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Author Topic: Punya-Paap  (Read 2161 times)

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Offline JR

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    • Sai Baba
Punya-Paap
« on: April 04, 2007, 08:14:35 AM »
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  • पुण्य पाप

    कांचनदेश के राजा धीरसिंह के आस्थान की नर्तकी थी, वसंतमालिनी ।  यघपि उसका जन्म साधारण परिवार में हुआ, परन्तु बचपन से ही नृत्य के प्रति वह विशेष रुचि दिखाती हुई आयी और बालिग होते-होते सुप्रसिद्व नर्तकी बन ई और नाम कमाया ।  राजा ने उसकी प्रतिभा को पहचाना और उसे आस्थान नर्तकी के पद पर नियुक्त किया ।  उसके नृत्य विन्यासों और असाधारण रुप भंगिमाओं को देखते हुए सबके सब मंत्रमुग्ध हो जाते थे ।  उस साल महारानी यामिनी देी के जन्म दिन के अवसर पर राजधानी में बड़े पैमाने पर उत्सव मनाये जा रहे थे ।  उस शुभ अवसर पर प्रजा के समक्ष उसका आदर-सत्कार करने का निर्णय राजा धीरसिंह ने लिया ।

    परन्तु, राजा का यह निर्णय अन्य कलाकारों और पंडितों को ठीक नहीं लगा ।  उन्हें जो गौरव नहीं मिला, वह एक राज नर्तकी को मिले, यह उन्हें बिलकुल पसंद नहीं आया ।  वे इस विषय को लेकर अंदर ही अंदर कुढ़ रहे थे ।  मौका मिलने पर उसका अपमान करने और उसे  नीचा दिखाने के लिये वे तैयार बैठे थे ।

    उस दिन की शाम को महारानी का जन्म दिनोत्सव मनाया जाने वाला था ।  वसंतमालिनी सजाये गये मंच पर बड़े ही विनय के सात एक कोने में बैठी हुई थी ।

    राजा धीरसिंह ने मूल्यवान भेंटें प्रदान करके उसका सत्कार किया और उसके नृत्य की प्रतिभा की प्रशंसा करते हुए कहा, हमारी वसंतमालिनी किसी अप्सरा से कम नहीं है ।  उसका अदभुत नृत्य कितना ही प्रशंसनीय है ।  ऐसी अदभुत नर्तकियाँ बहुत ही कम होती है ।  उसका हमारे आस्थान में होना हमारा सौभाग्य है ।  उसके अदभुत नृत्य को देखने का भाग्य देवताओं को भी नहीं मिला ।

    उपस्थित प्रजा ने तालियाँ बजाते हुए अपना हर्ष व्यक्त किया ।  पर, राजा से थोड़ी ही दूरी पर बैठे एक पंडित ने उठकर कहा, महाराज, क्षमा करें ।  आप अपूर्व कला पोषक है ।  कलाकारों का आदर करने में आपकी बराबरी करने की क्षमता किसी और में है ही नहीं ।  वसंतमालिनी एक सामान्य परिवार से आयी हुई कन्या है ।  किन्तु आपने उसे आस्थान नर्तकी बनाया, जो आपकी उदारता का ज्वलंत उदाहरण है ।  परन्तु, इसका यह मतलब नहीं कि आप उसकी तुलना अप्सराओं से करें ।  आपने ऐसा करके देवताओं का अपमान किया ।  मैंने जो कहा, उसमें कोई त्रुटि हो तो मुझे माफ करें ।

    इसके दूसरे ही क्षण एक नृत्य कलाकार उठ खड़ा हुआ और कहने लगा, मैंने अनगिनत नर्तकियों की नृत्य प्रतिभा देखी ।  वसंतमालिनी के नृत्य में स्वाभाविकता कम है और दिखावा अधिक ।  उसके नृत्य को देखते हुए आप ही आप हँसी फूट पड़ती है ।  यह दुर्भाग्य की बात है कि महाराज अपने हाथों उसका सम्मान कर रहे है ।  हमारे राज्य ने जो पाप किया, उसका यह फल है ।

    वही बैठे आस्थान बिदूषक गंगाधर शास्त्री ने उठकर कहा, महाप्रभु, हमारे राज्य ने जो पुण्य-पाप किये, इसके बारे में मैं नही जानता, पर इतना अवश्य जानता हूँ कि आस्थान नर्तकी वसंतमालिनी ने पुण्य-पाप दोनों किये ।

    बिदूषक की बातों ने महाराज में कुतूहल जगाया ।  उसने विदूषक से पूछा, ये लोग तो िसे पाप कह रहे है, अपमान मान रहे है, परन्तु आपका कहना है कि हमारी नर्तकी ने पाप-पुण्य दोनों किये है ।  यह कैसे संभव है ।  कृपया इस पर प्रकाश डालिये ।

    विदूषक ने कहा, आप श्रेष्ठ कला पोषक है ।  आपके राज्य में उसका जन्म लेना उसका पुण्य है ।  इसी कारण, आप आज इस विराट सभा में उसका सत्कार कर रहे है ।  परन्तु किसी जन्म में उसने पाप किया होगा और वह पाप अब उसका पीछा कर रहा है ।

    महाराज ने विदूषक से कहा कि वे इसे विशद रुप से समझाएँ और संदेहों को दूर करें ।

    साथी कलाकारों को जो आदर-सम्मान प्राप्त हो रहा है, उसे देखते हुए अन्य कलाकार ईर्ष्या के मारे जले जा रहे है ।  ऐसे लोगों के सम्मुख वसंतमालिनी को नाचना पड़ रहा है ।  यह उसका किया गया पाप है ।  विदूषक ने गंभीर स्वर में कहा ।

    इसके पहले जिन-जिन लोगों ने वसंतमालिनी की समालोचना की, उसके नृत्य को दिखावटटी बताया, उन्होंने शर्म के मारे सिर झुका लिये .  तब राजा ने कहा, ऐसे चाँद की सुन्दरता का आनन्द कोई नहीं ले सकता, जो चांदनी को नहीं फैलाता ।  उसी प्रकार साथी मानव में जो अच्छाई है, शक्ति-सामर्थ्य है, उनका जो आदर नहीं करता, उनका पांडित्य निष्प्रयोजन है ।  ऐसे लोगों के व्यक्तित्व में वह काला धब्बा है ।  मुझे इस बात का दुख है कि ऐसे लोग मेरे आस्थान में मौजूद है ।

    अपनी बाक् पटुता के बल पर जिन ईर्ष्यालु लोगों की असलियत का पर्दाफाश विदूषक ने किया, उसका सत्कार वसंतमालिनी के हाथों किया गया ।  जनता ने आन्नद-भरित होकर जोर से तालियाँ बजायी ।
    « Last Edit: April 04, 2007, 08:22:36 AM by Jyoti Ravi Verma »
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