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Author Topic: बाबा की यह व्यथा  (Read 147446 times)

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Offline Pratap Nr.Mishra

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  • राम भी तू रहीम भी तू तू ही ईशु नानक भी तू
Re: बाबा की यह व्यथा
« Reply #270 on: May 24, 2012, 01:11:59 PM »
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  • ॐ श्री साईं नाथाय नमः

    साईं राम साईं सेविकाजी

    आपकी प्रशंसा के लिए धन्यवाद | बाबा ही स्वयम कर्ता कर्म एवंग कारक हैं | 

    धन्यवाद

    ॐ साईं राम

    Offline saisewika

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    Re: बाबा की यह व्यथा
    « Reply #271 on: May 26, 2012, 11:56:59 AM »
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  • ॐ साईं राम


    यह वह पहली कविता है जो बाबा साईं ने पहली बार हाथ पकड़ कर लिखवाई थी।  यूँ तो पहले भी फोरम में पोस्ट कर चुकी हूँ, पर आज पुनः याद आई तो दोबारा प्रस्तुत कर रही हूँ-



    हाथ जोड़ कर शीश झुका कर
    साईं तेरे दर पर आकर
    बाबा करते हम अरदास
    रखना श्री चरणों के पास

    माँगे हम आ हाथ पसारे
    जो हम चाहे देना प्यारे
    धन दौलत की नही है आस
    ना ही राज योग की प्यास

    नहीं चाहिये महल चौबारे
    नहीं चाहिये वैभव सारे
    नहीं चाहिये यश और मान
    ना देना कोई सम्मान

    जो हम चाहें सुन लो दाता
    देना होगा तुम्हें विधाता
    खाली हम ना जायेंगे
    जो माँगा सो पायेंगे

    हमको प्रभु प्रेम दो ऐसा
    शामा को देते थे जैसा
    हरदम रखो अपने साथ
    मस्तक पर धर कर श्री हाथ

    भक्ति हममे जगाओ वैसी
    जगाई मेधा मे थी जैसी
    भक्ति मे भूलें जग सारा
    केवल तेरा रहे सहारा 

    महादान हमको दो ऐसा
    लक्ष्मी शिन्दे को दिया था जैसा
    अष्टान्ग योग नवधा भक्ति
    साईं सब है तेरी शक्ति

    सेवा का अवसर दो ऐसा
    भागो जी को दिया था जैसा
    चाहे कष्ट अनेक सहें
    श्री चरणों का ध्यान रहे

    निकटता दे दो हमको वैसी
    म्हाल्सापति को दी थी जैसी
    प्रभु बना लो अपना दास
    ह्रदय में आ करो निवास

    सम्वाद करो हमसे प्रभु ऐसे
    तात्या से करते थे जैसे
    सुख दुख तुमसे बांट सकें
    रिश्ता तुम से गाँठ सके

    महाज्ञान दो हमको ऐसा
    नाना साहेब को दिया था जैसा
    दूर अज्ञान अन्धेरा हो
    जीवन में नया सवेरा हो

    वाणी दे दो हमको वैसी
    दासगणु को दी थी जैसी
    घर घर तेरा गान करें
    साईं तेरा ध्यान धरें

    आशीष दे दो हमको ऐसा
    हेमाडपंत को दिया था जैसा
    कुछ हम भी तो कर जाऐं
    साईं स्तुति रच तर जाऐं

    महाप्रसाद हमको दो ऐसा
    राधा माई को दिया था जैसा
    हम भी पाऐं कृपा प्रसाद
    शेष रहे ना कोई स्वाद

    आधि व्याधि हर लो ऐसे
    काका जी की हरी थी जैसे
    शेष रहे ना कोई विकार
    दुर्गुण, दुर्मन, दुर्विचार

    मुक्ति देना हमको वैसी
    बालाराम को दी थी जैसी
    श्री चरणों में डालें डेरा
    जन्म मरण का छूटे फेरा

    जो माँगा है नहीं असंभव
    तुम चाहो तो कर दो संभव
    विनती ना ठुकराओ तुम
    बच्चों को अपनाओ तुम

    माना दोष घनेरे हैं
    बाबा हम फिर भी तेरे हैं
    दो हमको मनचाहा दान
    भक्तों का कर दो कल्याण

    जय साईं राम

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    Re: बाबा की यह व्यथा
    « Reply #272 on: August 21, 2012, 12:11:48 PM »
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  • ॐ साईं राम


    साईं गुणसमूह गुणगान॰॰॰॰॰॰

    साईं सदगुरू तेरी शरण
    परम मोक्ष का द्वार
    तेरे दर पर जो झुका
    हो गया भव से पार


    साईं तुम पारस हो-

    सुर सम तेरा रूप है
    पारस सम व्यवहार
    तपे स्वर्ण सा हो गया
    जो आया तेरे द्वार


    साईं तुम रँगरेज़ हो-

    साईं तू रँगरेज है
    देता तन मन रँग
    चढ़े रँग जो प्रेम का
    होवे नहीं अभँग


    साईं तुम चँदन हो-

    चन्दन सम सुवास तेरी
    फैल रही चहुँ ओर
    मँत्र मुग्ध हों ले सभी
    शुभ चरणों की ठौर


    साईं तुम प्रियतम हो-

    तू तो प्रियतम प्यारा है
    सबसे करता प्रीत
    जिसने प्रेम से नाम लिया
    हो गया उसका मीत


    साईं तुम सगे सँबँधी हो-

    तू है बन्धु और सखा
    हे साईं अभिराम
    मात पिता सम रूप तेरा
    तू सदगुरू सुजान


    साईं तुम ज्ञान स्वरूप हो-

    साईं ज्ञान स्वरूप है
    अखण्ड ज्योति प्रकाश
    सकल सृष्टि का ज्ञाता तू
    भू, पाताल, आकाश


    साईं तुम सुख स्वरूप हो-

    साईं तू सुखरूप है
    पाप ताप से दूर
    मुख मण्डल पर दमक रहा
    सूर्य तेज का पूर


    साईं तुम लीलाधर हो-

    साईं लीलाधर बड़ा
    अद्भुत तव अवतार
    चमत्कार करके किया
    भक्तों का उपकार


    क्या क्या तेरे गुण गहूँ
    क्या मेरी औकात
    तू तो सँत बेअँत है
    सारे जग का नाथ


    स्वीकारो मम नमन देव
    धरो शीश पर हस्त
    तेरे लीला गान में
    रहूँ सदा मैं मस्त


    जय साईं राम

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    Re: बाबा की यह व्यथा
    « Reply #273 on: April 25, 2013, 11:55:03 AM »
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  • ॐ साईं राम

    साईं तेरे दर पर आई
    क्षमा प्राप्ति की आशा ले
    पाप कर्म सब माफ कराके
    मुक्ति की अभिलाषा ले

    अवगुण मेरे अनगिन स्वामी
    नख शिख भरे विकार हैं
    मोह माया ना मिटती मेरी
    चित्त में घर सँसार है

    अहँकार के कारण अपना
    क्रोध भी जायज़ लगता है
    रिश्ते नातों में उलझा के
    मन भी मुझको ठगता है

    कभी स्वँय न्यायधीश बन जाती
    पर के दोष परखती हूँ
    शिक्षक बन उपदेश सुनाने
    में भी नहीं झिझकती हूँ

    मन में 'मैं' के भाव के कारण
    खुद को ठीक समझती हूँ
    अपने ही चश्में से सारी
    दुनिया को मैं तकती हूँ

    ईर्ष्या,ढाह,लोभ,मद,मत्सर
    जितने अवगुण काया के
    सब दिखते मुझे मेरे अँदर
    इस सँसारी माया के

    इतने अवगुण ओढ़ के स्वामी
    कैसे तुझको पाऊँगी
    कैसे मैले पैरों से चल
    तेरे दर पर आऊँगी

    साईं प्रभु जी दीन दयालु
    मेरे अवगुण चित्त ना धरो
    दुर्गुण दूर करो हे दाता
    भक्तन पर उपकार करो

    मेरी 'मैं' को मेटो स्वामी
    निर्मल कर दो चित्तवन को
    मनसा वाचा कर्मणा
    शुद्ध करो इस तन मन को

    शीश नवा शुभ चरणों में
    विनती करती बारम्बार
    अधम जीव को तारो बाबा
    हाथ थाम लो अपरम्पार

    जय साईं राम

    Offline saisewika

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    ॐ साईं राम

    रमते राम आओजी आओजी
    उदिया की गुनिया लाओजी लाओजी


    जामनेर का विलक्षण चमत्कार



    साईं नाथ जी प्यारे ने
    जामनेर की लीला की
    दूरस्थल पर बैठे भक्तों की
    परम प्रिय ने थी सुध ली

    नानाजी की पुत्री मैना
    गर्भावस्था में जब थी
    प्रसवकाल निकट था उसका
    पर तन से वो बोझिल थी

    तीन दिनों से प्रसव वेदना ने
    तन मन को तोड़ा था
    लेकिन नाना ने सबुरी के
    दामन को ना छोड़ा था

    बाबा ने भी श्रद्धा और
    सबुरी का था मान किया
    मैना की जीवन नैया को
    स्व हाथों में थाम लिया

    बापूगीर बुवा जब वापस
    खानदेश थे लौट रहे
    तब बाबा ने उन्हें बुलाकर
    श्रीमुख से शुभ वचन कहे

    "जामनेर में उतर कर तुम
    नाना के घर में जाना
    आरती की ये प्रति और ऊदि
    नाना को तुम दे आना"

    बापूगीर बुवा तब बोले
    दो ही रुपये हैं मेरे पास
    जलगाँव तक के भाड़े को ही
    वो होंगे शायद पर्याप्त

    तीस मील आगे फिर जाना
    सँभव ना हो पाएगा
    बाबा बोले "अल्लाह देगा"
    सब सँभव हो जाएगा

    साईं के वचनों को सुनकर
    बापू ने प्रस्थान किया
    दुविधा तो थी मन में लेकिन
    साईंनाथ का नाम लिया

    जलगाँव में उतरे जब बापू
    चपरासी ने उन्हें बुलाया था
    नाना ने उन्हें लेने है भेजा
    उसने उन्हें बतलाया था

    घोडा़गाड़ी में फिर उसने
    बापू जी को बैठा लिया
    नाना ने भेजा है कह कर
    उनको था जलपान दिया

    जामनेर के निकट पहुँचकर
    लघुशँका को रुके बुआ
    लौट उन्होंने जो भी देखा
    उनको अचरज घोर हुआ

    ओझल हो चुके थे दोनों
    ताँगा और ताँगे वाला
    भक्तों की खातिर बाबा ने
    चमत्कार था कर डाला

    नाना जी का पता पूछते
    बापू उनके घर आए
    ऊदि औेर आरती दोनों
    नाना जी को दिए थमाए

    धन्यवाद जब किया बुवा ने
    ताँगे और जलपान का
    नाना कुछ भी समझ ना पाए
    बुवा जी के बखान का

    स्तब्ध हो गए बापूगीर तब
    जब नाना ने बतलाया
    ना ही ताँगा ना चपरासी
    उन्होंने कुछ भी भिजवाया

    भावविह्वल हो दोनों ने फिर
    बाबा जी को नमन किया
    अद्भुत प्यारी लीला करने को
    साईं को धन्यवाद दिया

    साईं नाम ले, घोल पानी में
    ऊदि मैना ताई को दी
    पाँच मिनट में प्रसव हो गया
    लीला उस साईं की थी

    अपने भक्त जनों की खातिर
    करते थे लीला साईं
    पाप ताप सँताप मिटा कर
    सुख देते थे सर्व सहाई

    जय साईं राम

    Offline saisewika

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    Re: बाबा की यह व्यथा
    « Reply #275 on: May 06, 2013, 02:33:36 PM »
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  • ॐ साईं राम

    साईं प्रभुजी कीजिए
    हम पर सुख उपकार
    श्री चरणों की शरण में ले
    दीजिए भव से तार

    तेरे नाम की लगन हो,
    शुभ चरणों की आस
    दुखों में भी डोले ना
    अडिग रहे विश्वास

    अलख जगे शुभ जोत तव
    मेरे मन के भीत
    तुझसे अपरिमित प्रेम हो
    तू ही हो मन का मीत

    तुझसे बिछड़ के दुखी रहूँ
    सुख पाऊँ तव साथ
    तेरी चर्चा के बिना
    पूरी ना हो बात

    सोते जगते सिमरन हो
    भूलूँ सब सँसार
    चेतूँ, जागूँ, समझ लूँ
    थोथे सब व्यवहार

    सीढ़ी दर सीढ़ी चढ़ूँ
    तेरे दर की ओर
    पग पग चलती आऊँ मैं
    पकड़ नाम की डोर

    मेरे आत्माराम जी
    सजग रहें दिन रैन
    तेरे दरस की आस में
    खुले रहें मम नैन

    जग जागे मैं सो जाऊँ
    वृत्ति भीतर खींच
    सोवे जग तो जागूँ मैं
    तन की आँखें मीच

    तुझसे एकाकार हो
    मिट जाए मेरा आप
    मेरी 'मैं' पर साईं जी
    आप ही रहिए व्याप

    जय साईं राम

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    Re: बाबा की यह व्यथा
    « Reply #276 on: August 20, 2013, 12:27:35 PM »
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  • ॐ साईं राम

    साईं ज़िन्दगी के रास्ते ज़रूर
    कुछ टेढ़े मेढ़े रहे हैं
    जो भी देह के सुख दुख हैं
    सब मैंने भी सहे हैं

    कई बार बंधी और टूटी है
    मेरे मकसदों की आस
    पाया है और खोया भी है
    मैंने भी बहुत खास

    तन्हाईयाँ और मायूसियाँ
    मैंने भी हैं झेली
    हार जीत की बाज़ियां
    हाँ मैनें भी हैं खेली

    लेकिन हमेशा साईं तुम
    रहते जो हो साथ
    झँझावतों में भी ना
    कभी छोड़ा मेरा हाथ

    जब हारने को थी मैं
    तुमने बँधाई आस
    तन्हाईयों में भी तुम
    मँडराए मेरे पास

    कँटीले रास्तों पर
    मखमल बिछा दी साईं
    जो मुझको लगने को थी
    वो चोट तुमने खाई


    कैसे ना मानूँ दाता
    मैं अहसान तेरा
    नतमस्तक हो करूँ मैं
    ले ले प्रणाम मेरा

    जितना भी करूँ देवा
    शुकराना कम ही होगा
    मेरे लबों पे स्वामी
    तेरा नाम हरदम होगा

    बस इतना करम कर दे
    दासी पे मेरे दाता
    जब अँतिम साँस निकले
    ध्याऊँ तुझे विधाता

    जय साईं राम

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    Re: बाबा की यह व्यथा
    « Reply #277 on: September 18, 2013, 03:01:06 PM »
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  • ॐ साईं राम

    हाँ मैंने साईं को देखा
    सुन्दर मुख पर थी स्मित रेखा

    प्यारी अखियाँ झील सी गहरी
    भक्त जनों की चौकस प्रहरी

    तन पर लँबी कफनी शोभित
    जन जन को करती थी मोहित

    काँधे पड़ा हुआ था झोला
    शिव सम साईं दिखता भोला

    मुख मँडल की प्रभा अनोखी
    रक्तिम आभा मोहक चौखी

    कोमल हाथ में था इक सटका
    माथे पर था ज़री का पटका

    दाहिना हाथ साईं स्वतः हिलाते
    आशिष सबको देते जाते

    चरणों में पादुका को डाल
    शिरडी घूमें दीन दयाल

    किसी के हाथ में ऊदि देते
    माँग दक्षिणा किसी से लेते

    कभी झिड़क कर देते गाली
    भरते किसी की झोली खाली

    स्व मुख से शुभ वचन सुनाते
    कथा कहानी कहते जाते

    अल्लाह मालिक जिव्हा पे धारा
    साईं मेरा सर्व आधारा

    धूनि में लकड़ी को डाल
    भस्में सबके कष्ट मलाल

    साईं मालिक दया का सागर
    छलकाता करूणा की गागर

    इतनी ममता इतना प्यार
    अद्भुत साईं का दरबार

    निरख निरख कर रूप निराला
    भक्ति रस का छलका प्याला

    भीगे मेरे तरसे नैन
    व्याकुल चित्त ने पाया चैन

    ऐसे ही ऐसे ही देव
    दर्शन देते रहो सदैव

    जय साईं राम
    « Last Edit: September 20, 2013, 11:14:39 AM by saisewika »

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    Re: बाबा की यह व्यथा
    « Reply #278 on: December 10, 2013, 08:16:14 PM »
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  • ॐ साईं राम

    जिधर देखती हूँ
    उधर तू ही तू है
    आज अपनी ही नज़रों पे
    प्यार आ रहा है

    कभी खत्म ना हो
    साईं दीदार तेरा
    मेरे दिल को बड़ा ही
    करार आ रहा है

    क्या सुहाना है मँज़र
    तू सन्मुख है मेरे
    दरम्याँ कुछ नहीं है
    साईं मेरे और तेरे

    सच है या सपना
    या प्यारा सा अहसास
    हो जैसे भी, पर है
    तू मेरे आस पास

    तेरी खुश्बू भी फैली है
    फिज़ा में हवा में
    जैसे चँदन सा फैला हो
    सारे जहाँ में

    या जैसे यहाँ हो
    कोई फूलों की वादी
    इत्र की महक ज्यों
    किसी ने बिखरा दी

    मँदिर की घँटी
    सुबह को बजी हो
    गुलाबों से जैसे
    सारी शिरडी सजी हो

    दम दम दमकता
    साईं मुखड़ा तुम्हारा
    दे कर गया है
    ये अदभुत् नज़ारा

    अब बस साईं तुमसे
    इतना है कहना
    मेरी नज़रों में यूँ ही
    समाए तुम रहना

    जय साईं राम

    Offline saisewika

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    Re: बाबा की यह व्यथा
    « Reply #279 on: March 20, 2014, 12:46:39 PM »
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  • ॐ साईं राम

    साईं सच्चिदानन्द है
    सदगुरू एक ओंकार
    परम ईश परमेश्वर
    कर्ता और करतार

    आदि और अनन्त तू
    जड़ चेतन आधार
    विद्यमान सर्वत्र तू
    देवा अपरम्पार

    अति सबल सर्वज्ञ तू
    कण कण तेरा वास
    नभ तल जल में घुली हुई
    तेरी मधुर सुवास

    गीता का है ज्ञान तू
    उपनिषदों का सार
    सार तत्व है वेदों का
    सृष्टि का सँचार

    आगम निगम का भेद तू
    अदभुत रचनाकार
    तेरी शक्ति से चले
    जीवन का व्यापार

    ज्योतिर्मय जगदीश तू
    परम पुरुष भगवान
    तजोमय परमात्मा
    परम शक्ति की खान

    ब्रह्मा विष्णु महेश तू
    निर्गुण और गुणवान
    साईं शुद्ध स्वरूप का
    दीजिए हमको ज्ञान

    जय साईं राम

     


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