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Indian Spirituality => Bhajan Lyrics Collection => Topic started by: rajiv uppal on January 04, 2008, 09:35:53 AM

Title: मैली चादर ओढ़ के कैसे द्वार तुम्हारे आऊँ
Post by: rajiv uppal on January 04, 2008, 09:35:53 AM
मैली चादर ओढ़ के कैसे द्वार तुम्हारे आऊँ .
हे पावन परमेश्वर मेरे मन ही मन शरमाऊं ..

तूने मुझको जग में भेजा निर्मल देकर काया .
आकर के संसार में मैंने इसको दाग लगाया .
जनम जनम की मैली चादर कैसे दाग छुड़ाऊं ..

निर्मल वाणी पाकर मैने नाम न तेरा गाया .
नयन मूंद कर हे परमेश्वर कभी न तुझको ध्याया .
मन वीणा की तारें टूटीं अब क्या गीत सुनाऊं ..

इन पैरों से चल कर तेरे मन्दिर कभी न आया .
जहां जहां हो पूजा तेरी कभी न शीश झुकाया .
हे हरि हर मैं हार के आया अब क्या हार चढ़ाऊं ..


http://www.shirdi-sai-baba.com/sai/sai-baba-bhajans/मैली-चादर-ओढ़-के-कैसे-द्वार-तुम्हारे-आऊँ-t244.0.html
Title: Re: मैली चादर ओढ़ के कैसे द्वार तुम्हारे आऊँ
Post by: abhinav on January 11, 2008, 05:39:12 AM
RAJIV BHAI,

BAHUT SUNDER BHAAV LIKHE HAI AAPNE............SACH KABHI KABHI MAI BHI YAHI SOCHTA HUN KI MAI KITNE GANDE KAPDE PEHNKAR BABA KE MANDIR JATA HUN (JAB MAI SHOP KE GANDE HUE KAPDE PEHNKAR MANDIR JATA HUN), MAGAR BAAD ME MAN HI MAN SOCHTA HUN KI JO DIYA HUA HAI BABA AAP HI KA DIYA HUA HAI.

MERE PAAS CHAHE GANDE HI SAHI MAGAR AAPKE DIYE HUE KAPDE TO HAI.

BAHUT SUNDER RAJIV BAHI..............BAHUT SUNDER.

OM SAI RAM.
Title: Re: मैली चादर ओढ़ के कैसे द्वार तुम्हारे आऊँ
Post by: rajiv uppal on January 11, 2008, 06:00:09 AM
Abhinav bhai

JAI SAI RAM

Bhai maili chadar ka shayad aapne wordly meaning le liya hai,yaha maili chadar ka matlab hai hamare bure karam aur hamare man ki buraiyan

jai sai ram
Title: Re: मैली चादर ओढ़ के कैसे द्वार तुम्हारे आऊँ
Post by: abhinav on January 11, 2008, 06:05:05 AM
rajiv bhai,
om sai ram.


nahi nahi rajiv bhai, mai iss geet ka poora arth samajh sakta hun..............

bas yuhi mere dil me jo vichar uthte hai, maine to voh baat yaha likhi thi.

thanks.

om sai ram.
Title: Re: मैली चादर ओढ़ के कैसे द्वार तुम्हारे आऊँ
Post by: Ramesh Ramnani on January 12, 2008, 07:46:01 AM
जय सांई राम।।।

मंदिर जाने से पहले तन नहीं मन शुद्ध करो  

हम जब प्रभु के बारे में सोचते हैं, तो प्रभु के जो गुण हैं- सचाई का, प्रेम का, मददगार होने का ये सब गुण हम अपने अन्दर लाना चाहते हैं। हम भी शुद्ध जीवन जीना चाहते हैं, चाहते हैं कि हर क्षण हमारी जिन्दगी ऐसी हो, जो खुशियों से भरपूर हो। लेकिन हम उस अवस्था में कैसे पहुँचें?

सोचना एक बात है और वहाँ पर पहुँचना दूसरी बात। बहुत सी बार इन्सान सोचता कुछ है, लेकिन करता कुछ और है। कई बार हालात ऐसे हो जाते हैं कि हम जो सोचते हैं, वैसा नहीं कर पाते। सब चाहते हैं कि अपनी जिन्दगी में से काम, क्रोध, लोभ, मोह और अंहकार को दूर कर दें। पर करें कैसे? ये सवाल हम सबके सामने आते हैं। क्रोध हमें बहुत जल्दी आता है। तो उस क्रोध को कैसे काबू में लाएँ?

बुद्ध की जिन्दगी का एक उदाहरण है। वे एक बार अपने शिष्यों के साथ बैठे हुए थे। एक नौजवान वहाँ संगत में पहुँचा और उन्हें बुरा-भला कहने लगा। बुद्ध के शिष्यों को अच्छा नहीं लगा। उन्होंने चाहा कि उस नौजवान को उस जगह से दूर ले जाएँ। लेकिन बुद्ध ने उन्हें बिठा दिया और कहा कि इसे बोलने दो। वह बोलता गया, बोलता गया, बोलता गया; पाँच, दस, पन्द्रह मिनट बोलता गया और जब उसका गुबार निकल गया, तो बुद्ध ने बड़े प्रेम से उससे कहा कि जो तोहफा (गाली-गलौच का) तुम मेरे लिए लाए हो, यह मैं स्वीकार नहीं करता।

अगर गुस्से और क्रोध के साथ निपटना है, तो शान्त होकर ही निपटा जा सकता है। नहीं तो औरों की गर्मी, औरों की तेजी हमारे अन्दर भी गर्मी पैदा कर देती है। और हमारे अन्दर तनाव बढ़ता चला जाता है और छोटी-सी बात कई बार बहुत बड़ी हो जाती है।

महापुरुष समझाते चले आए हैं कि हम शान्त अवस्था में पहुँचें। लेकिन उस अवस्था में कैसे पहुँचें? इसके लिए हरेक धर्म में अन्तर्मुख होने को कहा जाता है। उसे भजन-सिमरन कहो, ध्यान टिकाना कहो, शान्त बैठकर प्रार्थना करना कहो -वह तरीका, जिसके द्वारा हम अपने आप को बाहर की दुनिया में नहीं, लेकिन अन्दर की दुनिया में ले जाते हैं।

जब हमारे कदम अन्दर की दुनिया में उठते हैं तो फिर हमारी जिन्दगी में एक बदलाव आना शुरू हो जाता है। हम बिना सोचे- समझे कोई प्रतिक्रिया नहीं करते। इन्सान जब बड़ी जल्दी में बगैर सोचे-समझे प्रतिक्रिया करता है, तो खराबी ही खराबी पैदा कर लेता है।

जिस किस्म का वातावरण हमारे आस-पास होता है, हम वैसे ही बन जाते हैं। अगर हम खुद शान्त रहेंगे, तो हमारे घर के, परिवार के लोग भी शान्त रहेंगे। हम लोग संतों - महापुरुषों की शरण में क्यों जाते हैं? उनके सत्संगों में क्यों जाते हैं? क्योंकि वहां पर जाकर हमें शान्ति मिलती हैं। वहाँ पर पहुँच कर हमारा ध्यान परमार्थ की ओर जाता है और इंसान, जिस ओर ध्यान देता है, वैसा ही बनने लगता है।

जब हम मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे, गिरजे या किसी और धर्मस्थान पर जाते हैं, तो क्या होता है? हम अपने आप को पाक और साफ कर के जाते है, अपने आप को शुद्ध करके जाते हैं। हम ऐसा क्यों सोचते हैं? क्योंकि हमें मालूम है कि अगर प्रभु की ओर ध्यान देना है, तो हमें साफ होना है, शुद्ध होना है। लेकिन हम सिर्फ बाहर की सफाई करते हैं। शुद्धता तो अन्दर की होनी चाहिए। शरीर की नहीं, आत्मा की होनी चाहिए। जब तक इंसान अन्दर से शुद्ध नहीं होगा, तब तक उसे प्रभु के दर्शन नहीं हो पाते। 

अपना सांई प्यारा सांई सबसे न्यारा अपना सांई


ॐ सांई राम।।।
Title: Re: मैली चादर ओढ़ के कैसे द्वार तुम्हारे आऊँ
Post by: chetanarora239 on February 03, 2011, 01:42:29 PM
rajiv ji bohut sunder likha hai kya aap mujhe sai bhajans likh kar de sakte ho yaan mata rani ke bhajans


pls reply must
Title: Re: मैली चादर ओढ़ के कैसे द्वार तुम्हारे आऊँ
Post by: manmeet on February 24, 2011, 09:33:06 AM
Om sai ram
Bahoot sunder Ramesh bhi
Rajiv bhai aapki poem bahoot he sunder hai
Thank you for sharing with us.
Title: Re: मैली चादर ओढ़ के कैसे द्वार तुम्हारे आऊँ
Post by: saisai83 on March 04, 2011, 11:31:51 AM
Om Sri Sai Nathaaya Namaha

Bohot sukh milta hai yeh man ke bhaav padh ke. Thank you so much for sharing these.

May Baba Bless you all always.

Jai Sai Ram
Title: Re: मैली चादर ओढ़ के कैसे द्वार तुम्हारे आऊँ
Post by: tanu_12 on March 06, 2011, 09:35:41 AM
Om Sai Ram

RAMESHJI thank you for the nice post and my answer to question which i asked to BABA. he never let anybody unaswered