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Author Topic: भावनाओं से आनंद की अनुभूति  (Read 1806 times)

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Offline JR

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भावनाओं से आनंद की अनुभूति

आत्मा अजर-अमर है, किंतु जन्म और मृत्यु आत्मा रूपी सिक्के के दो पहलू हैं अर्थात जहाँ जीवन है वहाँ मौत की उपस्थिति अनिवार्य है। तन के प्रति अगाध मोह के चलते इस सत्य (मृत्यु) को आम इंसान सहजता से नहीं स्वीकारता है और इस मोह की ही परिणति है स्वार्थी प्रवृत्ति। सुख-सुविधा की लालसा, लोभी प्रवृत्ति तथा भावी जीवन के प्रति असुरक्षा की भावना व्यक्ति को उत्तरोत्तर स्वार्थ की ओर प्रवृत्त करती है। व्यक्ति कितना भी उदार व परोपकारी क्यों न हो, लेकिन जब व्यापार-व्यवसाय, प्रतिस्पर्धा, प्रतिष्ठा अथवा आर्थिक लाभ आदि से संबंधित कोई भी कार्य उसके समक्ष उपस्थित होता है, तब वह पूर्णतया स्व के वशीभूत होकर कार्य करता है।

यदि नीतिगत सिद्धांत आचरण में सम्मिलित हों तो इस स्व में कोई बुराई भी नहीं है क्योंकि यह इंसान की नैसर्गिक विशेषता है। इन सबके पीछे व्यक्ति का मुख्य मकसद जीवन में सुख और आनंद की प्राप्ति है। सुख और आनंद वास्तव में तभी संभव है, जब इंसान का जीवन तनावरहितहो। जहाँ तनाव है वहाँ आनंद का होना नामुमकिन है। आज की जीवनचर्या कुछ इस तरह की हो गई है कि पग-पग पर तनाव पाँव पसारे खड़ा है। इस तनाव को न्यूनतम करने का एकमात्र उपाय है-

'अपने कार्यों को भी निःस्वार्थ भाव से करें'
कोई भी कार्य कितना भी निजी क्यों न हो, परिणामों के प्रति आशंकित न रहते हुए उसे पूरी तन्मयता से करें लेकिन मन में लोभ व स्वार्थ का भाव न रखते हुए यही सोचें कि यह तो मेरा उत्तरदायित्व है जो हो रहा है और जो कुछ होगा अच्छे के लिए ही होगा। इस कार्य के निर्वहन से सबका मंगल हो। परिणाम तो जो आना है वही आएगा मगर इस तरह की भावना अंतर्मन को अथाह शांति प्रदान कर हमेशा आनंद का अनुभव कराने वाली होती है। इस भावना को मन में स्थापित करने में यदि असुविधा महसूस करें तो इस सत्य पर एक बार गौर अवश्य करें कि जब यह शरीर ही अपना नहीं है तो संसार की कोई भी वस्तु अपनी कैसे हो सकती है। जब जीवन ही क्षणभंगुर है तो क्या अपना, क्या पराया? इसलिए प्रतिदिन ईश्वर से यह प्रार्थना करें कि-

'हे ईश्वर! दिनभर में जो भी कार्य करूँ बिलकुल निःस्वार्थ भाव से करूँ। कम से कम मेरे कार्य से किसी अन्य को तकलीफ न पहुँचे।'

इस प्रार्थना पर यदि धीरे-धीरे भी अमल शुरू कर दिया जाए तो इस जीवन को आनंद का पर्याय बनते देर नहीं लगेगी तथा इस भव के साथ परलोक भी सुखी हो जाएगा। ऐसी भावनाएँ व कार्य ही जिंदगी की वास्तविक कमाई है।

 
सबका मालिक एक - Sabka Malik Ek

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Offline astrobhadauria

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जीव आत्मा और प्राण,ये तीन शब्द हर पुराण और वेद मे मिलते है,इनके भेद को जानने के लिये कितने ही इस संसार मे आये और चले गये,भेद न तो आज तक किसी को मिला है,और न ही मिलेगा,कोई आत्मा को पर्मात्मा मानता है,अगर कोई कहे कि आत्मा को कष्ट भोगना पडता है तो क्या पर्मात्मा कष्ट भोगता है,यह तो हरगिज नही हो सकता है कि जगत पिता परमात्मा ही कष्ट भोगे,तो आत्मा परमात्मा के अन्दर है या आत्मा मे परमात्मा है,मतलब तो साफ़ नही होता है,तो जिसको कष्ट मिलता है,वह कौन है ? शायद जीव हो सकता है,मगर जीव कभी जीव को कष्ट दे ही नही सकता है,जीव अगर जीव को कष्ट देगा,तो उसे भी तो कष्ट होगा,कोई नही चाहता है कि खुद को ही कष्ट दिया जावे,तो कष्ट प्राण को मिलता होगा ? मगर प्राण तो शरीर को जिन्दा रखता है,प्राण तो हवा है,आती है जाती है,हवा तो हर जगह है,तो इसका मतलब हुआ कि हर जगह प्राण है,और हर जगह प्राण है तो फिर मरता कौन है ? गीता मे भी कहा कि जिस प्रकार से पुराने कपडे को बदला जाता है उसी प्रकार से आत्मा शरीर को बदल देती है,और नया शरीर धारण कर लेती है,मतलब शरीर मे आत्मा का ही राज है,आत्मा का ही राज है तो,जीव क्या है,जीव ही अत्मा है तो प्राण क्या है,आत्मा और जीव और प्राण मिलकर एक ही है तो मरता कौन है ? कोई कह रहा था कि प्राण का अर्थ है मनुष्य की वायु क्रिया,और शरीर का संचालन,प्राण शरीर को गति शील रखता है,तो जो शरीर को सौ साल तक गति शील रख सकता है,वह हजार साल तक भी गति शील रख सकता है, मतलब शरीर को प्राण गतिशील नही रखता है,जीव को स्वर्ग और नर्क मे फल भोगना पडता है,और वह जैसा करता है उसको वैसा हीफल मिलता है,तो जीव क्या है,किसने भेजा,इसे और क्या जीव अपने आप ही सब काम कर लेता है,अगर कर लेता तो पैदा होने के बाद माता की जरूरत नही पडती,खुद ही भोजन कर लेता,और खुद ही सब काम कर लेता,इसका मतलब जीव भी अकेला नही है,कहीं न कही किसी न किसी से जुडा हुआ है,और मेरे अपने ख्याल से मनुष्य भी एक पेड की तरह से जो चलता फिरता है,उसका जीवन   किसी न किसी प्रकार दूसरो पर निरभर है,वह वही करता है जो दूसरे लोग चाहते है,वे दूसरे लोग ही आसमानी ग्रह है,जो दूर से बैठ कर अपने रिमोट से मन चाहा चैनल देखने के लिये बटन दबाते रहते है,फिर आप अपनी आत्मा मे आनद की विभूति किस प्रकार से प्राप्त कर सकते है,उसको भी तो देने बाला कोई दूसरा ही है,कोई न काहू सुख दुख कर दाता,निज क्रत करम भोगु फल भ्राता ।

 


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