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Author Topic: मेरे साई बाबा की गेहूँ पीसनेवाली लीला यानी सच्चा भक्तिमार्ग !  (Read 195 times)

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Offline suneeta_k

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हरि ॐ

ॐ कृपासिंधु श्री साईनाथाय नम:

मेरे साई बाबा की गेहूँ पीसनेवाली लीला यानी सच्चा भक्तिमार्ग !

साई बाबा की गेहूँ पीसनेवाली लीला यानी भोले-भाले भक्तों के लिए सच्चे भक्तिमार्ग की सींख हैं । आम तौर पर आदमी परमार्थ करने से हिचकिचाता है , उसका मन आशंका से कांप उठता है कि मैं तो ठहरा बाल बच्चोंवाला , बीबी , मां-बाप घर में रहनेवाला संसारी इंसान , मुझे भला यह परमार्थ करना कैसे मुमकीन होगा? ना मैं घरबार छोडकर जंगल में जाकर धुनी रमा सकता हूं ना मैं संन्यासी लोगों की भांति भिक्षा मांग सकता हूं , यदि मैं ये सब करने लगा तो मेरे संसार , घर गृहस्थी को कौन संभालेगा  भला? दूसरी ओर देखा जाए  तो कई बार यह भी गलत बात दिमाग में ठूस दी जातीं हैं कि परमार्थ याने भगवान की भक्ति आदी बातें तो बूढापे में करने की बातें हैं , संसारी आदमी को इससे चार हाथ दूर ही रहना चाहिए , जवानी में कोई भला भगवान का नाम जपतें बैठकर अपना किमती वक्त क्यों जाया करने का आदी । साईनाथ यही गलत बातों को जड से उखाडना चाहतें थे और आम आदमी को भगवान की भक्ति का सच्चा रास्ता दिखाना चाहते थे और वो भी सहजता से, आसानी से , संसार में रहकर ही परमार्थ करना चाहिए , यही सच्चा भक्ति मार्ग है यह सबक सिखलाना चाहतें थे ।

संत एकनाथजी ने कहा था कि प्रारब्ध का नाश हरिकृपा से ही हो सकता है ।  साईबाबा ने खुद आटा पीसकर इस बात को दिखला दिया कि प्रारब्ध का नाश करनेवाली हरिकृपा को प्राप्त करना यानी परमार्थ साध्य करना यह बिलकुल भी कठिन न होकर बिलकुल सहज साध्य हैं । और उसके लिए हरिभक्ति यही सर्वांग सुंदर और सहज सरल मार्ग है । साईबाबा ने आम आदमी की घरेलू बात को ही अपना सिखाने का जरिया बनाया । गेहूँ आदि पीसने का कार्य अपने भारत देश में पहले से ही (आदिकाल) स्त्रियाँ ही करते आई हैं । पुरूषों के लिए ये काम नहीं ऐसी कोई बात नहीं थी, परन्तु जाते पर पीसने के लिए बैठनेवाली गृहिणी (महिला) का दृश्य इस भारतवर्ष के ग्रामीण क्षेत्रों में अकसर प्रात: समय में दिखाई देता था ।  तो यही हमारी रोज मरा कि जिंदगी में अपना पेट पालने के लिए जो क्रिया हमें करनी पडती है , उसी क्रिया को साईबाबा ने चुना था । हमें पता है कि अगर हमें गेहूँ खाना है तो उसका पहले उसका आटा पीसना पडता है और बाद में उसके आटे से रोटी बनती है जो हम सब्जी, दाल के साथ खा सकतें हैं ।  भूख कितनी भी लगी हो लेकिन आदमी कच्चा गेहूँ  नहीं खाता क्यों कि वो उसको हजम करने में परेशानी हो सकती हैं, कच्चा गेहूँ -बिना आटे के हजम करना बहुत ही कठिन है ।

हेमाडपंतजी हमें साईनाथ का अवतार किन हालात में हुआ था इसका एहसास चौथे अध्याय में करवातें हैं कि सभी तरह से लोग अपने कर्मों को छोडकर गलत मार्ग पर भटक गए थे, धर्म के नाम से झूठ का सहारा लेकर लोगों को लूटा जा रहा था । इसिलिए साईबाबा का अवतार उस समय में हुआ था, जब इंसान को सच्चा भक्तिमार्ग दिखलाना बहुत ही जरूरी हो गया था । हेमाडपंतजी हमें समझातें हैं कि उस समय का विचार करने पर पता चलता है कि उस समय में सच्चे भक्ति मार्ग का तकरीबन हर किसी को विस्मरण हो चला था । उसके स्थान पर अनुचित प्रथा, वृत्ति और आडंबर इन सब का बोलबाला सिर्फ हुआ ही नहीं था, बल्कि, इन सबने मजबूती के साथ अपने कदम जमा लिए थे । भक्ति के नाम पर लोगों को,  भोली-भाली आम जनता को बहला-फुसला कर (अपनी जेब भरनेवाले) अपने आपको सर्वोत्तम कहलानेवाले ‘सद्‌गुरु’ संपूर्ण समाज को अनुचित दिशा की ओर ले जा रहे थे ।

तब अपने आचरण से समाज को सच्च्चा भक्तिमार्ग सिखलाने वाला मसीहा जरूरी था, साईबाबा को इसिलिए मानवी रूप में अवतार लेना पडा था कि आम इंसान को साईबाबा अपने लगे, मेरे अपने लगे, उनसे लोग सच्चाई को भली-भांति जान ले । इसि वजह से साईबाबा ने आटा पीसने की सहज क्रिया को चुना और परमार्थ सहज सामान्य करके दिखा देने की क्रिया की।

साईबाबा ने स्वंय आटा पीसकर सिखाया कि जैसे जाते के दोनों तह और खूंटा इनके एकत्र आने से  गेहूँ पीसने की क्रिया होती है इसी के साथ गेहूँ का रूपांतर आटे में होता है, उसी प्रकार श्रद्धा और सबुरी एवं अनन्यता इन तीनों बातों के एकत्रित आ जानेसे भक्ति मार्ग पर चलना आसान हो जाता है, और परमार्थ सहजता से साध्य किया जा सकता है । ये साईमाऊली विठुमाऊली ही हैं, यह हेमाडपंत हमें इस गेहूँ पीसनेवाली कथा के माध्यम से बता रहे हैं । ‘पर पीसनेवाला यही एक’ इस पंक्ति के एक चरण में वे साई बाबा के विठ्ठल स्वरूप को स्पष्ट करते हैं । ईंट पर समचरण खड़ा रहनेवाला, अठ्ठाईस युगों से भक्तों की राह देखते पंढरपुर में पुंडलिक को दिए वचनानुसार कमर पर हाथ रखे खड़ा रहनेवाला पांडुरंग ही शिरडी में अवतरित हुए हैं । कारण भक्तों के लिए कष्ट उठानेवाला सिर्फ़ यही एक है । भक्तों के लिए स्वयं देह धारण करके अपार परिश्रम करनेवाली सिर्फ़ यही एक विठुमाऊली, साईमाऊली है । यही बात हमें गौलीबुवा भी बतातें हैं , दासगणू भी बतातें हैं ।

‘पर पीसनेवाला यही एक’ इस वाक्य में हेमाडपंत इस साईनाथ के एकमेव अद्वितीयत्व को स्पष्ट कर रहे हैं ।


साईबाबा के गेहूँ पीसने के पिछे छुपे इस अनोखी लीला का राज मैं समझ पाई एक लेख्ह पढकर , जिसकी जानकारी आप को देना उचित जानती हूं -
http://www.newscast-pratyaksha.com/hindi/shree-sai-satcharitra-adhyay1-part20-hindi/

यहां पर लेखक महोदय समझा रहें हैं कि माँ जैसे अपने बच्चे के लिए दूध-चावल  भी और अधिक नरम , मुलायम बनाके, उसे मसलकर (उसे छोटे-छोटे टुकड़ों में तोड़कर) उसे खाने को देती है, उसी प्रकार ये साईनाथ, ये साईमाऊली अपने बच्चों के लिए गेहूँ  पीसने बैठी है । गेहूँ को वैसे ही खाना यानी ज्ञानमार्ग द्वारा, योगमार्ग से अथवा अन्य किसी भी कठिन मार्ग से परमार्थ साध्य करना । इस तरह से गेहूँ खाना और उसे हज़म करना बहुत ही कठिन है यानी सर्व सामान्य के लिए ज्ञान, योग आदि कठिन / (मुश्किल तरीकेसे) मार्ग से परमार्थ साध्य करना बहुत ही मुश्किल है । परन्तु ये गेहूँ तो पोषक तत्त्व है, इसे खाये बगैर सामर्थ्य प्राप्त नहीं होगा । जीवन सुखपूर्वक निरोगी बनकर जीना मुश्किल होगा । फिर सामान्य भोले-भाले (भाविकों को ) भक्तों को ये गेहूँ खाना कैसे स्वाभाविक होगा इस बात की चिंता मेरे साईमाऊली को है । गेहूँ के सभी पोषकतत्त्व, उत्कृष्ट गुणधर्म तो मेरे बच्चों को मिलना ही चाहिए, परन्तु इसके लिए सीधे गेहूँ खाने के बजाय अन्य सहज सरल तरीके से इसका सेवन वे भी कर सके, इसके लिए मेरी यह साई माऊली स्वयं गेहूँ पीसने बैठी है ।

साई बाबा की गेहूँ पीसने की लीला यानी परमार्थ को सहज सरल बनाकर, भक्तों के लिए सहजसुंदर रास्ता निर्माण करने की लीला ।

लेखक महाशय ने समझाया कि साईबाबा ने अवतार क्यों लिया ?
अध्याय ४ में हेमाडपंतजी ने बयान किए हुए भारतवर्ष की प्रतिकूल परिस्थिती में सच्चा भक्तिमार्ग, सच्चा सद्‌गुरु, सच्चा भक्त आदि हर प्रकार से सुस्पष्ट रूप में सबके सामने (लाना) प्रस्तुत करने के लिए तथा इस भारतभूमि का मुकुटमणि होनेवाले मर्यादाशील भक्तिमार्ग को उज्ज्वल करने के लिए इस परमात्मा ने, इस सावरे ने, इस विठ्ठलने, साईरूप में अवतार लिया । परमार्थ साध्य करने के लिए नाक दबाकर, ब्रह्ममाया की चर्चा करके कर्मकांड का आहार बनकर कोई न कोई ढोंग-ढकोसला करना आवश्यक नहीं है, श्रद्धा-सबुरी एवं अनन्य सद्‍गुरु निष्ठा इस सहज-सरल मार्ग से परमार्थ आसानी से हर-कोई साध्य कर सकता है । किंबहुना गेहूँ पूर्णत: पाचक एवं पौष्टिक तत्त्व से बनता है, उसका आटा बनाने पर ही, यानी सही मायने में भक्ति मार्ग पर चलते हुए ही सच्चा परमार्थ साध्य किया जा सकता है । इस परमात्मा का सामीप्य प्राप्त होता है सिर्फ़ भक्तिमार्ग से ही । इसी सच्चाई को पुन: एक बार सबको  समझाकर बताने के लिए ही साईनाथ माऊली ने अवतार लिया था – ‘भक्त्याऽ हमे कथा ग्राह्य:।’

इस भक्ति मार्ग का आचरण कैसे करना चाहिए यह सभी को दिखाने के लिए ही साईबाबा यह गेहूँ पीसने की लीला करते हैं ।

लेख पढकर जाते का बहुत ही सुंदर मतलब ध्यान में आया -
जाते के नीचेवाला तल (चक्का) = श्रद्धा
जाते के ऊपरवाला तल (चक्का) = सबुरी
जाते का मज़बूती से ठोका गया (मज़बूत किया) खूंटा = अनन्यता

यह पढकर मुझे बहुत दु:ख हुआ कि मेरे साईबाबा ने सिर नीचे झुकाकर यहाँ पर गेहूँ पीसने की लीला क्यों  की ? लेखकजी बता रहें हैं कि इसका कारण यही है कि हम मनुष्यों को इस पवित्र भक्तिमार्ग को अपने तुच्छ स्वार्थ हेतु, (छोटे-मोटे स्वार्थ के लिए) अहंकार हेतु, कितना भ्रष्ट स्वरूप दिया था । भगवान की भक्ति - जो मूलत: शुद्ध आल्हादिनी भक्ति है, उसके मूल स्वरूप को हम अनदेखा कर देतें हैं , उसके सच्चे स्वरूप को नज़र अंदाज करके हमारे अपने द्वारा ही निर्माण किए गए विकृत प्रथाओं को ही हम भक्ति का लेबल चिपका देतें हैं । बाबा को इस गलत आडंबरों का ही निर्दलन करना था । यह वर्तुलाकार घुमनेवाला जाता कोरा ‘जाता’ न होकर वह साक्षात इस साईनाथ महाविष्णु का सुदर्शन चक्र ही है । दुष्टों का निर्दलन करनेवाले सुदर्शन चक्र यानी दुष्ट प्रथा एवं वृत्तियों को रगड़ कर पीसनेवाला यह, इस साईनाथ के हाथों का जाता है । कितनी सुंदर बात हैं यह कि मेरे साईबाबा का जाता यानि मेरे साईश्याम का सुदर्शन चक्र ही है, जैसे कॄष्ण भगवान ने राक्षसों का नाश  सुदर्शन चक्र फेंककर किया , ठीक वैसें  ही कालानुरूप अपना भेंस बदल कर आए वही भगवान ने साईश्याम बनकर बुराईयों को जाते में पीसा हैं और महामारी जैसी समस्या का निर्दालन किया। 

बाबा की यह पीसनेवाली लीला यानी भोले-भाले भक्तों के लिए परमार्थ को सहज,  सरल करके दिखानेवाली क्रिया है ।अपनी यह साईमाऊली का अपने बच्चों के लिए प्यार भी कितना अजीब है?  कितना निरपेक्ष प्रेम से (नि:स्वार्थ) है ? अपने बच्चों को मुसीबत में देखकर कोई मां चूप नहीं बैठ सकती, खुद कितना भी कष्ट सह लेती है, वैसे ही मेरे साईमाऊली ने खुद आटा पीसने का कष्ट उठाया है और दिखाया है कि भगवान को पाने का सच्चा रास्ता सहज है, सरल है , आसान है - वो है सच्चा भक्तिमार्ग !
 
आगे  तेरहवे अध्याय (१३ अध्याय ) में  भिमाजी पाटील के कथा के अन्त में हेमाडपंत हमें यही रहस्य और अधिक स्पष्ट करके बतला रहे हैं ।

दो हाथ एक माथा । स्थैर्य श्रद्धा अनन्यता । ना चाहे कुछ और साई । बस कृतज्ञतापूर्वक अर्पण हो ॥


श्रद्धा और सबुरी ये दो हाथ और अनन्यता रूपी माथा सिवाय इसके और कुछ ना चाहे साई, इसी लिए कृतज्ञतापूर्वक इन तीनों को एक साथ साईचरणों में अर्पण करना इतना ही है बस अपना काम ! इतनी सहज और सरल है यह परमार्थ की भक्तिरूपी राह !

ओम साईराम ।

 


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