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Author Topic: THE LEGENDS BEHIND HOLI..  (Read 3700 times)

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Offline tana

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    • Sai Baba
THE LEGENDS BEHIND HOLI..
« on: March 03, 2007, 01:16:57 AM »
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  • OM SAI RAM....

    HAPPY HOLI....
    The Legends behind Holi

    In North India, this festival is associated with the story of Prahlad and Holika. The word Holi is derived from the name Holika. Holika was the sister of Hirankashyap, the demon king of the Asuras. He fancied himself to be the Supreme Being. Naturally, he ordered his people to worship him. However, the demon king's son was an ardent devotee of Lord Vishnu. As son Prahlad did not obey him, Hirankashyap asked sister Holika to sit on a burning pyre with Prahlad in her lap. Holika had a boon that provided her protection against fire. But as luck would have it, Prahlad walked out of the pyre unharmed, while Holika was burnt.

    Another myth associated with the Holi festival in North India is about Lord Krishna. The cruel king Kamsa had sent demoness Putana to kill Krishna in Nandgaon. However, Krishna, even though a child, outsmarted her. Therefore, Holi signifies the victory of Lord Krishna over the evil forces. From that day, on the eve of Holi, people light a bonfire celebrating the victory of Lord Krishna. In Mathura and Vrindawan (Uttar Pradesh), places famous for Krishna's raslila (love-play), Holi is celebrated with songs, music and dances.

    In Kerala and Tamilnadu, the festival of Holi is associated with the legend of Kamdev, the Love-god. Kamdev, in a fit of foolishness, aimed his arrow at Lord Shiva, in order to wake the latter from his deep meditation. Lord Shiva opened his third eye and burnt him to ashes. The grief-stricken wife of Kamdev, Rati begged for restoration of her husband. Lord Shiva granted her a boon whereby she could see her husband, but not in the physical human form.

    Dol Jatra or Dol Purnima is the name by which Holi is known in Bengal. People fast and pray on this day. When all the traditional rituals are over, Krishna's idol is smeared with gulal and bhog is offered to both Lord Krishna and Agnidevta.

    In Maharashtra, Holi is commonly known by the name of Rangpanchami. On one Holi day, a five-year-old Jijabhai, splashed gulal on young Shahaji. As history tells us, Jijabai was later married to Shahaji and the couple produced the visionary king Shivaji, the valiant Maratha ruler.


    PICHKARI KI DHAAR,
    GULAL KI BAUCHAR,
    APNO KO PYAAR,
    YHE HAI HOLI KA TYOHAAR...


    WISH U HAPPY & COLOUR FUL HOLI....
    JAI SAI RAM...
    "लोका समस्ता सुखिनो भवन्तुः
    ॐ शन्तिः शन्तिः शन्तिः"

    " Loka Samasta Sukino Bhavantu
    Aum ShantiH ShantiH ShantiH"~~~

    May all the worlds be happy. May all the beings be happy.
    May none suffer from grief or sorrow. May peace be to all~~~

    Offline Ramesh Ramnani

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      • Sai Baba
    Re: THE LEGENDS BEHIND HOLI..
    « Reply #1 on: March 03, 2007, 01:51:55 AM »
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  • जय सांई राम।।।

    यह दुनिया रंग-बिरंगी है। जीवन में रंगों की अपनी विशेषता है। क्या आपने कभी कल्पना की है कि यदि यह संसार रंग विहीन होता तो इसका स्वरूप कैसा होता? रंग-बिरंगे फूल, पशु-पक्षी, कुछ भी न होते। सर्वत्र एक रंग होता, एकरसता होती,सब कुछ नीरस होता। सृष्टि में रंग हैं तो रस है। रस है तो जीवन है। प्रकृति के नियंता को इसका पूर्वाभास था। उसने जीवन की रचना की तो उसमें रंग भी भरे। ईश्वर की पाठशाला में चित्रकला का जितना महत्व है उन चित्रों में रंग भरने का उससे भी अधिक महत्व है। सृष्टि के रचयिता ने नीला आकाश बनाया तो मेघों को शुभ्रता दी। प्रकाश और अंधकार को पृथक रंग प्रदान किए हैं।

    एक माह में ही कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष के रंगों को जीवन की धूप-छाया और हर्ष-विषाद के प्रतीक रूप में अनुभव किया जा सकता है। यदि श्वेत रंग सादगी का प्रतीक है तो नीला रंग विराटता और गहराई का आभास देता है। पीली सरसों देखकर वसंती मौसम सहज ही जीवंत हो उठता है। जीवन इंद्रधनुषी है। यह रंगों से सजा हुआ एक पुष्प गुच्छ है। यह मुरझाता है, फिर भी हवाओं में अपनी रंग स्मृति और गंधमयता विसíजत कर जाता है। जीवन के अनेक रंग हैं। इसको रंगमंच कहा गया है। इसमें प्रत्येक प्राणी पात्र है, जिसका नाट्यनिर्देशक कोई और नही अपने बाबा सांई है। इस रंगमंच की परिणति है, जहां सब कुछ समाप्त हो जाया करता है। जीवन का रंगमंच रह जाता है। कथा स्मृतियां रह जाती हैं। पात्र बदल जाते हैं। हमारी संस्कृति में रंगों को प्रतीक रूप में मान्यता प्रदान की गई है। फूलों की बहुरंगी पंखुडि़यां हों, या तितली के पंख। ये नयनाभिराम ही नहीं होते, इनमें एक चित्ताकर्षक शक्ति होती है। रंगों की यह शक्ति उस चुंबकत्व को जागृत करती है जिससे जीवन-जगत में प्रेम की प्रवृत्ति का संचार होता है। प्रेम यदि जीवन की अनिवार्यता है तो रंग उसकी आधारभित्ति हैं। आज के भौतिकवादी समय में तनाव और कुंठा के मूल कारण हमारे अंतरंग का धूमिल होना है। इसे खोजना होगा। यदि हमारे भीतर का रस सूखने लगा है तो फिर इसकी एकमात्र वजह भीतर के रंग की अनुपस्थिति ही है। यह ध्यान रहे कि अंत:करण के रंगों को चटख किए जाने के लिए ही मनुष्य उत्सवोन्मुखी होता है।

    इसलिये आइये होली के शुभ अवसर पर हम सब मिलकर अपने बाबा से दुआ मांगें कि वो हमारे जीवन को भी इंद्रधनुषी जीवन में परिवर्तित करने की हमारे मन मे इच्छा जाग्रित करें और हमारे भीतर सूखे रंगों को फिर से हरा करने मे हमारी मदद करें।


    अपना सांई प्यारा सांई सबसे न्यारा अपना सांई

    ॐ सांई राम।।।
    अपना साँई प्यारा साँई सबसे न्यारा अपना साँई - रमेश रमनानी

     


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