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Author Topic: जीवन के लिये श्री सांई के उपदेश  (Read 104084 times)

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Offline Ramesh Ramnani

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जय सांई राम।।।

मां-बेटे की भक्ति - विशेष लगन

बायजा बाई और उसके बेटे तात्या कोते पाटिल का उल्लेख पहले भी कई बार आ चुका है। दोनों मां-बेटे के मन में साईं बाबा के प्रथम दर्शन करने के साथ ही उनके प्रति अगाध श्रद्धा, अटूट प्रेम और अनन्य भक्ति हो गई थी। यह कहना अनुचित नहीं होगा कि शिरडी में साईं बाबा के जितने भक्त थे उन सबमें बायजा बाई और उसके बेटे तात्य कोते पाटिल का सर्व प्रथम स्थान था। परिणाम यह हुआ कि साईं बाबा की उन दोनों पर सबसे अधिक कृपा थी। अन्तर्यामी साईं बाबा तो स्वयं भगवान थे और भगवान कभी पक्षपात नहीं करते। उनकी कृपा तो सब पर समान रूप से बरसती है। वर्षा का जल तो समान रूप से बरसता है पर जिसका पात्र जितना बड़ा होता है उसे उतना ही अधिक जल मिलता है। इसमें वर्षा का कोई पक्षपात नहीं। इसी तरह जिसकी जितनी अधिक भक्ति होती है वह प्रभु का उतना ही अधिक कृपा-पात्र हो जाता है।

तात्या कोते हमेशा साईं बाबा के साथ रहता था और बायजा मां प्रतिदिन मस्जिद में जा कर साईं को भोजन कराती थी।

बायजा के परिवार की स्थिति

बायजा बाई और तात्या कोते पाटिल की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी। उनके जीविकोपार्जन का कोई विशेष साधन नहीं था। तात्या कोते वन से लकड़ी बटोर कर ले आता और गट्ठा बना कर बेच देता था। बस यही उनकी थोड़ी सी आमदनी थी जिससे वे कठिनाई से जीवन-निर्वाह कर रहे थे। अब साईं बाबा की कृपा से उनकी दशा सुधरती जा रही थी।

उनके जीवन में एक आश्चर्य हो रहा था। जब से साईं बाबा शिरडी आये थे तब से तात्या कोते की लकड़ी का गट्ठा रास्ते में ही बिक जाता था, घर तक लाने की जरूरत ही नहीं पड़ती थे। कोई न कोई ग्राहक अवश्य ही मिल जाता और पूछता, "ओ लकड़ी वाले, लकड़ी कितने की है?" तात्या कहता, "भाई जो मर्जी हो दे दे, साईं तेरा भला करे।" वह ग्राहक एक रुपया दे कर खरीद लेता जब कि लकड़ी चार आने की ही होती थी।

एक दिन तात्या लकड़ी लाने के लिये जंगल में गया। वह लकड़ी इकट्ठी कर ही रहा था कि आकाश में काले काले बादल छा गये और गर्जना होने लगी। तात्या कोते चिन्तित हो गया कि अब क्या होगा! उसने थोड़ी ही लकड़ी इकट्ठी की थी जिसे गट्ठे में बांधा और गाँव की ओर चला। गाँव की सीमा पर पहुचते ही तात्या को आवाज सुनाई दी, "ए लकड़ी वाले।" वह रुक गया। खरीददार की आवाज थी। वह बोला, "लकड़ी चाहिये।" तात्या ने गट्ठर उसकी ओर बढ़ा दिया। उस ग्राहक ने बिना कुछ कहे उसके हाथ पर एक रुपया रख दिया। तात्य के मुँह से आश्चर्य के साथ निकाल गया, "एक रुपया!"

"कम है तो और लो भाई" कह कर ग्राहक ने एक रुपया और उसकी हथेली पर रख दिया। एकदम कम लकड़ी के लिये दो रुपये देने वाला उदार दाता कौन है - यह देखने के लिये तात्या ने आँखें ऊपर कीं तो वहाँ कोई नहीं था - न लकड़ी न ग्राहक। दो रुपये ले कर वह घर आ गया और मां बायजा बाई के हाथ में रुपये दे कर उसे जो कुछ हुआ था वह सब बता दिया।

मां-बेटे की आँखों से आनन्द के आँसू बहने लगे। वह सब कुछ समझ गई और बोली, "बेटा यह सब साईं बाबा की करामात मालूम होती है। साईं तो भगवान के अवतार और अन्तर्यामी हैं।" तात्या बोला, "मुझे भी ऐसा ही लगता है मां। इस बारे में मैं साईं बाबा से जरूर पूछूँगा।" तात्या कोते पाटिल उत्सुकता लिये साईं बाबा के निवास स्थान द्वारका माई मस्जिद की ओर चला। वहाँ पहुँच कर उसने साईं बाबा को दण्डवत प्रणाम किया और इसके पहले कि वह कुछ कहता, अन्तर्यामी सर्वज्ञ साईं बाबा बोल उठे, "तात्या, तुझे तो तेरी मेहनत की कमाई मिलती है। फिर शंका क्यों? तेरे भाग्य में जो कुछ है वही तुझे मिलता है। तू तो मेरा भाई है। बायजा मां मेरे मां है।" कह कर साईं बाबा ने तात्या को अपने हृदय से लगा लिया।

अपना सांई प्यारा सांई सबसे न्यारा अपना सांई

ॐ सांई राम।।।
अपना साँई प्यारा साँई सबसे न्यारा अपना साँई - रमेश रमनानी

Offline Ramesh Ramnani

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जय सांई राम।।।

बायजा बाई का भाग्य

बायजा बाई हमेशा साईं बाबा का ध्यान रखती थी। वह हर दिन मस्जिद में जाती और बाबा को खिलाती थी। समय के साथ वह शिथिल होती जा रही थी और बीमार भी रहती थी। एक दिन बायजा मां साईं को भोजन करा रही थी। साईं बाबा उससे बोले, "मां, मेरा एक कहना मान लो। कल से तुम खाना ले कर मत आया करो। कमजोर हो गई हो।"

"तो बेटा तुम्हें खिलायेगा कौन?"

"मैं खुद ही तुम्हारे घर पहुँच जाया करूंगा।"

कहने को तो बाबा ने कह दिया लेकिन वे तो थे अनतर्यामी। उन्हें मालूम था कि बायजा मां का अन्त एकदम निकट ही है। दूसरे दिन ही एकदम सबेरे तात्या मस्जिद में रोता हुआ आया लेकिन यह देख कर उसका दिल धक्- सा रह गया कि बाबा समाधिस्थ थे। उनका चेहरे लाल-सुर्ख किन्तु चित्त शान्त था। बाबा ने धीरे धीरे आँखें खोलीं। उनके नेत्र लाल और चेहरा भयंकर था।

"बाबा तुम्हें क्या हो गया है?" रोना भूल कर तात्या ने पूछा। साईं बाबा का चेहरा शान्त हो गया। वे बोले, "तात्या, तुम मेरे भाई हो और हमेशा रहोगे। मैंने बायजा मां को वचन दिया है।"

परन्तु बाबा, मां तो तुम्हें याद करते करते मर गई।" कहते कहते तात्या सिसकने लगा।

"मुझे सब मालूम है भाई। धीरज रखो।" कह कर बाबा उठे और तात्या के साथ उसके घर चले। घर पहुँच कर "मां" कहते हुये बायजा मां के चरणों में श्रद्धा अर्पित की और उसके निकट बैठ कर समाधिस्थ हो गये। कुछ क्षणों में एकाएक बायजा बाई के शव में कम्पन हुआ। शरीर चैतन्य हुआ और जीवित हो कर उसने आँखें खोल दीं और साईं बाबा तथा तात्या को आँखें भर कर देखती हुई बोली, "बेटा साईं, बेटा तात्या, मेरे पास आवो।" दोनों उसके निकट आ गये वह कहने लगी, "बेटा साईं, मेरा अन्त समय आ गया है। तात्या का ध्यान रखना।"

"तू फिकर मत कर मां, मेरे जीते जी तात्या को कुछ नहीं होगा" कह कर साईं बाबा ने अपना दाहिना हाथ हवा में उठाया और देखते देखते बायजा बाई फिर मृत्यु को प्राप्त हो गई।

अपना सांई प्यारा सांई सबसे न्यारा अपना सांई

ॐ सांई राम।।। 
अपना साँई प्यारा साँई सबसे न्यारा अपना साँई - रमेश रमनानी

Offline Dnarang

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जो, प्रेमपूर्वक मेरा नामस्मरण करेगा, मैं उसकी समस्त इच्छायें पूर्ण कर दूँगा । उसकी भक्ति में उत्तरोत्तर वृदिृ होगी । जो मेरे चरित्र और कृत्यों का श्रदृापूर्वक गायन करेगा, उसकी मैं हर प्रकार से सदैव सहायता करुँगा । जो भक्तगण हृदय और प्राणों से मुझे चाहते है, उन्हें मेरी कथाऐं श्रवण कर स्वभावतः प्रसन्नता होगी । विश्वास रखो कि जो कोई मेरी लीलाओं का कीर्तन करेगा, उसे परमानन्द और चिरसन्तोष की उपलबि्ध हो जायेगी । यह मेरा वैशिष्टय है कि जो कोई अनन्य भाव से मेरी शरण आता है, जो श्रदृापूर्वक मेरा पूजन, निरन्तर स्मरण और मेरा ही ध्यान किया करता है, उसको मैं मुक्ति प्रदान कर देता हूँ ।

जो नित्यप्रति मेरा नामस्मरण और पूजन कर मेरी कथाओं और लीलाओं का प्रेमपूर्वक मनन करते है, ऐसे भक्तों में सांसारिक वासनाएँ और अज्ञानरुपी प्रवृत्तियाँ कैसे ठहर सकती है । मैं उन्हें मृत्यु के मुख से बचा लेता हूँ ।

मेरी कथाऐं श्रवण करने से मूक्ति हो जायेगी । अतः मेरी कथाओं श्रदृापूर्वक सुनो, मनन करो । सुख और सन्तोष-प्राप्ति का सरल मार्ग ही यही है । इससे श्रोताओं के चित्त को शांति प्राप्त होगी और जब ध्यान प्रगाढ़ और विश्वास दृढ़ हो जायगा, तब अखोड चैतन्यघन से अभिन्नता प्राप्त हो जाएगी । केवल साई साई के उच्चारणमात्र से ही उनके समस्त पाप नष्ट हो जाएगें ।
Mere Sai ki Deepali

श्री साईनाथ । आपके ऋण हम किस प्रकार चुका सकेंगें । आपके श्री चरणों में हमारा बार-बार प्रणाम है । हम दीनों पर आप सदैव कृपा करते रहियेगा, क्योंकि हमारे मन में सोते-जागते हर समय न जाने क्या-क्या संकल्प-विकल्प उठा करते है । आपके भजन में ही हमारा मन मग्न हो जाये, ऐसा आर्शीवाद दीजिये ।

Baba mujh Dasi ko apne Charankamalon ki Sheetal Chaaya me Sthan de do.

Offline Dnarang

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True Service is Service done with a Pure Loving Heart and can be to
anything anyone be it Man Animal or even plant. It is a selfless
service which is done without expecting any reward in turn. There
should not be any ego while doing the service. If there is any
element of ego while doing the service, even the person receiving the seva will not be comfortable. The opportunities for doing the service, the financial position we are in, the job we have are all given by Sai.
 
By doing ego less service we are trying to give it back to Sai. We must try to see Sai in all the living beings and while doing service, think that we are doing service to none other than Sai.

Love All Serve All. Any Action performed with faith in god, to the
benefit of others, without expecting any materialistic reward to
thyself, but only expecting Gods grace, can be called as true Service.
In this service, if thought, word and deed harmonize the service becomes an offering.

To help someone who is in trouble, someone who cannot afford for his wellbeing, to share whatever we have with God by doing so. We should not be unkind to all human beings or should not hurt anybody whether mentally or physically.

True Service Means
S : Selflessness
E : Experience of Divinity
R : Rati i.e Love
V : Vision of Lord in those being served
I : Integrity of Thought, Word & Action
C : Compassion
E : Excitement
Mere Sai ki Deepali

श्री साईनाथ । आपके ऋण हम किस प्रकार चुका सकेंगें । आपके श्री चरणों में हमारा बार-बार प्रणाम है । हम दीनों पर आप सदैव कृपा करते रहियेगा, क्योंकि हमारे मन में सोते-जागते हर समय न जाने क्या-क्या संकल्प-विकल्प उठा करते है । आपके भजन में ही हमारा मन मग्न हो जाये, ऐसा आर्शीवाद दीजिये ।

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Offline Ramesh Ramnani

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जय सांई राम।।।

धूनी और भभूत या ऊदी

साईं बाबा अपने निवास स्थान द्वारकामाई मस्जिद में हमेशा धूनी जलाया करते थे। वह धूनी दिन-रात जलती रहती थी। साधु-सन्तों में से कुछ धूनी जलाते हैं किन्तु साईं बाबा के द्वारा जलाई गई धूनी अद्भुत और दिव्य थी। शिरडी में वही धूनी निरन्तर और अनवरत रूप से जलायी जा रही है। धूनी जलाना, अग्नि में हवन करना अग्निहोत्री ब्राह्मण का कर्तव्य और कर्म है। साईं बाबा के द्वारा प्रज्वलित धूनी से यह स्पष्ट और प्रमाणित है कि वे अवश्य ही अग्निहोत्री ब्राह्मण थे।

साईं बाबा दक्षिणा लेते थे। दक्षिणा से जो मिलता था उसका बहुत बड़ा हिस्सा दान में दे देते थे। दक्षिणा के पैसे से ही वे लकड़ी खरीदते थे जिसको धूनी में जलाते थे। लकड़ी जल जाने के बाद धूनी में भभूत या ऊदी रह जाती थी। धूनी की वह भभूत बहुत लाभदायक होती थी। वह भभूत लोगों के शारीरिक कष्ट और मानसिक बीमारियों को दूर कर देती थी। साईं बाबा के दर्शन करने के लिये कई भक्त आते थे। जब कोई भक्त साईं बाबा से विदा ले कर जाने लगता था तब बाबा उसे प्रसाद के रूप में भभूत देते थे। किसी भक्त के माथे पर वे भभूत लगा कर उसके सिर पर अपने वरद हस्त रख कर आशीर्वाद देते थे। साईं बाबा कभी प्रसन्न मन से अत्यन्त मधुर स्वर में गाते थे। उनके गीत की प्रथम पंक्ति होती थी - "रमते राम आओ जी आओ जी, उदिया की गोनिया लाओ जी।" भभूत से कई भयानक बीमारियाँ ठीक हो जाती थीं। आज भी उनकी धूनी की भभूत बीमारों को स्वस्थ कर देती है।

अपना सांई प्यारा सांई सबसे न्यारा अपना सांई

ॐ सांई राम।।।
अपना साँई प्यारा साँई सबसे न्यारा अपना साँई - रमेश रमनानी

Offline Ramesh Ramnani

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जय सांई राम।।।

मेरे बाबा सांई आज अवकाश पर है इसलिये मन्दिर की घंटी न बजाइये,
जो बैठा है बूढा अकेला पार्क में,  हो सके तो साथ समय उसके बिताइये ,
मेरे बाबा सांई है पीड़ित परिवार के साथ, जो अस्पताल में परेशान है,
उस पीड़ित परिवार की मदद कर आइये,
जो मर गया हो किसी के परिवार में कोई,
उस परिवार को सांत्वना दे आइये,
एक चौराहे पर खड़ा युवक काम की तलाश में,
उसे रोजगार के अवसर दिलाइये,
मेरे बाबा सांई आज अवकाश पर है इसलिये आज मन्दिर की घंटी न बजाइये ,
मेरे बाबा सांई है चाय कि दुकान पर उस अनाथ बच्चे के साथ,
जो कप प्लेट धो रहा है,  पाल सकते हैं,  पढ़ा सकते हैं,  तो पढाइये,
एक बूढी औरत है जो दर - दर भटक रही है,
एक अच्छा सा लिबास दिलाइये,
हो सके तो नारी आश्रम छोड़ आईये,
मेरे बाबा सांई आज अवकाश पर है,
इसलिये आज मन्दिर की घंटी न बजाइये।
   
अपना सांई प्यारा सांई सबसे न्यारा अपना सांई

ॐ सांई राम।।।
अपना साँई प्यारा साँई सबसे न्यारा अपना साँई - रमेश रमनानी

Offline Ramesh Ramnani

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जय सांई राम।।।

सन्त भगवान के अवतार होते हैं। उन्हें संसार की किसी भी वस्तु में तिल भर भी मोह नहीं रहता। यहाँ तक कि वे अपने शरीर से भी अलग रहते हैं। उनके शरीर तो "निज इच्छा निर्मित तनु" होते हैं। वे स्वेच्छा से शरीर धारण करते और बिना कष्ट के उसे त्याग देते हैं। साईं बाबा ने भी यही किया था।

महा समाधि लेने के दो वर्ष पूर्व सन् 1916 ई. में दशहरे (सीमोल्लंघन) के दिन साईं बाबा अपने भक्तों से धिरे हुये मस्जिद में बैठे थे। शाम का समय था। अचानक साईं बाबा को सीमा-रहित क्रोध आ गया। उन्होंने अपने सिर का कपड़ा, कफनी, लंगोट आदि को उतार कर अपने शरीर से अलग कर दिया और पूरी तरह से निर्वस्त्र हो कर सबके सामने धूनी के साने क्रोध में विकराल बने खड़े रहे। यह देख कर वहाँ उपस्थित सभी लोग डर से थर थर काँपने लगे। साईं बाबा ने अपने शरीर से निकाले हुये अपने सभी कपड़ों को जलती हुई धूनी में डाल दिया। जब कपड़े जलने लगे तब धूनी की आग की लपटें बहुत तेज और प्रकाशपूर्ण हो गई। उनकी आँखें लाल हो गईं और वे क्रोध में चिल्लाये, "तुम लोग गौर से देखो कि मैं हिन्दू हूँ कि मुसलमान।"

वहाँ उपस्थित भक्त लोग काँप रहे थे। बाबा के समीप जाने का साहस किसी में नहीं था। कुछ समय बाद साईं बाबा का कुष्ठ रोगी भक्त भागो जी शिन्दे हिम्मत करे बाबा के नजदीक गया और उनकी कमर में एक लंगोट बांधने में सफल हो गया और बोला, "बाबा यह सब क्या है? आज दशहरा का त्यौहार है।" अपने सटके (लकड़ी) से जमीन को पीटते हुये बाबा ने कहा, "यह मेरा सीमोल्लंघन का दिन है।" इस तरह साईं बाबा ने दो साल पहले अपने 'सीमोल्लंघन' अथवा दशहरे के दिन अपने महासमाधि की पूर्वसूचना दे दी थी पर किसी ने नहीं समझा और ध्यान नहीं दिया।

साईं बाबा का क्रोध शान्त हो ही नहीं रहा था। कम से कम ग्यारह बजे रात तक बाबा शान्त नहीं हुये और लोगों को सन्देह होने लगा कि आज बाबा की चावड़ी यात्रा का जुलूस निकलेगा या नहीं। एक घण्टे के बाद साईं बाबा की स्थिति शान्त और सामान्य हो गई और वे चावड़ी जाने के लिये कपड़े पहन कर तैयार हो गये।

अपना सांई प्यारा सांई सबसे न्यारा अपना सांई

ॐ सांई राम।।।
अपना साँई प्यारा साँई सबसे न्यारा अपना साँई - रमेश रमनानी

Offline Ramesh Ramnani

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एक दिन शाम के समय जब साईं बाबा तात्या के साथ बैठे थे तब वहाँ लक्ष्मी बाई आई और बाबा को प्रणाम किया। साईं बाबा ने उससे कहा, "लक्ष्मी, मैं बहुत भूखा हूँ।" लक्ष्मी बोली, "बाबा थोड़ा ठहरिये, मैं अभी आपके लिये रोटी ले कर वापस आती हूँ।" वह कुछ ही देर में साईं बाबा के लिये रोटी और सब्जी बना कर लाई और साईं बाबा के सामने रख दिया। बाबा ने रोटी और सब्जी को उठाया और एक कुत्ते को दे दिया। तब लक्ष्मी ने पूछा, "यह क्या है बाबा? मैं जल्दी से दौड़ कर रसोई घर में गई और आपके लिये रोटी-सब्जी बना कर लाई। आपने एक कौर भी नहीं खाया और सब एक कुत्ते को दे दिया।" साईं बाबा ने उत्तर दिया, "तुम व्यर्थ में क्यों दुःखी हो रही हो। कुत्ते की क्षुधा शान्त होना ही मेरी ही भूख की तृप्ति होना है। कुत्ता भले ही दूसरा प्राणी दिखता हो पर उसमें भी तो आत्मा है। भूख तो सबको समान रूप में लगती है। जिसके पास वाणी है वह बता सकता है पर जिसके पस वाक् शक्ति नहीं है वह चुप रह जाता है। निश्चित रूप से याद रखौ कि जो भूखे को भोजन देता है वह यथार्थ में उस भोजन से मेरी ही सेवा करता है। इसे स्वयं सिद्ध जानो। स्वयं न खा कर भूखे कुत्ते को रोटी-सब्जी दे देना तो तुच्छ बात है। इसके लिये तुम दुःखी क्यों होती हो?"

अपना सांई प्यारा सांई सबसे न्यारा अपना सांई

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अपना साँई प्यारा साँई सबसे न्यारा अपना साँई - रमेश रमनानी

Offline tana

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ॐ सांई राम~~~

बाबा कहना था कि चातुर्य त्याग कर सदैव साई साई यही स्मरण करो । इस प्रकार आचरण करने से समस्त बन्धन छूट जायेंगे और तुम्हें मुक्ति प्राप्त हो जायेगी ।

जय सांई राम~~~
"लोका समस्ता सुखिनो भवन्तुः
ॐ शन्तिः शन्तिः शन्तिः"

" Loka Samasta Sukino Bhavantu
Aum ShantiH ShantiH ShantiH"~~~

May all the worlds be happy. May all the beings be happy.
May none suffer from grief or sorrow. May peace be to all~~~

Offline tana

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ॐ सांई राम~~~

बाब शिरड़ी में 60 वर्षों तक रहे और इस दीर्घ काल में उन्होंने आटा पीसने का कार्य प्रायः प्रतिदिन ही किया । पीसने का अभिप्राय गेहूँ से नहीं, वरन् अपने भक्तों के पापो, दुर्भागयों, मानसिक तथा शाशीरिक तापों से था ।उनकी चक्की के दो पाटों में ऊपर का पाट भक्ति तथा नीचे का कर्म था । चक्की का मुठिया जिससे कि वे पीसते थे, वह था ज्ञान । बाबा का दृढ़ विश्वास था कि जब तक मनुष्य के हृदय से प्रवृत्तियाँ, आसक्ति, घृणा तथा अहंकार नष्ट नहीं हो जाते, जिनका नष्ट होना अत्यन्त दुष्कर है, तब तक ज्ञान तथा आत्मानुभूति संभव नहीं हैं ।

जय सांई राम~~~
"लोका समस्ता सुखिनो भवन्तुः
ॐ शन्तिः शन्तिः शन्तिः"

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Offline tana

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ॐ सांई राम~~~


बाबा के अमूल्य वचन सर्वसाधारण भक्तों के लिये है और यदि उन्हें ध्यान में रखकर आचरण में लाया गया तो सदैव ही कल्याण होगा । जब तक किसी से कोई पूर्व नाता या सम्बन्ध न हो, तब तक कोई किसी के समीप नहीं जाता । यदि कोई मनुष्य या प्राणी तुम्हारे समीप आये तो उसे असभ्यता से न ठुकराओ । उसका स्वागत कर आदरपूर्वक बर्ताव करो । यदि तृषित को जल, क्षुधा-पीड़ित को भोजन, नंगे को वस्त्र और आगन्तुक को अपना दालान विश्राम करने को दोगे तो भगवान श्री हरि तुमसे निस्सन्देह प्रसन्न होंगे । यदि कोई तुमसे द्रव्य-याचना करे और तुम्हारी इच्छा देने की न हो तो न दो, परन्तु उसके साथ कुत्ते के समान ही व्यवहार न करो । तुम्हारी कोई कितनी ही निंदा क्यों न करे, फिर भी कटु उत्तर देकर तुम उस पर क्रोध न करो । यदि इस प्रकार ऐसे प्रसंगों से सदैव बचते रहे तो यह निश्चित ही है कि तुम सुखी रहोगे । संसार चाहे उलट-पलट हो जाये, परन्तु तुम्हें स्थिर रहना चाहिये । सदा अपने स्थान पर दृढ़ रहकर गतिमान दरृरश्य को शान्तिपूर्वक देखो । एक को दूसरे से अलग रखने वाली भेद (द्घैत) की दीवार नष्ट कर दो, जिससे अपना मिलन-पथ सुगम हो जाये । द्घैत भाव (अर्थात मैं और तू) ही भेद-वृति है, जो शिष्य को अपने गुरु से पृथक कर देती है । इसलिये जब तक इसका नाश न हो जाये, तब तक अभिन्नता प्राप्त करना सम्भव नही हैं । अल्लाह मालिक अर्थात ईश्वर ही सर्वशक्तिमान है और उसके सिवा अन्य कोई संरक्षणकर्ता नहीं है । उनकी कार्यप्रणाली अलौकिक, अनमोन और कल्पना से परे है । उनकी इच्छा से ही सब कार्य होते है । वे ही मार्ग-प्रददर्शन कर सभी इच्छाएँ पूर्ण करते है । ऋणानुबन्ध के कारण ही हमारा संगम होता है, इसलनये हमें परस्पर प्रेम कर एक दूसरे की सेवा कर सदैव सन्तुष्ट रहना चाहिये । जिसने अपने जीवन का ध्येय (ईश्वर दर्शन) पा लिया है, वही धन्य औ सुखी है । दूसरे तो केवल कहने को ही जब तक प्राण है, तब तक जीवित हैं ।

जय सांई राम~~~
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ॐ शन्तिः शन्तिः शन्तिः"

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उपवास और श्रीमती गोखले~~~

बाबा ने स्वयं कभी उपवास नहीं किया, न ही उन्होंने दूसरों को करने दिया । उपवास करने वालों का मन कभी शांत नहीं रहता, तब उन्हें परमार्थ की प्राप्ति कैसे संभव है । प्रथम आत्मा की तृप्ति होना आवश्यक है भूखे रहकर ईश्वर की प्राप्ति नहीं हो सकती । यदि पेट में कुछ अन्न की शीतलता न हो तो हम कौनसी आँख से ईश्वर को देखेंगे, किस जिहा से उनकी महानता का वर्णन करेंगे और किन कानों से उनका श्रवण करेंगे । सारांश यह कि जब सम्त इंद्रियों को यथेष्ठ भोजन व शांति मिलती है तथा जब वे बलिष्ठ रहती है, तब ही हम भक्ति और ईश्वर-प्राप्ति की अन्य साधनाएँ कर सकते है, इसलिये न तो हमें उपवास करना चाहिये और न ही अधिक भोजन । भोजन में संयम रखना शरीर और मन दोनों के लिये उत्तम है ।

श्री मती काशीबाई काननिटकर (श्रीसाईबाबा की एक भक्त) से परिचयपत्र लेकर श्रीमती गोखले, दादा केलकर के समीप शिरडी को आई । वे यह दृढ़ निश्चय कर के आई थीं कि बाबा के श्री चरणों में बैठकर तीन दिन उपवास करुँगी । उनके शिरडी पहुँचने के एक दिन पूर्व ही बाबा ने दादा केलकर से कहा कि मैं शिमगा (होली) के दिनों में अपने बच्चों को भूखा नहीं देख सकता है । यदि उन्हें भूखे रहना पड़ा तो मेरे यहाँ वर्तमान होने का लाभ ही क्या है । दूसरे दिन जब वह महिला दादा केलकर के साथ मसजिद में जाकर बाबा के चरण-कमलों के समीप बैठी तो तुरंत बाबा ने कहा, उपवास की आवश्यकता ही क्या है । दादा भट के घर जाकर पूरनपोली तैयार करो । अपने बच्चों को खिलाओ और स्वयं खाओ । वे होली के दिन थे और इस समय श्रीमती केलकर मासिक धर्म से थी। दादा भट के घर में रसोई बनाने कि लिये कोई न था और इसलिये बाबा की युक्ति बड़ी सामयिक थी । श्री मती गोखले ने दादा भट के घर जाकर भोजन तैयार किया और दूसरों को भोजन कराकर स्वयं भी खाया । कितनी सुंदर कथा है और कितनी सुन्दर उसकी शिक्षा ।

जय सांई राम~~~
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ॐ शन्तिः शन्तिः शन्तिः"

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Offline tana

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बाबा के विचार~~

एक भक्त मुक्ताराम कहने लगा कि चलो, अच्छा ही हुआ, जो एक जीव बेचारा बच गया । श्री. हेमाडपंत ने उसकी अवहेलना कर कहा कि साँप को मारना ही उचित है । इस कारण इस विषय पर वादविवाद होने लगा । एक का मत था कि साँप तथा उसके सदृश जन्तुओं को मार डालना ही उचित है, किन्तु दूसरे का इसके विपरीत मत था । रात्रि अधिक हो जाने के कारण किसी निष्कर्ष पर पहुँचे बिना ही ही उन्हें विवाद स्थगित करना पड़ा । दूसरे दिन यह प्रश्न बाबा के समक्ष लाया गया । तब बाबा निर्णयात्मक वचन बोले कि सब जीवों में और सम्स्त प्राणियों में ईश्वर का निवास है, चाहे वह साँप हो या बिच्छू । वे ही इस विश्व के नियंत्रणकर्ता है और सब प्राणी साँप, बिच्छू इत्यादि उनकी आज्ञा का ही पालन किया करते है । उनकी इच्छा के बिना कोई भी दूसरों को नहीं पहुँचा सकता । समस्त विश्व उनके अधीन है तथा स्वतंत्र कोई भी नहीं है । इसलिये हमें सब प्राणियों से दया और स्नेह करना चाहिए । संघर्ष एवं बैमनस्य या संहार करना छोड़कर शान्त चित्त से जरीवन व्यतीत करना चाहिए । ईश्वर सबका ही रक्षक है ।
जय सांई राम~~~
"लोका समस्ता सुखिनो भवन्तुः
ॐ शन्तिः शन्तिः शन्तिः"

" Loka Samasta Sukino Bhavantu
Aum ShantiH ShantiH ShantiH"~~~

May all the worlds be happy. May all the beings be happy.
May none suffer from grief or sorrow. May peace be to all~~~

Offline Ramesh Ramnani

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जय सांई राम।।।

जैसा बोओगे बैसा ही काटोगे

मैं कभी मूक नहीं होता,
उपेक्षा नहीं करता किसी की,
तुम्हारी वाणी में बोलता रहता हूँ,
जब कोई मुझे पुकारता है प्रेम से,
मैं दौड़ा आता हूँ,
जब भी कभी कोई द्रोपदी या गजराज पुकारेंगे,
मैं आऊँगा।

जो तुम्हें मिलता है इस संसार में,
वह फल है तुम्हारे कर्मों का,
पिछले जन्मों में किए थे तुमने जो,
जैसा बोया है बैसा ही काट पाओगे,
यह नियम है,
जिसे तुम क्या,
मैं भी नहीं तोड़ सकता.

झांको अपने अन्दर प्रेम और विश्वास से,
मैं नजर आऊँगा तुम्हें,
मैं तुम में हूँ,  तुम मुझसे हो,
जब अलग महसूस करते हो ख़ुद को,
तभी आस्था डगमगाती है तुम्हारी,
आ जाओ मेरी शरण में जैसे अर्जुन आया था,
मैं तुम्हें भय और दुःख से मुक्त कर दूँगा.

अपना सांई प्यारा सांई सबसे न्यारा अपना सांई

ॐ सांई राम।।।
अपना साँई प्यारा साँई सबसे न्यारा अपना साँई - रमेश रमनानी

Offline rakeshwar21

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एक दिन दोपहर की आरती के पश्चात भक्तगण अपने घरों को लौट रहे थे, तब बाबा ने निम्नलिखित अति सुन्दर उपदेश दिया –

तुम चाहे कही भी रहो, जो इच्छा हो, सो करो, परंतु यह सदैव स्मरण रखो कि जो कुछ तुम करते हो, वह सब मुझे ज्ञात है । मैं ही समस्त प्राणियों का प्रभु और घट-घट में व्याप्त हूँ । मेरे ही उदर में समस्त जड़ व चेतन प्राणी समाये हुए है । मैं ही समस्त ब्राहांड़ का नियंत्रणकर्ता व संचालक हूँ । मैं ही उत्पत्ति, व संहारकर्ता हूँ । मेरी भक्ति करने वालों को कोई हानि नहीं पहुँचा सकता । मेरे ध्यान की उपेक्षा करने वाला, माया के पाश में फँस जाता है । समस्त जन्तु, चींटियाँ तथा दृश्यमान, परिवर्तनमान और स्थायी विश्व मेरे ही स्वरुप है ।

जय सांई राम़।।।

"जो दूसरों को पीड़ा पहुंचाता है,  वह मेरे ह्रदय को दुःख देता है तथा मुझे कष्ट पहुंचाता है। इसके विपरीत जो स्वंय कष्ट सहन करता है, वह मुझे अधिक प्रिय है"
 
अपना सांई प्यारा सांई सबसे न्यारा अपना सांई

ॐ सांई राम।।। 

baba hamari dasha kab sudharegi??.baba mujhe aapne sab kuchh diya hai mujhe man ki shanti do baba

 


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