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Author Topic: बाबा की यह व्यथा  (Read 161517 times)

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Offline saisewika

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Re: बाबा की यह व्यथा
« Reply #45 on: February 25, 2008, 11:43:49 AM »
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  • ओम साईं राम

    साईं अगर आंसू दे
    तो सिर माथे पर हमारे
    चाहे छोडे मझधार में
    चाहे लगाए किनारे

    पर साईं तो मां का आंचल है
    वृक्ष की ठंडी छाया है
    जीवन का आधार है
    हमदर्द है, सरमाया है

    वो हमें दुख नहीं
    केवल खुशियां ही देता है
    और हमारी सारी चिंताओं को
    हमसे वो ले लेता है

    फिर भी ये कहकर कि हम मानव हैं
    हम गलतियों का हक पाते हैं
    और हर कदम पर हर रोज़
    गलतियां किए जाते हैं

    फिर शिकायत करते हैं साईं से
    कि वो हमारी सुनता नहीं
    हम तो उसे बुलाते हैं
    पर उसे हमारी चिंता नहीं

    पता नहीं कितनी बार
    हम यूं ही शिकायत करते हैं
    और उस पर साईं से
    प्रेम का दम भरते हैं

    पर साईं तो फिर भी साईं हैं
    वो तो बक्शन हार है
    भक्तों की हज़ार गलतियां भी
    मेरे बाबा को स्वीकार हैं

    इसी लिए तो मेरा साईं
    मुझको इतना प्यारा है
    केवल उसका नाम ही
    जीवन का सहारा है

    जय साईं राम

    Offline tana

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      • Sai Baba
    Re: बाबा की यह व्यथा
    « Reply #46 on: February 25, 2008, 09:51:08 PM »
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  • ॐ साईं राम~~~

    जैसे बच्चा अपने टूटे खिलौने लाता है,
    आँखो में आँसू लिए,माता-पिता के पास!
    वैसे ही हम अपने टूटे सपने लाते है बाबा के पास,
    क्योंकि साईं, मेरे करूणामयी साईं पूरी करते है सब की आस!!

    फिर शांति से उन्हें काम
    करने देने की बजाय
    हम बार-बार उन्हें टोकते है,
    अपने ढ़ग से उन्हें मदद की गुहार लगाते है,
    ऐसा होता तो अच्छा रहता,
    ये हो जाता तो और अच्छा हो जाता,
    वो नहीं किया....ऐसा कर दो न बाबा.....

    जब फिर पूरे न होते सपने,
    फिर यूँ लगता अब बाबा न रहे अपने,
    फिर लगाने लगते शिकायतों की फेरी,
    दूसरों की व्यथा सुनते हो
    और मेरी बारी क्यों इतनी देरी??

    फिर मेरे साईं मेरे बाबा बोले कुछ यूँ रो कर--
    "ओ मेरे प्यारे बच्चों ,मैं क्या करता?
    मैं क्या कर सकता था?
    तुमने कभी पूर्ण विश्वास किया ही नहीं,
    तुमने कभी पूरी तरह छोङा ही नहीं मुझ पर ".....


    जय साईं राम~~~
    "लोका समस्ता सुखिनो भवन्तुः
    ॐ शन्तिः शन्तिः शन्तिः"

    " Loka Samasta Sukino Bhavantu
    Aum ShantiH ShantiH ShantiH"~~~

    May all the worlds be happy. May all the beings be happy.
    May none suffer from grief or sorrow. May peace be to all~~~

    Offline saisewika

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    Re: बाबा की यह व्यथा
    « Reply #47 on: March 04, 2008, 12:05:47 PM »
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  • ओम साईं राम

    ख़्वाहिशें कुकुरमुत्तों की तरह
    बढती जाती हैं
    कभी एक पूरी हुई भी तो
    दूसरी नहीं हो पाती है

    तमाम उम्र चलता है
    चाहतों का सिलसिला
    कभी साईं का शुकराना
    तो कभी उससे गिला

    जैसे सारी ज़िंदगी सिमटी हो
    चाहतों के आस पास
    कुछ ना कुछ पाने की
    बुझती नहीं प्यास

    कभी सोचती हूं साईं
    कि ज़िंदगी ऐसी क्यूं है
    आशाओं का, तम्मनाओं का
    रचा क्यूं चक्रव्यूह है

    बस अब बहुत हुआ
    नहीं चाहिए अब कुछ और
    बढती हुई मांगों का
    बस बंद हो ये शोर

    पर क्या कोई चाहत ना हो
    ये भी मेरी चाहत तो नही?
    एक और ही मांग की
    दस्तक या आहट तो नहीं

    साईं इस नादान मन का
    आप ही कुछ कीजिए
    बंद हो ये सिलसिला
    कोई ऐसा ही वर दीजिए

    जय साईं राम

    Offline tana

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      • Sai Baba
    Re: बाबा की यह व्यथा
    « Reply #48 on: March 04, 2008, 06:27:23 PM »
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  • ॐ सांई राम~~~

    तम्मना, इच्छा, चाह, आरज़ू, ख्वाईश या जुस्तजू
    न जाने कितने नाम धराए तू
    क्या तेरा कोई अंत नहीं,जितने नाम उससे भी बङी तू,
    क्या कभी पूरी होती तू,
    तेरा एक कहां पूरा हो,दूसरी तैयार करती तूं,
    पहले से आखिर सांस तक,हर पल साथ है रहती तूं,
    कोई न जीत पाया तुझे,तेरे आगे सब झुके,
    इंसा तो क्या भगवान के बस में भी नहीं तूं!!!

    साईं इस नादान मन का आप ही कुछ कीजिए
    बंद हो ये सिलसिला कोई ऐसा ही वर दीजिए!!!


    जय सांई राम~~~

    "लोका समस्ता सुखिनो भवन्तुः
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    Re: बाबा की यह व्यथा
    « Reply #49 on: March 12, 2008, 11:49:09 AM »
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  • ओम साईं राम

    आंख खुली जब आज सवेरे
    मन में थे कई प्रश्न घनेरे

    तुमको साईं कैसे पाऊं
    ढूंढूं कहां कहां मैं जाऊं

    यही सोच मैं घर से निकली
    कानों में आ बोली तितली

    वो देखो वो ठीक सामने
    उस वृद्ध को शीघ्र थामने

    जिस युवक ने बांह बढाई
    उसमें ही है तेरा साईं

    और वो देखो दूर वहां पर
    मंदिर दिखता एक जहां पर

    भूखों को जो रोटी देती
    ढेर दुआएं उनकी लेती

    उस बाला में साईं को मान
    कर ले उसकी तू पहचान

    दुखिया, पंगु और असहाय
    इनकी सेवा में सुख पाय

    उन सब में है साईं का वास
    क्यूं ना तुझको है आभास

    व्यर्थ भटकती यहां वहां
    साईंमय है सकल जहां

    केवल मन की आंखे खोल
    मुख से साईं नाम ही बोल

    मिट जायगा सब अंधियारा
    नित देखेगी साईं प्यारा

    जय साईं राम

    Offline nimmi_sai

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      • Sai Baba
    Re: बाबा की यह व्यथा
    « Reply #50 on: March 12, 2008, 12:11:40 PM »
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  • sai sevika ji ...
    very nice &very true ...he is everywhere ..sirf man ki aankhey chaiye
    bahut..bahut  sunder likha hai aapney .....baba says what we make happen for others will happen for us..
    ....You are a very kind and loving child of our sai  and I pray that you receive many blessings...amennnn

    pm sai shri sai jai jai sai
    Nimmi
    Surrender your problem entirely to God.
    Be humble.
     Forgive all your enemies.
    Have faith. Do not doubt.
    Thank God in advance and praise Him.
    Pray from the heart.
    om sai shri sai jai jai sai
    Nimmi

    Offline saisewika

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    Re: बाबा की यह व्यथा
    « Reply #51 on: March 13, 2008, 08:28:24 AM »
  • Publish
  • OM SAI RAM

    Nimmi_SAI ji

    Thanks for your blessings. It is like getting SAI PRASAD.
    May SAI bless you and each and every member of this devalaya .

    JAI SAI RAM
    Saisewika

    Offline saisewika

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    Re: बाबा की यह व्यथा
    « Reply #52 on: March 15, 2008, 10:59:38 AM »
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  • ऒम साईं राम

    आते हैं साईं
    बुलाकर तो देखो
    दिल में साईंनाथ को
    बैठा कर तो देखो

    भवसागर से पार
    लगाएंगे वो ही
    खुद को उनकी याद में
    डुबा कर तो देखो

    पाओगे निसदिन
    दरस उनका प्यारा
    मन में उनका मंदिर
    सजा कर तो देखो

    भूलोगे सारे
    गमों को दुखों को
    जग को उनकी खातिर
    भुला कर तो देखो

    सब्र और सबूरी
    आ जाएंगे खुद ही
    श्रद्धा का दीपक
    जला कर तो देखो

    पाओगे जो भी है
    मन में तुम्हारे
    शिरडी का फेरा
    लगा कर तो देखो

    दामन में होंगी
    ज़माने की खुशियां
    साईंराम से लौ
    लगा कर तो देखो

    जय साईं राम

    Offline tana

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      • Sai Baba
    Re: बाबा की यह व्यथा
    « Reply #53 on: March 16, 2008, 06:56:01 AM »
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  • ॐ सांई राम~~~

    वो आए रूके कुछ पल , झाका और चल दिए,
    मैं दौङी पीछे पकङा हाथ,
    और हैरानी से पूछा कहां चल दिए
    वो बोले बङे दुखी मन से ...अरे पगली
    तुने की थी पुकार तो में दौङा चला आया,
    पर लगा जब अंदर आने,
    तो देखा मैने कि भीङ है लगी हुई
    सभी ने है डेरा जमाया,
    मैं बैठू कहां ये बता मुझको
    क्या है तेरे मन में मेरा ठिकाना
    तू जब पुकारें मुझे मैं दौङा चला आता हूँ
    पर तू तो ये भी ना जाने कि है मुझे कहां बिठाना
    इस भीङ कि कुछ कम कर
    कर साफ मेरी जगह को
    फिर बुला मुझे फिर देख कभी ना होगा वापस जाना
    मैं हो गई शर्मिदां इस सच को जान कर
    कि मैने की पुकार वो आ भी गए
    पर कभी नहीं सोचा कि है उन्हे कहाँ बिठाना!!!!

    जय सांई राम~~~

    "लोका समस्ता सुखिनो भवन्तुः
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    Offline saisewika

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    Re: बाबा की यह व्यथा
    « Reply #54 on: March 17, 2008, 10:48:47 AM »
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  • ओम साईं राम

    तेरे चरणों में अपना ठिकाना चाहते हैं

    तुझे दिल में अपने बैठाना चाहते हैं

    शर्मसार हैं अपने करमों पे खुद ही

    किसी मुकाम पर खुद को पहुंचाना चाहते हैं

    जब नाम ले साईं तेरा, अपनी बात भी निकले

    काम कोई ऐसा कर जाना चाहते हैं

    तुम आकर वापिस जा ना सको

    अपने दिल को ही मन्दिर बनाना चाहते हैं

    जय साईं राम

    Offline Ramesh Ramnani

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      • Sai Baba
    Re: बाबा की यह व्यथा
    « Reply #55 on: March 20, 2008, 04:03:44 AM »
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  • जय सांई राम।।।

    बाबा की व्यथा के साथ-साथ ये इन्सान की व्यथा ही कहेंगे कि ज़माने बीत जाते हैं....

    कभी नज़रें मिलाने में ज़माने बीत जाते है
    कभी नज़रें चुराने में ज़माने बीत जाते हैं
    किसी ने आंख भी खोली तो सोने की नगरी में
    किसी को घर बनाने में ज़माने बीत जाते है
    कभी काली स्याह रातें हमे पल पल की लगती है
    कभी इक पल बिताने में ज़माने बीत जाते है
    कभी खोला घर का दरवाज़ा खड़ी थी सामने मन्ज़िल
    कभी मन्ज़िल को आने में ज़माने बीत जाते हैं
    इक इक पल में टूट जाते है उम्र भर के वो रिश्ते
    वो रिश्ते जो बनाने में ज़माने बीत जाते हैं।

    अपना सांई प्यारा सांई सबसे न्यारा अपना सांई

    ॐ सांई राम।।।
    अपना साँई प्यारा साँई सबसे न्यारा अपना साँई - रमेश रमनानी

    Offline saisewika

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    Re: बाबा की यह व्यथा
    « Reply #56 on: March 20, 2008, 01:04:09 PM »
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  • ओम साईं राम

    शिवरात्रि के अगले दिन
    झील के किनारे टहलने गई
    तो बाबा को पहले से ही वहां बैठा पाया
    आंखे मली, चुटकी काटी
    खुद को ही यकीं ना आया

    करीब गई, ध्यान से देखा
    हां मेरे प्यारे साईं ही थे
    मेरे राम, मेरे देव
    मेरे कृष्ण कन्हाई ही थे

    दण्डवत प्रणाम किया
    पर बाबा ने ना ध्यान दिया
    फिर रूखे स्वर में बाबा बोले
    वैसे तो तुम साईं नाम का दम भरती हो
    पर जो मुझे रूचते नहीं
    वो काम क्यूं करती हो?

    हाथ जोडकर मैंने पूछा
    मुझसे क्या कुछ भूल हो गई?
    मेरी कैसी करनी आपकी
    शिक्षा के प्रतिकूल हो गई?

    बाबा बोले गलती करके भी
    तुम्हें उसका अहसास नहीं
    यकीन जानो अभी तुम्हें
    साईं नाम का अभ्यास नहीं

    कल तुम शिव पूजन के लिए
    मन्दिर गई थीं
    याद करो तुमने एक नहीं
    गलतियां करी कई थीं

    मन्दिर के बाहर एक भूखा बालक
    मां का हाथ थामें रोता था
    एक और मां के आंचल में
    भूखा ही सोता था

    तुम उन्हें देख कर भी
    आगे बढ गई
    दूध की थैली लिए
    तुम मन्दिर की सीढियां चढ गई

    शिवलिंग पर तुमने
    पंचामृत और दूध चढाया
    और सोचा अपने कर्मों के खाते में
    एक और पुण्य बढाया

    अगर तुम उन भूखे बच्चों को
    दूध पिलाती
    और शिवलिंग पर
    भक्ती भाव का तिलक ही लगाती

    तो भी भोले बाबा
    उसे स्वीकार करते
    तुम्हारे दिल में दया है
    इसलिए तुम्हें प्यार करते

    पर तुम निर्दयी ही नहीं
    क्रूर भी थी
    खुद को बडा भक्त समझने के
    अहंकार में चूर ही थीं

    इसीलिए तुम लाईन तोड
    गलत तरीके से आगे बढी
    एक वृद्धा को धक्का मारा
    और उसके पैर पर चढी

    दर्द से वो कराही
    पर तुमने ना ध्यान दिया
    कई भक्तों को पीछे छोडा
    इस जीत पर भी अभिमान किया

    तुम क्या सोचती हो
    तुम्हारी पूजा स्वीकार होगी
    पूजा का आडम्बर करके
    तुम भवसागर से पार होगी

    तुम्हे लगता है
    भक्ती मर्ग पर चलना बहुत आसान है
    नहीं, इस पर चलना
    पतली सुतली पर चलने के समान है

    पग पग पर
    गड्डे हैं,खंदक है, खाई है
    ज़रा सी भूल
    और पतन की गहराई है

    मुझ तक पहुंचने के लिए
    बीच का कोई रास्ता नहीं
    या तो तुम्हारा इस माया से
    या मुझसे कोई वास्ता नहीं

    इसलिए या तो तुम
    मेरे नाम का दम मत भरो
    या फिर पूरे मन से ही
    मुझे याद करो

    तुम्हे बार बार समझाने
    तुम्हारे पास आता हूं
    क्यूंकि अपना नाम लेने वालों को
    मैं बहुत चाहता हूं

    संभलो, जीवन को यूं ना
    बेकार करो
    दुखियों का दर्द समझो
    प्राणीमात्र से प्यार करो

    अगर तुम ये सीधा सच्चा
    रास्ता अपनाओगी
    नि: संदेह अपने बाबा को
    एक दिन अपने सन्मुख पाओगी

    जय साईं राम

    Offline tana

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      • Sai Baba
    Re: बाबा की यह व्यथा
    « Reply #57 on: March 24, 2008, 11:06:22 PM »
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  • ॐ सांई राम~~~

    सुरेखा दी...कोई शब्द ही नहीं है~~~

    बस इतना ही कहूं गी~~~

    ओ बंदे सोच समझ कर कदम उठा,
    मंदिर जा ना मस्जिद जा,
    पर किसी को यूँ ही न दुखा...
    किसी का दुःख दर्द समझ,
    किसी की मजबूरी को समझ,
    उसका फायदा न उठा...
    भले ही ऱब को मना या न मना,
    पर दिल किसी का न दुखा...
    इतना ही कर के देखो,
    फिर देखो बाबा की कृपा और बाबा का प्यार~~~

    जय सांई राम~~~
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    Offline Ramesh Ramnani

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    Re: बाबा की यह व्यथा
    « Reply #58 on: March 26, 2008, 07:30:03 AM »
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  • जय सांई राम।।।

    वाह सुरेखा वाह। तुम्हारे शब्दों के सामने तो मेरे शब्द निशब्द मौन हो जाते है। तुम्हारा खूबसूरत अंदाज़े बयान पढ़कर तो मेरी लेखनी मानों थम सी जाती है।  बहन जवाब नही तुम्हारी बाबा भक्ति का।  ना जाने कितनी बार जब भी समय मिलता है तुम्हारे पिरोये मोतियो को सिर्फ बस पढ़ता रहता हूँ।  बाबा तुम्हारे द्वारा ना जाने कितनो के प्रश्नों का जवाब दे देते है। 

    क्यों याद करते है तुझे ऐ बाबा जब वो अकेले होते है
    क्यों वो याद तुझे करते है जब वो परेशानी में होते हैं।
    कहने में तुझसे कभी वो शर्मिंदा नही होते है?
    आख़िर क्या वजह है कि वो
    तुझे केवल अपने ग़मों में ही याद करते हैं।

    करते है तुझसे शिकायत ही क्यों,
    जब अपने किए का ही फल वो पाते है।
    आखिर क्या वजह है,  कि वो,  तुझे समझ नही पाते है।

    यूं तो कहते है सभी कि तू उनका मालिक है,
    फिर भी क्यों तेरी मर्ज़ी में दखल करते है,
    फिर भी हमेशा सिर्फ अपने भले की
    ही हमेशा उम्मीद क्यों करते हैं?

    अपना सांई प्यारा सांई सबसे न्यारा अपना सांई

    ॐ सांई राम।।।
    अपना साँई प्यारा साँई सबसे न्यारा अपना साँई - रमेश रमनानी

    Offline saisewika

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    Re: बाबा की यह व्यथा
    « Reply #59 on: March 29, 2008, 11:10:38 AM »
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  • ओम साईं राम

    रमेश भाई जी, और अनु

    इस द्वारकामाई में आकर आप से और दूसरे भक्तों से भक्ती के मायने बस जान पाई हूं. पता नहीं कब सभी विकार दूर होंगे और अपने को सच्चा साईं भक्त कह पाऊंगी.

    मैं इक अधम पतित प्राणी
    तन मन भरा विकार
    दयामयी हैं करूणा सागर
    कर लेते स्वीकार

    भली बुरी अब जैसी भी हूं
    बाबा शरण हूं तेरी
    भक्ती पथ पर मुझे लगाकर
    बांह थामना मेरी

    जय साईं राम

     


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