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« Reply #15 on: March 04, 2012, 07:58:14 PM » |
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ॐ श्री साईं नाथाय नमः
समुंद्र समाना बूंद में
रामविलास जांगिड़
हम अपना व्यक्तित्व निखारने के लिए संकल्प लेते हैं कि हम समय का ध्यान रखेंगे , धीरज धारण करेंगे , विवेक से काम लेंगे , योजना के अनुसार कार्य करेंगे आदि-आदि। इस तरह के कई संकल्प लेते हैं। दस तरह के संकल्प लेने पर भी हम एक भी संकल्प पर नहीं चल पाते हैं और हमारा व्यक्तित्व बिखरकर खील-खील हो जाता है। हमारा जीवन एक उपहास बन कर रह जाता है। इसका एकमात्र कारण यह है कि हम इतने संकल्प करके , इतने निश्चय करके उन पर दृढ़ नहीं रह पाते और उन पर चलने में लड़खड़ाने लगते हैं। इस लड़खड़ाहट में अंत में गिर ही पड़ते हैं। इसका कारण स्वयं को समझ बैठने के कारण ही हम टूट जाते हैं। परन्तु वास्तव में हम छोटे नहीं हैं। हममें भरपूर योग्यता भी है। हम कितने ही छोटे क्यों न हों , हम कितने ही निर्बल क्यों न हों , हम उसी परमात्मा के अंश हैं। वही परमात्मा हममें मौजूद है। हमें ढेरों संकल्पों को समझने की जरूरत नहीं है। एक बूंद में सागर मौजूद है। सिर्फ एक बूंद ही समस्त सागर का सार है। एक बूंद को समझ लिया तो सारे सागर को समझ लिया। अब पूरे सागर को समझने के लिए कुछ बचा ही नहीं। एक बूंद का रहस्य पकड़ में आ गया h2o । पूरा सागर पकड़ में आ गया। एक बूंद की समझ हो गई कि यह ऑक्सीजन व हाइड्रोजन का मिलन मात्र है। अब सागर को समझने के लिए प्रत्येक बूंद को तोड़ना तो सिर्फ मूर्खता ही होगी। एक संकल्प को समझ लिया। यानी एक संकल्प को व्यक्तित्व के निर्माण के लिए जीवन में उतार लिया। तब अन्य संकल्पों को जानना और समझना जरूरी नहीं होता है। दिक्कत तो तब होती है जब एक संकल्प को जाने बिना हम दूसरे , तीसरे की ओर बढ़ते हैं। एक बूंद का रहस्य जाने बिना दूसरी , तीसरी की ओर बढ़ते हैं। केवल एक और केवल एकमात्र संकल्प की साधना जरूरी है। उसे जीवन का हिस्सा बनाने की जरूरत बनाते हुए उसी को जीवन का पर्याय बना लेना ही श्रेष्ठ रहता है। एक बूंद ही है सागर। एक संकल्प ही है पूरा व्यक्तित्व। एक संकल्प लिया- दुनिया में हर व्यक्ति से ' प्रेम ' करने का। हर व्यक्ति , जगह , देश , परिस्थिति और उपादानों से प्रेम किया। प्रेम को जान लिया। प्रेम को समझ लिया। प्रेम को जी लिया। फिर कोई जरूरत नहीं है विवेक की श्रद्धा की , धैर्य की , समर्पण की। अगर धैर्य को अपना लिया। धैर्य को हर जगह , हर स्थिति , हर क्षण जीवंत बना लिया , तो कोई जरूरत नहीं अलग से प्रेम व श्रद्धा को समझने व जीने की। रहीम ने कहा है- ' एकै साधे सब सधे। ' सिर्फ एक की साधना कर लीजिए। आधी-अधूरी नहीं। पूर्णता चाहिए। पूर्ण साधना की आवश्यकता है। अत: जीवन बनाने के लिए सिर्फ एक गुण की साधना ही काफी है। उस एक गुण को हर परिस्थिति व हर उपादान में स्वयं को पर्याय बनाने की जरूरत है। तभी हम अपने व्यक्तित्व को उच्च मानदंडों पर खरा उतार पाएंगे। इसके लिए स्वयं को सिर्फ एक बूंद न समझें। स्वयं को तुच्छ न समझें , क्योंकि बूंद ही सागर का रहस्य है। कबीर ने इस संदर्भ में बहुत पहले कहा है: ' हेरत-हेरत हे सखि , रह्या कबीर हिराई। बूंद समानी समुंद्र में , सो कत हेरी जाई। ' तात्पर्य यह है कि बूंद समुद्र में खो गई है , अब उसे वापस कैसे निकाला जाए। कबीर समझ गए थे कि एक बूंद ही सागर है। एक बूंद की समझ ही काफी है। जब बूंद को समझ लिया। उसे जी लिया , तब वर्षों बाद कबीर ने अपने वचन को दोबारा लिखा और कहा: हेरत-हेरत हे सखि , रह्या कबीर हिराई , समुंद्र समाना बूंद में , सो कत हेरी जाई। ' समुद्र बूंद में समा गया। अब उसको किस तरह ढूंढा जाए ? बूंद समुद्र में गिरी थी , तो कोई रास्ता था समझने का , उसे ढूंढने का। मगर जब समुद बूंद में गिर जाए तो ढूंढने का क्या उपाय ? सच है मात्र एक साधना से , मात्र एक गुण को आत्मसात कर जीवंत बनाने से एक घड़ी ऐसी आती है कि बूंद सारे सागर को ग्रस लेती है। अणु में छिप जाता है विराट। तब ऐसा व्यक्ति परम तत्व को तो चखता ही है , वह उस परमात्मा को भी पीता है। वह इस प्रकृति को भी पीता है। वह उस परमात्मा को भी पीता है। उसने यात्रा शुरू की थी , ' बूंद समानी समुद्र में ' से और यात्रा का ठहराव ' समुंद्र समाना बूंद में ' पर हो गया।
ॐ श्री साईं नाथाय नमः
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« Reply #16 on: March 05, 2012, 04:45:05 AM » |
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ॐ श्री साईं नाथाय नमः
मन की चंचलता मिटे बिना मिलते नहीं प्रभु
स्वामी अवधेशानंद गिरी॥ जीवन में जितनी जरूरत बुद्धि की है , उससे भी ज्यादा जरूरत शुद्धि की है। बुद्धि से सही - गलत की पहचान होती है और शुद्धि से हमारे शरीर और मन में आ बैठी गंदगी दूर होती है। लेकिन यहां प्रश्न यह है कि बुद्धि कैसे आए और शुद्धि कैसे हो। ये दोनों लक्ष्य हम संतों के सत्संग और अच्छे शास्त्रों के पठन - पाठन से हासिल कर सकते हैं।
असल में व्यक्ति अपने आसपास जो देखता और सुनता है , उससे उसकी भावना व क्रिया प्रभावित होती है। कोई व्यक्ति जब साधुओं की संगति करता है तो वह स्वार्थ को छोड़ कर परमार्थ यानी दूसरों के हित की चिंता करने के लिए प्रेरित होता है। जब वह परमार्थ के बारे में सोचता है तो उसका ध्यान दूसरों की सेवा में लगता है। ऐसा होने पर खुद व्यक्ति का ही भला नहीं होता , बल्कि इससे पूरे समाज का कल्याण होता है।
परंतु मन सत्संग के लिए कैसे राजी हो ? वह तो बड़ा चंचल है। समस्या मन का चंचल होना नहीं है। मन चंचल न होता तो कोलकाता में बैठा व्यक्ति मन से मुंबई नहीं पहुंच पाता। यह तो एक सुविधा है। लेकिन मन की चंचलता तब समस्या बन जाती है , जब हम मन को किसी एक विषय में केंद्रित करना चाहते हैं और वह वहां स्थिर नहीं रहता। जिस प्रकार हवा को कैद कर पाना कठिन है , उसी प्रकार मन को वश में करना भी बहुत कठिन है। उस पर जितना काबू पाने की कोशिश करेंगे , वह उतना ही भागेगा। अनुभव कहता है कि मन वहीं लगता है , जहां उसे रस मिलता है। जहां उसे तृप्ति का अनुभव होता है। यदि मन ही मन हम भगवान को प्रेम करेंगे , तब मन भगवान में ही लगा रहेगा।
ध्यान रखना कि जब तक मन सांसारिक वस्तुओं में फंसा रहेगा , तब तक मन से मल मिटेगा नहीं। और जब तक मन का मल नहीं मिटेगा , तब तक मन की चंचलता नहीं खत्म होगी। पर जब मन से रज और तम के लक्षण मिट जाते हैं , तो वह स्वाभाविक रूप से स्थिर हो जाता है।
मन को स्थिर करने के प्रयास कब और कैसे किए जाएं , इसका भी विशेष ध्यान रखना पड़ता है। ब्रह्म मुहूर्त में मन पर सत्वगुण का प्रभाव विशेष रहता है। इसलिए उस समय को संतों ने भजन के लिए श्रेष्ठ माना है। तब मन सरलता से जप , ध्यान आदि में लग जाता है। सत्संग , कथा - श्रवण आदि से राग यानी जिसमें मन रमता है , उस राग की दिशा बदल जाती है। जो राग संसार में है , वह राग भगवान में हो जाता है और प्रभु में हुआ राग , अनुराग बन जाता है। संसार और सांसारिक भोग्य पदार्थों से विराग सहज ही हो जाता है।
गोपियों के लिए अपना मन भगवान में लगाना और स्थिर करना समस्या नहीं है। उनका मन तो कृष्ण में स्थिर है , क्योंकि उनका श्रीकृष्ण में अनन्य प्रेम है। गोपियों का मन तो संसार में नहीं लगता। सत योग से कृष्ण ने ही गोपियों के मन को चुरा लिया है। गोपियां तो उलटा प्रयास करती हैं , अपना ध्यान कृष्ण से परे हटाने का , किंतु उसमें वह विफल रहती हैं।
पूजा , नाम - स्मरण और ध्यान आदि सभी प्रेम की परछाई हैं - ऐसा मैं मानता हूं। जिसमें प्रेम होता है , हम उसकी पूजा और सेवा के लिए सदा लालायित रहते हैं। उसका स्मरण व ध्यान होता रहता है। सही बात तो यह है कि पाप हमारा प्रेम प्रभु में नहीं होने देते। अत : उन पापों से मुक्ति आवश्यक है। इसलिए नाम , जाप , संकीर्तन करते रहो। इससे पापों का नाश होगा और धीरे - धीरे प्रभु में प्रेम बढ़ता जाएगा। फिर मन सहज रूप से भगवान में स्थिर हो जाएगा।
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« Reply #17 on: March 05, 2012, 04:53:54 AM » |
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ॐ श्री साईं नाथाय नमः
जरूरत होने पर इसमें से कुछ हिस्सा लिया जा सकता है
हमेशा से यह कहा जाता रहा है कि सद्चरित्र ही जीवन है। चरित्रवान व्यक्तियों से ही चरित्रवान समाज बनता है और चरित्रवान समाज से ही चरित्रवान राष्ट्र बनता है। चरित्र के भी तीन पहलू हैं - क्रिया , विचार और भावना। जीव भगवान का अंश है। भगवान सच्चिदानंद यानी सत् चित् और आनंद स्वरूप हैं। सत् के अंश में क्रिया होती है , चित् के अंश में ज्ञान होता है और आनंद के अंश में भावना होती है। दूसरे शब्दों में सत् के अंश में कर्म , चित् के अंश में ज्ञान और आनंद के अंश में भक्ति होती है। जैसी क्रिया होगी वैसे विचार होंगे और जैसे विचार होंगे वैसी भावना होगी। अत : भाव के शुद्ध होने से ही विचारों की शुद्धि होती है। विचारों की शुद्धि से क्रिया भी शुद्ध होती है। इस प्रकार क्रिया , विचार और भावना की शुद्धि से चरित्र शुद्ध होता है।
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« Reply #18 on: March 06, 2012, 01:51:16 AM » |
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ॐ श्री साईं नाथाय नमः
लाजपत राय सभरवाल
चाणक्य ने कहा है, परमेश्वर न तो काठ में है, न पत्थर में और न मिट्टी के पदार्थों में ही है। वह तो हमारे भावों में है। इसलिए जहां भाव है, वहीं 'वह' है। प्राय: ईश्वर को हम मंदिर, मस्जिद, गिरिजा घर और गुरुद्वारों में खोजते हैं। उसे हम जंगलों, गुफाओं और पहाड़ों में खोजते हैं। पर वह ढूंढे नहीं मिलता।
कारण? कारण यह है कि उसका असली मंदिर तो और कहीं है। ईश्वर का असली मंदिर -मनुष्य का अपना हृदय स्थल है। यह मंदिर स्वयं भगवान का अपना बनाया हुआ है। गीता में भगवान कृष्ण ने कहा है, मैं सब भूतों, प्राणियों के हृदय में स्थित आत्मा हूं। महर्षि अरविंद भी यही समझाते थे कि ईश्वर कहीं और नहीं, बल्कि समस्त प्राणियों के हृदयों में आत्मा के रूप में निवास करता है।
प्रभु की कोई मूर्ति नहीं है। वह अंतर्यामी और अमूर्त है। वह अनादि, अनंत और आकार रहित है। उसकी कोई प्रतिमा नहीं है। वेदों में प्रतिमा की पूजा का कोई विधान नहीं हैं, अत: मूर्ति पूजा वेद-सम्मत नहीं है। ईश्वर प्राणियों में व्याप्त हो कर उन्हें अस्तित्व और गति देता है। ज्ञान, कर्म और भक्ति के द्वारा, उससे तादाम्य स्थापित कर के प्राणी पूर्णता को प्राप्त करता है।
परमेश्वर ने, प्राणी को सब कुछ दिया है। उसके लिए सूरज, चांद, सितारे, रोशन किए हैं, फिर भी हम दीये से उसकी आरती उतारते हैं। उसने ही तो असंख्य सुगंधित सुमन खिलाए हैं। फिर भी हम फूल चढ़ा कर और अगरबत्ती की खुशबू से उसे खुश करना चाहते हैं। उस ईश्वर ने ही तो अगणित रस-भरे फलों का उपहार दिया है, फिर भी हम एक-दो फल देकर रिझाना चाहते हैं उसे। उसी की वस्तु का उसी को उपहार।
ईश्वर ऐसा कोई उपक्रम, उपकार या उपहार नहीं चाहता। वह केवल निश्छल प्रेम चाहता है। शेष सब पुजारी चाहता है। वह उसकी प्रतिमा मंदिर में रख देता है और प्रचार करता है कि मूर्ति के दर्शन से ही वांछित फल मिलेगा। अगर वह मूर्ति ही सारी कामनाएं पूरी कर देती तो काम करने की जहमत उठाने की जरूरत क्या थी?
बहुत से लोग मूर्तियों के सामने साष्टांग गिर कर गिड़गिड़ाते हैं और चाहते हैं कि उनके सारे कष्ट दूर हो जाएं। किंतु क्या ऐसा होता है ? कुकर्म करते समय तो हम सोचते नहीं और फिर चाहते हैं कि मूर्ति ही हमें सजा से बचा दे। पर अंतर्यामी तो सब जानता है , वह सब के भले - बुरे कर्मों का द्रष्टा है। कुकर्म तो बड़ी बात है , वह तो कुचेष्टा को भी भांप लेता है। वह सिफारिश नहीं सुनता और रिश्वत भी नहीं लेता।
आप ने देखा होगा , बहुत से लोग मंदिर बनवाने या मूर्तियां खरीदने के नाम पर चंदा करते हैं। चंदा देने वाले नहीं जानते कि उनके पैसे का क्या किया जाएगा ? मंदिर या मूर्ति से किसे लाभ होगा ? पुजारी को या उनके भोले - भाले भक्तों को , जो धर्म के नाम पर धन देते हैं तथा बाद में यह भी नहीं जान पाते कि उनकी खून पसीने की कमाई की क्या गति हुई ? इसीलिए देश के अनेक छोटे - बड़े धर्म स्थलों में अपार धन जमा है।
प्रतिमाओं का मान कर के माननीयों को अपमान किया जाता है। माता , पिता , आचार्य , अतिथि और जीवन साथी - ये पांच मूर्तिमान देव हैं। सेवा और सत्कार से , उनको संतुष्ट रखना ही सच्चिदानंद की स्तुति है। इन मूर्त प्राणियों की सेवा से ही मनोकामनाएं पूर्ण हो सकती हैं। दीनों , द्ररिद्रों , रोगियों , बुजुर्गो और परित्यक्तों की परिचर्या ही पवित्र पूजा कर्म है। मंदिरों का उपयोग शालाओं , चिकित्सालयों या निराश्रितों के आश्रय - स्थलों के रूप में करने पर विचार करना चाहिए। प्रतिमा को पूज कर पार होने का सपना देखना तो पत्थर पर दूब जमाने की कोशिश जैसी है।
इसीलिए कबीर ने कहा ,
कबीरा जग बौरा भया ...... पाथर पूजै जाय।
घर की चाकी ना पूजै , जाका पीसा खाय।। ॐ श्री साईं नाथाय नमः
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« Reply #19 on: March 06, 2012, 02:04:44 AM » |
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ॐ श्री साईं नाथाय नमः
भगवान को मानने और जानने में अंतर है
प्रेम रावत 'महाराजी'॥ तुम लगे हुए हो मानने में और सोचते हो कि मानने से ही जान भी लिया। मानने और जानने में बहुत अंतर है। मानने से जानना नहीं होता है, परंतु अगर जानते हो तो फिर मानने की जरूरत नहीं है। मैं पूछता हूं- परमपिता परमेश्वर, तुम्हारे अंदर है, तुम जानते हो या मानते हो? हम मानते नहीं हैं। इसलिए नहीं मानते हैं, क्योंकि हम जानते हैं। ये है जीवन को जीने का ठाठ! जब जानते हैं तो मानने की जरूरत नहीं है। अभी तो तुम मानने में पड़े हुए हो।
जो दुनिया ने सिखाया, वह सब मानते हो। भगवान कहां है? ऊपर! ये मानते हो। जो मानते हैं, वे कहते हैं, वह ऊपर है। और जो जानते हैं, वे कहते हैं- नहीं, अंदर है। मानने वाले कौन हैं? क्यों मानते हैं? क्योंकि इस किताब में लिखा हुआ है। इस किताब से पहले क्या चक्कर था भगवान का? इससे पहले कि अक्षर बना, भगवान था या नहीं? क्या मानते हो तुम? था। ये मानने का चक्कर ही है, इसी ने तो सब कुछ कर रखा है। मानने के चक्कर में ही धर्मों में लड़ाई होती है।
क्या तुमने कभी सुना है कि बच्चे इस बात के लिए आपस में लड़ रहे हों कि ये बाप मेरा है? कुछ ऐसी ही लड़ाई हो रही है आज भगवान के लिए। लोग लड़ रहे हैं कि मेरा भगवान अच्छा है। तुम्हारा वाला तो नया-नया है, हमारा तो बहुत पुराना है! लड़ाई का कारण स्पष्ट है। सब लोग मानने के चक्कर में पड़े हुए हैं। किसी को इसका अहसास नहीं है कि वे स्वयं भी भगवान के बनाए हुए हैं और जिससे लड़ रहे हैं उन्हें भी उसी भगवान ने बनाया है।
कबीरदास जी कहते हैं-आए एक ही देश से, उतरे एक ही घाट। हवा लगी संसार की, हो गये बारह बाट। इस संसार के अंदर लोग यह नहीं जानते, नहीं सोचते कि कबीरा कुआं एक है, पानी भरें अनेक। भांडे का ही भेद है, पानी सब में एक। हम पांच बच्चे हैं। तेरी शक्ल अलग है, मेरी शक्ल अलग पर बाप तो हमारा एक ही है? जब बाप में ही संदेह हो गया तो क्या रह गया। चलती चक्की देख के, दिया कबीरा रोय। दो पाटन के बीच में, साबुत बचा न कोय।
ये सारा संसार चक्की है। धर्मों की चक्की चल रही है और तुम पिसोगे। हम नहीं चाहते तुम पिसो। इस बात को समझो कि तुम और कोई नहीं, उसके बनाए हुए हो। तुम भी हो, हम भी हैं। हममें ऊंचा-नीचा कोई नहीं। सब इस संसार के अंदर बराबर हैं। तुम्हारे पास सब कुछ है। जिस दिन तुम जान जाओगे कि क्या-क्या है तुम्हारे पास, तुम्हारी तबियत भी खुश हो जाएगी।
लोग मंदिर में जा रहे हैं , तो क्या उनको मालूम है कि वहां भगवान बैठे हैं ? तुम भी तो गए हुए हो मंदिर के अंदर ? इसीलिए तो गए थे न कि भगवान के दर्शन होंगे ? तो भगवान के दर्शन हुए ? ये है मानने का चक्कर ! इसे कहते हैं अंधविश्वास। बहुत लोगों ने मान रखा है तो वे मंदिर और तीर्थस्थानों में भगवान को खोज रहे हैं। उनकी मूर्तियों को देखकर प्रसन्न भी हैं। लेकिन क्या उन्होंने भगवान को पा लिया ? अरे भाई , कहां भटक रहे हो ?
सारा संसार उसका मंदिर है। आपका हृदय सबसे बड़ा मंदिर है। इसी में तो भगवान बसता है। वह तुम्हारे अंदर ही है। इसी बात को तो जानना है। कबीरदास जी ने इसीलिए तो कहा - कस्तूरी कुंडली बसै , मृग ढूंढ़े बन मांहि। यानी हमारी हालत उस हिरन की तरह है जो अपनी नाभि में कस्तूरी होने की बात से ही बेखबर रहता है और उसकी तलाश में मारा - मारा फिरता है। हमें इस बात को समझना चाहिए और भगवान को अपने भीतर ही खोजना चाहिए।
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« Reply #20 on: March 07, 2012, 02:47:23 AM » |
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प्रायश्चित करना ईश्वर की ओर उन्मुख होना है
लाजपत राय सभरवाल
किसी व्यक्ति के दो पुत्र थे। उसने एक बेटे के पास जाकर कहा, हे पुत्र, आज तुम अंगूर की बाड़ी में जाकर काम करो। उसने उत्तर दिया, मैं नहीं जाऊंगा। परंतु बाद में उसे पश्चाताप हुआ। उस युवक ने जब सारी बात पर विचार किया तो उसे लगा कि जो कुछ उसने अपने पिता से कहा, वह गलत था। उसने अपने पिता के प्रति पाप किया है। उसने तब अपने पिता के निवेदन को स्वीकार किया।
उस युवक के मन में बदलाव का एक बीज उपजा। जब मन और मस्तिष्क में कुछ बदलाव होता है, तो अक्सर खेद और अप्रसन्नता का भाव भी उत्पन्न होता है। आत्म तिरस्कार बहुत दुखदाई होता है, परंतु इस तरह की वेदना होने का मतलब है कि आत्मा अभी अखंड है, मरी नहीं है। प्रायश्चित करने वाले की आत्मा अपने पापों और अपराधों से मुक्त हो जाती है और उसका विश्वास ईश्वर के प्रति और भी प्रगाढ़ होता जाता है। व्यक्ति अपने आंतरिक विश्वास के सहारे ईश्वर की शरण पाना चाहता है।
हममें से बहुत से लोग अपने जीवन काल में, जाने-अनजाने में, कुछ न कुछ गलतियां कर बैठते हैं। या फिर कुछ ऐसा अनुचित हो जाता है, जिसके कारण दूसरों को कष्ट या पीड़ा या ठेस पहुंची हो। अपने जीवन का निष्कपट निरीक्षण करें, (जो कठिन और दुखदाई भी होता है) तो पता चलता है कि सचमुच कुछ गलत हुआ है और उसके लिए प्रायश्चित की स्थिति पैदा हो गई है। हमारे धर्मग्रंथों में प्रायश्चित करने का बहुत महत्व दिया गया है। ऐसा करने से पाप की भावना नष्ट होती है। अपने पापों के लिए पश्चाताप करने का मतलब यह है कि हम अपनी गलतियों या त्रुटियों को स्वीकार करते हैं और अपने आप को ऐसे व्यवहार और विचारों से दूर करने का प्रयास करते हैं। जब हम अपनी गलतियों का निरीक्षण करते हैं, हम पाते हैं कि यह एक अवसर है जब हम अपने आप का सुधार कर सकते हैं।
प्रायश्चित करना ऐसा कर्म है जिससे हमारे मन में एक बदलाव आ जाता है। हम अपनी गलतियों या पाप कर्मों के लिए खेद अनुभव करते हैं कि हमें ऐसा नहीं करना चाहिए। प्रायश्चित करने से हममें प्रेम, स्नेह के भाव पैदा होते हैं- सांसारिक वस्तुओं को छोड़ दिव्य विचारों की ओर मुड़ने लगते हैं। अपने आप को देव समझने की बजाय हमारे भाव परमसत्ता ईश्वर की ओर प्रवृत्त होते हैं। इधर-उधर जाने की बजाय, हमारा धर्म, सत्कर्म ईश्वर की ओर उन्मुख होने लग जाते हैं। पश्चाताप करने से पाप के प्रति स्थिति स्पष्ट हो जाती है। वास्तव में प्रायश्चित करने की राह ईश्वर की ओर उन्मुख होने का एक सरल और उचित उपाय है। इससे अपने आप व अन्यों के प्रति भी उचित अवस्था बनती है।
पश्चाताप करने का यह मतलब नहीं है कि हम एक ऋतु या किसी विशेष अवसर के लिए पापकर्म छोड़ देते हैं। इसका मतलब होता है सीधा 180 डिग्री पर पलटना या चलना। पश्चाताप में अपने पापों को छिपाना नहीं होता है। पापों को छिपाने का मतलब है कि बिखरे हुए बीजों को ढंकना जो बाद में अपने आप उजागर हो जाता है।
हम मनुष्यों के लिए अपने पापों के लिए पश्चाताप करना कठिन काम है। पश्चाताप हमारी इच्छा शक्ति को ललकारने की तरह है। प्रायश्चित करने में हमें ईश्वर के समक्ष विनम्र रहना होता है और वे सब बातें छोड़नी होती हैं जो हमारी इच्छा के विरुद्ध हैं। प्रायश्चित करना पूरी मानवजाति का कर्त्तव्य है। ईसा मसीह ने कहा है कि अपने पापों का प्रायश्चित करने की शिक्षा पूरे विश्व में दी जानी चाहिए।
गलतियां सभी से हो जाती हैं। प्रायश्चित करने वाला विनम्रता और साहस के साथ अपने अवगुणों को देख पाता है और निडर होकर उन्हें स्वीकार करता है। यही विनम्र उसे अपनी निर्बलताओं से लड़ने का बल देती है और वह उन पर विजय पा लेता है।
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« Reply #21 on: March 09, 2012, 01:44:35 AM » |
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भगवान आपकी बात सुनेंगे, जरा ऐसे पुकारें
परमात्मा को पुकारने के लिए शोर से अधिक शून्य की जरूरत होती है। इस शून्य को मौन भी कहा गया है। ईसा मसीह ने ईश्वर के लिए एक बड़ा आश्वासन यह दिया है कि जैसे ही हम उसे पुकारेंगे वह चला आएगा। उसका द्वार खटखटाएंगे वह दरवाजा खोल देगा। उसे याद करेंगे वह अपनी उपस्थिति दर्ज कराएगा। कुल मिलाकर इसका अर्थ यह है कि भरोसा रखो, ईश्वर क्रिया की प्रतिक्रिया जरूर करता है।
भक्तों के मामले में वह लापरवाह, निष्क्रिय और उदासीन बिल्कुल नहीं है। उसे बुलाने के लिए एक गहन आवाज लगाना पड़ती है। इसी का नाम संतों ने शक्ति कहा है। परमात्मा के सामने आप स्वयं को जितना निरीह, दीनहीन बनाएंगे आध्यात्मिक दुनिया में उतने ही शक्तिशाली माने जाएंगे। इसीलिए कहते हैं प्रार्थना करते समय यदि आंसू आ जाएं तो समझ लीजिए प्रार्थना शक्तिशाली हो गई।
तीन दरवाजे हैं जहां से शक्ति प्रवेश करती है-मन, वचन और शरीर। मन की चूंकि अनेक भागों में बंटने की रूचि होती है इसलिए वह शक्ति को भी तोड़ देता है। व्यर्थ और अनर्थ की बातचीत वचन की शक्ति को कमजोर करती है। और शरीर से तो हम स्वास्थ्य के मामले में लापरवाह होकर अपनी दैहिक शक्ति को खो बैठते हैं। यदि इन तीनों के मामले में सावधान रहा जाए और फिर परमात्मा को पुकारा जाए तो वह पुकार अपने परिणाम देगी। ज्यादातर लोग परमात्मा तक कैसे पहुंचे इसके तरीकों में उलझ जाते हैं और जीवन बीत जाता है।
सीधा सा तरीका है उसके सामने पहुंच जाओ और जैसे हम होते हैं वैसे ही हम बने रहें। उदाहरण के तौर पर कोई भीखारी हमारे सामने आकर खड़ा हो जाए और वह कुछ न कहे तो भी हम समझ जाएंगे ये क्यों खड़ा है? बस ऐसे ही परमात्मा के सामने अपने होने के साथ खड़े हो जाएं। बाकी जिम्मेदारी फिर उसकी है।
Source: पं. विजयशंकर मेहता
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« Reply #22 on: March 12, 2012, 03:52:17 AM » |
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ॐ श्री साईं नाथाय नमः
श्रद्धा और सबूरी, जीवन में है जरूरी
साईं बाबा आजकल ज्यादातर लोग हताशा और चिंताओं से घिरे दिखाई देते हैं। हर व्यक्ति किसी न किसी कारण से दुखी रहता है। असल में नकारात्मक कर्म मनुष्य को गर्त में ले जाते हैं। और सकारात्मक सोच उसे अहिंसक बनाती है। आज हम किसी को कष्ट देंगे तो कल कोई दूसरा हमें दुख देने के लिए तैयार मिलेगा। बबूल का पेड़ बोया है तो आम खाने को तो मिलेंगे नहीं।
मनुष्य अपनी कमियों को मिटाए बिना भगवान का प्रिय नहीं बन सकता। भौतिक सुखों में मन लगाया तो कष्ट है और ईश्वर का चिंतन किया तो स्वर्र्ग का सुख है। इसलिए ईश्वरीय शक्ति प्राप्त करो और उसी के सहारे अपने भाग्य को बदलने की हिम्मत जुटाओ। प्रेम के रूप में ईश्वर हम सबके अंदर मौजूद है। ईश्वर के प्रति प्रेम भक्ति को बढ़ाता है।
भक्ति योग यानी आत्म साक्षात्कार प्रेम द्वारा ईश्वर प्राप्ति योग की उच्चतम स्थिति है। संसार से विलग होकर ही संसार का ज्ञान प्राप्त होता है। लेकिन भगवान से प्रेम करके उससे एकाकार होकर भगवान का ज्ञान होता है। प्रेम में ही भगवान का वास है। नजरों में यदि प्रेम की आभा होगी, तो ईश्वर स्वयं सामने खड़ा दिखाई देगा। प्रेम ऐसी चीज है कि जितना बांटोगे, उतना बढ़ता जाएगा। इसीलिए प्रेमपूर्वक जीवन यापन अत्यंत जरूरी है।
जिस तरह जीवन के लिए सांसें जरूरी हैं, उसी प्रकार सत्य का आचरण जरूरी है। वही असली पूजा है। सत्य वह है, जो किसी भी परिस्थिति में बदले नहीं। सत्य शाश्वत है। जो शाश्वत है, वही ईश्वर है। यह संसार अनित्य है और इसमें बंधना सबसे बड़ी भूल है। यही भूल हम सब बार-बार करते हैं। सच की खोज यानी विज्ञान हमें विशेष ज्ञान से भरता है। सच और प्रेम एक दूसरे के पूरक हैं।
धर्म एक प्रकार का योग है। वह सबको जोड़ता है, कभी तोड़ता नहीं। धर्म ही हमें वसुधैव कुटुंबकम् की भावना से भरता है। धर्म का आचरण वही कर सकता है, जिसने अपने अहंकार पर विजय पा ली है। अपने-पराए का ज्ञान जब मिट जाता है तो धर्म मार्ग अपने आप प्रशस्त होता है। हमें संसार में निर्लिप्त भाव से सभी कार्य करने चाहिए।
भक्ति में श्रद्धा और सबूरी परम आवश्यक बताया है। सबूरी का अर्थ है सब्र , धैर्य। मनुष्य के जीवन में धैर्य ही ऐसी शक्ति है , जो उसकी आत्मा को बलवान बनाती है। हत्या , व्यभिचार , चोरी , नशाखोरी और मांसाहार - ये पांच पाप कर्म हैं। काम , क्रोध , मद , लोभ , घृणा - ये पांच नरक की ओर ले जाते हैं। सात्विक जीवन और निरामिष भोजन आत्मा और मस्तिष्क दोनों को शुद्ध रखता है। इंद्रियों को वश में करने से मन को शांति मिलती है। इससे हम अपनी इच्छाओं पर अंकुश लगाने में समर्थ हो जाते हैं। क्रोध तभी होता है , जब हम मन में सोची गई वस्तु को प्राप्त करने में असहाय हो जाते हैं।
अच्छा जीवन जीने के लिए सत्कर्म अवश्य करो। एक - दूसरे के लिए कभी कटु वचनों का प्रयोग न करो। सबकी मदद करो , किसी को कष्ट मत दो। मन , वाणी या कर्म से किसी को भी दुख पहुंचाना हिंसा है। सज्जनों की संगति ही सुख प्रदान करती है।
गुरु और ईश्वर पर संदेह न करो। लोगों के अलग - अलग किस्म के विचार ईश्वर को अलग - अलग नहीं कर सकते।
आत्मज्ञान से बढ़कर कोई ज्ञान नहीं है। आत्मसुख से बढ़कर कोई सुख नहीं है और आत्मविश्रांति से बढ़कर कोई सामर्थ्य का साधन नहीं है। मृत्यु के बाद भी मनुष्य का चरित्र बना रहता है , उसके विचार जीवित रहते हैं। चरित्र ही मनुष्य में वास्तविक शक्ति और शौर्य का संचार करता है। चरित्र , शक्ति का पर्याय है। चरित्रहीन और मुर्दे में कोई अंतर नहीं रह जाता।
ॐ श्री साईं नाथाय नमः
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sai ki beti_shalaka
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« Reply #23 on: March 12, 2012, 07:49:17 PM » |
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ॐ श्री साईं नाथाय नमः
जाको राखे साइया मार सके ना कोई बाल ना बांका कर सकेगा जो जग बैरी होई बाबा मेरी रक्षा करना साईं मेरी रक्षा करना राह तुम्हारी देख देख मेरी अखियाँ भर भर आई अब तो दर्शन देदो बाबा ओ शिर्डी के साईं ओ शिर्डी के साईं ओ शिर्डी के साईं बाबा मेरी रक्षा करना साईं मेरी रक्षा करना
बच्चों की कर देखबाल साईं बच्चों का कर ध्यान बच्चे आखिर बच्चे है तू साईं दीन दयाल तू साईं दीन दयाल तू साईं दीन दयाल बाबा मेरी रक्षा करना साईं मेरी रक्षा करना
मैं तौ हूँ मजबूर साईं है तेरी क्या मजबूरी हाथ पकड़ लो शरण में लेलो करदो आशा पूरी करदो आशा पूरी साईं करदो आशा पूरी बाबा मेरी रक्षा करना साईं मेरी रक्षा करना
हालत मेरी देख देख कर हंसने लगा ज़माना लाखों करोड़ों हाथों वाले मेरी लाज बचाना मेरी लाज बचाना साईं मेरी लाज बचाना बाबा मेरी रक्षा करना साईं मेरी रक्षा करना
मुझसा कोई पापी तेरे दर पे ना आया होगा और जो आया होगा खाली लौटाया ना होगा लौटाया ना होगा साईं लौटाया ना होगा बाबा मेरी रक्षा करना साईं मेरी रक्षा करना
ॐ श्री साईं नाथाय नमः
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sai ki beti_shalaka
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« Reply #24 on: March 23, 2012, 02:21:08 AM » |
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ॐ श्री साईं नाथाय नमः
ब्र. सुमित धनराज
एक छोटी सी मछली ने तैरते-तैरते एक दिन एक बड़ी मछली को देखा। उसने सोचा, इतनी बड़ी मछली तो पहले कभी देखी नहीं, जरूर सागर से आई होगी। उसने बड़ी मछली के पास जा कर पूछा, दीदी! सागर कैसा होता है? बड़ी मछली हंसते हुए बोली, अरे पगली, तू जहां तैर रही है, घूम रही है, खा- पी रही है, वही सागर है। छोटी मछली सोचने लगी, ऐसा तो मैं ने पहले कभी सोचा ही नहीं था।
ठीक उस छोटी मछली की तरह इस मानव लोक में रहते हुए हममें से ज्यादातर लोग यह नहीं समझ पाते कि स्वर्ग कहां होता है। वे सोचते हैं कि हमने जहां जन्म लिया है और जहां जीवन बिता रहे हैं, वह कोई निकृष्ुट सी जगह है, जहां कुछ ही समय के लिए रहना है। असल में तो हमें परलोक या स्वर्गलोक जाना है, जो अत्यंत दिव्य है और आनंद से भरा हुआ है।
इस भू-लोक को निरर्थक और इस जीवन को क्षणिक मानने के बाद हम यह खोज करना शुरू करते हैं कि मैं कौन हूं? हमें किसने बनाया? अगर ईश्वर का अस्तित्व है तो वह कैसा है? आखिर उसने मनुष्य को क्यों बनाया? ईश्वर कहां रहता है? उससे मिलन का क्या उपाय है? अगर मनुष्य ईश्वर के पास से आया है तो फिर उससे दूर क्यों है? सांसारिक प्रलोभन ईश्वरत्वपूर्ण मनुष्य को अपने स्वामी से दूर क्यों कर देते हैं? हमारे जीवन में अशांति क्यों है?
जिसका जन्म हुआ है उसे मरना क्यों पड़ता है? क्या मरने के बाद इंसान फिर से ईश्वर के पास जाता है? आत्मा और परमात्मा का मिलन कब होता है? अगर ईश्वर हमारे साथ है तो हमें उसे ढूंढने की जरूरत क्यों पड़ती है? जिसने ईश्वर को खोज लिया है, क्या वो उससे संतुष्ट है? अगर हममें ईश्वर का निवास है, तो हम उसे महसूस क्यूं नहीं कर पाते? ऐसे अनगिनत प्रश्न हमारे दिमाग पर हावी रहते हैं।
लेकिन इस दौर में हम यह महसूस नहीं कर पाते कि यह सारी सृष्टि ही ईश्वर की बनाई हुई है। इसका एक अंश हम मनुष्य भी हैं। इसकी सुंदरता ईश्वर की सुंदरता है। ईश्वर हमारे हृदय में, जीवन में, पड़ोसियों में और सारी सृष्टि में व्याप्त है। ये सब उसी की अभिव्यक्ति हैं। उसे देखने के लिए हमें बाहरी आंखों की आवश्यकता नहीं है। उसके लिए सिर्फ और सिर्फ आध्यात्मिक नेत्रों की जरूरत है।
हमारे इन आध्यात्मिक नेत्रों को सही दिशा में दौड़ाने के लिए प्रार्थना की मदद लेनी पड़ती है। साधु - संतों के तजुर्बें एवं गुरुओं के मत इस राह में हमारी सहायता करते हैं। परंतु ऐसी दृष्टि हम ध्यान और समाधि के जरिए भी विकसित कर सकते हैं। बाइबल कहती है , प्रभु पर श्रद्धा रखो ! पाप से दूर रहो ! और शैया पर मौन हो कर ध्यान करो।
ध्यान वह क्रिया है जिसमें सोचना नहीं पड़ता। इसमें शांत मन से यह देखा जाता है कि स्वयं के भीतर और बाहर क्या चल रहा है।
इस अनुभव का शुरुआती एहसास नीले आकाश जैसा है , जिसमें आराध्य की स्तुति करने वाले जितना ही उसके नीलेपन के पास जाना चाहते हैं , वो उतना ही उनसे दूर होता जाता है। जिस प्रकार किसी पहाड़ी पर खड़े होकर दूर तक नजरें फैलाकर देखने से कुछ दूरी के बाद सब कुछ धुंधला नजर आता है , उसी प्रकार ईश्वर को मानवीय दृष्टि से देखने पर उसका सही रूप नहीं प्रकट हो पाता है।
समुद्र की गहराई नापने के लिए उसमें जिज्ञासु या खोजी को गोता मारना पड़ता है। ठीक उसी प्रकार हृदय की गहराइयों में छुपे रहस्यों को जानने के लिए उसके भीतर शांत भाव से झांक कर देखना पड़ता है। यह तब ही संभव हो पाता है , जब भागदौड़ वाली जिंदगी जी रहा इंसान स्वयं के भीतर एक ध्यान यात्रा शुरू करता है। तब उसके सामने अनगिनत रहस्य प्रकट होते हैं।
ॐ श्री साईं नाथाय नमः
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hanushasai
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Jai Hanuman ! Jai Sai Ram ! Sabka Malik Ek !
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« Reply #25 on: March 24, 2012, 07:26:46 AM » |
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अदभुत लेख, ज्ञानवर्धक व भगवान के व्यापक रूप को व्यक्त करता हुआ ! धन्यवाद शलाका - प्रस्तुति के लिए !
जीवन मे लगाओ ध्यान ऐसे जीवन ही ध्यान बन जाये संसार मे साईं को खोजो ऐसे की संसार ही साईं बन जाये ! 
जय साईं राम !
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sai ki beti_shalaka
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« Reply #26 on: March 26, 2012, 11:00:17 PM » |
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ॐ श्री साईं नाथाय नमः
राम हमें शिष्टाचार के साथ जीना सिखाते हैं
सद्गुरु जग्गी वासुदेव।।
अगर आप राम के जीवन की घटनाओं पर गौर करें तो पाएंगे कि वह मुसीबतों का एक अंतहीन सिलसिला था। सबसे पहले उन्हें अपने जीवन में उस राजपाट को छोड़ना पड़ा, जिस पर उस समय की परंपराओं के अनुसार उनका एकाधिकार था। उसके बाद 14 साल वनवास झेलना पड़ा।
जंगल में उनकी पत्नी का अपहरण कर लिया गया। पत्नी को छुड़ाने के लिए उन्हें अपनी इच्छा के विरुद्ध एक भयानक युद्ध में उतरना पड़ा। उसके बाद जब वह पत्नी को ले कर अपने राज्य में वापस लौटे, तो उन्हें आलोचना सुनने को मिली। इस पर उन्हें अपनी पत्नी को जंगल में ले जा कर छोड़ना पड़ा, जो उनके जुड़वां बच्चों की मां बनने वाली थी। फिर उन्हें जाने-अनजाने अपने ही बच्चों के खिलाफ जंग लड़नी पड़ी। और अंत में वह हमेशा के लिए अपनी पत्नी से हाथ धो बैठे।
राम का पूरा जीवन ही त्रासदीपूर्ण रहा। इसके बावजूद लोग राम की पूजा करते हैं। भारतीय मानस में राम का महत्व इसलिए नहीं है, क्योंकि उन्होंने जीवन में इतनी मुश्किलें झेलीं; बल्कि उनका महत्व इसलिए है कि उन्होंने उन तमाम मुश्किलों का सामना बहुत ही शिष्टता पूर्वक किया।
अपने सबसे मुश्किल क्षणों में भी उन्होंने खुद को बेहद गरिमा पूर्ण रखा। उस दौरान वे एक बार भी न तो क्रोधित हुए, न उन्होंने किसी को कोसा और न ही घबराए या उत्तेजित हुए। हर स्थिति को उन्होंने बहुत ही मर्यादित तरीके से संभाला। इसलिए जो लोग मुक्ति और गरिमा पूर्ण जीवन की आकांक्षा रखते हैं, उन्हें राम की शरण लेनी चाहिए।
राम में यह देख पाने की क्षमता थी कि जीवन में बाहरी परिस्थितियां कभी भी बिगड़ सकती हैं। यहां तक कि अपने जीवन में तमाम व्यवस्था के बावजूद बाहरी परिस्थितियां विरोधी हो सकती हैं। जैसे घर में सब कुछ ठीक - ठाक हो, पर अगर तूफान आ जाए तो वह आपसे आपका सब कुछ छीन कर ले जा सकता है। अगर आप सोचते है कि 'मेरे साथ ये सब नहीं होगा' तो यह मूर्खता है। जीने का विवेकपूर्ण तरीका तो यही होगा कि आप सोचें, 'अगर मेरे साथ ऐसा होता है तो मैं इसे शिष्टता से ही निपटूंगा।'
लोगों ने राम को इसलिए पसंद किया, क्योंकि उन्होंने राम के आचरण में निहित सूझबूझ को समझा। अध्यात्मिक मार्ग पर चलने वाले अनेक लोगों में अक्सर जीवन में किसी त्रासदी की कामना करने का रिवाज देखा गया है। वे चाहते हैं कि उनके जीवन में कोई ऐसी दुर्घटना हो, ताकि मृत्यु आने से पहले वे अपनी सहने की क्षमता को तौल सकें।
जीवन में अभी सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा है और आप को पता चले कि जिसे आप हकीकत मान रहे हैं, वो आप के हाथों से छूट रहा है तो आप का अपने ऊपर से नियंत्रण छूटने लगता है। इसलिए लोग त्रासदी की कामना करते हैं। दरअसल, राम की पूजा इसलिए नहीं की जाती कि हमारी भौतिक इच्छाएं पूरी हो जाएं-मकान बन जाए, प्रमोशन हो जाए, सौदे में लाभ मिल जाए। बल्कि राम की पूजा हम उनसे यह प्रेरणा लेने के लिए करते हैं कि मुश्किल क्षणों का सामना कैसे धैर्य पूर्वक बिना विचलित हुए किया जाए।
इस भक्ति में सवाल यह नहीं है कि आपके पास कितना है, आपने क्या किया, आपके साथ क्या हुआ और क्या नहीं। असली चीज यह है कि जो भी हुआ, उसके साथ आपने खुद को कैसे संचालित किया। राम ने अपने जीवन की परिस्थितियों को सहेजने की काफी कोशिश की, लेकिन वे हमेशा ऐसा कर नहीं सके। उन्होंने कठिन परिस्थतियों में ही अपना जीवन बिताया, जिसमें चीजें लगातार उनके नियंत्रण से बाहर निकलती रहीं, लेकिन इन सबके बीच सबसे महत्वपूर्ण यह था कि उन्होंने हमेशा खुद को संयमित और मर्यादित रखा। आध्यात्मिक बनने का यही सार है।
ॐ श्री साईं नाथाय नमः
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sai ki beti_shalaka
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« Reply #27 on: March 26, 2012, 11:03:44 PM » |
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ॐ श्री साईं नाथाय नमः
समय नहीं बीतता, हम बीतते हैं...
लाजपत राय सभरवाल
राजा भर्तृहरि ने कहा था कि भोग नहीं भोगे जाते, हम ही भोगे जाते हैं। तप नहीं तपता, हम ही तप्त होते हैं। काल व्यतीत नहीं होता, हम ही व्यतीत होते जाते हैं। अर्थात हम सांसारिक विषय भोगों का उपभोग नहीं कर पाए, अपितु उन भोगों को प्राप्त करने की चिंता ने हम को भोग लिया। हमने तप नहीं किया, बल्कि आध्यात्मिक, आधिभौतिक और आधिदैविक ताप जीवन भर हमें ही तपाते रहे। भोगों को भोगते-भोगते हम काल को नहीं काट पाए, बल्कि काल ने हमें ही नष्ट कर दिया।
समय अपनी गति से चल रहा है। समय के साथ कदम मिलाकर चलने में मानव जीवन की सार्थकता है। जब ऐसा नहीं कर पाते तो सफलता से दूर हटते जाते हैं। हर श्वास के साथ जीवन की एक अमूल्य निधि यानी समय की एक इकाई कम होती जाती है, तब एक दिन यमदूत लेने आ जाते हैं। जब मुड़कर देखते हैं तो मालूम होता है कि हमने कितनी बेदर्दी से समय गंवाया है, उसका सदुपयोग नहीं कर सके। समय जैसी मूल्यवान संपदा का भंडार होते हुए भी हम विनिमय का धन, ज्ञान तथा लोकहित को नहीं पा सके। समय का सदुपयोग करने में समर्थ न होने पर समय हमें ही खर्च कर देता है।
हम में से बहुत से लोग अपनी इस प्राकृतिक धरोहर- समय का समुचित उपयोग नहीं करते। बचपन में इतना ज्ञान नहीं होता कि समय का मूल्य समझें। एक दिन यौवन आ खड़ा होता है। वह यौवन समय के बहुमूल्य वरदान के रूप में मिलता है। इस यौवन कान में हम बहुत से काम कर सकते हैं। पर इसे निर्दयता से खर्च कर देने पर बुढ़ापा अपनी कमजोर टांगों व धुंधली आंखों से हमारा स्वागत करता है। तब हम चौंक पड़ते हैं, निराश हो जाते हैं और सिर पर हाथ रखकर चिंताओं के सागर में डूब जाते हैं।
समय का किस प्रकार, किस प्रयोजन से उपभोग किया गया, इसी का लेखा-जोखा जीवन का मूल्यांकन प्रस्तुत करता है। जो समय का महत्व समझ सके और उसके सदुपयोग के लिए जागरूकता के साथ तत्पर हो गया, समझना चाहिए कि उसे जिंदगी मिल गई।
जीवन की संपदा एक-एक क्षण के साथ समाप्त होती जाती है। आयु वृद्धि के साथ मरण का दिन निकट से निकट आता चला जाता है। ऐसी स्थिति में समय के रूप में हमारे पास जो दैवी वरदान जैसी अमूल्य निधि थी और जिसके आधार पर कुछ भी खरीदा या पाया जा सकता था, वह किस प्रकार गलता, जलता, टूटता और मिटता चला जा रहा है, इसे देखने की न इच्छा होती और न फुरसत। ऐसी उपेक्षाओं के परिणाम भी सामने आते हैं।
समय ही उत्कर्ष है। समय की महानता के उच्चतम शिखर पर चढ़ने का सोपान है। समय के दुरुपयोग की भूल अपने भाग्य और भविष्य को ठुकराने की तरह है। समय कभी बूढ़ा नहीं होता। वह सदा युवा और नवीन रहता है। काल सदा एक समान रहता है। जो समय को नष्ट करता है, समय उसे नष्ट कर देता है। जो समय के महत्व को समझ सका, वे कभी समय नष्ट नहीं करते। बीता हुआ समय और मुंह से निकले हुए शब्द, दोनों ही लौटाए नहीं जा सकते। समयरूपी धन सब के लिए समान है। ईश्वर ने यह धन देने में किसी प्रकार का पक्षपात नहीं किया- निर्धन हो, धनवान हो, पंडित हो, मूर्ख हो, किसी संप्रदाय का हो, सबके लिए समान है, सब को समान रूप से सुलभ है। समय को न तो घटाया जा सकता है और न ही बढ़ाया जा सकता है। धन घट सकता है पर समय नहीं। सबके लिए बराबर है।
हमारी एक कमजोरी यह है कि हम प्रमाद के वशीभूत होकर आज का काम कल पर सरका देते हैं। हमारी कमजोरी काल के महत्व को नष्ट करती है। मृत्यु इस बात की प्रतीक्षा नहीं करती कि किसी मनुष्य ने अपना काम पूरा कर लिया है या नहीं। अत: वर्तमान काल में ही समय का सदुपयोग करते हुए निश्चित कार्य को निश्चित समय में करना ही लाभकारी है।
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sai ki beti_shalaka
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« Reply #28 on: March 27, 2012, 04:12:01 AM » |
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ॐ श्री साईं नाथाय नमः
लाजपतराय सभरवाल ईसा मसीह ईश्वर से प्रार्थना करते थे कि 'हे प्रभु, हमें बुराइयों से बचा, पर परीक्षा में न डाल।' वह जानते थे कि मनुष्य बहुत डरपोक है। उसे शरीर से इतना अधिक मोह है कि प्राण त्यागना तो दूर, थोड़ा सा शारीरिक कष्ट सहना पड़े, कोई आर्थिक क्षति हो जाए या इच्छापूर्ति में कोई प्रतिरोध दिखाई पड़े, तो वह विचलित हो जाता है।
महर्षि पतंजलि ने योगशास्त्र में पांच क्लेशों का वर्णन किया है- अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेष। इनसे मनुष्यों को कष्ट होता हैं, इसलिए क्लेश कहलाते हैं। अभिनिवेष मृत्यु के भय को कहते हैं। मृत्यु का भय संसार के प्रत्येक मनुष्य के सिर पर सवार है।
दुनिया में मृत्यु को सबसे बड़ा भय, दुख, वियोग, शोक एवं चिंता का कारण माना गया है। इसलिए इसे कोई नहीं चाहता है। इसका नाम लेते ही सब बेचैन हो जाते हैं, कांप उठते हैं। अर्जुन को मृत्यु बोध हुआ तो ज्ञान, वैराग्य एवं विचार जागृत हो गए।
योगीराज श्रीकृष्ण ने आत्मा की अमरता और अजर होने का उपदेश दिया था कि जैसे मनुष्य फटे-पुराने वस्त्रों को उतार कर नया वस्त्र धारण करता है, उसी प्रकार जीवात्मा पुराने शरीर को छोड़ कर नए शरीर को प्राप्त करता है।
जब वस्त्र गंदे हो जाते हैं तो उन्हें उतार कर अलग कर दिया जाता है। और नए कपड़े जिन्हें पहन कर शरीर को सुख मिलता है, पहन लिए जाते हैं। ठीक उसी प्रकार जब शरीर जीर्ण-शीर्ण हो जाता है तो आत्मा शरीर को छोड़ देती है।
जब यह सत्य सिद्धांत हृदय में बिठा लिया जाता है, हम मजबूत बनते हैं और मृत्यु का भय नहीं रहता। श्रीकृष्ण ने अर्जुन को मृत्यु का वास्तविक स्वरूप समझाया कि मृत्यु तो जीवन की व्यवस्था और परिवर्तन है। तुम आत्मा हो शरीर नहीं।
गीता में कहा गया है- जिसका जन्म हुआ है, उसकी मृत्यु भी निश्चय होगी। कोई इसे रोक नहीं सकता। हम सबकी स्वाभाविक इच्छा है कि जीवन में सुख प्राप्त हो, दुख कभी प्राप्त न हो। यक्ष ने युधिष्ठिर से पूछा कि संसार का सबसे बड़ा आश्चर्य क्या है? उन्होंने उत्तर दिया 'प्रतिदिन प्राणी मृत्यु का ग्रास बना कर यमलोक की ओर जा रहे हैं, यह देखकर भी धरती पर शेष बचे लोगों की इच्छा होती है कि वे सदा जीवित रहें।'
हमारा शरीर पंच भौतिक है। यानी यह पांच तत्वों से मिलकर बना है। यह क्रमश: विकास करता है और फिर ह्रास की ओर उन्मुख होता है। विकसित होना और फिर खत्म होना, यह सृष्टि का हमेशा कायम रहने वाला नियम है। हम अपने शरीर पर इस नियम को लागू होते हुए प्रत्यक्ष देखते हैं। विचारकों और ज्ञानवान लोगों के इस तर्क में कोई खोट नहीं है कि इस शरीर में उपस्थित रहने वाली आत्मा किसी काल में न तो जन्म लेती है और न मरती है। यह अजन्मी, नित्य, शाश्वत और सनातन है। शरीर का नाश होने पर भी इसका नाश नहीं होता।
इसमें संदेह नहीं है कि आम तौर पर लोग मृत्यु को ही सबसे भयावह कष्ट मानते हैं। युवा हों या वृद्ध, सभी मौत के नाम से सिहर उठते हैं। इस संबंध में गीता में कहा गया है- मृत्यु से डरना, घबराना तथा दुखी नहीं होना है। इसके बजाय उसका रहस्य समझ कर धैर्य और वीरता से उसका मुकाबला करना है। मानव जन्म लिया है तो इस जीवन का पूर्ण भोग करें, लेकिन इस दुनिया से जाने से पहले अपने अच्छे कमोर्ं की सुगंध बिखेरें। इस सिद्धांत को जिसने भी अपने हृदय में बैठा लिया वह मृत्यु बंधन से छूट जाता है।
वेद कहते हैं कि हम 'त्रयम्बकमं' अर्थात तीनों कालों में रक्षक, 'सुगंधिम' अर्थात यशस्वी, 'पुष्टिवर्धनम' अर्थात शारीरिक, आत्मिक और सामाजिक बल को बढ़ाने वाले जगदीश की स्तुति करते हैं। हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि जैसे पका हुआ खरबूजा लता-बंधन से छूट जाता है वैसे ही इस मृत्यु से छूट जाएं।
परंतु हमारा साथ मोक्ष रूपी अमृत से न छूटे और हम अमरता का लाभ पाएं। ईश्वर का सच्चा भक्त जीवन के संघर्षों में, दुख और सुख में, जन्म-मृत्यु में एक समान रहता है अर्थात समत्व बुद्धि रखता है। सुख आने पर अति प्रसन्न नहीं होता, दुख के आ जाने पर दिन-रात दुखी नहीं होता।
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« Reply #29 on: March 27, 2012, 04:17:30 AM » |
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ॐ श्री साईं नाथाय नमः
सीखने की तैयारी हो तो हर कहीं गुरु है
अमृत साधना मैं ओशो के कुछ पुराने प्रवचन पढ़ रही थी, जिनमें वे बार-बार कहते हैं कि जीवन में गुरु का उतना महत्व नहीं है, जितना शिष्य का है। गुरु होने के लिए हर कोई तैयार हो जाता है, शिष्य बनना बड़ी मुश्किल है। कारण है अहंकार। अहंकार इतना सख्त होता है कि कोई झुकने के लिए तैयार नहीं होता। किसी से सीखना अपमान जनक मालूम होता है। सचाई यह है कि शिष्य हुए बगैर गुरु होना संभव नहीं है।
शिष्य का मतलब है सीखने की तैयारी। और सीख वही सकता है जिसका अहंकार कम हो। तालाब के किनारे हवा में डोलती हुई घास की लचीली पाती जैसा जिसका मन हो, वही सीख सकता है। हवा का रुख जिस ओर हो उधर झुक गए, तो सीखा जा सकता है।
जितने महान लोग हुए हैं, वे इसीलिए महान बने क्योंकि वे अस्तित्व के अनगिनत सोतों से सीखते रहे। मध्ययुगीन कवि अब्दुर्रहीम खानखाना- उन सौभाग्यशाली कवियों में से थे, जिन्हें बाहर और भीतर, दोनों ही दुनिया का ऐश्वर्य नसीब हुआ था। वे अकबर के दरबार के 9 रत्नों में से एक थे। दौलत, इज्जत, हुकूमत -उनके पास वह सब था जिसकी हर किसी को हसरत होती है। इतना सब होने के बावजूद वे छोटे से छोटे लोगों से सीखते थे।
रहीम ने अपना काव्य लिखने के लिए दो प्रकार के छंदों का इस्तेमाल किया- दोहे और बरवै। बरवै छंद की उत्पत्ति के बारे में एक प्यारी सी कहानी है। रहीम कवि के साथ शहंशाह अकबर के सिपाहसालार भी थे और अक्सर सेना के साथ युद्ध करने जाते थे। उनका एक सैनिक एक बार लंबी छुट्टी पर अपने घर गया। उसी बीच उसकी शादी हो गई और वह अपनी नई पत्नी के प्यार में इस कदर डूबा कि उसे छुट्टियां खत्म होने का ध्यान ही नहीं रहा। उसकी पत्नी सुंदर थी, चतुर थी, उसके प्रेमपाश से निकल आना उस नौजवान के लिए मुश्किल मालूम हो रहा था। कई दिनों बाद उसे एकाएक ध्यान आया कि छुट्टी का समय तो खत्म हो गया और मैं अब तक वापस नहीं गया! वह नौकरी से निकाले जाने की आशंका से परेशान हो गया।
जब पत्नी को पति की परेशानी पता चली तो उसने पति को दो पंक्तियां लिख कर दीं और कहा, इन्हें खानखाना साहब की खिदमत में पेश कर देना। सैनिक ने आकर वे दो पंक्तियां अपने साहित्य-रसिक सेनापति को दिखाईं तो वे बहुत प्रसन्न हुए और उसे माफी दे दी। वे पंक्तियां एक नए ही छंद में रची गई थीं- सेनापति रहीम के अंदर बसने वाले कवि को वह छंद इतना अधिक पसंद आया कि उन्होंने न केवल स्वयं उस छंद को अपनी अभिव्यक्ति का माध्यम बना लिया, बल्कि अपने समकालीन अन्य कवियों को भी इस ओर प्रेरित किया। सैनिक की नवेली दुलहन ने जो पंक्तियां लिखकर भिजवाई थीं वे ये हैं :
प्रेम प्रीति का बिरवा चलेउ लगाय। सींचन की सुधि लीजियो, सूखि न जाय।।
प्रीति का बिरवा तो लगा लिया, पर उसे सींचने का भी स्मरण रखें- कहीं सूख न जाए।
इन पंक्तियों में आए प्रमुख शब्द 'बिरवा' के आधार पर ही रहीम ने इस नए छंद का नामकरण बरवै किया- और उसके बाद स्वयं भी इस छंद में कुछ अत्यंत मधुर पदों की रचना की।
कबलौं रहि है, सजनी, मन में धीर। सावन हूं नहि आवन, कित बलवीर।। घन घुमड़े चहूं ओरन, चमकत बीज। पिय प्यारी मिलि झूलत, सावन-तीज।।
रहीम साहब इतने प्रतिष्ठित कवि थे, उनका अहंकार आडे़ आता तो वे उन पंक्तियों को फाड़कर फेंक देते और उस सैनिक को कड़ी सजा देते- लेकिन दुनिया एक नए छंद से वंचित रह जाती। सीखने की तैयारी हो तो कदम दर कदम गुरु मिलता है।
ॐ श्री साईं नाथाय नमः
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Sai Baba Says -Keep the bad evilminded persons a distance.Live with honor,realizing the greatness of Nama Naamsmaran,always be happy...
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