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Main Section => Little Flowers of DwarkaMai => Topic started by: JR on March 30, 2007, 04:00:49 AM

Title: दिल्ली दूर है ।
Post by: JR on March 30, 2007, 04:00:49 AM
महान पुरुषों के जीवन की घटनाएँ  

दिल्ली दूर है ।

दिल्ली के सुल्तान घियासुद्दीन तुगलक की बड़ी इच्छा थी कि उसके किले के चारों ओर एक नई दीवार निर्मित की जाये ।  यह चौदहवीं शताब्दी की बात है, जब नगर के आस-पास इतने मजदूर उपलब्ध नहीं होते थे ।  फिर भी सुलतान को पूरा विश्वास था कि उसके हुक्म के नाम पर उसके अधिकारीगण मजदूरों की फौज इकट्ठी कर लेंगे ।  पर आह ।  भाग्य में कुछ और बदा था ।  सारे मजदूर हिन्दू और मुसलमानों के पीर एक बहुत बड़े फकीर निजामुद्दीन औलिया की ख्वाहिश पूरी करने के लिए एक झील की खुदाई करने में लगे थे ।

उन्हें हमारे काम पर लगा दो ।  औलिया की झाल इन्तजार कर सकती है, नाराज सुलतान ने हुक्म दिया ।  यह हुक्म फकीर को बताया गया और मजदूरों को भी कहा गया ।  दीवार इन्तजार कर सकती है, फकीर ने कहा ।  मजदूरों ने भी सुलतान के हुक्म की परवाह नहीं की ।  सुलतान इस बात से और भी नाराज था कि मजदूर औलिया का काम बिना मजदूरी लिये कर रहे थे ।

सुलतान ने औलिया को सबक सिखााने का निश्चय किया ।  लेकिन तभी बंगाल में, जो उसकी सल्तनत का हिस्सा था, विद्रोह हो गया और उसे उसको दबाने के लिये सेना के साथ वहाँ जाना पड़ा ।  दिल्ली में हुकूमत की जिम्मेदारी उसके बेटे मुहमम्द पर थी ।  उसे सुलतान से यह निर्देश दिया गया कि किसी भी तरह से, येन केन प्रकारेण, झील से मजदूरों को हटाकर दीवार का निर्माण पहले पूरा करे ।

मुहम्मद के दिल में फकीर के लिये बड़ी इज्जत थी ।  उसने झील की खुदाई के काम की प्रगति में कोई रुकावट नहीं डाली ।

सुलतान घियासुद्दीन ने बंगाल में विद्रोह को दबा दिया ।  साथ ही, दिल्ली की खबर भी लेता रहा ।  उसने फकीर से बदला लेने की कसम खा ली ।  वह अपने बेटे मुहम्मद पर भी आग बबूला हो रहा था । 

जब सुलतान विजयी होकर लौट रहा था, तब सबको पूरा विश्वास था कि वह फकीर को फाँसी दे देगा ।  और मुहम्मद को भी माफ नहीं करेगा ।  फकीर के शुभचिन्तकों ने उसको दिल्ली छोड़कर चले जाने की सलाह दी ।  फकीर सिर्फ मुस्कुरा कर रह गये ।

हे मालिक ।  जब क्रोध से पागल सुलतान दिल्ली पहुँचेगा तब आप की क्या दुर्गति होगी, सोचिये जरा,  अनेक लोगों ने फकीर को चेतावनी दी ।

दिल्ली दूर है ।  फकीर ने जवाव दिया ।

इस बीच मुहम्मद राजधानी में विजयी पिता का स्वागत करने के लिये एक शानदार मंच और भड़कीला तोरण द्वार बनाने में लगा गया था ।  सुलतान तेजी से नगर की ओर बढ रहा था ।

कृपया करके अपनी जिन्दगी के वास्ते यहाँ से चले जाइये, हम आपसे प्रार्थना करते है ।  फकीर के मुरीदों ने उनसे बड़ी मिन्नत की ।

दिल्ली दूर स्त,  (दिल्ली दूर है) फकीर ने बड़ी शान्ति के साथ फिर वही बात दुहरा दी ।  जब कोई उनसे सुलतान के डर से दिल्ली छोड़ कर चले जाने के लिये कहता तो वे यही कहकर मुस्कुरा देते ।

नगाड़ा और तुरही के जयघोष पर सुलतान ने स्वागत द्वार में प्रवेश किया और मंच की ओर प्रस्थान किया ।  वहाँ दो अलंकृत सिंहासन रखे हुए थे ।  एक सिंहासन सुल्तान के लिये था और दूसरा मुहम्मद के लिये ।  लेकिन सुलतान ने अपने छोटे बेटे को दूसरे सिंहासन पर बैठने का संकेत किया, जिससे यह पता चला कि मुहम्मद अब राज्य का वारिस नहीं रहा ।

तभी अचानक मंच ध्वस्त हो गया ।  भय से लोग चीखने-चिल्लाने लगे ।  धूल के एक बवण्डर ने सब को अन्धा कर दिया ।  जब शोर और तूफान के थम जाने पर सुलतान और उसके चहेते बेटे के शरीरों को मलबे से बाहर घसीट कर लाया गया तब वे मृत पाये गये ।  आह ।  दिल्ली सचमुच घियासुद्दीन के लिये बहूत दूर साबित हुई ।

क्या यह मात्र दुर्घटना थी ।  अफ्रीकी यात्री इब्न बतुता ऐसा नहीं मानता ।  उसकी मान्यता के अनुसार तोरण द्वार और मंच सुल्तान के लिये मौत के जाल थे ।

दिल्ली दूर स्त एक लोकप्रिय कहावत है, जिसका अर्थ होता है, वह लक्ष्य जो मिलता हुआ प्रतीत होते हुए भी अप्रत्याशित रुप से अप्राप्य रह जाता है ।
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Title: Re: दिल्ली दूर है ।
Post by: marioban29 on January 16, 2008, 11:05:31 AM
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