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Author Topic: जीवन में प्रेणना की स्रोत : लघु कहानियाँ  (Read 16856 times)

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Offline Pratap Nr.Mishra

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  • राम भी तू रहीम भी तू तू ही ईशु नानक भी तू

ॐ साईं नाथाय नमः

ईश्वर को किसी वस्तु के भाती खोजते है वे नासमझ है ....वह तो वस्तु है ही नहीं ...वह तो आलोक आनंद और अमृत के परम अनुभव का नाम है ...ईश्वर न तो विषय है न वस्तु और न ही व्यक्ति कि जिसे कही बाहर खोजा जा सकता है ..वह तो अपनी चेतना का आत्यंतिक परिष्कार है ...

सूफी फ़कीर जुन्नेद से किसी ने पूछा ," ईश्वर है तो दिखाई क्यों नहीं देता ? जुन्नेद ने कहा ," ईश्वर कोई वस्तु नहीं वह तो एक अनुभूति है ..जिसे देखने का कोई उपाय नहीं हा अनुभव करने का अवश्य है ....फ़क़ीर की बाते प्रश्नकर्ता को संतुष्ट नहीं कर सकी ..तब उन्होंने पास ही पड़ा एक पत्थर उठाया ...और पाँव पर पटक दिया उनके पाँव पर गहरी चोट आई और खून की धारा बहने लगी ..प्रश्न कर्ता हैरान रह गया उसने कहा ये क्या किया आपने? इससे क्या आपको पीड़ा नहीं होगी ? फ़कीर जुन्नेद हसते हुए बोले पीड़ा दिखती नहीं है फिर भी है... ऐसे ही ईश्वर भी है .....

जीवन में जो दिखाई देता है उसकी ही नहीं तो उसकी भी सत्ता है जो दिखाई नहीं देती ..दृश्य से उस अदृश्य की सत्ता बहुत गहरी है ...क्योकि उसको अनुभव करने के लिए स्वयं के अस्तित्व की गहराई में उतरना पड़ता है ..तभी यह पात्रता उपलब्ध होती है उसे छू सके उसे देख सके उसे जान सके ....साधारण इन्द्रिया नहीं उसे पाने के लिए तो अनुभूति की गहरी सवेदन शीलता अर्जित करनी पड़ती है ..तभी जाकर साक्षात्कार होता है और तभी मालुम पड़ता है कि वह कही बाहर नहीं जो उसे देखा जा सके वह तो भीतर है वह तो देखने वाले में ही छिपा है ......

सच तो यह है कि ईश्वर को बाहर खोजना नहीं है बस स्वयं को खोदते जाना है अंत में अपने अस्तित्व के मूल स्त्रोत और चरम विकास के रूप में उसे अनुभव करना है
..ईश्वर तो हमारे दिल में ही बसा हुआ है

ॐ साईं राम

Offline Pratap Nr.Mishra

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ॐ श्री साईं नाथाय नमः

अभिमान रूपी शत्रु 

भगवान श्रीराम वनवास काल के दौरान संकट में हनुमान जी द्वारा की गई अनूठी सहायता से अभिभूत थे। एक दिन उन्होंने कहा, "हे हनुमान, संकट के समय तुमने मेरी जो सहायता की, मैं उसे याद कर गद्गद् हो उठा हूं। सीता जी का पता लगाने का दुष्कर कार्य तुम्हारे बिना असंभव था। लंका जलाकर तुमने रावण का अहंकार चूर-चूर किया, वह कार्य अनूठा था। घायल लक्ष्मण के प्राण बचाने के लिए यदि तुम संजीवनी बूटी न लाते, तो न जाने क्या होता?" तमाम बातों का वर्णन करके श्रीराम ने कहा, "तेरे समान उपकारी सुर, नर, मुनि कोई भी शरीरधारी नहीं है। मैंने मन में खूब विचार कर देख लिया, मैं तुमसे उऋण नहीं हो सकता।" सीता जी ने कहा, "तीनों लोकों में कोई ऎसी वस्तु नहीं है, जो हनुमान जी को उनके उपकारों के बदले में दी जा सके।"

श्रीराम ने पुन: जैसे ही कहा, "हनुमान, तुम स्वयं बताओ कि मैं तुम्हारे अनंत उपकारों के बदले क्या दूं, जिससे मैं ऋण मुक्त हो सकूं।" श्री हनुमान जी ने हर्षित होकर, प्रेम में व्याकुल होकर कहा, "भगवन, मेरी रक्षा कीजिए- मेरी रक्षा कीजिए, अभिमान रूपी शत्रु कहीं मेरे तमाम सत्कर्मो को नष्ट नहीं कर डाले। प्रशंसा ऎसा दुर्गुण है, जो अभिमान पैदा कर तमाम संचित पुण्यों को नष्ट कर डालता है।" कहते-कहते वह श्रीराम जी के चरणों में लोट गए। हनुमान जी की विनयशीलता देखकर सभी हतप्रभ हो उठे और श्रीराम ने हनुमान को गले लगा लिया। चारों तरफ जयश्री राम और जय हनुमान के नारे गूंजने लगे।

ॐ सांई राम।।।

Offline Pratap Nr.Mishra

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ॐ साईं नाथाय नमः

संगती का गुणों पर प्रभाव

एक बार एक शिकारी जंगल से दो तोतों को पकड़ के ले आया और बाजार में उनको बेचने बेठ गया | एक महात्माजी ने एक तोते को खरीदकर आश्रम ले गये और दुसरे तोते को एक बदमास (डाकू) अपने अड्डे में ले गया | 

कुछ महीनो पश्चात यह देखने में आया की महात्माजी का तोता आश्रम के अध्यात्मिक परिवेश, अध्यात्मिक विचारधारा और अध्यात्मिक संगती में रहने के फलस्वरूप सुबह-शाम राम राम ,भजन -कीर्तन एवंग सात्विक संस्कारों की बात बोलने लगा |
वही दूसरा तोता जो डाकू के अड्डे में रहा वो सुबह -शाम गाली-गलोच ,अहिंसा एवंग तामसिक संस्कारों की बात बोलने लगा |

सारांश :  संगदोष का प्रभाव से हमें बचना और दूसरों को भी बचाना चाहिये | हमें सात्विक विचारों के साथ ही रहना चाहिये ,तामसिक विचारों से सदैव दूर रहने का प्रयास करना चाहिये |

ॐ साईं राम

Offline Pratap Nr.Mishra

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ॐ साईं नाथाय नमः

पवित्रता (ज्ञान) को ग्रेहण करने के लिए प्रवित्र (पात्र ) का होना आवश्यक है |

एक राज्य की सीमा के बहार एक महात्माजी का आश्रम था | जबभी कोई राज्य से बहार जाता तो आते जाते महात्माजी से आशीर्वाद पाने हेतु हाथ जोड़ता था और महात्माजी भी अपना हाथ उठाके उसको आशीर्वाद दिया करते थे | धीरे-धीरे राज्य में महात्माजी की प्रसिद्धि होने लगी कि उनके आशीर्वाद से सब मनोवांछित फलों कि प्राप्ति हो जाती है | राजा के कानों में भी या शुभ समाचार पहुंचा | राजा ने सोचा की क्यों  ना महात्माजी को राज्य के भीतर ही बुलालें जिससे राज्य की भी भलाई होगी और मेरी भी | मेरा खजाना ,ऐश्वर, प्रसिद्धि और नाना प्रकार की इच्छाओं की भी महात्माजी के आशीर्वाद से पूर्ति होती रहेगी | राजा ने तदुपरांत मंत्री को बुलाके आदेश दिया कि आप महात्माजी के पास जाइये और उनसे हमारे राज्य में रहने कि प्राथना कीजिये और उन्हें मेरे पास आने का निवेदन करिये | मंत्री महात्माजी के पास गये और राजा का आदेश सुनाया | महात्माजी ने राजा का निवेदन स्वीकार करते हुये मंत्री को चलने के लिए कहा | महात्माजी साथ में अपना कमंडल जो बहुत ही गन्दा था और बास (दुर्गन्ध ) मार रहा था लेकर चल पड़े |

राजा के सम्मुख उपस्थित होने पर राजा ने उनको सविनिमय नमन किया और कहा कि महात्माजी आप आज से हमारे राज्य में ही रहिये | आपको आश्रम बनाने के लिए जितनी भूमि कि अवसकता होगी वो दी जायेगी एवंग जो भी पैसा लगेगा वो हमारे राज्यकोस  से आपको दिया जायेगा | महात्माजी ने कहा ठीक है और अपना कमंडल आगे कर दिया राजा की ओर दान देने के लिये | राजा ने कमंडल को देखा और उसको लेकर सेवादारों को उसको साफ़ करके लाने को कहा | सेवादारों ने कमंडल को स्वछ करके राजा को दे दिया | राजा ने तब उसको सोने के सिक्कों से भर दिया और महात्माजी को लौटा दिया | महात्माजी ने उसको ग्रेहण किया और प्रस्थान करने लगे | राजा को आश्चर्य हुआ की महात्माजी ने कोई आशीर्वाद तो दिया ही नहीं | ऐसा विचार कर राजा ने महात्माजी से कहा कि आप मुझे कुछ आशीर्वाद तो दीजिये | महात्माजी मौन खड़े रहे | राजा ने पुनः निवेदन किया पर महात्माजी पुनः मौन ही रहे | राजा ने तीसरी बार पुनः जब कहा तो महात्माजी ने कहा पात्र तो साफ़ (स्वछ) पहले करलो | राजा को महात्माजी की बात समझ में नहीं आई और पूछने लगा कि महात्माजी मै आपके कथन को नहीं समझ पाया | महात्माजी ने कहा जैसे सोने के सिक्कों को कमंडल में डालने के पूर्व तुमने उसको स्वछ करवाया था क्योकि पवित्र चीज़ पवित्र पात्र में ही ग्रेहण करने योग्य होती है वैसे ही आशीर्वाद पाने के लिये तुम्हे भी अपने दिल (पात्र ) को स्वछ करना आवश्यक है |

सारांश :  भगवानके दिव्य पवित्र स्वरूपों को ग्रेहण करने के लिये सबसे पहले हमें स्वयम को स्वछ करने कि अवसकता है अन्यथा हमारे लाख प्रयास के बाद भी हमारा पात्र खाली ही रह जायेगा |

ॐ साईं राम 

Offline Pratap Nr.Mishra

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ॐ साईं नाथाय नमः

निष्ठा ओर श्रधा का महत्व

एक बार एक शिष्य आपने गुरु के साथ गुरु पिता के पास मिलने को उनके आश्रम को जा   रहे थे.
गुरु का अनुसरण कर शिष्य उनके पीछे पीछे  वियावान जंगल के रास्ते से गुरु का स्मरण करते हुये
रहा था . जंगल पार करने के पश्चात उन्होने देखा की आगे एक गहरी उफंती नदी है जो मार्ग अवरोध
कर रही है .कोइ ओर भी मार्ग नही नजर नही आ रह था उनको आश्रम तक पहुचने का. गुरु ने कहाँ
की पहुचना शिग्रह ही जरूरी है वरना गुरु के आदेश की अवहेलना होगी पर यहाँ तो दुर-दुर तक कोइ
नाव भी नही दिख रही है जिसपर  सवार होगे इस उफन्ति नदी को पार किया जा सकता था .

शिष्य ने गुरु से कहाँ कि गुरुजी कुछ  पेड़ से टुटी टेहनिओ को मैने नदी के पानी मे बेहते हुए देखा है .
क्यो ना हमलोग उसी टेह्नी का सहारा लेकर इस नदी को पार कर ले . गुरु को अपने शिष्य की बातो
से बहुत ही अच्चाम्भा हुआ ओर उसकी मुर्खता  पर हसी भी. गुरु ने क्रोधित होके कहाँ की ठीक है तुम
 पहले नदी को पार कर के दिखाओ .

शिष्य गुरु के आदेश को सर्वोपरी मानके एक  बेहती हुइ टेह्नी को पकड लिया ओर आँखों को बांध कर
उसपर सवार हो गया . गुरु की आँखे विश्मय से खुली की खुली रह  गई  जब उन्होंने देखा कि शिष्य
बडी सहजता से उस टेह्नी पर सवार नदी पर कर दुसरे किनारे पहुच गया है .

शिष्य ने गुरु से निवेदन किया की गुरुजी आप भी मेरी भाति इस नदी को पार करके आ जाइये. गुरु ने
भी उसी तरह से प्रयास किये पर हर बार टेह्नी पर पैर रखते ही गुरूजी  पानी मे तैयरने की जगाह डूब
जाते थे . गुरुजी बहुत परेशान की शिष्य ने तो बडी ही सहजता से इस कार्य को कर लिया मै क्यो नही
 कर पा रहा हू.

संकोचित मन  से गुरुजी ने शिष्य से पूछा कि तुमने  कैसे  ये  सब  किया ?

शिष्य ने बड़ी ही विनम्रता और  छमा  मांगते  हुये कहाँ की गुरूजी  वो  आपही  है. जिन्होंने मुझे नदी
के इस पार लाया  है . मैने तो बस  आपके  आदेश को गुरु आदेश मानकर आपके  प्रति दृढ़ता और श्रधा
रखते हुये  आखे बांध  कर आपको  ही याद  करता रहा . वो  आपही थे जिन्होंने  टेह्नी को थामे  रखा
था ओर मुझे  डूबने  नही दिया  .

आप भी अपने गुरु पर दृढ़ता,श्रधा ओर विस्वास करते  हुये  टेह्नी पर सवार हो जाइये.आपके गुरुजी भी
आपकी तरह आपको  नदी पर करा  देगे .

श्रधाऔर भक्ती मे  वो शक्ति है जिसने ध्रुव प्रहलाद को महा आग्नि के लपटों के बीच मे भी सही सलामत रखा . .

साईं  राम

 
राम रहे बन भीतरे गुरु  की पूजा ना आस ।
रहे कबीर पाखंड सब, झूठे सदा निराश  ॥

कामी, क्रोधी , लालची, इनसे भक्ती  न होय ।
भक्ती  करे कोइ सूरमा, जाती वरन कुल खोय ॥

मै अपराधी जन्म  का, नख-सिख भरा विकार  ।तुम दाता दु:ख भंजना, मेरी करो  सम्हार  ॥

Offline Pratap Nr.Mishra

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ॐ श्री साईं नाथायनमः

मन की शांति

स्रोत : कथा सागर नवभारत टाइम्स

गुरु और शिष्य तीर्थ-यात्रा करके लौटे तो उन्होंने देखा कि उनकी कुटिया उजड़ी हुई थी। वर्षा और आंधी-तूफान ने उसके आधे भाग को ही उड़ा दिया था। कुटिया में रखा सारा सामान भी अस्त-व्यस्त पड़ा था। यह देखकर शिष्य क्रोधित होकर बोला , ' गुरुदेव , यही सब देखकर तो भगवान से मेरा विश्वास उठ जाता है। जो दुर्जन हैं , उनके महल भी सुरक्षित हैं और हम दिन-रात साधना में लगे रहते हैं फिर भी ईश्वर हमारी झोपड़ी तक का ख्याल नहीं रखते। '

गुरु मुस्कराकर बोले , ' वत्स , मैं तो परमात्मा को धन्यवाद देता हूं कि उसने हमारी रक्षा की है। उसकी करुणा का मैं ऋणी हूं। आंधी-तूफान का क्या भरोसा! वह तो पूरी कुटिया को उड़ाकर ले जा सकता था। पर परमात्मा की कृपा से कुटिया इस हालत में है कि इसे फिर से बनाया जा सकता है। '

इस पर शिष्य ने कहा , ' पर गुरुदेव , अधार्मिकों के महलों का ईश्वर कुछ नहीं करता। वे अब भी शान से खड़े हैं। '

गुरु ने समझाया , ' अगर इस तरह दुनिया को देखोगे तो कभी चैन से नहीं रह पाओगे। अधार्मिकों के महल जरूर शान से खड़े हैं लेकिन उनके मन की क्या हालत है , यह तुम नहीं देखते ? मनुष्य महल या कुटिया में प्रसन्न नहीं होता न ही उसे पूर्ण शांति मिलती है। असली चीज है मन की शांति। हमारे पास मन की शांति है क्योंकि हम ईश्वरोपासना और जन कल्याण में लगे हैं। जो दुनियावी प्रपंचों में लीन हैं , उनका जीवन भारी तनाव और दुख में बीतता है। '

गुरु की बात सुनकर शिष्य टूटी कुटिया को ठीक करने में जुट गया।

ॐ साईं राम

Offline Abhilav Vishwakarma

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आपकी इन लघु कथाओं को मैं सदैव याद रखूँगा l जब भक्त की भक्ति में वृद्धि होती है तब इश्वर उसके समक्ष विभिन्न बुरी परिस्थितियां उत्पन्न कर देते हैं l ऐसे में एक ही सहारा होता है विश्वास का , जो आपकी कथाओं का सार है , गुरु और इष्ट पर विश्वास इसी के सहारे जीवन चलता है येही जीवन का मूल है l

यह मेरा अनुभव है की  भगवन पे विश्वास न होने पर ही व्यक्ति विभिन्न दुखों में उलझ जाता है l हम सब भाग्यशाली हैं जो हमें इश्वर के आशीर्वाद से भक्ति की शक्ति प्राप्त हुई है l  धन्यवाद


ॐ जय साईं राम
« Last Edit: September 04, 2013, 07:14:11 AM by Abhilav Vishwakarma »

Offline Pratap Nr.Mishra

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ॐ श्री साईं नाथायनमः

बाज और किसान…

बहुत समय पहले की बात है , एक राजा को उपहार में किसी ने बाज के दो बच्चे भेंट किये ।
वे बड़ी ही अच्छी नस्ल के थे , और राजा ने कभी इससे पहले इतने शानदार बाज नहीं देखे थे।

राजा ने उनकी देखभाल के लिए एक अनुभवी आदमी को नियुक्त कर दिया।

जब कुछ महीने बीत गए तो राजा ने बाजों को देखने का मन बनाया , और उस जगह पहुँच गए
जहाँ उन्हें पाला जा रहा था। राजा ने देखा कि दोनों बाज काफी बड़े हो चुके थे और अब पहले से भी शानदार लग रहे थे ।

राजा ने बाजों की देखभाल कर रहे आदमी से कहा, ” मैं इनकी उड़ान देखना चाहता हूँ ,
तुम इन्हे उड़ने का इशारा करो । “ आदमी ने ऐसा ही किया।

इशारा मिलते ही दोनों बाज उड़ान भरने लगे , पर जहाँ एक बाज आसमान की ऊंचाइयों को छू रहा था ,
वहीँ दूसरा , कुछ ऊपर जाकर वापस उसी डाल पर आकर बैठ गया जिससे वो उड़ा था।

ये देख , राजा को कुछ अजीब लगा.

“क्या बात है जहाँ एक बाज इतनी अच्छी उड़ान भर रहा है वहीँ ये दूसरा बाज उड़ना ही नहीं चाह रहा ?”,
राजा ने सवाल किया।

” जी हुजूर , इस बाज के साथ शुरू से यही समस्या है , वो इस डाल को छोड़ता ही नहीं।”

राजा को दोनों ही बाज प्रिय थे , और वो दुसरे बाज को भी उसी तरह उड़ना देखना चाहते थे।

अगले दिन पूरे राज्य में ऐलान करा दिया गया कि जो व्यक्ति इस बाज को ऊँचा उड़ाने में कामयाब होगा उसे ढेरों इनाम दिया जाएगा।

फिर क्या था , एक से एक विद्वान् आये और बाज को उड़ाने का प्रयास करने लगे ,
पर हफ़्तों बीत जाने के बाद भी बाज का वही हाल था, वो थोडा सा उड़ता और वापस डाल पर आकर बैठ जाता।

फिर एक दिन कुछ अनोखा हुआ , राजा ने देखा कि उसके दोनों बाज आसमान में उड़ रहे हैं।
उन्हें अपनी आँखों पर यकीन नहीं हुआ और उन्होंने तुरंत उस व्यक्ति का पता लगाने को कहा जिसने ये कारनामा कर दिखाया था।

वह व्यक्ति एक किसान था।

अगले दिन वह दरबार में हाजिर हुआ। उसे इनाम में स्वर्ण मुद्राएं भेंट करने के बाद राजा ने कहा ,
” मैं तुमसे बहुत प्रसन्न हूँ , बस तुम इतना बताओ कि जो काम बड़े-बड़े विद्वान् नहीं कर पाये वो तुमने कैसे कर दिखाया। “

“मालिक ! मैं तो एक साधारण सा किसान हूँ , मैं ज्ञान की ज्यादा बातें नहीं जानता ,
मैंने तो बस वो डाल काट दी जिसपर बैठने का बाज आदि हो चुका था, और जब वो डाल ही नहीं रही तो वो भी अपने साथी के साथ ऊपर उड़ने लगा। “

दोस्तों, हम सभी ऊँचा उड़ने के लिए ही बने हैं। लेकिन कई बार हम जो कर रहे होते है उसके इतने आदि हो जाते हैं कि
अपनी ऊँची उड़ान भरने की , कुछ बड़ा करने की काबिलियत को भूल जाते हैं। यदि आप भी सालों से
किसी ऐसे ही काम में लगे हैं जो आपके सही potential के मुताबिक नहीं है तो एक बार ज़रूर सोचिये कि
कहीं आपको भी उस डाल को काटने की ज़रुरत तो नहीं जिसपर आप बैठे हुए हैं ?

ॐ साईं राम

 


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