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Author Topic: आज का चिन्तन  (Read 162987 times)

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Offline Ramesh Ramnani

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Re: आज का चिन्तन
« Reply #120 on: January 06, 2008, 02:27:03 AM »
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  • जय सांई राम।।।

    बैठे-बैठे सोचते रहे
    कि अब वक़्त को
    यूं ही नहीं जाने देंगे

    जब हम
    कुछ करने के लिए
    खड़े हुए
    तो वक़्त जा चुका था

    अपना सांई प्यारा सांई सबसे न्यारा अपना सांई

    ॐ सांई राम।।।
    अपना साँई प्यारा साँई सबसे न्यारा अपना साँई - रमेश रमनानी

    Offline tana

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    Re: आज का चिन्तन
    « Reply #121 on: January 06, 2008, 02:34:18 AM »
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  • जय सांई राम।।।

    बैठे-बैठे सोचते रहे
    कि अब वक़्त को
    यूं ही नहीं जाने देंगे

    जब हम
    कुछ करने के लिए
    खड़े हुए
    तो वक़्त जा चुका था

    अपना सांई प्यारा सांई सबसे न्यारा अपना सांई

    ॐ सांई राम।।।

    ॐ सांई राम~~~

    मैं खिलौनों की दुकाने खोजता रह गया,
    इतने में मेरे फूल जैसे बच्चे सयाने हो गए~~~

    जय सांई राम~~~

    "लोका समस्ता सुखिनो भवन्तुः
    ॐ शन्तिः शन्तिः शन्तिः"

    " Loka Samasta Sukino Bhavantu
    Aum ShantiH ShantiH ShantiH"~~~

    May all the worlds be happy. May all the beings be happy.
    May none suffer from grief or sorrow. May peace be to all~~~

    Offline saikrupakaro

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    Re: आज का चिन्तन
    « Reply #122 on: January 06, 2008, 07:15:45 PM »
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  • om shri sai, any sai bhakt living in Australia or New Zealand plzz contact me ASAP at anamikanoname@yahoo.co.in om shri sai
    SHRI SAI BABA SAB PAR KRUPA KARO PLZZ

    Offline Ramesh Ramnani

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    Re: आज का चिन्तन
    « Reply #123 on: January 09, 2008, 07:50:07 AM »
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  • जय सांई राम़।।।

    "सोच को बदलो,  सितारे बदल जायेंगें....
    नज़र को बदलो,  नज़ारे बदल जायेंगें....
    कश्तियाँ बदलने कि ज़रूरत नहीं है....
    दिशाओं को बदलो,  किनारे बदल जायेंगें....

    अपना सांई प्यारा सांई सबसे न्यारा अपना सांई

    ॐ सांई राम।।।
    अपना साँई प्यारा साँई सबसे न्यारा अपना साँई - रमेश रमनानी

    Offline tana

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    Re: आज का चिन्तन
    « Reply #124 on: January 09, 2008, 11:15:43 PM »
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  • ॐ सांई राम~~~

    तेरे चाहने से कुछ नहीं होता
    होगा वही जो किस्मत में लिखा होगा,
    रो रो कर गिङगिङा कर देख ले
    फिर भी होगा वही जो होना होगा,
    तू कर समझौता और मुस्कुरा कर के देख
    फिर दुखों का दर्द कुछ कम होगा,
    खुशी-गम चाहे हो सुख-दुःख
    सब उसी की ईच्छा से होगा,
    जीवन बिता पर ये याद रख
    उसकी इच्छा में कभी तेरा बुरा ना होगा,

    दुःख-सुख जो भी मिले तुझे
    इसमे जरूर कुछ भला ही होगा~~~


    जय सांई राम~~~

    "लोका समस्ता सुखिनो भवन्तुः
    ॐ शन्तिः शन्तिः शन्तिः"

    " Loka Samasta Sukino Bhavantu
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    May all the worlds be happy. May all the beings be happy.
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    Offline tana

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    Re: आज का चिन्तन
    « Reply #125 on: January 11, 2008, 05:07:01 AM »
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  • ॐ साईं राम~~~

    थोङा सा सम्मान मिला,पागल हो गए।
    थोङा सा धन मिला,बेकाबू हो चले।
    थोङा सा ज्ञान मिला,उपदेश की भषा सीख ली।
    थोङा सा यश मिला,दुनिया पर हंसने लगे।
    थोङा सा रूप मिला,दर्पण को तोङ डाला।
    थोङा सा अधिकार मिला,दूसरों को तबाह कर दिया।
    इस प्रकार तमाम उम्र छलनी से पानी भरते रहे।
    अपनी समझ से बहुत बङा काम करते रहे।
    अंत में कुछ भी हाथ न आया सिवाय पश्चाताप के।

    जय साईं राम~~~
    "लोका समस्ता सुखिनो भवन्तुः
    ॐ शन्तिः शन्तिः शन्तिः"

    " Loka Samasta Sukino Bhavantu
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    Re: आज का चिन्तन
    « Reply #126 on: January 14, 2008, 02:02:45 AM »
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  • ॐ साईं राम~~~


    भाषा एक संस्कार है~~~

    एक पुरानी कथा है । एक राजा शिकार खेलने के लिए वन में गया । शेर का पीछा करते करते बहुत दूर निकल गया। सेनापति और सैनिक सब इधर उधर छूट गए। राजा रास्ता भटक गया। सैनिक और सेनापति भी राजा को खोजने लगे।सभी परेशान थे। एक अंधा भिखारी चौराहे पर बैठा था। कुछ सैनिक उसके पास पहुँचे। एक सैनिक बोला 'क्यों बे अंधे ! इधर से होकर राजा गया है क्या?' 'नहीं भाई !' भिखारी बोला। सैनिक तेजी से आगे बढ गए। कुछ समय बाद सेनापति भटकते हुआ उसी चौराहे पर पहुँचा।उसने अंधे भिखारी से पूछा 'क्यों भाई अंधे ! इधर से राजा गए हैं क्या?' 'नहीं जी, इधर से होकर राजा नहीं गए हैं ।' सेनापति राजा को ढूँढने के लिए दूसरी दिशा में बढ़ ग़या। इसी बीच भटकते-भटकते राजा भी उसी चौराहे पर जा पहुँचा। उसने अंधे भिखारी से पूछा - 'क्यों भाई सूरदास जी ! इस चौराहे से होकर कोई गया है क्या?' 'हाँ महाराज ! इस रास्ते से होकर कुछ सैनिक और सेनापति गए हैं।' राजा चौंका - 'आपने कैसे जाना कि मैं राजा हूँ और यहाँ से होकर जाने वाले सैनिक और सेनापति थे ?' 'महाराज ! जिन्होंने 'क्यों बे अंधे' कहा वे सैनिक हो सकते हैं। जिसने 'क्यों भाई अंधे' कहा वह सेनापति होगा। आपने 'क्यों भाई सूरदास जी !'कहा.आप राजा हो सकते हैं।
    आदमी की पहचान उसकी भाषा से होती है और भाषा संस्कार से बनती है। जिसके जैसे संस्कार होंगे, वैसी ही उसकी भाषा होगी । जब कोई आदमी भाषा बोलता है तो साथ में उसके संस्कार भी बोलते हैं।

    जय साईं राम~~~
    "लोका समस्ता सुखिनो भवन्तुः
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    " Loka Samasta Sukino Bhavantu
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    Offline Ramesh Ramnani

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    Re: आज का चिन्तन
    « Reply #127 on: January 14, 2008, 02:15:09 AM »
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  • जय सांई राम।।।

    गीता सार

    जो हुआ अच्छा हुआ जो हो रहा है अच्छा हो रहा है, जो होगा वो भी अच्छा होगा, तुम्हारा क्या गया जो तुम रोते हो? तुम क्या लाये थे जो तुमने खो दिया? तुमने क्या पैदा किया था जो नष्ट हो गया? तुमने जो लिया यही से लिया, जो दिया यही पर दिया, जो आज तुम्हारा है, कल किसी और का था, कल किसी और का होगा

    अपना सांई प्यारा सांई सबसे न्यारा अपना सांई

    ॐ सांई राम।।।
    अपना साँई प्यारा साँई सबसे न्यारा अपना साँई - रमेश रमनानी

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    Re: आज का चिन्तन
    « Reply #128 on: January 15, 2008, 04:13:20 AM »
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  • जय सांई राम़।।।

    एक मंदिर पड़ोस में है। रात्रि वहां रोज ही भजन-कीर्तन होने लगता है। धूप की तीव्र गंध उसके बंद प्रकोष्ठ में भर जाती है। फिर आरती-वंदन होता है। वाद्य बजते हैं। घंटो का निनाद होता है और ढोल भी बजते हैं। फिर पुजारी नृत्य करता है और भक्तगण भी नाचने लगते हैं। यह देखने एक दिन मंदिर के भीतर गया था। जो देखा वह पूजा नहीं, मूच्र्छा थी। वह प्रार्थना के नाम पर आत्म-विस्मरण था। अपने को भूलना दुख-विस्मरण देता है। जो नशा करता है, वही काम धर्म के ऐसे रूप भी कर देता है।जीवन-संताप को कौन नहीं भूलना चाहता है? मादक द्रव्य इसीलिए खोजे जाते हैं। मादक-क्रिया काण्ड भी इसीलिए खोजे जाते हैं। मनुष्य ने बहुत तरह की शराबें बनाई हैं और सबसे खतरनाक शराबें वे हैं, जो कि बोतलों में बंद नहीं होती। दुख-विस्मरण से दुख मिटता नहीं है। उसके बीज ऐसे नष्ट नहीं होते,  विपरीत, उसकी जड़े और मजबूत होती जाती हैं। दुख को भूलना नहीं, मिटाना होता है। उसे भूलना धर्म नहीं, वंचना है। दुख-विस्मरण का उपाय जैसे स्व-विस्मरण है,  वैसे ही दुख-विनाश का स्व-स्मरण है। धर्म वह है, जो स्व को परिपूर्ण जाग्रत करता है। धर्म के शेष सब रूप मिथ्या हैं। स्व-स्मृति पथ है,  स्व-विस्मृत विपथ है। यह भी स्मरण रहे कि स्व-विस्मृति से स्व मिटता नहीं है। प्रच्छन्न धरा प्रवाहित ही रहती है। स्व-स्मृति से ही स्व विसर्जित होता है। जो स्व को परिपूर्ण जानता है,  वह स्व के विसर्जन को उपलब्ध हो,  सर्व को पा लेता है। स्व के विस्मरण से नहीं,  स्व के विसर्जन से सर्व की राह है। प्रभु के स्मरण से स्व को भूलना भूल है। स्व के बोध से स्व को मिटाना मार्ग है और जब स्व नहीं रह जाता है, तब जो शेष रह जाता है, वही प्रभु है। प्रभु स्व के विस्मरण से नहीं, स्व के विसर्जन से उपलब्ध होता है।

    अपना सांई प्यारा सांई सबसे न्यारा अपना सांई

    ॐ सांई राम।।।
    अपना साँई प्यारा साँई सबसे न्यारा अपना साँई - रमेश रमनानी

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    Re: आज का चिन्तन
    « Reply #129 on: January 23, 2008, 04:40:04 AM »
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  • ॐ साईं राम~~~ 
     
    तथास्तु 
    - चंद्रा र. देवत


    भगवान का दरबार लगा था। सभी लोगों ने उनसे विभिन्न प्रार्थनाएँ की थीं। एक-एक कर वे उनके सामने प्रस्तुत की जा रही थीं। एक सेठ की प्रार्थना सुनकर परमात्मा को बड़ा आश्चर्य हुआ।

    उसने कहा, 'हे भगवान दुःख के दिनों में आप मेरा साथ देना। गरीबी आए तो मेरी मदद करना।'

    चकित परमात्मा ने अपने सचिव से पूछा, 'यह तो बड़ा सुखी-संपन्न सेठ है न?' 'जी प्रभु!'
    सचिव ने पुष्टि की, 'भरापूरा घर है इसका। बेटे-बेटी, नाती-पोते, धन-दौलत, ऐश्वर्य, आपसी प्रेम, मान-मर्यादा सब प्रकार के सांसारिक सुख हैं। दान-धर्म, कर्मकांड में भी पीछे नहीं।' 
     
    भगवान ने निःश्वास ली, 'फिर तो इसकी प्रार्थना स्वीकार करनी पड़ेगी मुझे। तुम ऐसा करो, इसके लिए दुःख व गरीबी का बंदोबस्त करो ताकि मैं इसकी मदद कर सकूँ।'

    इसीलिए कहा गया है- सकारात्मक सोचो, सकारात्मक बोलो और हर अच्छे-बुरे के लिए परमात्मा का धन्यवाद करो। 

    जय साईं राम~~~
     
     
    "लोका समस्ता सुखिनो भवन्तुः
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    Re: आज का चिन्तन
    « Reply #130 on: January 28, 2008, 12:21:10 AM »
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  • जय सांई राम।।।

    मैं मनुष्य को इतना भरा हुआ देखता हूं कि उन पर मुझे बहुत दया आती है। उनमें किंचित भी अवकाश नहीं है, थोड़ा सा भी आकाश नहीं है। जिसमें आकाश नहीं है, वह मुक्त कैसे हो सकता है? मुक्ति के लिए बाहर नहीं, भीतर आकाश चाहिए। जिसमें भीतर आकाश होता है, वह बाहर के आकाश से एक हो जाता है और अंतस आकाश जब विश्व के आकाश से एक होता है - वह सम्मिलन, वह संगम, वह संपरिवर्तन ही मुक्ति है। वही ईश्वरानुभव है।

    इसलिए मैं ईश्वर से किसी को भरने को नहीं कहता हूं - वरन सबसे कहता हूं कि अपने को खाली कर लो और तुम पाओगे कि ईश्वर ने तुम्हें भर दिया है।

    वर्षा में जब बदलियां पानी गिराती हैं, तो टीले जल से वंचित ही रह जाते हैं और गड्ढे परिपूरित हो जाते हैं। गड्ढों की तरह बनो, टीलों की तरह नहीं। अपने को भरो मत,  खाली करो ओर प्रभु की वर्षा तो प्रतिक्षण हो रही है - जो उस जल को अपने में लेने को खाली है, वह भर दिया जाता है।

    गागर का मूल्य यही है कि वह खाली है;  वह जितनी खाली होती है,  सागर उसे उतना ही भर देता है।

    मनुष्य का मूल्य भी उतना ही है,  जितना कि वह शून्य है,  उस शून्यता में ही सागर उतरता है और उसे पूर्ण करता है।

    अपना सांई प्यारा सांई सबसे न्यारा अपना सांई

    ॐ सांई राम।।। 
    अपना साँई प्यारा साँई सबसे न्यारा अपना साँई - रमेश रमनानी

    Offline Ramesh Ramnani

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    Re: आज का चिन्तन
    « Reply #131 on: January 29, 2008, 01:28:02 AM »
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  • जय सांई राम।।।

    मैं साधकों को देखता हूं, तो पाता हूं कि वे सब मन को साधने में लगे हैं। मन को साधने से सत्य नहीं मिलता है; विपरीत, वही तो सत्य के अनुभव में अवरोध है। मन को साधना नहीं विसर्जित करना है। मन को छोड़ो तब द्वार मिलता है। धर्म मन में या मन से उपलब्ध नहीं होता है। वह अ-मन की स्थिति में उपलब्ध होता है।

    मात्सु साधना में था। वह अपने गुरु-आश्रम के एक एकांत झोपड़े में रहता और अहर्निश मन को साधने का अभ्यास करता। जो उससे मिलने भी जाते, उनकी ओर भी वह कभी कोई ध्यान नहीं देता था।

    उसका गुरु एक दिन उसके झोपड़े पर गया। मात्सु ने उसकी ओर भी कोई ध्यान नहीं दिया। पर उसका गुरु दिन भर वहीं बैठा रहा और एक ईट पत्थर पर घिसता रहा। मात्सु से अंतत: नहीं रहा गया और उसने पूछा, आप क्या कर रहे हैं? गुरु ने कहा,  'इस ईट का दर्पण बनाना है।'  मात्सु ने कहा - ईट का दर्पण!  पागल हुए हो - जीवन भर घिसने पर भी नहीं बनेगी। यह सुन गुरु हंसने लगा और उसने मात्सु से पूछा, 'तब तुम क्या कर रहे हो?  ईट दर्पण नहीं बनेगी, तो क्या मन दर्पण बन सकता है?  ईट भी दर्पण नहीं बनेगी,  मन भी दर्पण नहीं बनेगा। मन ही तो धूल है, जिसने दर्पण को ढंका है। उसे छोड़ो और अलग करो, तब सत्य उपलब्ध होता है।'

    विचार संग्रह मन है और विचार बाहर से आये धूलिकण हैं। उन्हें अलग करना है। उनके हटने पर जो शेष रह जाता है, वह निर्दोष चैतन्य सदा से ही निर्दोष है। निर्विचार में, इस अ-मन की स्थिति में, उस सनातन सत्य के दर्शन होते हैं, जो कि विचारों के धुएं में छिप गया होता है।

    विचारों का धुआं न हो तो फिर चेतना की निर्धूम ज्योति-शिखा ही शेष रह जाती है। वही पाना है, वही होना है। साधना का साध्य वही है।
     
    अपना सांई प्यारा सांई सबसे न्यारा अपना सांई

    ॐ सांई राम।।।
    अपना साँई प्यारा साँई सबसे न्यारा अपना साँई - रमेश रमनानी

    Offline Ramesh Ramnani

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    Re: आज का चिन्तन
    « Reply #132 on: January 31, 2008, 02:11:04 AM »
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  • जय सांई राम।।।

    मैं तुम्हें देखता हूं : तुम्हारे पार जो है, उसे भी देखता हूं।

    शरीर पर जो रुक जाएं वे आंखें देखती ही नहीं हैं। शरीर कितना पारदर्शी है! सच ही, देह कितनी ही ठोस क्यों न हो, उसे तो नहीं ही छिपा पाती है, जो कि पीछे है।

    पर, आंखें ही न हों, तो दूसरी बात है। फिर तो सूरज भी नहीं है। सब खेल आंखों का है। विचार और तर्क से कोई प्रकाश को नहीं जानता है।

    वास्तविक आंख की पूर्ति किसी अन्य साधन से नहीं हो सकती है। आंख चाहिए। आत्मिक को देखने के लिए भी आंख चाहिए, एक अंतर्दृष्टि चाहिए। वह है, तो सब है। अन्यथा, न प्रकाश है, न प्रभु है।

    जो दूसरे की देह के पार की सत्ता को देखना चाहे, उसे पहले अपनी पार्थिव सत्ता के अतीत झांकना होता है।

    जहां तक मैं अपने गहरे में देखता हूं, वहीं तक अन्य देहें भी पारदर्शी हो जाती हैं।

    जितनी दूर तक मैं अपनी जड़ता में चैतन्य का आविष्कार कर लेता हूं, उतनी ही दूर तक समस्त जड़ जगत मेरे लिए चैतन्य से भर जाता है। जो मैं हूं, जगत भी वही है। जिस दिन मैं समग्रता में अपने चैतन्य को जान लूं, उसी दिन जगत नहीं रह जाता है।

    स्व-अज्ञान संसार है; आत्मज्ञान मोक्ष है।

    एक बार देखो कि कौन तुम्हारे भीतर बैठा हुआ है? इस हड्डी-मांस की देह में कौन आच्छादित है? कौन है, आबद्ध तुम्हारे इस बाह्य रूप में?

    इस क्षुद्र में कौन विराट विराजमान है?

    कौन है, यह चैतन्य? क्या है, यह चैतन्य?

    यह पूछे बिना, यह जाने बिना जीवन सार्थक नहीं है। मैं सब कुछ जान लूं, स्वयं को छोड़कर, तो उस ज्ञान का कोई मूल्य नहीं है।
    जिस शक्ति से 'पर' जाना जाता है, वह शक्ति स्वयं को भी जानने में समर्थ है। जो अन्य को जान सकती है, वह 'स्वयं' को कैसे नहीं जानेगी!

    केवल दिशा-परिवर्तन की बात है।

    जो दिख रहा है, उससे उस पर चलना है, जो कि देख रहा है। दृश्य से दृष्टा पर ध्यान परिवर्तन आत्म-ज्ञान की कुंजी है।
    विचार प्रवाह में से उस पर जागो, जो उनका भी साक्षी है।

    तब एक क्रांति घटित हो जाती है। कोई अवरुद्ध झरना जैसे फूट पड़ा हो, ऐसे ही चैतन्य की धारा जीवन से समस्त जड़ता को बहा ले जाती है।

    अपना सांई प्यारा सांई सबसे न्यारा अपना सांई

    ॐ सांई राम।।।

    अपना साँई प्यारा साँई सबसे न्यारा अपना साँई - रमेश रमनानी

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    Re: आज का चिन्तन
    « Reply #133 on: February 09, 2008, 12:21:01 AM »
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  • जय सांई राम।।।

    जिस व्यक्ति पर परमपिता परमेश्वर बाबा सांई की कृपा दृष्टि हो जाती है उसके लिए तीनों लोक अपने ही घर के समान हो जाते हैं। जिस पर बाबा सांई का स्नेह रहता है उसके सब कार्य स्वयं सिद्ध जाते हैं और वो जंहा रहता है वहीं उसकी शिरडी बन जाती है।

    अपना सांई प्यारा सांई सबसे न्यारा अपना सांई

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    Re: आज का चिन्तन
    « Reply #134 on: March 17, 2008, 04:53:45 AM »
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  • ॐ साईं राम~~~

    कर्म भूमि पर फ़ल के लिए श्रम सबको करना पड़ता है,
    रब सिर्फ़ लकीरें देता है रंग हमको भरना पड़ता है~~~

    जय साईं राम~~~
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