लिए दंडित किया गया है।' 

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    ॐ सांई राम।।।
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    Re: आज का चिन्तन
    « Reply #84 on: June 20, 2007, 07:16:37 AM »
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  • ॐ साईं राम....

    ईश्वर अनुमान नहीं...
    ईश्वर तो अनुभव हैं....

    मैं ढूंढ आया अल्लाह मस्जिद में...
    मैं ढूढं आया राम मंदिर में...
    मैं ढूढं आया... नमाज़ में भी नहीं
    मैं ढूढं आया...प्रार्थना में भी नहीं...

    जहाँ वो है....वहाँ तो मैनें ढूढां ही नहीं~~~~~

    मंदिर मस्जिद जा कर घर आ गए ...तो क्या............

    जैसे जब कोई बीमार हो तो दवा की शीशी को देख कर ही ठीक हो रहे हो ....       

    जय साईं राम....
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    Re: आज का चिन्तन
    « Reply #85 on: June 29, 2007, 07:16:17 AM »
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  • ॐ सांई राम...

    पेङ बोले पत्ते से - अरे मुझ पर ही तू पलता है ,
    फिर पत्ता बोला पेङ से - अरे मुझ से ही तू चलता है ,
    दोनों बावरे ये ना जाने , सारे जग की रीत यही है ,
            ये जग मिल जुल कर ही चलता है ।

    जय सांई राम..
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    Re: आज का चिन्तन
    « Reply #86 on: July 05, 2007, 03:44:36 AM »
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  • ॐ सांई राम...

    जो होता है अच्छा होता है ,
    गीता में भगवान ये कहता है ,
    फिर क्यों तू रोता है ,
    दामन क्यों भिगोता है ,
    पगले!!! हर दुख में छिपी होती है खुशी ...
    तू क्यों ये भूल जाता है....

    जय सांई राम....
           
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    Re: आज का चिन्तन
    « Reply #87 on: July 11, 2007, 05:52:18 AM »
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  • ॐ सांई राम...

    ना जाऊं मैं मथुरा ना जाऊं मैं काशी ,
    जहाँ बिछाया आसन मैने , वही मेरा अविनाशी~~~

    सांई~~~~~~~मेरे बाबा मेरे सांई~~~


    जय सांई राम...
           
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    Re: आज का चिन्तन
    « Reply #88 on: August 11, 2007, 12:24:34 AM »
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  • जय सांई राम।।।

    ज्ञान और भक्ति

    नश्वर संसार से संबंध विच्छेद ही ज्ञान और जगत-नियंता भगवान से संबंध स्थापित करना ही भक्ति है। ज्ञान में प्रवृत्तियों का निरोध है,जबकि भक्ति में आत्म-निवेदन। परम सत्य का अनुसंधान जिस सूक्ष्म बुद्धि द्वारा संभव है वह प्रभु के प्रति सर्वात्म समर्पण भाव से ही प्राप्त है। ज्ञान एवं भक्ति परस्पर अन्योन्याश्रित हैं। भक्ति का साधन ज्ञान है, क्योंकि बिना भगवत्स्वरूप को जानें भगवद् अनुराग संभव नहीं। इसी प्रकार ज्ञान का साधन भक्ति है, क्योंकि भगवान के विषय में भक्ति से ही जान पाना संभव है। ऐश्वर्य, धर्म, यश, लक्ष्मी, ज्ञान और वैराग्य-इन छह विशेषताओं से परिपूर्णतम् प्रभु स्वयं पूर्णरूपेण अखंड एवं अनंत हैं। श्वेताश्वर उपनिषद् में जीवात्मा बाल के अग्रभाग के दस हजारवें अंश के परिमाप की बतलाई गई है। परमात्मा एवं अणुरूप जीवात्मा दोनों ही जीव के हृदय में स्थित रहते हैं। ज्ञानीजन पराई स्त्री को माता के सदृश, पराए धन को धूलतुल्य और समस्त जीवों को आत्मवत् मानते हैं।

    भगवद् अनुराग से विषय-विराग होता है और तदनंतर भगवान की अनन्य शरणागति से भगवत्प्राप्ति। भक्ति को कर्म, ज्ञान और योग से श्रेष्ठतर कहा गया है। भक्ति में प्रभु का बल सक्रिय रहता है, पर ज्ञान में मात्र साधक का स्वयं का बल ही क्रियाशील रहता है। भक्तिमार्ग भगवत्प्राप्ति का सुगम व सुखद उपाय है, जबकि ज्ञानमार्ग अत्यधिक दुस्तर एवं कष्टप्रद- ज्ञान को पंथ कृपान के धारा। ज्ञान तो मात्र अज्ञान को मिटाता है, किंतु भगवान स्वयं भक्त के परवश हो जाते हैं। ज्ञानी को भक्ति की प्राप्ति सुनिश्चित नहीं, किंतु भक्त को ज्ञान की प्राप्ति सुनिश्चित है। ज्ञान के अभाव में ज्ञानी का पतन संभव है, पर भगवद्भक्त का कभी पतन नहीं होता। गीता में स्वयं भगवान की स्पष्टोक्ति है कि उन्हें उन्हीं में अर्पित मन एवं बुद्धि वाला भक्त ही प्रिय है। ज्ञानी ज्ञानामृतपान से तृप्त हो सकते हैं,किंतु भक्ति में प्यास ही तृप्ति है, मो मन अटक्यौ स्याम सौं, गड़यौ रूप में जाए। चहले परि निकसै नहीं, मनो दूबरी गाय। महाकवि विद्यापति कहते हैं, जनम अवधि हम रूप निहारेनु, नयन न तिरपित भेला। मन:स्थिति के अनुरूप अध्यात्म-मार्ग का चयन कर साधक जीवन कृतकृत्य कर सकते हैं। प्रभु की सभी पर अनवरत कृपावृष्टि के कारण साधना कभी विफल नहीं होती।

    अपना सांई प्यारा सांई सबसे न्यारा अपना सांई

    ॐ सांई राम।।।
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    Offline Ramesh Ramnani

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    Re: आज का चिन्तन
    « Reply #89 on: August 13, 2007, 08:58:04 PM »
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  • जय सांई राम।।।

    गुरु से ज्ञान, मुक्ति व वैराग्य के प्रश्न करें

    प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन में खुशी, आनन्द व सुख चाहता है और उसी के लिए वह प्रयास करता रहता है। अक्सर लोग ऐसी धारणा बना लेते हैं कि यदि हमें गुरु मिल जाए तो हमारी सभी समस्याओं का समाधान हो जाएगा और वह सब मिल जाएगा जो आज तक नहीं मिल पाया। हमारा सारा भार गुरु अपने ऊपर उठा लेगा, फिर हमें कुछ नहीं करना पड़ेगा, जो करेगा गुरु करेगा।

    यह धारणा गलत है, क्योंकि गुरु सिर्फ मार्गदर्शक होता है, चलना तो व्यक्ति को स्वयं ही पड़ता है। हम गुरु की तलाश शुरू करते हैं, सोचते हैं कि हमारा भी एक गुरु होना चाहिए। जैसे किसी मंत्री से दोस्ती होनी चाहिए, जैसे घर में कोई फैशनेबुल कार होनी चाहिए। यह विचार कुछ समय बाद चला जाता है, फिर कभी ध्यान आता है कि अरे मुझे तो गुरु करना था, मैं तो भूल ही गया। फिर मन में आता है कि चलो, अभी तो बहुत उम्र पड़ी है, बाद में कर लेंगे।

    असल में गुरु तब तक नहीं मिलता जब तक शिष्य के अंदर उसके लिए तीव्र इच्छा जागृत न हो। ज्यादातर लोग जब अपने लिए गुरु की आकांक्षा करते हैं, तो देखादेखी करते हैं। उसने इनको अपना गुरु बनाया तो मैं भी इन्हीं को अपना गुरु बना लूं, यह देखा-देखी गलत है। फलाँ गुरु की बड़ी शोहरत है, इस आधार पर गुरु का चयन गलत है। यदि गुरु खुद ही अन्धकार में होगा, तो वह कैसे हमारी नाव पार लगाएगा?

    इसलिए किसी को गुरु बनाने से पहले उसे अपनी इच्छाओं की कसौटी पर कसें- आप गुरु क्यों चाहते हैं? जब अंदर से लगे कि हाँ, यही मुझे सन्मार्ग दिखा सकता है, तभी गुरु बनाएँ। जब शिष्य को सच्चा गुरु मिल जाता है तब गुरु अपने सत्संग में शिष्य से उसके भीतर पड़े विकारों, उलझनों, कष्टों, क्लेशों को उजागर करने को कहता है। शिष्य अपने प्रश्नों को गुरु के समक्ष रखता है और गुरु उनका उत्तर देता है। लेकिन अक्सर ऐसा देखा जाता है कि गुरु के निकट पहुंचकर शिष्य अपने अहंकार, धन, कीर्ति, बुद्धिमता और विद्वता का गुणगान करने लगता है। या फिर अपने जीवन की भौतिक कमियों का रोना रोता हैं। अपनी सांसारिक वासनाओं के पूर्ण नहीं हो पाने का दुख रोता है। गुरु समझ जाता है कि शिष्य का रुझान किधर है, उसको ज्ञान, मुक्ति या वैराग्य से मतलब नहीं, वह तो बस सांसारिक सुख चाहता है। ऐसे में गुरु भी उसकी प्रकृति के अनुरूप ही उसे सुख पाने में ले आता है।

    इस प्रकार गुरु के सान्निध्य में आकर भी शिष्य बन्धन में ही पड़े रहते हैं। गुरु से वही प्रश्न करें, जिसे जानने के लिए आप उसकी शरण में गए हैं।

    जिस प्रकार कठोपनिषद् में नचिकेता यमराज से मृत्यु का रहस्य जानने की इच्छा रखता है, लेकिन यमराज छोटे बालक नचिकेता को इस रहस्य के बदले हर तरह का प्रलोभन देने की कोशिश करता है- ऐसे प्रलोभन जो उसकी कल्पना में भी नहीं थे। लेकिन नचिकेता सबको ठुकरा देता है और केवल एक ही रट लगाए रखता है कि मुझे मृत्यु का रहस्य जानना है। तब अंत में यमराज को नचिकेता के दृढ़ निश्चय आगे झुकना पड़ता है और उसे जीवन-मृत्यु का रहस्य बताना पड़ता है।

    यदि हम भगवद्गीता को ध्यान से पढ़ें तो वहां अर्जुन ने कृष्ण से घुमा-फिराकर ज्ञान, मुक्ति व वैराग्य के ही प्रश्न किए हैं। अष्टावक्र गीता में राजा जनक ने भी अपने गुरु अष्टावक्र से ज्ञान, मुक्ति व वैराग्य के ही प्रश्न किए। इसी प्रकार राम ने भी गुरु वशिष्ठ से इसी प्रकार के प्रश्नों को जानने की जिज्ञासा की।

    जब तक शिष्य के भीतर अपनी मुक्ति का प्रबल वेग नहीं जागेगा, तब तक सच्चे प्रश्न नहीं हो पाएंगे। तब जिनके पास गुरु हैं वे भी, अपने गुरु के पास जाकर भी, ज्ञान, मुक्ति और वैराग्य नहीं पा सकेंगे। शिष्य केवल गुरु मुख के शब्दों की विलासिता में ही रहकर असली मुक्ति को गंवा देगा। 

    अपना सांई प्यारा सांई सबसे न्यारा अपना सांई

    ॐ सांई राम।।।
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