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Author Topic: निरगुन काल तब बोले बानी । उरझे जीव सकल जमखानी ।।  (Read 2003 times)

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Offline JR

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ऊँ सांई राम

निरगुन काल तब बोले बानी ।  उरझे जीव सकल जमखानी ।।
कैसे के तुम शब्द पसारो ।  कौने विधि तुम जीव उबारौ ।।
ऐसे जीव सकल है करनी ।  कैसे पहुंचैं पुरुष के सरनी ।।
जग में जीव क्रोध विकारा ।  कैसे पहंचैं पुरुष के द्घारा ।।
क्रोधी जीव प्रेत अभिमानी ।  धरिहैं जन्म नरक की खानी ।।
लोभ होय सरप विकरारा ।  माटी भखे जीव अधिकारा ।।
लोभ जन्म सूकर अवतारा ।  कैसे पावै मोक्ष के द्घारा ।।
विषई विषै सब विष की खानी ।  ए सब कहिये जम सहिदानी ।।

अर्थ - निरंजन ने कहा कि मैंने काम, क्रोधादि में जीव को फंसाया हुआ है ।  ऐसे में तो कोई भी जीव परम पुरुष के लोक में नहीं पहुँच सकता ।  इस पर भी यम के 14 दूत मैंने प्रत्येक आदमी में बिठाए हुए है और बड़ी ताकत से उन्हें बांधा हुआ है ।  तुम कैसे निकलोगे उन्हें ।  प्रत्येक आदमी के भीतर यम के 14 दूत बैठे हुए है ।  एक का काम है, नींद लाना ।  एक का काम है, विषयों को दिल में पैदा करना ।  एक का काम है, मौज करना ।  वो जीव को मौज करता है ।  एक का काम है, चित्त भंग कर देना ।  इसका नाम है चित्तभंगा आदि यम के ये 14 दूत् है, जो जीव को भ्रमित कर रहे है ।  इनके साथ काम, क्रोध आदि भी जीव पर छाए हुए है ।  विषयों में जीव को उलझा दिया है ।  जीव बड़ा गन्दा हो गतया है ।  तुम्हारे शब्द को कोई नहीं मानेगा ।

जय सांई राम
सबका मालिक एक - Sabka Malik Ek

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