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Author Topic: Mann me basa gaun  (Read 4145 times)

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Offline JR

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    • Sai Baba
Mann me basa gaun
« on: April 03, 2007, 11:24:23 AM »
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  • मन में बसा गाँव


    भैया भी धुन के पक्के निकले। मम्मी को उनकी केमेस्ट्री की भाषा में ही पाठ पढ़ाया- मम्मी, आपकी केमेस्ट्री में पानी का फार्मूला है एचटूओ, लेकिन प्यास का कोई फार्मूला नहीं होता क्योंकि प्यास अनुभूति है। आप मेरे लिए छप्पन भोग बना सकती हैं, लेकिन मेरी भूख मुझे ही लगनी चाहिए क्योंकि वह अनुभूति है। पापा मुझे यूफोम की गद्दी वाला बिस्तर दे सकते हैं, लेकिन नींद नहीं दे सकते। नींद तो मेरी निजी है, वह मुझे ही आनी चाहिए। ठीक उसी तरह विवाह मुझे करना है इसलिए मुझे लगना चाहिए, मैं किससे विवाह करूँ?

    यह सही है कि ढोलक की थाप पर थिरकने वाली लड़की गजब की सुंदर है। यह भी सही है कि इस शादी में आए सभी मेहमान तल्लीन होकर उसे नाचते हुए देख रहे हैं। और मेघनाथ भैया? उनका इस तरह से उसे आँखें फाड़-फाड़कर देखना मुझे अच्छा नहीं लग रहा है।

    मेरे मेघनाथ भैया क्या ऐसी-वैसी हस्ती हैं? अच्छे-भले एमबीबीएस, एमडी वाली लंबी पूँछ वाली डिग्री लगाने वाले डॉक्टर हैं। वह भी भारत में नहीं, दुबई में। इसीलिए तो, उनतीस साल की छोटी-सी उम्र में लाखों में खेल रहे हैं। हों भी क्यों नहीं। पापा रामनाथ आचार्य, मुंबई के सिविल हॉस्पिटल में जाने-माने सर्जन हैं। मैं स्वयं मेडिकल के अंतिम वर्ष में हूँ। मम्मी तो कहती है, हमें फ्लैट के बाहर डॉक्टर्स हाउस वाली नेम प्लेट लगा लेनी चाहिए।

    एक बात बताना तो मैं भूल ही गया, कि हमारी मम्मी भी डॉक्टर हैं, लेकिन एमबीबीएस नहीं, वे केमेस्ट्री में पीएचडी हैं। जब-तब सुनाती रहती हैं, तुम चीर-फाड़ करने वालों में, मैं ही एक रचनात्मक कार्य करने वाली हूँ। उनकी बात सोलह आने सच है। जिस सुघड़ता से मम्मी ने धन की बागडोर सँभाली है, हम लोगों का ध्यान रखा है, मुंबई की व्यस्त जीवनशैली में व्यस्त रहकर रिश्ते निभाए हैं, उसके लिए उनकी सब तारीफ करते नहीं थकते।

    अब यही उदाहरण लें। शादी पापा की बुआ के बेटे की बड़ी बेटी की है। लेकिन निमंत्रण इतना आग्रह और अपनत्वभरा था, कि हम सभी को आना पड़ा। भैया भी एक महीने की छुट्टी पर दुबई से आए थे। उन्हें भी मम्मी ने यहाँ आने पर विशेष जोर दिया, क्योंकि सास वाली भूमिका उन्हें भी तो अब निभाना है। भैया से कई बार पूछ चुकी हैं- 'कोई देखी है? तुम्हारी निगाह में कोई लड़की हो तो बताओ?'

    भैया का एक ही उत्तर होता- 'मम्मी, लड़कियों को देखता रहता तो पढ़ाई कब करता? इस मामले में अपने राम भैया जैसे कार्तिक स्वामी नहीं है। शिल्पा पिछले दो वर्षों से पीछे पड़ी है, अपने मम्मी-पापा से मिलवाओ। मैं ही उसे टाल रहा हूँ। एक तो मेघनाथ भैया की ओर से हरी झंडी नहीं मिल रही है। दूसरा, अभी मेरा सिर्फ ग्रेज्युएशन ही क्या, पोस्ट ग्रेज्युएशन भी होना है। वर्ना मम्मी की फटकार से बचना मुश्किल है। मम्मी का सिद्धांत है, पहले पढ़ाई पूरी करो फिर प्यार-वार का चक्कर चलाना। अब मम्मी को कैसे समझाया जाए कि प्यार पढ़ाई करते-करते ही होता है। फिर देखती नहीं, भैया हरियाली में सात साल रहकर भी रेगिस्तान की गरम बालू पर चलते रहे।

    मेरी कहानी मैं आपको बाद में सुनाऊँगा। बात भैया की चल रही है। मैंने भैया को झकझोरा, तो समाधि भंग की स्थिति में न तो मुझे डाँट पाए न कुछ कह सके। लेकिन आँखें बराबर उस लड़की का पीछा करती रहीं।

    आखिर हमने छेड़ ही दिया- भैया, पता लगाएँ, सुंदरी कौन है? और भैया की मूक सहमति जानकर खोजबीन में लग गए। पंद्रह-बीस मिनटों में लड़की की पूरी जनमपत्री हाथ लग गई। लड़की दुल्हन की मौसेरी बहन थी। नाम चारुलता, शिक्षा एमए अर्थशास्त्र। परिवार में दो बहनें व एक भाई। बड़ी बहन विवाहित और भाई इंजीनियरिंग में पढ़ रहा है। घर में खेती-बाड़ी का काम और निवास निपट आदिम जाति कल्याण विभाग के झाबुआ गाँव में। बस यहीं सब गड़बड़ है। अब लड़की चाहे नखशिखांत सुंदर ही क्यों न हो, हमारे घर की बहू नहीं बन सकती। क्यों?
     
    be continue..............
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    Offline JR

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    Re: Mann me basa gaun
    « Reply #1 on: April 03, 2007, 11:25:54 AM »
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  • क्यों क्या पूछ रहे हैं साहब। रामनाथ आचार्य पिछले 30 वर्षों से मुंबई में रह रहे हैं। सायन जैसे उपनगर में तीन बेडरूम का, आधुनिक साज-सज्जा युक्त स्वयं का फ्लैट है, जहाँ सरस्वती और लक्ष्मी दोनों बरसों से प्रेमपूर्वक साथ रही हैं। इस सबने हमारी मम्मी को अहंकारी बना दिया है। उनका कहना है- गँवारों जैसे जीना भी कोई जीना है?

    वैचारिक बुद्धिवादिता के दायरे में न आने वाले लोग उन्हें पसंद नहीं हैं। इसीलिए अभी तक दर्जनों लड़कियों की तस्वीरें और जनमपत्री लौटा चुकी हैं। किसी की फोटो पसंद नहीं आती, तो किसी की जनमपत्री नहीं मिलती और जहाँ दोनों मिल जाते, वहाँ लड़की एज्युकेशन में मार खा जाती। मम्मी के विचारों में जहाँ तक हो, लड़की डॉक्टर हो या कम से कम साइंस पोस्ट ग्रेज्युएट हो।

    हमारी मम्मी का अटल विश्वास है, कि कला की पढ़ाई अर्थात बीए, एमए सिर्फ वे ही लड़कियाँ करती हैं जिनके नंबर कम होते हैं। जिन्हें साइंस में भर्ती नहीं मिलती। क्योंकि उनमें कम अकल होती है। अब इस दायरे में चारुलता कहीं से भी नहीं आती। इसलिए भैया की दीवानगी परवान चढ़ने पर मुझे शक हो रहा था।

    भैया भी धुन के पक्के निकले। मम्मी को उनकी केमेस्ट्री की भाषा में ही पाठ पढ़ाया- मम्मी, आपकी केमेस्ट्री में पानी का फार्मूला है एचटूओ, लेकिन प्यास का कोई फार्मूला नहीं होता क्योंकि प्यास अनुभूति है। आप मेरे लिए छप्पन भोग बना सकती हैं, लेकिन मेरीभूख मुझे ही लगनी चाहिए। क्योंकि वह अनुभूति है। पापा मुझे यूफोम की गद्दी वाला बिस्तर दे सकते हैं, लेकिन नींद नहीं दे सकते। नींद तो मेरी निजी है, वह मुझे ही आनी चाहिए। ठीक उसी तरह विवाह मुझे करना है इसलिए मुझे लगना चाहिए, मैं किससे विवाह करूँ?

    मम्मी क्या समझी और कितना समझी, वही जाने। लेकिन चारुलता के पापा से मिलने गाँव जाने के लिए राजी हो गईं। शादी में वह उसकी मम्मी के साथ आई थी। शादी के दूसरे ही दिन हम चारुलता के गाँव के लिए रवाना हो गए।

    छब्बीस साल की उम्र में पहली बार गाँव देखा। आश्चर्य हो रहा था। क्योंकि यह गाँव सिनेमा में देखे गाँव के सेट से और पुस्तकों में पढ़े कागज के गाँव से बिलकुल अलग था।

    पहुँचने के 15-20 मिनट बाद ही चारुलता ने हमारे सामने लस्सी के ग्लास रख दिए। ऐसी स्वादिष्ट लस्सी कभी नहीं चखी थी। पापा बाहर बरामदे में बैठे चारुलता के पिताजी से बातें कर रहे थे। चारुलता के पिताजी बहुत विनम्रता से कह रहे थे, साहब, आप पढ़े-लिखे बड़े लोग हैं। हमारी और हमारी बेटी की उमर गाँव में गुजरी है। वह कैसे रह पाएगी? फिर बात सिर्फ इस देश के बड़े शहर की नहीं है, विदेश की है। मेरी बेटी परेशान हो जाएगी। जहाँ तक शादी का प्रश्न है, भगवान का दिया सब कुछ है। आप जैसी चाहें, वैसी व्यवस्था हो जाएगी, लेकिन एक ही बात मन में खा रही है। मेरी बेटी विदेशी जीवन को कैसे अपना सकेगी?
     
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