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Author Topic: श्री साई ज्ञानेश्वरी - भाग 10  (Read 265 times)

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Offline trmadhavan

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।| श्री सदगुरू साईनाथाय नमः
अथ श्री साई ज्ञानेश्वरी चतुर्थ अध्याय: |।
श्री साई ज्ञानेश्वरी का चतुर्थ अध्याय 'भगवद्भक्ति' है।

ईश्वर के प्रति झुकाव एवं मन में ईश्वर के प्रति लगाव पैदा होना ही भगवद्भक्ति' है।
इस अध्याय में श्री साई के साथ उनके भक्तों के चार संवाद हैं ।
श्री साई ने बताया है कि शुद्ध भक्ति करें,
भक्ति करने का अधिकार सभी को है,
सच्चे सद्गुरू की भक्ति करें
एवं निष्ठा एवं इमानदारी के साथ भक्ति करें |
भक्ति की सीढ़ी ही इंसान को भगवान तक पहुँचाती है।

इस अध्याय में सर्वप्रथम “श्री साई चाँद पाटील संवाद है।
इस संवाद में सद्गुरू श्री साई भक्‍त के मन में विश्वास पैदा करते हैं।
विश्वास से श्रद्धा उत्पन्न होती है,
श्रद्धा से आस्था जागृत होती है,
आस्था के कारण मनुष्य आराध्य के सामने मस्तक झुकाता है
और आराध्य की भक्ति में मन को लीन करता है।
बाबा हिदायत देते हैं कि भौतिक पदार्थों का मोह त्यागना आवश्यक है|
मन जब भौतिकता के माया-जाल से दूर होता है,
तभी व्यक्ति ईश्वर की सत्ता का भान
और उनके स्वरूप का ध्यान कर सकता है।
तभी भगवद्भक्ति संभव है |

आइये, अब हम “श्री साई चाँद पाटील संवाद” का पारायण करते हैं |

जंगल-जंगल घूमकर, कर पाया न तलाश |
खोई घोड़ी ना मिली, चाँद उदास निराश ।।

एक दिन एक यवन व्यक्ति
औरंगाबाद जिले के घने जंगलों से होकर गुजर रहा था।
उसका नाम चाँद पाटील था।
उसकी घोड़ी खो गई थी
और वह जंगल-जंगल भटक कर उसकी तलाश कर रहा था।

चाँद पाटील ने एक वृक्ष के नीचे एक नवयुवक फकीर को देखा
तो वह आश्चर्यचकित रह गया।
उसके मन में खयाल आया-
“अरे। इस निर्जन घने जंगल में यह फकीर!
वह भी कच्ची उम्र का नवयुवक!
कहीं यह अनाथों की माँ तो नहीं,
कहीं यह बेसहारों को सहारा देने वाला तो नहीं ।”

चाँद पाटील के मन में दूसरा खयाल आया-
“यह सूनी डगर, यह घना जंगल,
इस निर्जन में मनुष्य का क्‍या काम?
अवश्य ही, यह मनुष्य नहीं है।
कहीं यह कोई यक्ष या वनदेव तो नहीं!
कहीं यह भूत-पिशाच या राक्षस तो नहीं!
कहीं मनुष्य के रूप में यह कोई व्यन्तर तो नहीं |”

चाँद पाटील ने फिर सोचा-
“इस निर्जन जंगल में मनुष्य का होना संभव नहीं।
मेरे सामने तो कोई दुर्भाग्य ही खड़ा है।
अब मेरे ऊपर शीघ्र ही कोई आघात होनेवाला है।
अब मैं कैसे प्राण बचाऊ?'
यह सोचकर चाँद पाटील पीछे मुड़ा और वहाँ से भागने को तत्पर हुआ।

चाँद पाटील को पीछे मुड़ते देख फकीर ने उसे आवाज लगाई और कहा-
“अरे! मैं कोई भूत-प्रेत नहीं |
में वनदेव या यक्ष भी नहीं ।
सच्चाई तो यह है कि मैं एक गरीब फकीर हूँ ।
इस सूने जंगल में पेड़ के नीचे आ बेठा हूँ।
अपने मन में किसी तरह का भय और संशय मत रखो |
इधर आओ, मेरे पास बैठो। हम दोनों बैठकर चिलम पिएँगे।”

फकीर के ऐसे वचन सुनते ही चाँद पाटील का भय कम हुआ।
उनको ऐसा लगा, जैसे किसी सघन समस्या से ग्रस्त होते-होते,
वे बाल-बाल बच गये हों।

चाँद पाटील सकृचाते हुए फकीर के पास आए।
फकीर के करीब बैठकर उन्होंने तम्बाकू का चूरा-चूरा किया
और उसे चिलम में भरा |
फिर उन्होंने चिलम पर छापी लपेटी |
उन्होंने फकीर से कहा-
“चिलम भरकर तैयार है
किन्तु जलते हुए कोयले की कमी है।
वैसे, में अग्नि प्रजजलित करने वाला चकमक पत्थर
हमेशा अपने साथ रखता हूँ.
परन्तु इस बार मैं उसे अपने घर पर ही छोड़ आया।
अब उसका इन्तजाम आप ही करें|”

चाँद पाटील की बात सुनकर फकीर के चेहरे पर मुस्कराहट आ गई
और उसने हँसते हुए कहा-
“तुम सांसारिक लोग हो।
तुम्हारे जीवन में हमेशा ही
कुछ-न-कुछ अड़चनें लगी रहती हैं ।
तुम्हारे पास खुद के सुख नहीं,
तुम्हारे पास जो सुख दिखाई पड़ते हैं,
वे सारे उधार लिए हुए हैं।
तुम हर दिन दूसरों की सहायता के मुँहताज रहते हो।
तुम्हें देखकर मुझे ऐसा लगता है कि
जैसे तुम्हारा इस धरती पर जन्म लेना ही बेकार हो ।"

आगे फकीर ने कहा-
“आग का आदि-स्रोत सूर्य है,
सूर्य के तेज की शक्ति अखिल ब्रह्मांड में व्याप्त है।
फिर आग प्राप्त करने के लिए चिन्ता कैसी?"

इतना कहकर फकीर ने अपने हाथ का चिमटा जमीन पर जोर से पटका,
जमीन से अग्नि का अंगार प्रकट हुआ |
उन्होंने अंगारे को चिलम पर रखा |
कपड़े की छापी दूर फेंक दी ।
ऐसा करते समय फकीर ने धिककार पूर्ण मुद्रा व्यक्त की |

इंसान सिफ इंसान ही बना रहना चाहता हे।
वह अपनी अल्पशक्ति तक ही सीमित रह जाता है।
इंसान यदि प्रयास करे तो वह भगवान भी बन सकता है
और अनंत शक्तियाँ भी हाशिल कर सकता है,
परन्तु अफसोस!
इंसान सांसारिक पदार्थों में उलझ कर रह गया है,
उसे इस जगत में आकर जिन शक्तियों का विकास करना था,
उस दिशा में वह कदम नहीं बढ़ाता, अग्रसर नहीं होता।
अत: फकीर धिक्कार के साथ यह खेद व्यक्त करता है।

चाँद पाटील ने फकीर की शक्ति को पहचाना।
उसका मन आश्चर्यचकित रह गया।
उसने सद्भाव एवं आदर के साथ फकीर के चरणों में सर झुका दिया।
चाँद पाटील ने कहा-
“हे महाराज! आपमें विशेष शक्ति है।
आप अलौकिक ताकतों के अधिकारी हैं |
आप साक्षात्‌ ईश्वर के प्रतिनिधि हैं, एक पैगम्बर हैं ।
मेरा यह सौभाग्य है कि मेरी आपसे भेंट हुई।”

चाँद पाटील बोले-
“हे शक्ति-संपन्‍न! मैं चार दिनों से जंगल-जंगल भटक रहा हूँ।
भूखा-प्यासा अपने घोड़े को दूँढ रहा हूँ।
मेरा घोड़ा चार सौ रूपये का था,
वह तुर्की नस्ल का, तेज गति से चलने वाला,
एक बार में चालीस कोस की दूरी तय करनेवाला था,
वह घोड़ा अनेक गुणों से सम्पन्न था।
ऐसा घोड़ा मिल पाना ही बड़ा कठिन है।
मैंने वह घोड़ा खो दिया है।
घोड़े के लापता हो जाने से मैं बिल्कुल ही दुखी हो गया हूँ।
मुझे तो खाना-पानी भी अच्छा नहीं लग रहा।
चार दिनों से मैंने पेट में अन्न का एक दाना भी नहीं डाला है।
मे भटक-भटक कर थक गया पर घोड़े को दूँढ नहीं पाया।
जब तक वह घोड़ा मुझे नहीं मिल जाता,
तब तक मेरी इच्छा चिलम पीने की भी नहीं है।"

फकीर ने पाटील को कहा-
“हे भले आदमी! सब्र रखो ।
तुम सामने वाली झाड़ी के पास जाओ,
वहाँ जाकर सामने देखो,
वहाँ तुम्हारा घोड़ा घास चर रहा है।
तुम्हारा खोया घोड़ा तुम्हें मिल जाएगा।

मामूली से घोड़े के लिए तुम लोग इतने दुखी हो जाते हो?
तुम लोग सांसारिक जीव हो,
तुम लोग नाशवान व अस्थायी वस्तुओं के प्रति बेहद मोह रखते हो।

तुम्हारा बच्चा थोड़ी देर के लिए इधर-उधर चला जाता है तो
उसकी खोज में तुम गली-गली खाक छानते फिरते हो |
तुम्हारी पत्नी यदि घर छोड़कर चली जाती है तो
उसके गम में तुम आँखें भर-भर कर आँसू छलकाते हो ।
छोटा-मोटा दुख आते ही अपना सर पकड़कर बैठ जाते हो।

तुम्हारे घर में यदि चोरी हो जाए तो
तुम छाती पीट-पीट कर रोते हो ।
अगर तुम्हारे घर में आग लग जाती है तो
तुम गले में शंख डालकर चिल्लाते हो
और पूरे गाँव को इकट्ठा कर लेते हो ।'

फकीर ने कहा- “अरे मनमौजी चाँद भाई!
यह संसार माया से उत्पन्न है, यह माया का ही प्रतिरूप है|
तुम माया में मन को उलझाए जा रहो हो।
ब्रह्मांड की जिसने रचना की है,
उस अल्ला-इलाही के बारे में मन में ध्यान करो,
उसे समझने की कोशिश करो,
उस परवरदिगार ईश्वर को कभी मत भूलो।

वह ईश्वर इस संसार का मूल स्रोत है, आदि कारण है,
वह समस्त सुखों का सागर है, वही एकमात्र सत्य है।
उसकी खोज क्‍यों नहीं करते?
सुख-सागर की तलाश न करके आखिर तुम किसकी तलाश कर रहे हो?

लाभ और हानि एक-दूसरे के सापेक्ष हैं,
इन दोनों का पारस्परिक सम्बन्ध है।
ये एक-दूसरे पर निर्भर हैं।
एक को समझे बिना दूसरे के महत्व को नहीं जान सकते |
ग्रीष्म ऋतु में गर्मी पड़ती है, इसके बाद वर्षा की ऋतु आती है।
गर्मी की तपन के बाद ही वर्षा का महत्व जाना जा सकता है।
ग्रीष्म और वर्षा एक-दूसरे के सापेक्ष हैं|
एक के महत्व को जाने बिना दूसरे के महत्व को नहीं जाना जा सकता ।|

अरे चाँद भाई!
तुम एक घोड़े के लिए इतनी चिंता कर रहे हो!
क्या तुमने कभी ईश्वर को खोजने की थोड़ी-सी भी चिन्ता की है?
उसके लिए क्‍या तुम्हारे मन में थोड़ी-सी भी हलचल पैदा हुई है?
निरर्थक की तलाश तुम करते फिरते हो,
सत्य की तलाश करते समय मौन और खामोश हो जाते हो?
तुम सिंह के बच्चे को छोड़कर बकरी के बच्चे की इच्छा क्‍यों करते हो?'

फकीर के ऐसे वचनों को सुनकर चाँद पाटील खामोश हो गये ।
फिर वे बोले- “हे ज्ञान-संपन्‍न फकीर!
आप ज्ञान के भंडार हैं।
आपके अदभुत ज्ञान की प्रशंसा कर पाने में में सक्षम नहीं ।
मेरे शब्दों में इतनी सामर्थ्य नहीं
कि वह आपके अगाध ज्ञान की प्रशंसा कर सके |”

इतना कह कर चाँद पाटील झाड़ी की तरफ गये।
वहाँ उनका घोड़ा हरी-हरी घास चर रहा था।
पाटील ने अपना घोड़ा पकड़ लिया।
घोड़ा पाकर पाटील के मन में अद्भुत आनंद भर गया।

जिस प्रकार से पत्नी के ऋतुमती होने पर पति प्रसन्न होता है
और जिस प्रकार सूखे खेतों पर वर्षा पड़ने से किसान प्रसन्न होता है,
वैसे ही खोया घोड़ा प्राप्त होने पर चाँद भाई प्रसन्न हुए ।
एक हाथ से घोड़ा पकड़े चाँद पाटील फकीर के पास आए।
उन्होंने आदर के साथ उनके सामने मस्तक झुकाया।

चाँद पाटील बोले- “हे समर्थ!
आप इस निर्जन में क्‍यों बैठे हैं?
आप मेरे साथ चलें, मेरे घर को पवित्र करें, वहीं रहें |
अब आप मेरे अनुरोध पर किसी तरह की आपत्ति न करें
और मेरे यहाँ ही बसेरा करें।”

चाँद पाटील के आग्रहपूर्ण वचन सुनकर नवयुवक फकीर हँसने लगा।
फकीर ने कहा- “हे चाँद भाई!
में ठहरा एक फकीर।! रमता जोगी हूँ मैं।
मुझे गाड़ी-घोड़े और आलीशान बंगलों से क्‍या प्रयोजन?
वैसे, आज में तुम्हारे घर नहीं चल सकता |
आज ऐसा कर पाना मेरे लिए संभव नहीं ।
तुम बार-बार आग्रह मत करो |
में शायद कल या फिर कभी तुम्हारे यहाँ आऊंगा |

चाँद पाटील ने फकीर को प्रणाम किया
और घोड़े पर सवार होकर उल्लासपूर्वक अपने घर प्रस्थान किया ।

दूसरे दिन फकीर चाँद पाटील के गाँव धूपखेड़ा में पधारे |
उनके दर्शन के लिए सारा धूपखेड़ा गाँव उमड़ पड़ा |
हिन्दू और मुसलमान--दोनों जाति के लोगों ने
कृपा-मूर्ति फकीर को मस्तक झुकाया।
मुसलमानों ने उन्हें 'एक पहुँचा हुआ औलिया' माना |
हिंदुओं ने उन्हें 'सद्गुरू महाराज' के रूप में स्वीकार किया।
दोनों जाति के लोगों ने उनके पावन चरणों में
अपनी-अपनी श्रद्धा और भक्ति-भावना व्यक्त की |

फकीर कुछ समय तक चाँद पाटील के घर रहे ।
बाद में चाँद भाई की पत्नी के भतीजे की शादी
शिरडी ग्राम की लड़की के साथ तय हुई।
शादी में बारात के साथ फकीर धूपखेड़ा से शिरडी आए |
खंडोबा मंदिर के पुजारी म्हालसापति ने
फकीर का स्वागत करते हुए उन्हें आओ साईं” कहकर संबोधित किया।
इसके बाद फकीर का यही नाम प्रचलित हो गया।

श्री साई शिरडी की धरती पर क्‍या आए,
शिरडी की धरती का कण-कण धन्य हो गया ।
श्री साई के चरणों का स्पर्श पाकर शिरडी का जर्र-जर्रा पावन हो गया,
शिरडी का सौभाग्य-सितारा ही चमक उठा।
दूसरे शब्दों में कहें तो शिरडी गोकुल के समान पूज्य एवं महिमामंडित हो गई |

कृष्ण ने मथुरा में जन्म लिया था
और वे रहने के लिए गोकल में आ गये थे।
इसी प्रकार से श्री साईं धूपखेड़ा में प्रकट हुए थे
परन्तु शिरडी को उन्होंने अपना स्थायी बसेरा बना लिया।
कृष्ण को पाकर गोकल धन्य हुआ
और श्री साई को पाकर शिरडी धन्य हो गई |

धूपखेड़ा प्रकट हुए, सुन्दर तरूण फकीर |
पारस-परस से खिल गई, शिरडी की तकदीर ।।

इस अध्याय में दूसरा संवाद "म्हालसापति श्री साई संवाद" है।

इस संवाद में सदगुरू श्री साई यह व्यक्त करते हैं कि
मंदिर, मस्जिद, गिरजाघर या गुरूद्वारा आदि
अलग-अलग प्रकार के देवस्थान हो सकते हैं,
परन्तु इनमें रहनेवाला ईश्वर एक ही है।
लोगों ने अपनी मानसिकता के अनुसार
ईश्वर का आवास-स्थान बनाया, ईश्वर का नाम रखा।
ईश्वर का चाहे कोई भी स्वरूप क्‍यों न हो,
कोई भी नाम क्‍यों न हो,
ईश्वर तो एक ही है।

कोई भी व्यक्ति ईश्वर की भक्ति कर सकता है।
उच्च-नीच, अमीर-गरीब, हिन्दू-मुसलमान--
सभी ईश्वर भक्ति के पात्र हैं,
ईश्वर सभी की भक्ति को स्वीकार करता है।

आइये, अब हम “म्हालसापति श्री साई संवाद” का पारायण करते हैं--

मुस्लिम जैसा साई का, लगता सूरत वेश।
यह देवालय हिन्दु का, कर सकते न प्रवेश |।

शिरडी में खंडोबा देव का मन्दिर था, इस मंदिर के पुजारी म्हालसापति थे।
मंदिर में देव-दर्शन के लिए भकतगण आते रहते थे।
श्री साई खंडोबा मंदिर में खंडोबा देव के दर्शन करने गये।
मंदिर के पुजारी म्हालसापति ने उन्हें देखा और कहा--
“हे साई! आप इस मंदिर में प्रवेश नहीं कर सकते।|
यह हिन्दुओं का मंदिर है, यह एक देवस्थान है।
आप शकक्‍्ल-सूरत से मुसलमान लगते हैं।
अत: आप मस्जिद में या ताकिया पर इबादत के लिए
जाएँ ।”

म्हालसापति के ऐसे वचन सुनकर श्री साई आश्चर्यचकित रह गये ।
उन्होंने म्हालसापति से कहा-
“हे ज्ञानी पुजारी! हिन्दू तथा मुसलमान
दोनों जाति के लोगों को बनानेवाला ईश्वर तो एक ही है।
हिन्दू और मुसलमान--यह तो केवल शब्दगत विभेद है।
ईश्वर में विश्वास करने वाले सज्जन पुरूष इस प्रकार के भेदों को महत्व नहीं देते |

हर व्यक्ति को अपने पंथ के प्रति श्रद्धा रखनी चाहिए |
हर व्यक्ति को अपने पंथ के रीति-रिवाज
एवं विधि-विधान के अनुसार आचरण करना चाहिए।
इसमें शिथिलता नहीं बरतनी चाहिए, नियमों की अवहेलना नहीं करनी चाहिए |
सभी को अपने-अपने आराध्य में उस एक ही सच्चिदानंद के दर्शन करने चाहिए |”

श्री साई ने कहा-
“जिसे मुसलमान अल्ला-इलाही कहते हैं,
उसे हिन्दू शेषशायी कहते हैं, तुम उसे खंडोबा के रूप में जानते हो |
अनेक रूपों में वह एक ही है, जो सभी जगह व्याप्त है।

तुम खंडोबा के संदर्भ में विचार करो |
तुम खंडोबा से अपनी वाणी द्वारा एक प्रश्न पूछो |
उन्होंने गडेरिया जाति की बाणू नामक कन्या के साथ शादी क्‍यों की?

इसपर यदि तुम सघनता से विचार करोगे तो
तुम्हें इसका सार-तत्व प्राप्त होगा ।
मूलतः जो सार-तत्व है, वह यही है कि जो ज्ञानी पुरूष होते हैं,
वे किसी तरह के भेद-भाव को महत्व नहीं देते |
इस धरती पर जहाँ कहीं भी मंदिर हैं या मस्जिद है,
सज्जन लोग उसमें से किसी का भी तिरस्कार नहीं करते |
वे दोनों पूज्य स्थलों का समान रूप से आदर करते हैं।"

श्री साईं ने म्हालसापति से कहा-
“मैं दूर से ही देव-दर्शन कर लेता हूँ।
तुम्हारे पंथ के विधान के अनुसार मेरा प्रवेश वर्जित है,
अतः: तुम्हारे पंथ के विधान का आदर करते हुए
में मंदिर के भीतर आने की हरकत नहीं करूँगा ।

तुम्हारे पुराणों में एक कथा है।
चोखा महार नाम का एक व्यक्ति पंढ़रीनाथ को अति-प्रिय था।
महार नीच जाति है परन्तु चोखा महार अपने सुकृत्यों एवं सद्‌गुणों के कारण
पंढ़रीनाथ के द्वार तक पहुँचने में सफल हो गया था।
जिसका अन्तर शुद्ध है, वह नीच जाति का होकर भी पवित्र है, पावन है।

श्री साई के ऐसे वचन सुनकर म्हालसापति का हृदय असीम आनंद से भर गया।
श्री साई के चरणों में सादर नमन करके उन्होंने कहा-
“यह मेरे पुण्य कर्मो का योग है कि मेरी मुलाकात आप जेसी ज्ञानमूर्ति से हुईं ।
आपसे निवेदन है कि आप अब इसी शिरडी गाँव में स्थायी रूप से रहें ।'

श्री साईं ने म्हालसापति से कहा- “एवमस्तु |”
इसके बाद श्री साईं ने म्हालसापति क॑ साथ शिरडी गाँव में प्रवेश किया ।
गाँव में एक टूटी-फूटी वीरान मस्जिद थी,
म्हालसापति श्री साईं को लेकर वहाँ आए।
श्री साई ने इसी मस्जिद में अपना आसन जमा दिया।

मसजिद जर्जर खंडहर, पंछी करत बसेरा।
साईं ने आकर यहीं, डाला अपना डेरा।।

// श्री सदयुरू सार्ईनाथार्पणयस्तु शुर्थ थवतु /
इति श्री साई ज्ञानेश्वरी चतुर्था अध्याय: //

अगला भाग में इस अध्याय का दुसरा भाग।

© श्री राकेश जुनेजा कि अनुमति से पोस्ट किया है।

 


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