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Author Topic: Shree Sainath Stavan Manjari- lyrics in Hindi and English  (Read 20782 times)

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Offline tanu_12

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Shree Sainath Stavan Manjari- lyrics in Hindi and English
« on: November 06, 2011, 04:59:12 AM »
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  • ॐ सांई राम!!!


    श्री दासगणु महाराज कृत
    श्री सांईनाथ स्तवन मंजरी~~


    हिन्दी अनुगायन
    ठाकुर भूपति सिंह

    ॥ॐ श्री गणेशाय नमः॥
    ॥ॐ श्री सांईनाथाय नमः॥

    मयूरेश्वर जय सर्वाधार। सर्व साक्षी हे गौरिकुमार।
    अचिन्त्य सरूप हे लंबोदर। रक्षा करो मम,सिद्धेश्वर॥1॥

    सकल गुणों का तूं है स्वामी। गण्पति तूं है अन्तरयामी।
    अखिल शास्त्र गाते तव महिमा। भालचन्द्र मंगल गज वदना॥2॥

    माँ शारदे वाग विलासनी। शब्द-स्रष्टि की अखिल स्वामिनी।
    जगज्जननी तव शक्ति अपार। तुझसे अखिल जगत व्यवहार॥3॥

    कवियों की तूं शक्ति प्रदात्री। सारे जग की भूषण दात्री।
    तेरे चरणों के हम बंदे। नमो नमो माता जगदम्बे॥4॥

    पूर्ण ब्रह्म हे सन्त सहारे। पंढ़रीनाथ रूप तुम धारे।
    करूणासिंधु जय दयानिधान। पांढ़ुरंग नरसिंह भगवान॥5॥

    सारे जग का सूत्रधार तूं। इस संस्रति का सुराधार तूं।
    करते शास्त्र तुम्हारा चिंतन। तत् स्वरूप में रमते निशदिन॥6॥

    जो केवल पोथी के ज्ञानी । नहीं पाते तुझको वे प्राणी।
    बुद्धिहीन प्रगटाये वाणी। व्यर्थ विवाद करें अज्ञानी॥7॥

    तुझको जानते सच्चे संत। पाये नहीं कोई भी अंत।
    पद-पंकज में विनत प्रणाम। जयति-जयति शिरडी घनश्याम॥8॥

    पंचवक्त्र शिवशंकर जय हो। प्रलयंकर अभ्यंकर जय हो।
    जय नीलकण्ठ हे दिगंबर। पशुपतिनाठ के प्रणव स्वरा॥9॥

    ह्रदय से जपता जो तव नाम। उसके होते पूर्ण सब काम।
    सांई नाम महा सुखदाई। महिमा व्यापक जग में छाई॥10॥

    पदारविन्द में करूं प्रणाम। स्तोत्र लिखूं प्रभु तेरे नाम।
    आशीष वर्षा करो नाथ हे । जगतपति हे भोलेनाथ हे॥11॥

    दत्तात्रेय को करूं प्रणाम। विष्णु नारायण जो सुखधाम।
    तुकाराम से सन्तजनों को। प्रणाम शत शत भक्तजनों को॥12॥

    जयति-जयति जय जय सांई नाथ हे। रक्षक तूं ही दीनदयाल हे।
    मुझको कर दो प्रभु सनाथ। शरणागत हूं तेरे द्वार हे॥13॥

    तूं है पूर्ण ब्रह्म भगवान। विष्णु पुरूषोत्तम तूं सुखधाम।
    उमापति शिव तूं निष्काम। था दहन किया नाथ ने काम॥14॥

    नराकार तूं तूं है परमेश्वर। ज्ञान-गगन का अहो दिवाकर।
    दयासिंधु तूं करूणा-आकर। दलन-रोग भव-मूल सुधाकर॥15॥

    निर्धन जन का चिन्तामणि तूं। भक्त-काज हित सुरसुरि जम तूं।
    भवसागर हित नौका तूं है। निराश्रितों का आश्रय तूं है॥16॥

    जग-कारण तूं आदि विधाता। विमलभाव चैतन्य प्रदाता।
    दीनबंधु करूणानिधि ताता। क्रीङा तेरी अदभुत दाता॥17॥

    तूं है अजन्मा जग निर्माता। तूं मृत्युंजय काल-विजेता।
    एक मात्र तूं ज्ञेय-तत्व है। सत्य-शोध से रहे प्राप्य है॥18॥

    जो अज्ञानी जग के वासी। जन्म-मरण कारा-ग्रहवासी।
    जन्म-मरण के आप पार है। विभु निरंजन जगदाधार है॥19॥

    निर्झर से जल जैसा आये। पूर्वकाल से रहा समाये।
    स्वयं उमंगित होकर आये। जिसने खुद है स्त्रोत बहायें॥20॥

    शिला छिद्र से ज्यों बह निकला। निर्झर उसको नाम मिल गया।
    झर-झर कर निर्झर बन छाया। मिथ्या स्वत्व छिद्र से पाया॥21॥

    कभी भरा और कभी सूखता। जल निस्संग इसे नकारता।
    चिद्र शून्य को सलिल न माने। छिद्र किन्तु अभिमान बखाने॥22॥

    भ्रमवश छिद्र समझता जीवन। जल न हो तो कहाँ है जीवन।
    दया पात्र है छिद्र विचार। दम्भ व्यर्थ उसने यों धारा॥23॥

    यह नरदेह छिद्र सम भाई। चेतन सलिल शुद्ध स्थायी।
    छिद्र असंख्य हुआ करते हैं। जलकण वही रहा करते हैं॥24॥

    अतः नाथ हे परम दयाघन। अज्ञान नग का करने वेधन।
    वग्र अस्त्र करते कर धारण। लीला सब भक्तों के कारण॥25॥

    जङत छिद्र कितने है सारे। भरे जगत में जैसे तारे।
    गत हुये वर्तमान अभी हैं। युग भविष्य के भीज अभी हैं॥26॥

    भिन्न-भिन्न ये छिद्र सभी है। भिन्न-भिन्न सब नाम गति है।
    पृथक-पृथक इनकी पहचान। जग में कोई नहीं अनजान॥27॥

    चेतन छिद्रों से ऊपर है। "मैं तूं" अन्तर नहीं उचित है।
    जहां द्वैत का लेश नहीं है।सत्य चेतना व्याप रही है॥28॥

    चेतना का व्यापक विस्तार। हुआ अससे पूरित संसार।
    "तेरा मेरा" भेद अविचार। परम त्याज्य है बाह्य विकार॥29॥

    मेघ गर्भ में निहित सलिल जो। जङतः निर्मल नहीं भिन्न सो।
    धरती तल पर जब वह आता। भेद-विभेद तभी उपजाता॥30॥

    जो गोद में गिर जाता है। वह गोदावरी बन जाता है।
    जो नाले में गिर जाता है। वह अपवित्र कहला जाता है॥31॥

    सन्त रूप गोदावरी निर्मल। तुम उसके पाव अविरल जल।
    हम नाले के सलिल मलिनतम। भेद यही दोनों में केवल॥32॥

    करने जीवन स्वयं कृतार्थ। शरण तुम्हारी आये नाथ।
    कर जोरे हम शीश झुकाते। पावन प्रभु पर बलि-बलि जाते॥33॥

    पात्र-मात्र से है पावनता। गोदा-जल की अति निर्मलता।
    सलिल सर्वत्र तो एक समान। कहीं न दिखता भिन्न प्रणाम॥34॥

    गोदावरी का जो जलपात्र। कैसे पावन हुआ वह पात्र।
    उसके पीछे मर्म एक है। गुणः दोष आधार नेक है॥35॥

    मेघ-गर्भ से जो जल आता। बदल नहीं वह भू-कण पाता।
    वही कहलाता है भू-भाग। गोदावरी जल पुण्य-सुभाग॥36॥

    वन्य भूमि पर गिरा मेघ जो। यद्यपि गुण में रहे एक जो।
    निन्दित बना वही कटुखारा। गया भाग्य से वह धिक्कारा॥37॥

    सदगुरू प्रिय पावन हैं कितने। षड्रिपुओं के जीता जिनने।
    अति पुनीत है गुरू की छाया। शिरडी सन्त नाम शुभ पाया॥38॥

    अतः सन्त गोदावरी ज्यों है। अति प्रिय हित भक्तों के त्यों हैं।
    प्राणी मात्र के प्राणाधार। मानव धर्म अवयं साकार॥39॥

    जग निर्माण हुआ है जब से। पुण्यधार सुरसरिता तब से।
    सतत प्रवाहित अविरल जल से। रुद्धित किंचित हुआ न तल है॥40॥

    सिया लखन संग राम पधारे। गोदावरी के पुण्य किनारे।
    युग अतीत वह बीत गया है। सलिल वही क्या शेष रहा है॥41॥

    जल का पात्र वहीं का वह है। जलधि समाया पूर्व सलिल है।
    पावनता तब से है वैसी। पात्र पुरातन युग के जैसी॥42॥

    पूरव सलिल जाता है ज्यों ही। नूतन जल आता है त्यों ही।
    इसी भाँति अवतार रीति है। युग-युग में होती प्रतीत है॥43॥

    बहु शताब्दियाँ संवत् सर यों। उन शतकों में सन्त प्रवर ज्यों।
    हो सलिल सरिस सन्त साकार। ऊर्मिविभूतियां अपरंपार॥44॥

    सुरसरिता ज्यों सन्त सु-धारा। आदि महायुग ले अवतार।
    सनक सनन्दन सनत कुमार। सन्त वृन्द ज्यों बाढ़ अपारा॥45॥

    नारद तुम्बर पुनः पधारे। ध्रुव प्रहलाद बली तन धारे।
    शबरी अंगद नल हनुमान। गोप गोपिका बिदुर महाना॥46॥

    सन्त सुसरिता बढ़ती जाती। शत-शत धारा जलधि समाती।
    बाढ़ें बहु यों युग-युग आती वर्णन नहीं वाणी कर पाती॥47॥

    सन्त रूप गोदावरी तट पर। कलियुग के नव मध्य प्रहर पर।
    भक्ति-बाढ़ लेकर तुम आये। 'सांईनाथ" सुनाम तुम कहाये॥48॥

    चरण कमल द्वय दिव्य ललाम। प्रभु स्वीकारों विनत प्रणाम।
    अवगुण प्रभु हैं अनगिन मेरे। चित न धरों प्रभु दोष घनेरे॥49॥

    मैं अज्ञानी पहित पुरातन। पापी दल का परम शिरोमणी।
    सच में कुटिल महाखलकामी। मत ठुकराओं अन्तरयामी॥50॥

    दोषी कैसा भी हो लोहा। पारस स्वर्ण बनाता चोखा।
    नाला मल से भरा अपावन। सुरसरिता करती है पावन॥51॥

    मेरा मन अति कलुष भरा है। नाथ ह्रदय अति दया भरा है।
    कृपाद्रष्टि से निर्मल कर दें। झोली मेरी प्रभुवर भर दें॥52॥

    पासस का संग जब मिल जाता। लोह सुवर्ण यदि नहीं बन पाता।
    तब तो दोषी पारस होता। विरद वही अपना है खोता॥53॥

    पापी रहा यदि प्रभु तव दास। होता आपका ही उपहास।
    प्रभु तुम पारस,मैं हूँ लोहा। राखो तुम ही अपनी शोभा॥54॥

    अपराध करे बालक अज्ञान। क्रोध न करती जननी महान।
    हो प्रभु प्रेम पूर्ण तुम माता। कृपाप्रसाद दीजियें दाता॥55॥

    सदगुरू सांई हे प्रभु मेरे। कल्पवृक्ष तुम करूणा प्रेरे।
    भवसागर में मेरी नैया। तूं ही भगवान पार करैया॥56॥

    कामधेनू सम तूं चिन्ता मणि।ज्ञान-गगन का तूं है दिनमणि।
    सर्व गुणों का तूं है आकार। शिरडी पावन स्वर्ग धरा पर॥57॥

    पुण्यधाम है अतिशय पावन। शान्तिमूर्ति हैं चिदानन्दघन।
    पूर्ण ब्रम्ह तुम प्रणव रूप हें। भेदरहित तुम ज्ञानसूर्य हें॥58॥

    विज्ञानमूर्ति अहो पुरूषोत्तम। क्षमा शान्ति के परम निकेतन।
    भक्त वृन्द के उर अभिराम। हों प्रसन्न प्रभु पूरण काम॥59॥

    सदगुरू नाथ मछिन्दर तूं है। योगी राज जालन्धर तूं है।
    निवृत्तिनाथ ज्ञानेश्वर तूं हैं। कबीर एकनाथ प्रभु तूं है॥60॥

    सावता बोधला भी तूं है। रामदास समर्थ प्रभु तूं है।
    माणिक प्रभु शुभ सन्त सुख तूं। तुकाराम हे सांई प्रभु तूं॥61॥

    आपने धारे ये अवतार। तत्वतः एक भिन्न आकार।
    रहस्य आपका अगम अपार। जाति-पाँति के प्रभो उस पार॥62॥

    कोई यवन तुम्हें बतलाता। कोई ब्राह्मण तुम्हें जतलाता।
    कृष्ण चरित की महिमा जैसी। लीला की है तुमने तैसी॥63॥

    गोपीयां कहतीं कृष्ण कन्हैया। कहे 'लाडले' यशुमति मैया।
    कोई कहें उन्हें गोपाल। गिरिधर यदूभूषण नंदलाल॥64॥

    कहें बंशीधर कोई ग्वाल। देखे कंस कृष्ण में काल।
    सखा उद्धव के प्रिय भगवान। गुरूवत अर्जुन केशव जान॥65॥

    ह्रदय भाव जिसके हो जैसे। सदगुरू को देखे वह वैसा।
    प्रभु तुम अटल रहे हो ऐसे। शिरडी थल में ध्रुव सम बैठे॥66॥

    रहा मस्जिद प्रभु का आवास। तव छिद्रहीन कर्ण आभास।
    मुस्लिम करते लोग अनुमान। सम थे तुमको राम रहमान॥67॥

    धूनी तव अग्नि साधना। होती जिससे हिन्दू भावना।
    "अल्ला मालिक" तुम थे जपते। शिवसम तुमको भक्त सुमरते॥68॥

    हिन्दू-मुस्लिम ऊपरी भेद। सुभक्त देखते पूर्ण अभेद।
    नहीं जानते ज्ञानी विद्वेष। ईश्वर एक पर अनगिन वेष॥69॥

    पारब्रम्ह आप स्वाधीन। वर्ण जाति से मुक्त आसीन।
    हिन्दू-मुस्लिम सब को प्यारे। चिदानन्द गुरूजन रखवारे॥70॥

    करने हिन्दू-मुस्लिम एक। करने दूर सभी मतभेद।
    मस्जिद अग्नि जोङ कर नाता। लीला करते जन-सुख-दाता॥71॥

    प्रभु धर्म-जाति-बन्ध से हीन। निर्मल तत्व सत्य स्वाधीन।
    अनुभवगम्य तुम तर्कातीत। गूंजे अनहद आत्म संगीत॥72॥

    समक्ष आपके वाणी हारे। तर्क वितर्क व्यर्थ बेचारे।
    परिमति शबद् है भावाभास। हूं मैं अकिंचन प्रभु का दास॥73॥

    यदयपि आप हैं शबदाधार। शब्द बिना न प्रगटें गीत।
    स्तुति करूं ले शबदाधार। स्वीकारों हें दिव्य अवतार॥74॥

    कृपा आपकी पाकर स्वामी। गाता गुण-गण यह अनुगामी।
    शबदों का ही माध्यम मेरा। भक्ति प्रेम से है उर प्रेरा॥75॥

    सन्तों की महिमा है न्यारी। ईशर की विभूति अनियारी।
    सन्त सरसते साम्य सभी से। नहीं रखते बैर किसी से॥76॥

    हिरण्यकशिपु रावंअ बलवान। विनाश हुआ इनका जग जान।
    देव-द्वेष था इसका कारण। सन्त द्वेष का करें निवारण॥77॥

    गोपीचन्द अन्याय कराये। जालन्धर मन में नहीं लाये।
    महासन्त के किया क्षमा था। परम शान्ति का वरण किया था॥78॥

    बङकर नृप-उद्धार किया था। दीर्घ आयु वरदान दिया था।
    सन्तों की महिमा जग-पावन। कौन कर सके गुण गणगायन॥79॥

    सन्त भूमि के ज्ञान दिवाकर। कृपा ज्योति देते करुणाकर।
    शीतल शशि सम सन्त सुखद हैं। कृपा कौमुदी प्रखर अवनि है॥80॥

    है कस्तूरी सम मोहक संत। कृपा है उनकी सरस सुगंध।
    ईखरसवत होते हैं संत। मधुर सुरूचि ज्यों सुखद बसंत॥81॥

    साधु-असाधु सभी पा करूणा। दृष्टि समान सभी पर रखना।
    पापी से कम प्यार न करते। पाप-ताप-हर-करूणा करते॥82॥

    जो मल-युत है बहकर आता। सुरसरि जल में आन समाता।
    निर्मल मंजूषा में रहता। सुरसरि जल नहीं वह गहता॥83॥

    वही वसन इक बार था आया। मंजूषा में रहा समाया।
    अवगाहन सुरसरि में करता। धूल कर निर्मल खुद को करता॥84॥

    सुद्रढ़ मंजूषा है बैकुण्ठ। अलौकिक निष्ठा गंग तरंग।
    जीवात्मा ही वसन समझिये। षड् विकार ही मैल समझिये॥85॥

    जग में तव पद-दर्शन पाना। यही गंगा में डूब नहाना।
    पावन इससे होते तन-मन। मल-विमुक्त होता वह तत्क्षण॥86॥

    दुखद विवश हैं हम संसारी। दोष-कालिमा हम में भारी।
    सन्त दरश के हम अधिकारी। मुक्ति हेतु निज बाट निहारी॥87॥

    गोदावरी पूरित निर्मल जल। मैली गठरी भीगी तत्जल।
    बन न सकी यदि फिर भी निर्मल। क्या न दोषयुत गोदावरि जल॥88॥

    आप सघन हैं शीतल तरूवर।श्रान्त पथिक हम डगमग पथ हम।
    तपे ताप त्रय महाप्रखर तम। जेठ दुपहरी जलते भूकण॥89॥

    ताप हमारे दूर निवारों। महा विपद से आप उबारों।
    करों नाथ तुम करूणा छाया। सर्वज्ञात तेरी प्रभु दया॥90॥

    परम व्यर्थ वह छायातरू है। दूर करे न ताप प्रखर हैं।
    जो शरणागत को न बचाये। शीतल तरू कैसे कहलाये॥91॥

    कृपा आपकी यदि नहीं पाये। कैसे निर्मल हम रह जावें।
    पारथ-साथ रहे थे गिरधर। धर्म हेतु प्रभु पाँचजन्य-धर॥92॥

    सुग्रीव कृपा से दनुज बिभीषण। पाया प्राणतपाल रघुपति पद।
    भगवत पाते अमित बङाई। सन्त मात्र के कारण भाई॥93॥

    नेति-नेति हैं वेद उचरते। रूपरहित हैं ब्रह्म विचरते।
    महामंत्र सन्तों ने पाये। सगुण बनाकर भू पर लायें॥94॥

    दामा ए दिया रूप महार। रुकमणि-वर त्रैलोक्य आधार।
    चोखी जी ने किया कमाल। विष्णु को दिया कर्म पशुपाल॥95॥

    महिमा सन्त ईश ही जानें। दासनुदास स्वयं बन जावें।
    सच्चा सन्त बङप्पन पाता। प्रभु का सुजन अतिथि हो जाता॥96॥

    ऐसे सन्त तुम्हीं सुखदाता। तुम्हीं पिता हो तुम ही माता।
    सदगुरु सांईनाथ हमारे। कलियुग में शिरडी अवतारें॥97॥

    लीला तिहारी नाथ महान। जन-जन नहीं पायें पहचान।
    जिव्हा कर ना सके गुणगान। तना हुआ है रहस्य वितान॥98॥

    तुमने जल के दीप जलायें। चमत्कार जग में थे पायें।
    भक्त उद्धार हित जग में आयें। तीरथ शिरडी धाम बनाए॥99॥

    जो जिस रूप आपको ध्यायें। देव सरूप वही तव पायें।
    सूक्षम तक्त निज सेज बनायें। विचित्र योग सामर्थ दिखायें॥100॥

    पुत्र हीन सन्तति पा जावें। रोग असाध्य नहीं रह जावें।
    रक्षा वह विभूति से पाता। शरण तिहारी जो भी आता॥101॥

    भक्त जनों के संकट हरते। कार्य असम्भव सम्भव करतें।
    जग की चींटी भार शून्य ज्यों। समक्ष तिहारे कठिन कार्य त्यों॥102॥

    सांई सदगुरू नाथ हमारें। रहम करो मुझ पर हे प्यारे।
    शरणागत हूँ प्रभु अपनायें। इस अनाथ को नहीं ठुकरायें॥103॥

    प्रभु तुम हो राज्य राजेश्वर। कुबेर के भी परम अधीश्वर।
    देव धन्वन्तरी तव अवतार। प्राणदायक है सर्वाधार॥104॥

    बहु देवों की पूजन करतें। बाह्य वस्तु हम संग्रह करते।
    पूजन प्रभु की शीधी-साधा। बाह्य वस्तु की नहीं उपाधी॥105॥

    जैसे दीपावली त्यौहार। आये प्रखर सूरज के द्वार।
    दीपक ज्योतिं कहां वह लाये। सूर्य समक्ष जो जगमग होवें॥106॥

    जल क्या ऐसा भू के पास। बुझा सके जो सागर प्यास।
    अग्नि जिससे उष्मा पायें। ऐसा वस्तु कहां हम पावें॥107॥

    जो पदार्थ हैं प्रभु पूजन के। आत्म-वश वे सभी आपके।
    हे समर्थ गुरू देव हमारे। निर्गुण अलख निरंजन प्यारे॥108॥

    तत्वद्रष्टि का दर्शन कुछ है। भक्ति भावना-ह्रदय सत्य हैं।
    केवल वाणी परम निरर्थक। अनुभव करना निज में सार्थक॥109॥

    अर्पित कंरू तुम्हें क्या सांई। वह सम्पत्ति जग में नहीं पाई।
    जग वैभव तुमने उपजाया। कैसे कहूं कमी कुछ दाता॥110॥

    "पत्रं-पुष्पं" विनत चढ़ाऊं। प्रभु चरणों में चित्त लगाऊं।
    जो कुछ मिला मुझे हें स्वामी। करूं समर्पित तन-मन वाणी॥111॥

    प्रेम-अश्रु जलधार बहाऊं। प्रभु चरणों को मैं नहलाऊं।
    चन्दन बना ह्रदय निज गारूं। भक्ति भाव का तिलक लगाऊं॥112॥

    शब्दाभूष्ण-कफनी लाऊं। प्रेम निशानी वह पहनाऊं।
    प्रणय-सुमन उपहार बनाऊं। नाथ-कंठ में पुलक चढ़ाऊं॥113॥

    आहुति दोषों की कर डालूं। वेदी में वह होम उछालूं।
    दुर्विचार धूम्र यों भागे। वह दुर्गंध नहीं फिर लागे॥114॥

    अग्नि सरिस हैं सदगुरू समर्थ। दुर्गुण-धूप करें हम अर्पित।
    स्वाहा जलकर जब होता है। तदरूप तत्क्षण बन जाता है॥115॥

    धूप-द्रव्य जब उस पर चढ़ता। अग्नि ज्वाला में है जलता।
    सुरभि-अस्तित्व कहां रहेगा। दूर गगन में शून्य बनेगा॥116॥

    प्रभु की होती अन्यथा रीति। बनती कुवस्तु जल कर विभुति।
    सदगुण कुन्दन सा बन दमके। शाशवत जग बढ़ निरखे परखे॥117॥

    निर्मल मन जब हो जाता है। दुर्विकार तब जल जाता है।
    गंगा ज्यों पावन है होती। अविकल दूषण मल वह धोती॥118॥

    सांई के हित दीप बनाऊं। सत्वर माया मोह जलाऊं।
    विराग प्रकाश जगमग होवें। राग अन्ध वह उर का खावें॥119॥

    पावन निष्ठा का सिंहासन। निर्मित करता प्रभु के कारण।
    कृपा करें प्रभु आप पधारें। अब नैवेद्य-भक्ति स्वीकारें॥120॥

    भक्ति-नैवेद्य प्रभु तुम पाओं। सरस-रास-रस हमें पिलाओं।
    माता, मैं हूँ वत्स तिहारा। पाऊं तव दुग्धामृत धारा॥121॥

    मन-रूपी दक्षिणा चुकाऊं। मन में नहीं कुछ और बसाऊं।
    अहम् भाव सब करूं सम्पर्ण। अन्तः रहे नाथ का दर्पण॥122॥

    बिनती नाथ पुनः दुहराऊं। श्री चरणों में शीश नमाऊं।
    सांई कलियुग ब्रह्म अवतार। करों प्रणाम मेरे स्वीकार॥123॥


    ॐ सांई राम!!!

    ~~~प्रार्थनाष्टक~~~

    शान्त चित्त प्रज्ञावतार जय। दया-निधान सांईनाथ जय।
    करुणा सागर सत्यरूप जय। मयातम संहारक प्रभु जय॥124॥

    जाति-गोत्र-अतीत सिद्धेश्वर। अचिन्तनीयं पाप-ताप-हर।
    पाहिमाम् शिव पाहिमाम् शिव। शिरडी ग्राम-निवासिय केशव॥125॥

    ज्ञान-विधाता ज्ञानेश्वर जय। मंगल मूरत मंगलमय जय।
    भक्त-वर्गमानस-मराल जय। सेवक-रक्षक प्रणतापाल जय॥126॥

    स्रष्टि रचयिता ब्रह्मा जय-जय। रमापते हे विष्णु रूप जय।
    जगत प्रलयकर्ता शिव जय-जय। महारुद्र हें अभ्यंकर जय॥127॥

    व्यापक ईश समाया जग तूं। सर्वलोक में छाया प्रभु तूं।
    तेरे आलय सर्वह्रदय हैं। कण-कण जग सब सांई ईश्वर है॥128॥

    क्षमा करे अपराध हमारें। रहे याचना सदा मुरारे।
    भ्रम-संशय सब नाथ निवारें। राग-रंग-रति से उद्धारे॥129॥

    मैं हूँ बछङा कामधेनु तूं। चन्द्रकान्ता मैं पूर्ण इन्दु तूं।
    नमामि वत्सल प्रणम्य जय। नाना स्वर बहु रूप धाम जय॥130॥

    मेरे सिर पर अभय हस्त दों। चिन्त रोग शोक तुम हर लो।
    दासगणू को प्रभु अपनाओं। 'भूपति' के उर में बस जओं॥131॥

    कवि स्तुति कर जोरे गाता। हों अनुकम्पा सदा विधाता।
    पाप-ताप दुःख दैन्य दूर हो। नयन बसा नित तव सरूप हों॥132॥

    ज्यौ गौ अपना वत्स दुलारे। त्यौ साईं माँ दास दुलारे।
    निर्दय नहीं बनो जगदम्बे। इस शिशु को दुलारो अंबे ॥133॥

    चन्दन तरुवर तुम हो स्वामी। हीन-पौध हूं मैं अनुगामी।
    सुरसरि समां तू है अतिपावन। दुराचार रत मैं कर्दमवत ॥134॥

    तुझसे लिपट रहू यदि मलयुत। कौन कहे तुझको चन्दन तरु।
    सदगुरु तेरी तभी बड़ाई। त्यागो मन जब सतत बुराई ॥135॥

    कस्तुरी का जब साथ मिले। अति माटी का तब मोल बड़े।
    सुरभित सुमनों का साथ मिले। धागे को भी सम सुरभि मिले ॥136॥

    महान जनों की होती रीति। जीना पर हुई हैं उनकी प्रीति।
    वही पदार्थ होता अनमोल। नहीं जग में उसका फिर तौला ॥137॥

    रहा नंदी का भस्म कोपीना। संचय शिव ने किया आधीन।
    गौरव उसने जन से पाया। शिव संगत ने यश फैलाया॥138॥

    यमुना तट पर रचायें। वृन्दावन में धूम मचायें।
    गोपीरंजन करें मुरारी। भक्त-वृनद मोहें गिरधारी॥139॥

    होंवें द्रवित प्रभों करूणाघन। मेरे प्रियतम नाथ ह्रदयघन।
    अधमाधम को आन तारियें। क्षमा सिन्धु अब क्षमा धारियें॥140॥

    अभ्युदय निःश्रेयस पाऊ। अंतरयामी से यह चाहूं।
    जिसमें हित हो मेरे दाता। वही दीजियें मुझे विधाता॥141॥

    मैं तो कटु जलहूं प्रभु खारा। तुम में मधु सागर लहराता।
    कृपा-बिंदु इक पाऊ तेरा। मधुरिम मधु बन जायें मेरा॥142॥

    हे प्रभु आपकी शक्ति अपार। तिहारे सेवक हम सरकार।
    खारा जलधि करें प्रभु मीठा। दासगणु पावे मन-चीता॥143॥

    सिद्धवृन्द का तुं सम्राट। वैभव व्यापक ब्रह्म विराट।
    मुझमें अनेक प्रकार अभाव। अकिंचन नाथ करें निर्वाह॥144॥

    कथन अत्यधिक निरा व्यर्थ हैं। आधार एक गुरु समर्थ हैं ।
    माँ की गोदी में जब सुत हो। भयभीत कहो कैसे तब हो॥145॥

    जो यह स्तोत्र पड़े प्रति वासर। प्रेमार्पित हो गाये सादर ।
    मन-वाँछित फल नाथ अवश दें। शाशवत शान्ति सत्य गुरुवर दें॥146॥

    सिद्ध वरदान स्तोत्र दिलावे। दिव्य कवच सम सतत बचावें।
    सुफल वर्ष में पाठक पावें। जग त्रयताप नहीं रह जावें॥147॥

    निज शुभकर में स्तोत्र सम्भालो। शुचिपवित्र हो स्वर को ढालो।
    प्रभु प्रति पावन मानस कर लो। स्तोत्र पठन श्रद्धा से कर लो॥148॥

    गुरूवार दिवस गुरु का मानों। सतगुरु ध्यान चित्त में ठानों।
    स्थोथरा पठन हो अति फलदाई। महाप्रभावी सदा-सहाई॥149॥

    व्रत एकादशी पुण्य सुहाई। पठन सुदिन इसका कर भाई।
    निश्चय चमत्कार थम पाओ। शुभ कल्याण कल्पतरु पाओ॥150॥

    उत्तम गति स्तोत्र प्रदाता। सदगुरू दर्शन पाठक पाता।
    इह परलोक सभी हो शुभकर। सुख संतोष प्राप्त हो सत्वर॥151॥

    स्तोत्र पारायण सद्य: फल दे। मन्द-बुद्धि को बुद्धि प्रबल दे।
    हो संरक्षक अकाल मरण से। हों शतायु जा स्तोत्र पठन से॥152॥

    निर्धन धन पायेगा भाई। महा कुबेर सत्य शिव साईं।
    प्रभु अनुकम्पा स्तोत्र समाई। कवि-वाणी शुभ-सुगम सहाई॥153॥

    संततिहीन पायें सन्तान। दायक स्तोत्र पठन कल्याण।
    मुक्त रोग से होगी काया। सुखकर हो साईं की छाया॥154॥

    स्तोत्र-पाठ नित मंगलमय है। जीवन बनता सुखद प्रखर है।
    ब्रह्मविचार गहनतर पाओ। चिंतामुक्त जियो हर्षाओ॥155॥

    आदर उर का इसे चढ़ाओ। अंत द्रढ़ विश्वास बासाओ।
    तर्क वितर्क विलग कर साधो। शुद्ध विवेक बुद्धि अवराधो॥156॥

    यात्रा करो शिरडी तीर्थ की। लगन लगी को नाथ चरण की।
    दीन दुखी का आश्रय जो हैं। भक्त-काम-कल्प-द्रुम सोहें॥157॥

    सुप्रेरणा बाबा की पाऊं। प्रभु आज्ञा पा स्तोत्र रचाऊं।
    बाबा का आशीष न होता। क्यों यह गान पतित से होता॥158॥

    शक शंवत अठरह चालीसा। भादों मास शुक्ल गौरीशा।
    शाशिवार गणेश चौथ शुभ तिथि। पूर्ण हुई साईं की स्तुति॥159॥

    पुण्य धार रेवा शुभ तट पर। माहेश्वर अति पुण्य सुथल पर।
    साईंनाथ स्तवन मंजरी। राज्य-अहिल्या भू में उतारी॥160॥

    मान्धाता का क्षेत्र पुरातन। प्रगटा स्तोत्र जहां पर पावन।
    हुआ मन पर साईं अधिकार। समझो मंत्र साईं उदगार॥161॥

    दासगणु किंकर साईं का। रज-कण संत साधु चरणों का।
    लेख-बद्ध दामोदर करते। भाषा गायन ' भूपति' करते॥162॥

    साईंनाथ स्तवन मंजरी। तारक भव-सागर-ह्रद-तन्त्री।
    सारे जग में साईं छाये। पाण्डुरंग गुण किकंर गाये॥163॥

    श्रीहरिहरापर्णमस्तु | शुभं भवतु | पुण्डलिक वरदा विठ्ठल |
    सीताकांत स्मरण | जय जय राम | पार्वतीपते हर हर महादेव |

    श्री सदगुरु साईंनाथ महाराज की जय ||
    श्री सदगुरु साईंनाथपर्णमस्तु ||

    जय सांई राम!!!

    ॐ सांई राम!!!

    ॥श्री सच्चिदानन्द सदगुरु साईनाथ महाराज की जय ॥

    ॥ॐ राजाधिराज योगिराज परब्रह्य सांईनाथ महाराज॥

    ॥श्री सच्चिदानन्द सदगुरु साईनाथ महाराज की जय ॥


    जय सांई राम!!


    source - http://www.shirdisaibabakripa.org/2009/10/shri-sainath-stavan-manjari-lyrics-in.html
    Man Ke Gehre Andhiyare Me "Sai" Naam Diye Jaisa

    Give Light, and the darkness will disappear of itself...

    Offline tanu_12

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    Re: Shree Sainath Stavan Manjari- lyrics in Hindi and English
    « Reply #1 on: November 06, 2011, 05:11:33 AM »
  • Publish
  • DAS GANU
    Translated from the marathi by Smt.Zarine Taraporevala and
    Edited by Dr. Smt.Indira Kher,
    Ex.Executive Editor, Shri Sai Leela (English Edn)


    A HUMBLE TRIBUTE OF PRAISE TO SHRI SAINATH
    I bow down to Shri GANESH.
    Oh,MAYURESHWARA ,You are the one on whom we depend,
    Oh,son of GAURI, the all-knowing.
    Oh,You inconceivable one.
    You with an immeasurable belly.
    Protect me,oh,Shri GANAPATI                                           ….1

    You are the first and foremost of all the Ganas'
    and of all the deities;
    Therefore, you are called "GANESH"2
    You are acknowledged by all the "SHASTRAS" [sacred books]
    You of sacred countenance, oh, BHALACHANDRA!                    .2
     
    1. A term for certain troops of inteniror deities considered as Shiva's attandants,
    and under the especial superintendence of GANESH.
    2. A name formed by the combination of   JU and B©e    i.e. Lord.
    Oh, SHARADA,Goddess of Speech !
    You are the mistress of  the realm of words;
    Because of your existence,
    All wordily transactions are carried on.                   ….3
     
    You are the deity revered by all authore;
    You are eternally the pride of this nation;
    Your infinite power prevails everywhere.
    I bow to you, JAGADAMBE.  
                                                                                                     ….4
     
    You are the Supreme Spirit and beloved of the saints !
    incarnation in human form of PANDHARIRAYA
    You are the ocean of kindness and infinite compassion;
    Oh Pandurang Narahari !                                                                                                 ….5
     
    You, who control the world like a puppeteer with his strings,
    You are omnipresent.
    All the sciences and scared books are still delving
    To plumb the essence of your nature.                                     ….6

    Those who are pedagogues,
    To them, you are not revealed, Oh  CHAKRAPANI ;
    All those foolish people
    Only indulge in the jugglery  of words.                                        ….7
     
     Only the saints understand you
    Others remain baffled.
    To you, My obeisance.
    Respectful and with my whole body
    prostrate in veneration before you                                            ….8
     
     Oh, you five - headed SHANKRA,
    Oh, you wearer of garland of skulls,
    Oh, you blue - throated DIGAMBARA,
    Oh, you BRAHAMRUPA PASHUPATI !                                         ….9
     
     One who recites your name all the time,
    His worldly adversities are immediately dissolved
    Such is, oh DHURJATI,
    The power of your  name.                                                        ….10
     
    With obeisance at your feet,
    I am writing this paean of praise;
    Help me always to complete this mission,
    Oh, you NILAKNTHA - the blue - throated  one!                      ….11
     
     Now, let me bow to the son of Arti (DATTATREYA),
    To the family deity of Indira (VISHNU)
    To Tukaram and all other saints;
    So, also, to all the devotees.                                                   …..12
     
    Hail, hail to you, Sainath,
    Redeemer of sinners and mereciful one !
    I lay my head down at your feet;
    Now give me your protection                                                   ….13
     
     You are the whole world, the abode of bliss:
    You, yourself , are Vishnu, the paragaon among men;
    One whose wife is Uma !
    You are also that enemy of  Cupid3                                         ….14
    3. i.e. You are also Shankar

    You are God in human form !
    You are the sun in the sky of knowledge!
    You are the ocean of kindness!
    You are the anti  - dote for worldly maladies!                       ….15

    You are the CHINTAMANI of  the poor and the down - trodden !
    You are the divine purifer (Ganges river ) for your devotees!
    You are a raft for those drowing in worldlinees!
    You are the refuge of the timid.                                            ….16
     
    You are the very cause of this creation!
    That which is pure CHIATANYA !
    You are that Oh, very treasure of compassion,
    The universe is only one of your LEELAS.                             ….17
     
    You are not born!
    Death also does not affect you!
    This is the final conclusion
    Which one arrives at, after a thoughtful search.                 ….18
     
    Birth and death,
    These concepts are born of ignorance!
    From both you are free
    Oh, Lord of course!                                                               ….19
     
    If water appears as a spring,
    Does it imply that its source is there?
    It existed already, full and flush,
    Merely sprang up from within the earth.                             ….20
     
    Water that springs up in a hallow
    Is ,therefore, so described or named;
    A "spring becomes its proper name
    Without the water, it is only a hallow.                                     ….21
     
    To spring up and to dry up and disappear,
    This is not the nature of water:
    Because the water of the spring
    Has no importance for the hallow it fills.                                
    It is only the hallow that is mistakenly proud
    Of itself, rather than the water that filled it.
    Therefore, when the water dries up
    The hollow becomes  impoverished.                                       ....23
     
    The human body is really like the hallow water bed;
    The spirit (pure energy) is like the pure clean water  of the spring; Although there are innumerable such hallows
    The essence is the same in everyone.                                ....24
      
    Therefore, you, who are without a beginning,
    I say to you, merciful one,
    To destroy the mountain of ignorance
    Please become the thunderbolt of Indra                               ....25
      
    Until  now, such hollows (beings)
    Have existed in large numbers, on this earth.
    Many more exist even now,
    And, in the future, as the goes by, many more will come      ...26
        
    Each such hollow (being)
    Is given a separate and different name and appearance;
    That is how in this world, They are identified.                      ...27

    Therefore, to distinguish that spirit
    In terms of "you and me" is not proper;
    Because. as there is no duality
    That itself is most surely, the Spirit              ….28
     
    And, since the Spirit
    Truly encompasses the whole world,
    Then, the "you and  me" the duality concept,
    How can it possibly be entertained?                                     ....29

    Water latent in the clouds
    Is all the same;
    But when it descends upon the earth,
    It assumes different  forms4                                                 ….30
    4.Examples brooks river springs, lakes etc.

     That which falls in the  Godavari  bed
    Is known as the (sacred) River Godavari;
    That which falls into a well
    Does not have the same worthliness of prestige.              ….31
     
    Saints are the river Godavari,
    And, you are the water in it
    We are the puddles , wells and lakes;
    That is the difference between us.                                     ….32
     
    For the fulfillments of our lives
    We must surrender to you,
    Always, with folded hands,
    Because you are the embodiments of  piety.                      …33
     
    It is due to its water -bed
    That the waters of Godavari have become holy;
    Considered merly as water,
    I's the same everywhere everywhere.                              ….34
     
    The bed of Godavari
    That is considered as truly sacred,
    Owes all its sanctity
    To the quality of the land through which it flows              ….35
     
    The water latent in the clouds
    Does not alter that part of the earth on which it falls;
    Yet, that very part of the earth
    Is called Godavari (or pure) by the scholars
    of  the scared books.                                                          ….36
     
    Where the water has fallen elsewhere,
    It has acquired the qualities of the soil of those places;
    Contaminated, bitter salty it becomes
    Though. originally   sweet                                                   ….37
     
    Same is the case with you, oh, GURURAYA,
    In whom there is no impurity of the six - vices5
    To that holy form
    This title, "Saint " is befitting.                                          ….38
    5. These are lust, anger, greed, desire, ego, envy.

    Therefore, saints are Godavari
    so full of grace:
    Amongst all the beings
    Your place is the  highest!                                                    ….39
                              
    From the beginning of creation
    Godavari has been in existence;
    It has been full of water
    And it has never lacked it till today.                                    ….40
     
    Look, the enemy  of RAVAN6
    Came to the banks of the Godavari
    But it's water has flowed
    And the water at present is not the same as old  water.   ….41
     
    The bed alone remains the same.
    The waters have flowed into the ocean,
    The sanctity is eternal
    Of the river - bed, to this  day.                                           ….42
    6. i.e. Rama
     
    Each year,
    The old waters  go and the new
    Flow into the river bed;
    It's the law, as you  know.                                                 ….43
     
    A century is like a year
    The sages of that century
    Are like the flowing waters
    While the great souls are like the waves on the water.    ….44
     
    Of these saints who are like Godari,
    In the early centuries,
    There was a great flood
    Of  SANAT - SANAK - SANANDAN.7                                     ….45
    7. Three sons of Bramadev who were born of his own mental conception.

    Followed by NARADA and TUMBER8
    DHRUVA, PRAHLD, powerful king BALI,
    SHABARI,9ANGAD, 10 VAYUKUMAR11,
    VIDUR 12, GOPE - GOPIKA13                                                   ….46
     
    Thus ,many came the present time
    In each of the centuries in the past,
    The floods came repeatedly,
    which I am unable to recount.                                                ….47
     
    In this present century,
    The sacred Godavari
    Has for certain flooded this land
    In your form, Oh , Sainath!                                                     ….48
     
    Therefore at your divine feet
    I make obeisance;
    Maharaj, of my faults
    Take no notice, I plead.                                                          ….49
     
    8. A devotee of God with the face of a horse.
    9. A Bhil woman , a devotee of Shri. Rama.
    10. Son of Vali 11. Hanuman 12. Pandavas' Uncle.
    13. The dairy lads and maids, companions of Shrikrishna.
     
    I am a poor, wretched, ignorant man,
    The greatest of sinners;
    Ridden with vices,
    But do not cast me off!                                                           ….50
     
    The inherent defects of iron
    Are ignored by "parisa"14
    The small streams of the village, Lendi and ohol
    Are not rejected by the Godavari.                                          ….51
     
    I am full of vices within.
    By your mrercitful glance.
    Do, do quickly destroy them.
    This, only, is the plea of "DAS"                                               ….52
     
    It after coming in contact with the the 'parisa"!
    The iron"s inherent defects
    Do not change GURUVARA,
    Then, it is to the discredit of the "parisa"!                             ….53
     
    14. Imaginary stone that turns iron into gold
    Don't let me be a sinner
    Don't belittle yourself;
    Look ,you are 'parisa',I am the iron;
    My discharge is your concern too.
    A child always commits mistakes,                                           ….54
     
    But a mother does not scold;
    Remembering this,
    Grant me your grace.                                                             ….55
     
    Oh,Sadguru Sainath,
    You are my "KALPATURU"!15
    You are the means for crossing this worldly ocean,
    You alone are so - undoubtedly.                                            ….56
     
    You are "KAMDHENU"!16
    You are "CHINTAMANI"!17

    You are  the sun in the sky of knowledge.
    You are great mine of virtues !
    Oh,you are the ladder to heaven !                                         ….57
     
    15.  Wish - fulfilling tree. 16. Cow yielding all desires.
    17. Gem giving whatever is desired.
     
    Oh, pious, purest one,
    Oh, embodiment of peace and bliss,
    Oh the supreme self,
    Oh the non-dual one, the ocean of knowledge;                    ….58
     
    Oh, incarnation of the supreme wisdom, the best among men,
    Oh, abode of forgiveness and peace,
    Oh, refuge of devotees,
    Bless me, bless me !                                                                ….59
     
    You are the Sadguru MACHINDER18
    You are the Mathama JALANDER19
    You are NIVRATINATH, DNYANESHWAR,
    KABIR, SHEIKH MOHAMMED, EKNATH you are.                    ….60
     
    You are BODHLA 20      You are SAVATAMALI,
    You are truly RAMDAS
    You are TUKARAM Sainath,
    You are SAKHA 21 You are MANIKPARABHU22                      ….61
     
    18. The great founder of nath Panth. 20. Mankogi Bodhale of Dhamangaon.
    21. SAKHaram Maharaj of Loni. 22. Saint from Humanabad.
     
    Your present manifestation,
    And your manifold nature
    are really difficult to understand !
    The knowledge about your caste and creed
    You do not reveal to anybody.                                                 ….62
     
    Some say you are a Muslim,
    Some say you are Brahmin.
    Thus like Krushana,
    You too, are inscrutable!                                                         ….63
     
    Having observed SHREE KRUSHNA,
    Different people called him by various names.
    Some call him 'YADU BUSHAN'
    Some call him a cowherd.                                                   ….64
     
    YASHODA23called him a darling
    KANSA 24called him the great evil.
    UDDHAV 25called him beloved,
    ARJUN called him Omniscient.                                                 ….65
     
    23. Shrikrishna's foster mother. 24. Krishna's uncle.25. krishna's devotee.
     
    Thus oh GURUVARA ,To you
    According to each person's conclusion
    Based on his mental attitude,
    Names are give ,by them.                                                       ….66
     
    The masjid being your dewelling,
    And your ears not being pierced.
    Nothing your offering the 'FATEHA'
    To call you a Muslim is logical.26                                             ….67
      


    source - http://www.shirdisaibabakripa.org/2009/10/shri-sainath-stavan-manjari-lyrics-in.html
    Man Ke Gehre Andhiyare Me "Sai" Naam Diye Jaisa

    Give Light, and the darkness will disappear of itself...

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    • "I AM HERE IN YOUR HEART"
    Re: Shree Sainath Stavan Manjari- lyrics in Hindi and English
    « Reply #2 on: November 06, 2011, 05:17:27 AM »
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  • 26. The above concusion of Das Ganu is not based on facts.
    In the thirteenth verse of seventh Canto of Shri Sai - Charitra,
    Hemadpant says:- "His ears were piecred, so how can be called a Yavana?
    Cirumcision he approved, so how can he be called a Hindu?
    "He is neither Hindu nor Muslim,
    Sai is the holy incarnation.
    Sai is the holy incarnation."
    The late Swami Sai- Sharn - Anand has rendered this work of Das Ganu into Gujrati In the foonote to his translation of the sixty - seveth verse thereof , he observes,
    "Das Ganu does not appear to have observed Baba's ears carefully.
    As per the translator's own knowledge and observations.
     
    Similarly , considering the worship of fire,
    As done by you, Lord of mercy,
    My own conclusion is
    That you are a Hindu !                                                           ….68
     
    But these superficial differences
    Would interest only pedagogues;
    But for those devotees desirous of knowledge
    They are of no consequence.                                                ….69
     
    You are BRAHMA Itself !
    Caste and greed have no relevance to you ;
    You are the Guru Supreme !
    You are the creator of this world !                                       ....70
     
    Baba's ears were pierced and had not undergone circumcision.
    If any pasad  were brought at a time other the afternoon Naivedya and if Bade Baba or other Muslims were present, Baba would order the first "Sura" of Koran to be recited and would himself join in. But in the absence of Muslims, this practice was never follow.

    There was Hindu - Muslim rivalry;
    Therefore , to bring about unity and amity.
    The masjid and the fire worship were embraced by you,
    To show your "leela" to the devotees.                                 ….71
     
    You are beyond caste and greed,
    You are Brahman, the essence to Truth;
    You are That, verily,
    You are beyond human conception !                                     ….72
     
    Giving free rein to surmises and conjectures,
    Arguments have flourished about you.
    There, my insignificant
    Words, how will they prevail?                                               ….73
     
    But when I behold you,
    I cannot remain silent;
    Because for encomium, words
    Are normally the only means.                                               ….74

    Therfore, by means of words,
    Whatever description is possible,
    That I will always proffer,
    With your grace.                                                                      ….75
     
    Saints, I reckon
    Higher than gods;
    For distinctions such as mine and thine
    find not a place in their proximity.                                           ….76
      
    HIRANYAKASHAPU  and RAVANA27
    Were killed because of their hatred of god;
    Such a deed has never been done by saints.                           ….77
     
    GOPICHAND, In the heap of garbage,
    Buried JALANDARA ;
    But that sage
    Had no rancour for that act.                                                    ….78
     
    27.The two demons killed by Lord Vishnu and Shri Rama respectively.
     
    On the contrary, the king was delivered
    from the material world
    And was immortalised ;
    Such is the prowess of the saints,
    It is indescribable !                                                                  ….79
      
    Saints are the Sun,
    Their grace is illuminating ;
    Saints are as pleasing as the moon,
    Their benign ness is as gentle as moonligt.                             ….80
     
    Saints, are the soothing musk,
    Their blessing are like it's fragrance,
    Saints are the juicy sugarcane,
    Their blessings are like its sweetness.                                   ….81
     
    Saints, towards the good and the bad,
    Are the same, definitely.
    On the contrary, their love for the sinners
    Is immeasurable.                                                                     ….82

    In the waters of the Godavari,
    Only the soiled clothes come to be cleansed ;
    The clean ones, in a trunk,
    Remain far from the Godavari  banks.                                   ….83
     
    Even that which remained in the trunk,
    came once,
    To be cleansed thoroughly
    On the Godavari banks.                                                          ….84
     
    The trunk is the eternal abode ;
    You are the Godavari, unshakable faith is the ghat;
    All beings are the garments
    Full of the impurities comprising six vices.                             ….85
     
    The "DARSHAN " of your feet
    Is like a bath in the Godavari ;
    Wash away my sins.
    Oh, Samarth, and purify me !                                                 ….86
     
    We worldly people
    Gather layers of impurities again and again ;
    Therefore, we are the right people
    for the "DARSHAN " of saints.                                                ….87
     
    In the abundant waters of the Godavari
    Comes the wash 28, to be cleansed at the GHATS :
    If it is really left unattended,
    Then, it is a discredit to the Godavari !                                  ….88
      
    You are the cool, shady tree, with abundant foliage ;
    We are the travellers, really,
    Suffering from the scorching sun - rays
    Of the three - fold 29 calamities of Life.                                 ….89
     
    From that blazing heat, oh compassionate one,
    Protect us, Oh GURURAYA.
    The benign grace of your cool shade
    Is extraordinary !                                                                   ….90
     
    28. The dirty clothes. 29. These arise out of spiritual conditions, physical conditions or due to fate.

    Sitting under a tree
    If one feels the heat of the sun,
    Then, who will call that tree
    The shade-giving tree ?                                                          ….91
     
    Lock, without your grace
    Nothing can be right in the world ;
    SHESHAYEE 30 befrieneded  ARJUNA,
    To uphold the right.                                                                ….92
     
    Due to the kindness of SUGRIV, BIBHISHANA
    Came in contact with King RAM,
    It is due to the saints,
    That Shri Hari is thus glorified.                                               ….93
     
    BRAHMAN, being formless,
    VEDAS  cannot describe it.
    Be endowing it with forms,
    The saints have reduced the importance of the formless !   ….94
     
    30. Vishnu
     
    VAIKUNTHAPATI, husband of RUKMINI,
    was made a "Mahra " by DAMAJI ;
    TO PICK UP CORPSES OF BUFFALOES
    CHOKHAMELA made JAGAD - ATMA (God) slog.                     ….95
     
    Knowing the prowess of saints,
    Jagjivan laboured  by carring  water.
    Saints have truly lorded
    Over God Himself, who is Eternal Truth
    - Knowledge - Bliss.                                                                 ….96
     
    There is no need to speak more.
    You are our mother and our father,
    Oh, Sadguru Sainath,
    Dweller of Shirdi village.                                                          ….97
     
    Baba, your "LEELAS"
    No one can truly comprehend ;
    Then, my  plebain  speech
    How can it do justice, tell me ?  
    To save the sinners,
    You came to Shirdi;
    Pouring water into earthen lamps,
    You made them burn,                                                          ….99
     
    The wooden plank of absurdly small measures
    You turned into your bed, truly;
    Thereby displaying to the devotees
    Your amazing yogic powers !                                              …100
     
    The barrenness of many women
    You have completely dispelled ;
    The diseases of many
    You have cured with the " Udi " !                                        …101
     
    To ward off worldly difficulties
    Is not impossible for you.
    The weight of an ant,
    Does the elephant consider as a burden?                           …102
     
    So be it, GURURAYA,
    Have mercy on the humble one.
    I  surrender at your feet,
    Do not turn me away.                                                          …103
     
    You are the king of kings,
    You are richer than KUBER himself,
    You are the Heater par excellence.
    No one is superior to you !                                                  …104
     
    for the worship of other deities.
    The ritual is as prescribed.
    But, for your worship,
    There is nothing worthy of you !                                         …105
     
    Look, in the realm of the sun,
    The festival of DEEPAVALI has come ;
    But to celebrate it ,
    What shall be the means ?                                                   …106

     To quench the ocean's
    Thirst, adequate water cannot be found on earth;
    To warm the fire
    From where will the heat be found ?                                     …107
     
    All articles needed for the worship
    Are filled with your essence;
    from the beginning, they are part of you,
    Oh, SHREESAMARTHA GURURAYA !                                       …108
     
    All my talk is a philosophical statement,
    for I have not experienced its truth.
    I have spoken with out experience,
    A meangingless maze of words.                                            …109
     
    If ritualistic worship
    Of you, is to be performed by me,
    To do that I have no wherewithal’s,
    My SAMARATHA GURURAYA !                                                …110
     
    Mostly, with the help of my imagination only
    Will I worship  you.
    That worship itself, oh compassionate one,
    Do accept from this slave.                                                     …111
     
    Now with my tears
    I bathe your feet;
    The sandalwood of true devotion
    I make into paste and apply.                                                 …112
     
    The long tunic ("KAFNI") of these ornamental  words
    I place on you, sincerely ;
    This garland of adoration,
    I place round your neck.                                                        …113
     
    The incense of vileness
    I burn before you, truly ;
    Through it is of impure composition
    Even then, there will be no foul-odour  from it.                    …114
     Elsewhere than before the Sadguru,
    If incense is burnt
    What happens to that incense
    Is like this                                                                             …115
     
    When the incense is put on the fire,
    The moment it actually touches it
    The fragrance  from the incense
    Leaves it instantly.                                                               …116
     
    Before you, it's the contrary
    the impurities burn away in the fire,
    The good remains for ever
    For the world to see.                                                           …117
     
    Once the vileness of the mind is burnt away,
    The mind will become purer ;
    Once the Ganga's impurity is gone,
    Then it is holy, naturnally.                                                     …118
     
    The light of temptations
    I kindle most truly,
    From which, may the lustre of asceticism
    Be granted to me, oh GURUVARA !                                      …119
     
    The throne of pure faith
    I offer you as a seat ;
    On receiving it
    Accept the offering ("naiyvedya") of devotion.                  …120
     
    You partake the offerings of devotion,
    Give me the essence ;
    Because I am your child
    I have a claim on your milk.                                                  …121
     
    My mind is my monetary offering ("DAKSHINA")
    That I offer to you ;
    Therefore, the credit or discredit of any action
    will no longer be mine.                                                         …122

    Now, most humbly and devotedly
    I do obeisance to you ;
    Please accept it,
    Oh divine Sainath !                                                                …123
    « Last Edit: November 06, 2011, 05:20:36 AM by tanu_12 »
    Man Ke Gehre Andhiyare Me "Sai" Naam Diye Jaisa

    Give Light, and the darkness will disappear of itself...

    Offline tanu_12

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    Re: Shree Sainath Stavan Manjari- lyrics in Hindi and English
    « Reply #3 on: November 06, 2011, 05:25:00 AM »
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  • EIGHTFOLD PRAYER
     
    Possessing peaceful mind, and wisdom supreme,
    Sainath, the compassionate,
    You are ocean of kindess, truth incarnate ,
    And destroyer of the darkness of ignorance !                  ...1-124
    The sage, beyond caste and greed you are.
    Beyond comprehension compassion incarnate;
    Protect me, protect me,
    Oh, Sainath of Shirdi !                                                        ...2-125
     
    You are the sun of Divine Knowledge
    the bestower of choicest blessings ;
    Oh, fabled HAMSA  of the minds of the devotees,
    Protector you are of those who surrender to you.             .3-126
     
    You are BRAHMADEV, creator of the world;
    You the sustainer of the world VISHNU ;
    The destroyer of the three worlds,
    You are that very RUDRA !                                                    .4-127
     
    There is no place on this earth,
    Where you are not
    Omniscient, oh you Sainath,
    You dwell in all our hearts.                                                   .5-128
     
    Forgive us all our sins
    I implore you !
    And those weaves of doubts and delusions,
    Repel instantly.                                                                  ...6-129
     
    You are cow, I the calf,
    You are moon, I the stone melted by It's light;
    At your feet, which are like the Ganges,
    Respectfully the slave (DAS) bows down !                       ...7-130

    Place on  my head
    Your hand  and bless me, oh Lord!
    Wars off my sorrow and worry
    For this GANU is your servant.                                               .8-131
     
    With this eight-fold prayer
    I prostrate myself before ;
    My sins (demerits) suffering and poverty
    Ward off immediately.                                                             …132
     
    You are the cow and I the calf ;
    You are the mother and I the child ;
    Do not harbour
    Any harsh feelings towards me.                                              …133
     
     
    You are the sandalwood from Malaygiri31
    I'm a thorny shrub.
    You are the life-giving waters of Godawari,
    I, the greatest of sinners.                                                       …134
     
    31. Mountain in mysore famous fot its Sandalwood forests.

    If after having your "DARSHAN"
    The impurities of my wicked mind remain
    Unchanged GURURAYA,
    Who will then call you sandalwood ?                                       …135
     
    The proximity of musk ("KAASTURI")
    makes even the dust more valuable;
    The fragrance of flowers is transmitted
    To the thread which ties the garlands.                                   …136
     
    This is the way of the great.
    Whosoever they come in touch with,
    To him they impart
    A part of their greatness.                                                        …137
     
    Sacred ashes, join cloth and the bull,
    SHIVA made symbolic parts of himself;
    Therefore, these objects
    Are praised in all quarters.                                                     …138
     
    For the amusement of the cowherds,
    At Vrindavan, on the banks of the Yamuna,
    The lord of the World played  "DAHI-KALA"
    That too has earned recognition from wise men,                   …139
     
    Similarly , I am a sinner,
    But, I am under your protection;
    Will you not redeem me, Oh, GURURAYA
    From my sinful state?                                                              …140
     
    Worldly or spiritual,
    In whatever objects I seek satisfaction,
    I have no doubt, O GURURAYA,
    That you will grant me these.                                                 …141
     
    With your grace,
    Control my mind ;
    If the oceans are sweetened
    There is no fear of their being salty.                                      …142
     
     
    To make the oceans sweet
    Truly you have the powers.
    Therefore, this supplication of Dasganu,
    Please concede.                                                                      …143
     
    Whatever be my shortcomings,
    They are all yours !
    You are the foremost among the spiritual masters,
    So do not stint while giving.                                                   …144
     
    Now, why should I speak more ?
    You are my only refuge.
    The child held in the mother's arms,
    Is naturally with out fear.                                                      …145
     
    So be it. This hymn of praise,
    Whosoever read with love,
    Their desires
    Fulfil , O Lord.                                                                         …146

     Your blessing for this hymn
    I entreat.
    May the difficulties of he who receites this sincerely.
    Be warded off within a Year.                                                  …147
     
    After performing all ablutions,
    Should this hymn, be recited regularly,
    With a pure and sincere feeling
    In your heart.                                                                          …148
     
    If this be not possible,
    Then, every  Thursday.
    Meditating on the Sadguru in your mind.
    This hymn should be recited.                                                  …149
     
    If even this be not possible
    Then on every "ekadasi"32
    This hymn should be read
    To realize the beneficial effect.                                              …150
     
    32. The elevanth day of the month accoding to Marathi calander.
     
    One who recites this with faith
    Will ultimately progress spiritually by the Grace of GURU.
    Who will satiate the material desires readily.
    And thereby deliver him from their bondage.                         …151
     
    With repeated recitations of this hymn.
    Dull wits will be sharpened.
    And, If perchance, someone's life is short,
    Then, by recitation, he will live upto a hundred years!          …152
     
    Where wealth is wanting.
    KUBER, the Lord of wealth  himself will come to stay.
    Oh reading this hymn.
    This is the Truth and so it shall be.                                         …153
     
    To the childless children will be born
    On reciting this hymn.
    And the ailments of one who recites this hymn
    Will be dispelled in all directions.                                            …154

    Fear and worry will disappear,
    Prestige will increase.
    He will realise the imperishable BRAHMAN
    With the regular recitation of this hymn.                                …155
     
    Regarding this hymn, oh wise ones,
    Have faith in your hearts
    About the efficacy of this hymn;
    And give no place
    To doubts and misconceptions.                                              …156
     
    Go on pilgrimage to Shirdi,
    Concentrate on the lotus feet of Baba,
    Who  is the succour of the poor and the meek,
    The wish- fulfilling tree for the devotees !                            …157
     
    It was because of the inspiration received from Him
    That this hymn has been composed.
    How else could an insignificant ignorant one, like me,
    Have written it ?                                                                    …158
     
    In Shake 331840
    In the bright half of the BHADRAPAD  month,
    On GANESH-CHATURTHI day,
    Monday,  in the second 'PARHAR'   34                                   …159
     
    This humble tribute of praise to Shri Sainath,
    Was completed at Maheshwara35
    By the sacred bank of the Narmada
    Near Shri Ahilya Devi's SAMADHI.                                         …160
     
    At Maheshwara , the famous TIRTHA,
    The hymn was completed.
    Shri Sai Nath made me utter every word
    By becoming part of my mind.                                               …161
     
    The disciple Damodar
    Became the scribe truly,
    I Das, Ganu, am only an obedient servant.
    Of all the saints and sages.                                                  …162
     
    33. i.e. A.D. 1918 34. i.e. three houres after sunrise.35. Near Indore.
     Peace be with you ! May this humble tribute
    of praise to Shri Sainath
    Help you cross the worldly ocean.
    This is the prayer, with faith and respect
    Of Das Ganu, to Shri Panduranga.                                          …163
     
     
    Let this be offered to Shri hari-Hara!
    Bless us, O Lord !
    PUNDALIK VARDA (fulfiller of wishes) HARI-VITHAL !
    I recall Sitakanta ! Hail Hail  Rama
    Parvati-pate Har-Har Mahadev !
    Hail to Shri Sadguru Sainath Maharaj !
    Shri Sadguru Sainath, I offer this to you
    Bless us, O Lord!.
    Man Ke Gehre Andhiyare Me "Sai" Naam Diye Jaisa

    Give Light, and the darkness will disappear of itself...

     


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