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Author Topic: श्री साई ज्ञानेश्वरी - भाग 11  (Read 240 times)

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Offline trmadhavan

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।| श्री सदगुरू साईनाथाय नमः
अथ श्री साई ज्ञानेश्वरी चतुर्थ अध्याय: |।
श्री साई ज्ञानेश्वरी का चतुर्थ अध्याय 'भगवद्भक्ति' है।

मसजिद जर्जर खंडहर, पंछी करत बसेरा।
साईं ने आकर यहीं, डाला अपना डेरा।।

इस अध्याय में तीसरा संवाद "गंगागीर श्री साई संवाद" है।
इस संवाद में यह भावना व्यक्त की गईं है कि
भक्त को सदगुरू की परख और पहचान करनी चाहिए,
झूठे एवं ढ़ोंगी गुरूओं के पीछे भटक-भटक कर अपना समय बर्बाद नहीं करना चाहिए |

सद्‌गुरू सुयोग से मिलता है,
सद्गुरू का सानिध्य मिल जाए तो सच्चे हृदय से उसकी भक्ति करनी चाहिए ।
ईश्वर आध्यात्मिक उत्थान के लिए सदगुरू को धरती पर भेजता है।

सद्गुरू भक्ति में लगनेवाले लोगों को अमृत का पान कराने के लिए तत्पर हैं|
जो लोग भक्ति में नहीं लगते,
अकरणीय कार्यों में संलग्न रहते हैं, असत्य की जय-जयकार करते हैं,
उन्हें भी सद्गुरू सन्‍्मार्ग दिखाकर भगवद्भक्ति में लगाने का प्रयास करते हैं।

आइये, अब हम “गंगागीर श्री साई संवाद” का पारायण करते हैं।

साई सच्चे संत हैं, गंगा-नीर समान |
हर पौधों को सींचते, सद्गुरू को पहचान। |

साई सुमेरू ज्ञान कं, बोले गंगागीर |
शीशे का टुकड़ा नहीं, यह कोहि-नूर हीर ||

साई की अवहेलना, ना करना नादान |
साई दीनानाथ हैं, साई ईश समान।।

एक दिन श्री साई कुंए से पानी निकाल रहे थे,
उस समय गंगागीर नामक एक ज्ञानी संत की नजर उनपर पड़ी |
गंगागीर पारखी थे |
उन्होंने शिरडी के लोगों को इकट्ठा किया और उन्हें कहा-
“अरे शिरडी-वासियों।
तुम लोग कितने बेपरवाह हो!
क्या तुम्हारी आँखें इस रत्न को नहीं देखती?
क्या तुम अपने गाँव में रहने वाले अनमोल हीरे को नहीं परख सकते?
तुम लोग कितने पागल हो!
झूठे साधुओं के चक्‍कर में तुम जंगल-जंगल भटकते फिरते हो
और सच्चे साधु को न पहचान कर उसे उपेक्षित कर देते हो ।'

गंगागीर ने आगे कहा-
“तुम्हारे सामने जलेबी एवं करंज्या जैसे स्वादिष्ट मिष्ठान्न रखे हुए हैं,
उन्हें क्यों नही चखते, उन्हें खाकर तृप्त क्यों नहीं होते?
इन पदार्थों के सुलभ होने के बावजूद
तुम सूखी रोटी के लिए दर-दर भिक्षा क्‍यों माँग रहे हो?
गंगा का जल तुम्हारे पास है,
फिर तुम कुए का पानी सेवन करने का इरादा क्‍यों रखते हो?

साधु-संत रूपी गगन में श्री साईं ज्ञान के प्रखर सूर्य हैं ।
वे संसार के सभी पर्वतों में विशाल हिमगिरि के समान हैं।
इस संसार के कोटि-कोटि लोगों में वे सर्वश्रेष्ठ हैं।

वर्तमान में जितने भी साधु-संत हैं,
उन सभी साधु-संतों की विशाल श्रंंखला में वे मेरूमणि के समान हैं ।
तुम गॉव-गाँव भटक कर सच्चे साधु की खोज करते फिर रहे हो,
तुम्हारे गाँव में जो सर्वोत्तम संत है, उसे पहचानो |
यदि तुम उसे नहीं पहचानते, तो यह समझो कि तुम उसका अपमान कर रहे हो |

तुम सर्वोत्तम संत श्री साईं का रंच-मात्र भी तिरस्कार न करो,
उनकी उपेक्षा न करो |
वही संत तुम सभी के लिए कल्याणकारी सिद्ध होंगे।
जिस राज्य की प्रजा अपने राजा को संतुष्ट एवं प्रसन्‍न नहीं रख सकती,
उस राज्य की प्रजा कभी भी सुखी और खुशहाल नहीं हो सकती |”

शिरडीवासियों को श्री साईं के संदर्भ में
जानकारी देने के बाद गंगागीर मस्जिद में पहुँचे |
श्री साईं ने उन्हें देखकर प्रसन्नता व्यक्त की |
गंगागीर ने भी श्री साई को देखकर अपना हार्दिक आनंद व्यक्त किया।

श्री साईं ने गंगागीर से हँसते-हँसते कहा-
“आज तो मंदिर ही स्वयं चलकर मस्जिद तक आया है।
आज भेद-भाव को बिल्कूल परे रखकर एक ज्ञानी ब्राह्मण
मुझ जैसे फकीर से मिलने मस्जिद में पधारे हैं।
आज तो गरूड़राज स्वयं किसी राजहंस के घोंसले की शोभा बढ़ाने आए हैं|

आपका यहाँ पधारना शुभ है।
आपने यहाँ आकर सदभावना का परिचय दिया है।
सच्चाई तो यह है कि आपका और हमारा घराना एक ही है।
आप एक ज्ञानी संत हैं, मैं एक फकीर |
हम दोनों पहले कभी एक ही वैकुंठ में रह चुके हैं।
ईश्वर ने हम दोनों को इस मृत्यु-लोक में भेजा है।
इस संसार में जो भेद-भाव व्याप्त हो रहा है,
उसे मिटाने के लिए और जन-जन को सुपथ पर अग्रसर करने के लिए
ईश्वर ने हमें इस संसार में उतारा है।

श्री साई ने बताया-
“मैं लोगों से गोरस ग्रहण करने की पेशकश करता हूँ।
लोग मेरी आवाज सुनकर मेरे पास आते हैं ।
वे मेरे सर पर रखे गोरस के घट को देखते हैं
और खिलखिलाकर हँसने लगते हैं।
वे कहते हैं कि देखो! यह संत व्यक्ति क्या लेकर आ गया!
उनमें से कोई-कोई व्यक्ति तो पत्थर उठा लेता है
और गोरस के पात्र पर दे मारता है।
कोई-कोई व्यक्ति तो हँसते-हँसते यह कहने लगता है
कि ऐ फकीर साईनाथ!
तुम यह गोरस का पात्र लेकर यहीं खड़े रहो,
जब मेरी मृत्यु हो तो दो-चार बूँद मेरे मुँह में डाल देना।

मेरे अनुरोध पर एक व्यक्ति भी गोरस का पान करने के लिए तैयार नहीं होता ।
उल्टे वे मुझे कहते हैं कि तुम हमारी शिंदी का एक-दो घूँट पीकर तो देखो!
आज इस शिंदी का नाम चारों तरफ गूँज रहा है
और यह सारा संसार शिंदी के पीछे भाग रहा है।
शिंदी का प्याला ही आज महत्वपूर्ण एवं महिमामंडित है,
दूध के प्याले को तो आज कोई पूछ ही नहीं रहा।
मैं तो इस निराले संसार का यह अनोखा स्वांग देख रहा हूँ।
मुझे लगता है कि वर्तमान समय में इस संसार के लोग
हमारी बात को थोड़ा-मोड़ा मानने में भी कतराएँगे, ऐसा मेरा खयाल है।
आप का इस संदर्भ में कैसा अनुभव है?

श्री साई के वचन सुनकर गंगागीर ने कहा-
“आज जगह-जगह पर ताड़ के पेड़ों के घने जंगल व्याप्त हैं
और उनकी शोभा भी निराली है।
इन ताड़ के पेड़ों का रस शराब के रूप में बेचने के लिए
गाँव-गाँव में, थोड़ी-थोड़ी दूरी पर दुकानें खोल दी गई हैं।
यहाँ नित्य चहल-पहल बनी रहती है।
लोग शिंदी को दिल खोलकर अपना रहे हैं
और इसके रंग से अपने अंग-अंग को मस्ती के रंग में रंगते जा रहे है।
शिंदी की मस्ती के बाद वे आनंद से मग्न होकर इतना कोलाहल करते हैं,
जिससे सारा आसमान गूंज उठता है, दसों दिशाएँ ध्वनित हो उठती हैं|

वर्तमान समय में वातावरण में यह शमां है
और ऐसे समय में ईश्वर ने हमें और तुम्हें
सर पर गाय के शुद्ध दूध का घड़ा रखकर धरती पर भेजा है।
साथ ही, ईश्वर ने हमें यह आदेश दिया है
कि लोगों को जल्दी-जल्दी गोरस का पान करवाओ |”

श्री साई ने कहा-
“मेरे अनुरोध पर किसी-किसी ने थोड़ा दूध ग्रहण किया
परन्तु उस दूध के पौष्टिक तत्व से वे पागल हो गये,
उनका मस्तिष्क मानो शिथिल पड़ गया।
उन्होंने फिर से शिंदी का प्याला हाथ में थाम लिया।
आज के समय की यह अद्भुत रीत है।

हम हाथ में अमृत का प्याला लेकर संसार के पास जाते हैं
और कहते हैं कि इसे पीकर तुम अमर बनो।
किंतु हमारी बात लोग इस कान से सुनते हैं
और उस कान से निकाल देते हैं।
वे हमें कहते हैं कि
उन्हें तो शिंदी का ही प्याला चाहिए,
भले ही उसे पीकर उन्हें मौत ही क्‍यों न आ जाए।
लोग सत्य के अमृत का पान ही नहीं करना चाहते,
वे सत्य का तनिक भी आदर नहीं करना चाहते,
सभी असत्य की जय-जयकार करने में लगे हुए हैं
और असत्य की झूठी पताकाएँ लहाराने में मग्न हें |”

गंगागीर ने कहा-
“मैंने भी कई बार ऐसा ही अनुभव किया।
मेने भी कई बार लोगों को सन्मार्ग पर लाने की कोशिश की।
मैंने कुछ अच्छा करने का प्रयास किया परंतु मेरा प्रयास विफल रहा।

संसार को संपूर्ण रूप से देखने के बाद
मेरे जेहन में यह धारणा बनी कि
गोरस को बॉटने का कार्य-दायित्व लेकर
हम अपने-आप पर व्यर्थ ही इतराते हैं
क्योंकि इसे ग्रहण करनेवाला कोई नहीं।
अतः: मैंने अपना हृदय इस कार्य की ओर से दूसरी दिशा में मोड़ लिया |

गंगागीर की निराशापूर्ण वाणी सुनकर
श्री साई ने उनके हाथ में अपने दोनों हाथ रखे और बोले-
“हे पूज्य संत! हमारा काम है संसार का भला करना।
अत: हम शुद्ध मन से लोककल्याण में लगें, पतितों का उद्धार करें ।

हम जानते हैं कि यह मर्त्यलोक है,
यहाँ के लोग अपनी मरजी से कार्य करते हैं,
वे संत के मार्गदर्शन की उपेक्षा करते हैं |
फिर भी हमें ईश्वर ने जिस कार्य के लिए भेजा है, उसे हम करें|

इस संसार में जिसे मरना है, वह मरेगा |
संसार-सागर में जिसे डूबना है, वह डूबेगा |
यहाँ जिसे जीना है, वह जिएगा।
भवसागर से तरने का दृढ़ संकल्प जिसके मन में है,
वह भवसागर पार करेगा |
शिंदी की इच्छा रखनेवाला शिंदी पिएगा,
गोरस की इच्छा करनेवाले को गोरस मिलेगा ।”

करते जग के आदमी, मन मरजी के काम |
इमरत-रस को छोड़कर, पीते शिंदी जाम ।।

सागर पार उतारने, आते संत महान ।
साई तुझे कराएँगे, अमृत रस का पान।।

इस अध्याय में चौथा संवाद '“वासुदेवानंद पुंडलीक श्री साई संवाद' है|
इस अध्याय में श्री साई यह संकेत करते है कि
ईश्वर या सद्गुरू का कोई भी कार्य करना,
उनकी भक्ति के बराबर है।
कार्य छोटा हो या बड़ा, कोई भी कार्य क्‍यों न हो,
उसे मन में दृढ़ निष्ठा एवं आस्था के साथ करना चाहिए,
कार्य में कहीं कोई लापरवाही नहीं बरतनी चाहिए |
सद्गुरू के कार्य में लापरवाही बरतना--
यह भक्ति के प्रति लापरवाही है।

आप सदगुरू का कार्य कितनी निष्ठा के साथ करते हैं,
आपका मन सदगुरू के कार्य में कितना तललीन है,
इसकी जानकारी सदगुरू को अपने-आप हो जाती है।
भक्ति में लापरवाही नहीं,
इमानदारी एवं निष्ठा जरूरी है।
तभी भगवद्भक्ति संभव है |

आइये, अब हम “वासुदेवानंद पुंडलीक श्री साई सवाद” का पारायण करते है।

साई भाई हैं बड़े, बंधु सखा ललाम |
उनके चरणों में बसे, चारों तीरथ धाम ।।

अर्पित करना नारियल, कर सादर प्रणाम |
हो जाए न देर कहीं, जल्दी करना काम |।

एक बार राजमहेन्द्री नगरी में गोदावरी नदी के किनारे
महान संत श्री वासुदेवानंद सरस्वती पधारे |
उनके दर्शन करने के लिए
नांदेड के कई भकक्‍त-जन राजमहेन्द्री आए
जिसमें प्रसिद्ध व्यक्ति पुंडलीक राव भी शामिल थे।
उन्होंने स्वामीजी की वंदना की,
उनसे कुशल-हक्षैेम पूछा |
स्वामीजी ने भी उनका सारा हाल-समाचार अवगत किया ।
परस्पर वार्तालाप के दौरान शिरडी की सहज ही चर्चा होने लगी।

शिरडी का नाम सुनते ही श्री वासुदेवानंद जी का मन आनंद से भर गया।
वे पुंडलीक राव से बोले-
“श्री साई मुसलमान हैं, फिर भी वे मेरे ज्येष्ठ बन्धु हैं।
मैं जाति का ब्राह्मण हूँ, फिर भी एक मुसलमान मेरे प्रगाढ़ रिश्ते में हैं।
ऐसा पूर्वजन्मों से है।
यह सत्य है कि कालातीत में भी हम दोनों सन्त थे।
युग-युग तक यह सत्य चलता रहेगा ।
अतः हिन्दू-मुसलमान में भेद-भाव करना अल्पज्ञता एवं अज्ञान है|”

वासुदेवानंद जी ने कहा-
“क्या ब्राह्मण के तीन कान होते हैं?
क्या मुसलमान के साढ़े तीन कान होते हैं?
जातिगत भेद करना दोषपूर्ण है क्योंकि दोनों के अन्दर प्राणधारा एक ही है।
मैं तुम्हें यह जो कह रहा हूँ, यह सत्य है,
इसे आश्चर्य भरी नजर से या शंका भरी निगाह से मत देखो।
श्री साईनाथ महाराज साक्षात्‌ दिव्य संत हैं और मेरे ज्येष्ठ बन्धु हैं।

हे पुंडलीक राव!
क्या तुम श्री साईनाथ महाराज के दर्शन करने
कभी शिरडी गये हो?
यदि नहीं गये तो शीघ्र उनके दर्शन करो |”

वासुदेवानंद जी की बात सुनकर
पुंडलीक राव ने दोनों हाथ जोड़कर
मधुर स्वर में उत्तर दिया-
“स्वामी जी! एक माह के अन्तराल में मैं वहाँ जाऊंगा, ऐसा निश्चित है।"

स्वामी वासुदेवानंद जी ने पुण्डलीक राव से कहा-
“मेरी एक बात ध्यान से सुनो,
तुम शीघ्रातिशीघ्र जाकर श्री साईं के दर्शन करो |
एक महीने के भीतर-भीतर जाओ ।
चूक न करना, विलम्ब न करना |
तुम जब वहाँ जाओ तो
मेरी तरफ से यह नारियल उन्हें सम्मान के साथ भेंट करना
और मेरी तरफ से उन्हें आदर सहित प्रणाम कहना |

हालांकि मैं एक स्वामी हूँ
और परम्परागत रीति के अनुसार
हम स्वामी किसी को प्रणाम या वंदन नहीं करते |
श्री साई के सम्मुख हमारी इस रीति
और परम्परागत व्यवहार का कोई प्रयोजन नहीं |
उनके सामने हमारे सारे बंधन महत्वहीन हैं।

श्री साई एक फकीर हैं, में एक संन्यासी हूँ ।
उनके सामने कर्म-अकर्म, रीति-बन्धन, करणीय--अकरणीय
आदि का कोई प्रश्न ही नहीं उठता |
सूर्य के सामने शुद्ध-अशुद्ध क्या,
वह तो अशुद्ध को भी शुद्ध करने की क्षमता रखता है।"

पुंडलीक राव ने स्वामीजी को आश्वस्त करते हुए कहा-
“में इसी माह श्री साईं के दर्शन करूँगा |”
उन्होंने स्वामी जी से नारियल लेकर कहा-
“यह श्री साई को सादर भेंट किया जाएगा।”

पुंडलीक राव एक माह के भीतर ही
अपने साथियों के साथ शिरडी के लिए रवाना हो गये।
कोपरगाँव से जानेवाली गाड़ी में अभी काफी समय शेष था।
सभी को भूख लगी थी, अत: सभी सामने नदी के किनारे नाश्ता करने बैठ गये।

उनके पास पोटली में भूना हुआ चिवड़ा बंधा था।
पोटली खोली गई और सभी चिवड़ा खाने लगे।
चिवड़ा खाने में तेज था, उसमें मिर्च कुछ अधिक डली हुईं थी।
चिवड़े को खाने योग्य बनाने के लिए नारियल निकाला गया,
उसे तोड़कर चिवड़े में मिला दिया गया
और नाश्ते के साथ उसे खाने के काम में ले लिया गया।

पुंडलीकराव यह भूल गये कि नारियल श्री साईं को अर्पण करने के लिए था
और उसे तोड़कर खा लिया गया।
दोपहर के समय सभी शिरडी पहुँच गये ।
सभी श्री साईं के दर्शन करने मस्जिद की ओर गये।

पुंडलीकराव ने जैसे ही श्री साई के दर्शन किए,
श्री साई ने उनसे कहा- “तुम एक अच्छे गृहस्थ हो
और अच्छा गृहस्थ व्यवहार में प्रामाणिकता बरतता है।
उसका लेन-देन साफ-सुथरा होता है।
मेरे पूज्य दोस्त ने तुम्हें जो नारियल
मुझे भेंट करने के लिए दिया था,
वह तुम अविलम्ब मुझे दो।
मेरे भाई द्वारा भेजे गए नारियल को पाने के लिए
मेरा हृदय अत्यन्त उत्सुक हो रहा है।

लेकिन वह नारियल तुम मुझे दोगे कैसे?
उसे तो तुमने चिवड़े के साथ मिलाकर खा लिया ।
खाते वक्‍त तुम उस नारियल को बिल्कुल ही भूल गये
कि यह किसी की अमानत है
जो किसी को तुम्हें सौंपनी है।
मेरे लिए वह नारियल अनमोल सम्पत्ति थी
परन्तु तुमने उसकी हिफाजत नहीं की ।
तुमने अपने दुष्ट मित्रों की कुसंगति के कारण
मेरा अनमोल खजाना खो दिया।

श्री साई समर्थ के ऐसे वचन सुनकर
पुंडलीक राव हक्‍्के-बक्के रह गये |
वे श्री साईं के श्रीचरणों में झुक गए।
अपने सिर पर अनायास ही दोष लग जाने के कारण
वे थोड़े उत्तेजित हो गये और बिना सोचे-समझे बोल पड़े-
“महाराज! सचमुच हम नारियल को भूल गये।
हमें भूख लगी और तिकक्‍त चिवड़े को मीठा करने के लिए
हमने अपनी इच्छा से नारियल तोड़ कर उसमें मिला लिया।
वस्तुतः यह मेरी बड़ी भूल है,
आपके प्रति यह एक अपराध है।
आप मुझे क्षमा करें ।
में ऐसा करता हूँ कि
उस नारियल के बदले आपको दूसरा नारियल लाकर देता हूँ।

पुंडलीक राव दूसरा नारियल लाने के लिए ज्योंहि उठे,
साईं ने उन्हें हाथ पकड़कर वापस बिठाया और हँसकर बोले-
“पुंडलीकराव! दूसरा नारियल लाने की जरूरत नहीं |
वासुदेवानंद जी द्वारा दिया गया नारियल अनमोल था,
कोई अन्य नारियल उसकी बराबरी कभी नहीं कर सकता |
गोदावरी के पवित्र जल की कीमत अनमोल है,
उसकी बराबरी कभी कुए का पानी नहीं कर सकता |
अब जो भूल हो गई, वो तो हो गई |
तुम मेरे बच्चे हो,
अब मैं अपने हृदय में किसके लिए क्रोध करूँ?
मेरे क्रोध करने से होगा भी क्या?

टेलिग्राफ और वायरलेस से दूसरी जगह तुरन्त संदेश भेजा जा सकता है,
यह सचमुच आश्चर्यजनक है ।
परन्तु एक संत ने दूसरे संत के सम्मान में नारियल दिया,
इसकी तत्क्षण जानकारी श्री साई को हो गई |
यह तो उससे भी अधिक आश्चर्यजनक है ।
किस समय, किस जगह पर, क्‍या हो रहा है,
इसकी पूर्ण जानकारी सन्त को तत्क्षण हो जाती है।

प्राचीन काल में इस लोक में कुछ ऐसे समर्थ व्यक्ति भी थे
जिनको समय, परिस्थिति और घटना का स्पष्ट ज्ञान होता था।
वे इस कला को कायम रखे हुए थे
और अनेक भक्त कहाँ किस हाल में हैं,
इसको ज्ञात करने के लिए इस कला का उपयोग करते थे ।
जानकारी करने के बाद वे दूर बैठे भक्तों का कल्याण करते थे।
उन्हें टेलिग्राफ या वायरलेस की कोई आवश्यकता नहीं थी।

वे अपने पेट की भूख मिटाने के लिए माघुकरी पर आश्रित होते
और भोजन के दो ग्रास जुटाने के लिए घर-घर जाकर भिक्षा माँगते |
उनके पास न तो पैसा रहता था,
न वे मन में पैसे की लालसा रखते थे।
ऐसे अकिचन ही दिव्य शक्तियों से सम्पन्न होते हैं,
सत्य की साक्षात्‌ प्रतिमूर्ति होते हैं।

कहा-कहाँ क्या हो रहा, इसका किसको ज्ञान ।
साईं सब कुछ जानते, साई संत महान।।

क्षण-क्षण पल-पल की खबर, उनको रहती ज्ञात।
हित-चिन्ता में हैं मगन, सुबह-शाम दिन-रात | |

// श्री सदयुरू सार्ईनाथार्पणयस्तु शुर्थ थवतु /
इति श्री साई ज्ञानेश्वरी चतुर्था अध्याय: //

अगला भाग - अध्याय भगवतप्राप्ति
 
© श्री राकेश जुनेजा कि अनुमति से पोस्ट किया है।

 


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