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Author Topic: SMALL STORIES  (Read 109775 times)

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Offline Ramesh Ramnani

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Re: SMALL STORIES
« Reply #30 on: April 04, 2007, 11:42:14 PM »
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  • जय सांई राम।।।

    एक राजा साधु बन जंगल चले गए। वहां उन्हें एक शुभचिंतक मिला, जिसने कहा, 'हे राजन! आप गृहस्थाश्रम को त्याग कर संन्यास आश्रम की इच्छा कर रहे हैं। यह आप जैसे वीर क्षत्रियों के योग्य नहीं है। आप घर में भी रहकर व्रत, उपवास और धर्मानुष्ठान कर सकते हैं।' राजा ने जवाब दिया, जिसमें साधु धर्म स्वीकार करने की शक्ति न हो, वह गृहस्थाश्रम में रहता हुआ वानप्रस्थ धर्म का पालन कर सकता है, पर साधु धर्म के लिए गृहस्थाश्रम का त्याग आवश्यक है।'

    वह व्यक्ति बोला, 'आपको पहले सोना, चांदी, हाथी, घोड़े, रथ आदि का भंडार इकट्ठा कर लेना चाहिए था तब आप साधु बनते।' इस पर राजा ने कहा, 'यदि व्यक्ति के पास कैलाश पर्वत के समान सोने-चांदी के असंख्य पर्वत हों, फिर भी लोभी मनुष्य को उनसे संतोष नहीं होता। इच्छा आकाश के समान अनंत है जबकि धन सीमित है। केवल संतोष धारण करने से ही इच्छा की निवृत्ति हो सकती है।'

    अपना सांई प्यारा सांई सबसे न्यारा अपना सांई

    ॐ सांई राम।।।

    अपना साँई प्यारा साँई सबसे न्यारा अपना साँई - रमेश रमनानी

    Offline Ramesh Ramnani

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    Re: SMALL STORIES
    « Reply #31 on: April 07, 2007, 12:38:13 AM »
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  • जय सांई राम।।।

    दानवीर विक्रमादित्य।

    एक दिन राजा विक्रमादित्य दरबार को सम्बोधित कर रहे थे तभी किसी ने सूचना दी कि एक ब्राह्मण उनसे मिलना चाहता है। विक्रमादित्य ने कहा कि ब्राह्मण को अन्दर लाया जाए। जब ब्राह्मण उनसे मिला तो विक्रम ने उसके आने का प्रयोजन पूछा। ब्राह्मण ने कहा कि वह किसी दान की इच्छा से नहीं आया है, बल्कि उन्हें कुछ बतलाने आया है। उसने बतलाया कि मानसरोवर में सूर्योदय होते ही एक खम्भा प्रकट होता है जो सूर्य का प्रकाश ज्यों-ज्यों फैलता है ऊपर उठता चला जाता है और जब सूर्य की गर्मी अपनी पराकाष्ठा पर होती है तो सूर्य को स्पर्श करता है। ज्यों-ज्यों सूर्य की गर्मी घटती है छोटा होता जाता है तथा सूर्यास्त होते ही जल में विलीन हो जाता है। विक्रम के मन में जिज्ञासा हुई कि ब्राह्मण का इससे अभिप्राय क्या है। ब्राह्मण उनकी जिज्ञासा को भाँप गया और उसने बतलाया कि भगवान इन्द्र का दूत बनकर वह आया है ताकि उनके आत्मविश्वास की रक्षा विक्रम कर सकें। उसने कहा कि सूर्य देवता को घमण्ड है कि समुद्र देवता को छोड़कर पूरे ब्रह्माण्ड में कोई भी उनकी गर्मी को सहन नहीं कर सकता। 

    देवराज इन्द्र उनकी इस बात से सहमत नहीं हैं। उनका मानना हे कि उनकी अनुकम्पा प्राप्त मृत्युलोक का एक राजा सूर्य की गर्मी की परवाह न करके उनके निकट जा सकता है। वह राजा आप हैं। राजा विक्रमादित्य को अब सारी बात समझ में आ गई। उन्होंने सोच लिया कि प्राणोत्सर्ग करके भी सूर्य भगवान को समीप से जाकर नमस्कार करेंगे तथा देवराज के आत्मविश्वास की रक्षा करेंगे। उन्होंने ब्राह्मण को समुचित दान-दक्षिणा देकर विदा किया तथा अपनी योजना को कार्य-रुप देने का उपाय सोचने लगे। उन्हें इस बात की खुशी थी कि देवतागण भी उन्हें योग्य समझते हैं। भोर होने पर दूसरे दिन वे अपना राज्य छोड़कर चल पड़े। एकान्त में उन्होंने माँ काली द्वारा प्रदत्त दोनों बेतालों का स्मरण किया। दोनों बेताल तत्क्षण उपस्थित हो गए। 

    विक्रम को उन्होंने बताया कि उन्हें उस खम्भे के बारे में सब कुछ पता है। दोनों बेताल उन्हें मानसरोवर के तट पर लाए। रात उन्होंने हरियाली से भरी जगह पर काटी और भोर होते ही उस जगह पर नज़र टिका दी जहाँ से खम्भा प्रकट होता। सूर्य की किरणों ने ज्योंहि मानसरोवर के जल को छुआ कि एक खम्भा प्रकट हुआ। विक्रम तुरन्त तैरकर उस खम्भे तक पहुँचे। खम्भे पर ज्योंहि विक्रम चढ़े जल में हलचल हुई और लहरें उठकर विक्रम के पाँव छूने लगीं। ज्यों-ज्यों सूर्य की गर्मी बढी, खम्भा बढ़ता रहा। दोपहर आते-आते खम्भा सूर्य के बिल्कुल करीब आ गया। तब तक विक्रम का शरीर जलकर बिल्कुल राख हो गया था। सूर्य भगवान ने जब खम्भे पर एक मानव को जला हुआ पाया तो उन्हें समझते देर नहीं लगी कि विक्रम को छोड़कर कोई दूसरा नहीं होगा। उन्होंने भगवान इन्द्र के दावे को बिल्कुल सच पाया। 

    उन्होंने अमृत की बून्दों से विक्रम को जीवित किया तथा अपने स्वर्ण कुण्डल उतारकर उन्हें भेंट कर दिए। उन कुण्डलों की विशेषता थी कि कोई भी इच्छित वस्तु वे कभी भी प्रदान कर देते। सूर्य देव ने अपना रथ अस्ताचल की दिशा में बढ़ाया तो खम्भा घटने लगा। सूर्यास्त होते ही खम्भा पूरी तरह घट गया और विक्रम जल पर तैरने लगे। तैरकर सरोवर के किनारे आए और दोनों बेतालों का स्मरण किया। बेताल उन्हें फिर उसी जगह लाए जहाँ से उन्हें सरोवर ले गए थे। विक्रम पैदल अपने महल की दिशा में चल पड़े। कुछ ही दूर पर एक ब्राह्मण मिला जिसने उनसे वे कुण्डल मांग लिए। विक्रम ने बेहिचक उसे दोनों कुण्डल दे दिए। उन्हें बिल्कुल मलाल नहीं हुआ।

    ऐसे थे दानवीर विक्रमादित्य।

    अपना सांई प्यारा सांई सबसे न्यारा अपना सांई

    ॐ सांई राम।।  
    अपना साँई प्यारा साँई सबसे न्यारा अपना साँई - रमेश रमनानी

    Offline adwaita

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    Re: SMALL STORIES
    « Reply #32 on: April 07, 2007, 12:16:15 PM »
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  • Dear ramesh bhai,

    I always look forward for the story of the day. this is my favourite section. but there is one request from me,  i would be glad if the post is in english. i hope you wond mind. its is my humble request. please forgive me if i am wrong. om sai ram.


    Gayatri.

    Offline Ramesh Ramnani

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    Re: SMALL STORIES
    « Reply #33 on: April 09, 2007, 09:12:45 AM »
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  • जय सांई राम

    एक गाँव में एक बनिया रहता था। वो बनिया बहुत कन्जूस था। खाना खाने के समय अक्सर वो सैर पर निकलता था और रास्ते में जिस घर में उसे कोई खाना खाता हुआ दिखता बस उसी के घर घुस जाता और खाना खाने बैठ जाता। गाँव वाले उसकी इस आदत से बहुत परेशान थे पर कुछ कर नहीं पाते थे क्योंकि वो उसकी दुकान से उधार सामान लेते थे। इस सब से बनिया बडा खुश था दुकान भी चल रही थी और खाने के पैसे भी बच रहे थे।

    एक बार उस बनिये के घर उसका कोई दूर का रिश्तेदार तोताराम आया। अब गाँव वाले मन ही मन बडे खुश थे कि आज बनिया बुरा फंसा। लेकिन बनिया था बडा तेज। कुछ देर तोताराम से यहाँ-वहाँ की बातें करने के बाद बनिया बोला, चलो तोताराम हम तुम्हें अपने गाँव के मिठे मिठे अमरूद खिलाएं। “अमरूद अरे वाह”, तोताराम बोला। अब दोनों सुक्खन माली के बाग की तरफ चल पडे।

    सुक्खन चाचा अरे ओ सुक्खन चाचा बनिये ने दुर से ही आवाज़ दी। देखो हमारे यहाँ मेहमान आए हैं इन्हें कुछ ताज़े और मीठे अमरूद खिलाओ। माली बोला हाँ हाँ क्यों नहीं ये लो एकदम ताज़े और मीठे हैं। मीठे क्या हैं पेड‌‌़े हैं पेड़े!! बनिया बोला, “क्या कहा पेड़े हैं”?  तो इसका मतलब क्या पेड़े अमरूद से भी बढिया होते हैं। हाँ जी होते तो हैं माली ने कहा। तो फिर हम इन्हें पेड़े ही खिलाएंगे। सुनकर तोताराम के मुहँ में पानी आ गया।

    अब बनिया चल दिया मोटेराम हलवाई की दुकान पर और बोला मोटेराम जी, ये हमारे मेहमान हैं इन्हें ताज़े पेड़े खिलाओ। हाँ जी ये लो एकदम ताज़े पेड़े हैं। अजी, पेड़े क्या हैं मक्खन हैं मक्खन! यह सुनते ही बनिया फिर बोला, “क्या कहा मक्खन”? तो इसका मतलब क्या मक्खन पेड़ों से भी बढिया होते हैं। हाँ जी मक्खन होता तो बढिया है। तो फिर हम इन्हें मक्खन खिलाएंगे। सुनकर तोताराम के मुहँ एक बार फिर उतर गया।

    अब बनिया चला हरिया ग्वाले के घर। इधर तोताराम का भूख के मारे बुरा हाल हो रहा था और उधर बनिया मन ही मन बहुत खुश हो रहा था। उसके पैसे जो बच रहे थे।

    हरिया अरे ओ हरिया, जरा हमारे तोताराम जी को मक्खन खिलाओ। और हाँ देखो मक्खन जरा ताज़ा लाना, बाहर से ही बनिया चिल्लाया। “अभी लाया हुज़ूर”, हरिया ने हुक्म बजाया। ये लिजिए, ये रहा मक्खन। मक्खन ताज़ा है न हरिया - बनिया मुस्कुराते हुए बोला। अजी साहब बिल्कुल ताज़ा है मेरा मेक्खन्, एकदम पानी की तरह। सुनते ही बनिया बोला - क्या कहा? पानी है! हाँ जी एकदम पानी है, हरिया ने घबराते हुए जवाब दिया। तो फिर हम तोताराम को पानी ही पिलायेंगे। और अब तो तोताराम की शक्ल देखनेवाली थी। खैर अब बनिया चला बाबा गुदना की प्याउ पर।

    प्याऊ पर पहुँच कर बनिया बोला -  बाबा ओ बाबा - जरा हमारे मेहमान को थोडा पानी पिला दो। और हाँ पानी ताज़ा पिलाना। हाँ-हाँ बेटा मेरा पानी एकदम ताज़ा है ताज़ा। और बेटा पानी क्या है हवा है हवा। क्या कहा - बनिया बोला, तुम्हारा पानी हवा है। हाँ साहब मेरा पानी हवा है जितना भी पियो पेट ही नहीं भरता। तब तो हम अपने मेहमान को हवा ही खिलाएंगे। चलो तोताराम हम तुम्हें हवा खिलाएंगे।

    बस-बस बहुत हुआ, अब मुझे कुछ नहीं खाना, भूख के मारे मेरा दम निकला जा रहा है। ये कहता हुआ तोताराम वहाँ से खिसक लिया। और बनिया मन ही मन बहुत खुश हुआ।

    बेटा तेजल तुम कभी ऐसा तो नही करोगी जब फोरम के आंटी-अंकल कभी तुम्हारे घर चन्दीगढ़ आये? पता चले सिर्फ चन्दीगढ़ की हवा खाके ही बन के बुद्धु वापस घर को लौटना पड़े। हाहाहाहाहाहाहाहा

    अपना सांई प्यारा सांई सबसे न्यारा अपना सांई

    ॐ सांई राम।।।

    अपना साँई प्यारा साँई सबसे न्यारा अपना साँई - रमेश रमनानी

    Offline Ramesh Ramnani

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    Re: SMALL STORIES
    « Reply #34 on: April 10, 2007, 03:06:13 AM »
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  • जय सांई राम।।।

    सच्ची इबादत
     
    एक बार एक बादशाह कुछ साथियों के साथ अपने मुल्क के सरहदी इलाकों का मुआयना करने जा रहा था। चलते-चलते नमाज का वक्त हो गया। अगल-बगल कोई साफ-सुथरी और समतल जमीन नहीं दिखी तो साथियों ने बादशाह के लिए वहीं रास्ते में ही मुसल्ला बिछा दिया। बादशाह ने अभी नमाज पढ़ना शुरू ही किया था कि एक युवती दौड़ती हुई आई और उसके मुसल्ले पर पैर रखती हुई आगे निकल गई। बादशाह को बड़ा क्रोध आया, लेकिन उस समय उसके मंत्री-संतरी वगैरह भी नमाज पढ़ रहे थे, सो वह कुछ नहीं बोला।

    पर जब वह युवती उधर से लौटी, तो बादशाह ने डपट कर कहा, मूर्ख स्त्री! इधर से जाते समय तुझे दिखाई नहीं दिया कि मैं नमाज अता कर रहा हूं। तू जाए-नमाज पर पैर रख कर चली गई। युवती बोली, जहांपनाह! गुस्ताखी माफ हो। मेरा चित्त अपने स्वामी पर लगा हुआ था। बादशाह ने उसी तरह सख्ती से दरियाफ्त किया, ऐसा क्या हो गया है तुम्हारे स्वामी को?

    युवती नम्रता से बोली, मेरे स्वामी काफी दिनों से परदेस गए हुए हैं। मुझे किसी ने बताया कि वे परदेस से आ रहे हैं, बस उन्हीं को देखने गई थी। लेकिन, वह सूचना झूठी निकली। वहां कोई और आया था। बादशाह डांट कर बोला, स्वामी के लिए जा रही थी तो क्या रास्ता और जाए-नमाज नहीं दिखाई दे रहा था? युवती बोली, उस समय मुझे अपने स्वामी के अलावा कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था। न आप दिखे और न ही आप का जाए-नमाज दिखाई पड़ा। लेकिन जहांपनाह, आप तो सर्वशक्तिमान और एकमात्र स्वामी अल्लाह में अपना चित्त लगाए हुए थे, फिर आप ने मुझे इधर से जाते हुए कैसे देख लिया?

    बादशाह को अपनी गलती का एहसास हुआ और वह बोला, तुम ठीक कहती हो। खुदा की इबादत करना और खुदा में चित्त लगाना दो अलग-अलग बातें हैं। जिसका चित्त खुदा में लग जाएगा उसे इस नश्वर दुनिया की बाकी चीजों के लिए कहां होश रह जाएगा। 

    अपना सांई प्यारा सांई सबसे न्यारा अपना सांई

    ॐ सांई राम।।।

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    The Hart and the Hunter

    We often despise what is most useful to us.

     
    The Hart was once drinking from a pool and admiring the noble figure he made there. "Ah," said he, "where can you see such noble horns as these, with such antlers! I wish I had legs more worthy to bear such a noble crown; it is a pity they are so slim and slight." At that moment a Hunter approached and sent an arrow whistling after him. Away bounded the Hart, and soon, by the aid of his nimble legs, was nearly out of sight of the Hunter; but not noticing where he was going, he passed under some trees with branches growing low down in which his antlers were caught, so that the Hunter had time to come up. "Alas! alas!" cried the Hart: We often despise what is most useful to us.

    सबका मालिक एक - Sabka Malik Ek

    Sai Baba | प्यारे से सांई बाबा कि सुन्दर सी वेबसाईट : http://www.shirdi-sai-baba.com
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    Offline Ramesh Ramnani

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    Re: SMALL STORIES
    « Reply #36 on: April 11, 2007, 12:29:37 AM »
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  • जय सांई राम।।।

    नगर पिता 
     
    महामाहन को वैशाली नगर में अपने सद्रुणों और वरिष्ठता के कारण नगर पिता की उपाधि मिली हुई थी। वह इसे एक उत्तरदायित्व समझकर भली-भांति निभा रहे थे। एक दिन उस नगर पर शत्रु राज्य ने चढ़ाई कर दी। शत्रु की सेना बालकों, स्त्रियों और वृद्धों को भी सताने लगी। अत्यंत वृद्ध और अशक्त होते हुए भी महामाहन दुश्मनों के बीच आए और ललकार कर बोले, 'तुम्हें कुटिल नीति के कारण भले ही सफलता मिल गई है, पर अपने को विजेता समझने की भूल न करो। नगर की एक भी स्त्री, बालक या वृद्ध का बाल तक बांका नहीं होना चाहिए।'

    शत्रु राजा ने बूढ़े महामाहन की यह मांग अनसुनी कर दी। संयोग से वह महामाहन का दूर का संबंधी था, इसलिए उसके प्रति उदारता दिखाते हुए उसने कहा, 'मैं आपकी और आपके परिवार की रक्षा का वचन दे सकता हूं। इसके अलावा मुझे किसी और से कुछ लेना-देना नहीं है।' महामाहन केवल अपनी सलामती नहीं चाहते थे। वह नगर पिता की हैसियत से अपना कर्त्तव्य निभाना चाहते थे। जब नगर के हजारों स्त्री-पुरुष कष्ट में हों, तब अकेले अपने कुटुंब को बचाने का उनके लिए कोई अर्थ नहीं था। उन्हें अपने प्राणों की चिंता नहीं थी। उनका नगर धर्म उन्हें पुकार रहा था। आक्रमणकारी राजा को उन्होंने खूब समझाया, खूब प्रार्थना की। अंत में राजा थोड़ा पिघला और बोला, 'महामाहन, आप इतना कह रहे हैं तो आपकी बात मान लेता हूं। लेकिन मेरी एक शर्त है। आप नदी में डुबकी मारें। आपके ऊपर आने से पहले जितने नागरिक जितनी सम्पत्ति लेकर भाग जाना चाहें भाग सकते हैं। देखता हूं आप कब तक नदी में रहते हैं।'

    राजा की यह कठोर शर्त महामाहन मान गए। उन्होंने नदी में डुबकी लगाई और तली में पहुंच कर एक पेड़ की जड़ से चिपट गए। घंटों बीत जाने पर भी महामाहन ऊपर न आए। अंत में खोज करने पर महामाहन का शरीर वृक्ष की जड़ के साथ जकड़ा पाया गया। उन्होंने नगर की रक्षा के लिए अपना शरीर त्याग दिया था। इस तरह नगर पिता की उपाधि को उन्होंने सार्थक किया।

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    Offline Sai ka Tej

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    Re: SMALL STORIES
    « Reply #37 on: April 11, 2007, 04:13:28 AM »
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    ramesh uncle
    sai ram

    your story is really nice and yes whenever you come to chandigarh main kanjoos nahi banoongi in this story it means hamain kanjoos nahi bannana chaheey

                                 :) :D ;D                      

    sai ram
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    Offline Ramesh Ramnani

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    Re: SMALL STORIES
    « Reply #38 on: April 12, 2007, 02:20:25 AM »
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    चंदन बनो
     
    एक महात्मा ने अपने शिष्यों को एक ऐसे व्यक्ति को सुधारने का कार्य सौंपा जो जरूरत से ज्यादा नशा करता था। इससे वह स्वयं तो बर्बाद हो ही रहा था, उसका पूरा परिवार भी तबाह हो रहा था। शिष्य उसके पास गए और कुछ ही दिनों में वापस आकर महात्मा से बोले, 'गुरु जी, हमने पूरा प्रयास कर लिया, मगर वह सुधरने वाला नहीं है।' महात्मा ने शिष्यों से कहा, 'मैंने तुम्हें चंदन बनने की शिक्षा दी है। जो कुल्हाड़ी चंदन को काटती है, वह भी सुगंधित हो जाती है। चंदन अपना स्वभाव कभी नहीं छोड़ता। जब वह व्यक्ति भी बुराई का मार्ग नहीं छोड़ रहा तो तुम भलाई का मार्ग बीच में ही छोड़कर वापस कैसे आ गए? स्वभाव के मामले में तो वह व्यक्ति तुम से भी अच्छा निकला। लगता है मेरी शिक्षा में कुछ कमी रह गई।'

    शिष्यों को गुरु की बातों से अपनी गलती का अहसास हुआ और वे दोबारा उस व्यक्ति को सुधारने चल दिए। इस बार उन्होंने जी जान से प्रयास किया, जिससे वह व्यक्ति सुधर गया और उसका पूरा जीवन ही बदल गया।

    अपना सांई प्यारा सांई सबसे न्यारा अपना सांई

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    अपना साँई प्यारा साँई सबसे न्यारा अपना साँई - रमेश रमनानी

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    Re: SMALL STORIES
    « Reply #39 on: April 13, 2007, 02:37:37 AM »
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  • जय सांई राम।।।

    जीवन का उपयोग  

    महर्षि रमण के आश्रम के पास एक गांव में एक अध्यापक रहता था। रोज-रोज के पारिवारिक तनाव और कलह से ऊबकर उसने आत्महत्या करने का निर्णय किया। यह निर्णय करना उसके लिए आसान नहीं था, क्योंकि परिवार के भविष्य की भी उसे चिंता थी। ऊहापोह की इस स्थिति में वह महर्षि रमण के आश्रम में पहुंचा और उन्हें सारी बात बताकर उनकी राय पूछी। महर्षि उस समय आश्रवासियों के भोजन के लिए पत्तलें बना रहे थे। वे चुपचाप उसकी बात सुनते रहे। पत्तल बनाने में महर्षि के परिश्रम और तल्लीनता को देखकर अध्यापक को आश्चर्य हुआ। उसने पूछा, 'आप इतने परिश्रम से ये पत्तल बना रहे हैं, जबकि भोजन के उपरांत ये कूड़े में फेंक दी जाएंगी।' महर्षि मुस्कराते हुए बोले, 'आप ठीक कहते हैं, लेकिन किसी वस्तु का पूरा उपयोग हो जाने के बाद उसे फेंकना बुरा नहीं है। बुरा तो तब कहा जाएगा जब उसका उपयोग किए बिना अच्छी अवस्था में ही कोई फेंक दे। मेरे कहने का आशय तो आप समझ ही गए होंगे।'

    अध्यापक की समस्या का समाधान हो गया और वह दुखों से भागने की बजाय उनसे जूझने और संघर्ष करने का संकल्प लेकर वहां से रवाना हुआ। 

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    Offline Sai ka Tej

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    Re: SMALL STORIES
    « Reply #40 on: April 13, 2007, 05:42:27 AM »
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  • jai sai ram

                              LITTLE ANJU TAKES CHARGE
    "anju, your mother and i are going out. nanu & nani MA are resting. do answer  the phone call, please,"  said her father.

    "today  you are INCHARGE," mummy said before leaving.

    Anju locked up the door. just then the telephone rang. anju, the little minder, picked it up. it was urgent. her fathers friend was coming over the day after. he wanted to be met at the station

                  ANJU noted down:

    HIS NAME
    DATE OF ARRIVAL
    NAME OF THE TRAIN
    TIME OF ARRIVAL
    COACH AND SEAT NO.

    HER PARENTS WERE HAPPY WITH THEIR LITTLE MINDER.

    SAI RAM
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    Offline Ramesh Ramnani

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    Re: SMALL STORIES
    « Reply #41 on: April 16, 2007, 12:55:14 AM »
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    नकली नौकर
     
    एक साहूकार था। उसका एक नौकर था। साहूकार उससे बहुत ज्यादा काम लेता था। एक दिन नौकर घर से भाग गया। साहूकार उसे खोजने निकला। काफी दौड़ भाग के बाद वह मिल गया। साहूकार ने उसे दो-चार चांटे लगाए और घर ले आया। अब वह उससे पहले से ज्यादा काम लेने लगा। नौकर भी खुशी-खुशी काम कर रहा था।

    कुछ महीने बाद एक दिन साहूकार के दरवाजे पर एक लड़का आया और उसके पैर पकड़ कर बोला, 'मालिक मुझे माफ कर दो। मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई जो आप को बिना बताए यहां से चला गया। मुझे फिर से नौकरी पर रख लीजिए।' साहूकार चक्कर में पड़ गया, क्योंकि दोनों की शक्ल-सूरत काफी मिलती-जुलती थी। उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि उसका असली नौकर कौन है, वह जिसे वह पकड़ कर लाया था या वह जो सामने खड़ा था। गौर से देखने के बाद साहूकार समझ गया कि जिस आदमी को वह पकड़ कर लाया था, वह उसका असली नौकर नहीं था। उसने नकली नौकर से पूछा, 'मेरा नौकर तो यह है, तुम कौन हो।' वह बोला, 'आप का नौकर'। साहूकार गुस्से में बोला, 'सच बताओ तुम कौन हो'। वह फिर बोला, 'आप का नौकर हूं और मेरा नाम लुकमान है।'

    साहूकार समझ गया कि ये हकीम लुकमान हैं। उसने उनके पैर पकड़ कर कहा, 'मुझे माफ कर दो। मैंने आपको पहचाना नहीं।' लुकमान ने कहा, 'माफ तो मैं कर दूंगा, लेकिन मेरी एक शर्त है। आज से तुम किसी नौकर को सताओगे नहीं।'

    ' ठीक है, लेकिन आप यह तो बताइए कि आप इतने दिन तक यहां इतने कष्ट क्यों सहते रहे। चांटा खाने के बाद भी आप ने अपना नाम नहीं बताया।' हकीम लुकमान बोले, 'सेठ, इसमें मेरा नफा था। मुझे यहां रह कर तजुर्बा हुआ कि नौकर के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए। मेरे घर में भी एक नौकर है। मैं उससे कई तरह के बेढब काम लेता रहता हूं। मुझे पता ही नहीं चलता कि उसे कौन सा काम अच्छा लगता है और कौन सा बुरा। अब इसकी समझ हो गई है।'

    अपना सांई प्यारा सांई सबसे न्यारा अपना सांई

    ॐ सांई राम।।।
    अपना साँई प्यारा साँई सबसे न्यारा अपना साँई - रमेश रमनानी

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    • ~सांई~~ੴ~~सांई~
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    Re: SMALL STORIES
    « Reply #42 on: April 18, 2007, 01:59:25 AM »
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  • ॐ सांई राम!~!

    न देने वाला मन


    एक भिखारी सुबह-सुबह भीख मांगने निकला। चलते समय उसने अपनी झोली में जौ के मुट्ठी भर दाने डाल लिए। टोटके या अंधविश्वास के कारण भिक्षाटन के लिए निकलते समय भिखारी अपनी झोली खाली नहीं रखते। थैली देख कर दूसरों को लगता है कि इसे पहले से किसी ने दे रखा है। पूर्णिमा का दिन था, भिखारी सोच रहा था कि आज ईश्वर की कृपा होगी तो मेरी यह झोली शाम से पहले ही भर जाएगी।

    अचानक सामने से राजपथ पर उसी देश के राजा की सवारी आती दिखाई दी। भिखारी खुश हो गया। उसने सोचा, राजा के दर्शन और उनसे मिलने वाले दान से सारे दरिद्र दूर हो जाएंगे, जीवन संवर जाएगा। जैसे-जैसे राजा की सवारी निकट आती गई, भिखारी की कल्पना और उत्तेजना भी बढ़ती गई। जैसे ही राजा का रथ भिखारी के निकट आया, राजा ने अपना रथ रुकवाया, उतर कर उसके निकट पहुंचे। भिखारी की तो मानो सांसें ही रुकने लगीं। लेकिन राजा ने उसे कुछ देने के बदले उलटे अपनी बहुमूल्य चादर उसके सामने फैला दी और भीख की याचना करने लगे। भिखारी को समझ नहीं आ रहा था कि क्या करे। अभी वह सोच ही रहा था कि राजा ने पुन: याचना की। भिखारी ने अपनी झोली में हाथ डाला, मगर हमेशा दूसरों से लेने वाला मन देने को राजी नहीं हो रहा था। जैसे-तैसे कर उसने दो दाने जौ के निकाले और उन्हें राजा की चादर पर डाल दिया। उस दिन भिखारी को रोज से अधिक भीख मिली, मगर वे दो दाने देने का मलाल उसे सारे दिन रहा। शाम को जब उसने झोली पलटी तो उसके आश्चर्य की सीमा न रही। जो जौ वह ले गया था, उसके दो दाने सोने के हो गए थे। उसे समझ में आया कि यह दान की ही महिमा के कारण हुआ है। वह पछताया कि काश! उस समय राजा को और अधिक जौ दी होती, लेकिन नहीं दे सका, क्योंकि देने की आदत जो नहीं थी।


    जय सांई राम!~!


    "लोका समस्ता सुखिनो भवन्तुः
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    Aum ShantiH ShantiH ShantiH"~~~

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    May none suffer from grief or sorrow. May peace be to all~~~

    Offline Ramesh Ramnani

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    Re: SMALL STORIES
    « Reply #43 on: April 19, 2007, 01:56:36 AM »
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  • जय सांई राम

    खोटे सिक्के
     
    किसी राजा के पास एक महात्मा बैठे हुए थे। उसी समय महात्मा जी का एक शिष्य वहां आया और कहने लगा, 'यहां के दुकानदार बहुत ही खराब हैं। जब मैं एक सिक्का लेकर सामान खरीदने गया तो उन्होंने कहा कि यह खोटा है, इसलिए तुम्हें सामान नहीं मिल सकता। तुम महात्मा जी के शिष्य हो, इसलिए छोड़ देते हैं अन्यथा तुम्हें दंड दिलाते।' राजा भी यह सब सुन रहा था। उसने सिक्का लेकर देखा और पूछा, 'यह आपको किसने दिया है? क्या आपको मेरे कानून का पता नहीं है। यह खोटा है और खोटा सिक्का चलाने वाले को मैं सख्त दंड देता हूं। मैं जानता हूं कि आपने यह नहीं बनाया होगा, पर आपको यह सिक्का दिया किसने?' इस पर महात्मा ने कहा, 'यह खोटा है तो क्या हुआ, इस पर राजा की छाप तो है ही।' राजा ने कहा, 'मेरा सिक्का सच्चा होना चाहिए। मेरी छाप होने पर भी खोटा सिक्का बनाना और चलाना अपराध है।'  इस पर महात्मा बोले, 'राजन, आपका शासन अन्याय से पूरी तरह मुक्त नहीं है। आप निरपराध को सजा देते हैं। युद्ध के नाम पर रक्तपात करते हैं। ऐसा करना क्या खोटा सिक्का चलाने के समान अपराध नहीं है?' राजा समझ गया। उसने पूछा, 'तब क्या करना चाहिए।' महात्मा बोले, 'सुशासन करना चाहिए। बेकसूर व्यक्ति को दंड न मिले इसका ध्यान रखना चाहिए। '

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    Offline Ramesh Ramnani

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    Re: SMALL STORIES
    « Reply #44 on: April 20, 2007, 09:52:14 AM »
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  • जय सांई राम।।।

    सहयोग की भावना
     
    देवताओं और असुरों में संघर्ष चलता रहता था। पहले दानव हावी होते, पर अंतत: देवता ही जीतते। एक बार दानवों ने ब्रह्मण से निवेदन किया, 'हमें समझ में नहीं आता कि हमारे साथ यह पक्षपातपूर्ण व्यवहार क्यों हो रहा है। हम दोनों आपकी संतान हैं। पिता पुत्रों पर सदा समभाव रखता है। पर आप तो पिता होकर भी हमारे प्रति सद्भाव नहीं रखते। आप सदा देवों का ही पक्ष लेते हैं।'

    ब्रह्मण ने एक शब्द भी नहीं कहा। उन्होंने दानवों को समझाने के लिए एक विराट भोज का आयोजन किया। उसमें देव और दानव दोनों ही आमंत्रित थे। भोज में स्वादिष्ट व्यंजन परोसे गए। ब्रह्मण के आदेश से देवों और दानवों के हाथों में खपच्चियां बंधवा दी गईं जिससे कि उनके हाथ मुड़ न सकें। देवों और दानवों के बैठने की व्यवस्था इस प्रकार की गई कि वे एक दूसरे को देख न सकें। स्वादिष्ट भोज्य पदार्थों को देखकर दानवों का मन ललचाने लगा, पर खपच्चियां बंधी होने के कारण वे खा नहीं सके, क्योंकि हाथ मुड़ते ही नहीं थे। बिना हाथ मोड़े वे मुंह में निवाले कैसे रख सकते थे। वे मन ही मन ब्रह्मण को कोस रहे थे।

    दूसरी तरफ देवताओं ने जब हाथ से खाने में खुद को असमर्थ पाया तो वे आमने-सामने बैठ गए और एक दूसरे के मुंह में भोजन डालते गए। इनका यह प्रयोग पूर्णरूपेण सफल रहा। सभी ने छककर खाया। असुर भूखे उठ खड़े हुए। क्रोध से भरे जब वे देवताओं की ओर आए तो उन्हें खाते देखकर हैरान रह गए।

    ब्रह्मण ने असुरों से कहा, 'तुम सभी भूखे रह गए और देवताओं ने अच्छी तरह भोजन कर लिया। देवताओं और तुम में यही अंतर है। देवता एक दूसरे को सहयोग करते हैं। उन्हें केवल अपने पेट की नहीं, दूसरों के पेट की भी चिंता है, इसलिए वे सदा तुम लोगों से जीतते रहे हैं। तुम में देवताओं से अधिक शक्ति है, मगर सहयोग की भावना न रहने से तुम्हारी पराजय होती है। यदि तुम भी जीतना चाहते हो तो एक दूसरे का सहयोग करना सीखो। तुम्हारी विजय होगी।'

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