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Author Topic: श्री साई ज्ञानेश्वरी - भाग 13  (Read 196 times)

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Offline trmadhavan

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श्री सदगुरू साईनाथाय नमः |
अथ श्री साईं ज्ञानेश्वरी षष्ठम्‌ अध्याय ||
श्री साई ज्ञानेश्वरी का छठा अध्याय “ईश्वर का ऐश्वर्य' है।

वह जो सम्पूर्ण शक्ति, सम्पूर्ण यश, सम्पूर्ण धन, सम्पूर्ण ज्ञान, सम्पूर्ण सौन्दर्य एवं सम्पूर्ण त्याग
आदि छ: प्रकार के ऐश्वर्य से पूर्ण है, वह ईश्वर है।

ईश्वर के पास क्‍या नहीं है?
सबका सृजनकर्ता तो वही है।
ईश्वर के ऐश्वर्य का आकलन कोई नहीं कर सकता |

श्री साई ज्ञानेश्वरी के छठे अध्याय में श्री साई के साथ उनके भक्तों के आठ संवाद हैं
जिनमें सर्वप्रथम 'शिरडीवासी श्री साई संवाद' है।
यहाँ हमें यह संकेत मिलता है कि
ईश्वर अखंड है, जन्म-मृत्यु से परे है।
वह धरती पर सगुण रूप में अवतार लेता है।
उसका कोई घर नहीं होता,
उसके द्वारा निर्मित यह संपूर्ण ब्रह्मांड ही उसका घर है।
दुनिया के सारे लोग ही उसके पारिवारिक सदस्य हैं ।
उसके लिए सभी एक समान हैं।
उसके रूप अनेक हैं, किन्तु मूल रूप में वह एक ही है।
तो आइये, सबसे पहले 'शिरडीवासी श्री साई संवाद” का पारायण करते हैं--

घर कहाँ और दर कहाँ, कहाँ निवासस्थान |
सबके हृदय वह बसा, उसमें सबको जान।।

शिरडीवासी श्री साईं से प्रश्न करते---
“आप कहाँ से आए हैं?
आपका ठाँव-ठिकाना कहाँ है?
आपका शुभ नाम कया है?
आप किस कारण से प्रकट हुए हैं?

ऐसे प्रश्न सुनकर श्री साई का मन आन्दोलित हो जाता।
मेघ की गर्जना के बाद जैसे धरती पर वर्षा के आने का तेज स्वर उभरता है,
वैसी ही तीव्र आवाज में श्री साई उन्हें उत्तर देते थे।

श्री साई कहते---
“मेरा कोई ठाँव-ठिकाना नहीं है।
मैं मूल रूप से निर्गुण हूँ।
कर्म में बंधे होने के कारण मैंने स्थूल पिंड पाया है,
यह शरीर धारण किया है, सगुण स्वरूप प्राप्त किया है।
पंचभूत के पाँच तत्वों से बनी हुयी यह मेरी देह है।
इस देह के भीतर एक आत्मा है, यह आत्मा नौका की तरह है।
संपूर्ण विश्व ही मेरा गाँव है, यह अखिल ब्रह्मांड ही मेरा निवास-स्थान है ।
मेरे लिए यहाँ के सभी लोग अपने हैं।
में सभी में हूँ, यह जानो ।

ब्रह्म मेरा जनक है,
ईश्वर ने मुझे पैदा किया है।
माया मेरी माता है,
ईश्वर की उत्पत्तिजन्य शक्ति ने मुझे गढ़कर तैयार किया है।
ईश्वर और माया के योग से ही मैंने साकार रूप ग्रहण किया हे।
ईश्वर की इच्छा से ही मैंने यह शरीर धारण किया है।”

ब्रह्म जगत का नाथ है, ब्रह्म है निराकार |
धरता जब साकार रूप, लेता वह अवतार।।

'श्री साई ज्ञानेश्वरी' के छठे अध्याय में दूसरा संवाद “श्री साई वणिक संवाद' है।
यहाँ हमें यह ज्ञात होता है कि
क्षिति, जल, पावक, गगन, समीर-- ये पंचमभूत ईश्वर द्वारा निर्मित हैं,
इसपर ईश्वर का पूर्ण अधिकार एवं नियंत्रण है ।
ईश्वर किसी भी पंचभूत को कहीं भी प्रकट कर सकता है।
वह एक पंचभूत को दूसरे पंचभूत में परिवर्तित कर सकता है।
ईश्वर के ऐश्वर्य का अंदाज लगा पाना सामान्य इंसान के वश की बात नहीं।
ईश्वर अपनी स्वेच्छा से धरती पर किसी भी रूप में अवतार ले सकता है,
किसी भी रूप में वह रह सकता है।
फकीर के रूप में श्री साई ईश्वर का अवतार हैं।
साई ब्रह्मांड-नायक हैं |

साई मस्जिद में हर रात दीपक जलाते हैं,
अज्ञान रूपी अंधकार उन्हें बिल्कुल पसंद नहीं,
वे दुनिया को ज्ञान का प्रकाश दिखाना चाहते हैं।
इसी कार्य के लिए साई फकीर ने धरती पर अवतार लिया।
एक बार साईं को तेल उपलब्ध नहीं हुआ,
फिर भी उन्होंने दीपक जलाए और वे दीपक पूरी रात जलते रहे |

तो आइये, सबसे पहले “श्री साई वणिक संवाद” का पारायण करते हैं।

मिली ना भिक्षा तेल की, खाली हाथों आए |
पारब्रह्म ने मस्जिद में, जल से दीप जलाए।।

श्री साई शिरडी गाँव के दुकानदारों के पास गये और बोले-
“भिक्षा में तेल दे दो भाई! मस्जिद में दिये जलाने हैं, आज दीपावली है।
मंदिर में जलते अनगिनत दीपकों की तरह
आज मस्जिद को भी रोशन करना है।”

प्रत्युक दुकानदार कहता-
“तेल नहीं है बाबा! तेल खत्म हो गया बाबा!
अगली दुकान में मिलेगा बाबा!”
श्री साईं जिस दुकानदार के पास जाते,
वही उनसे बहाना बनाता और झूठ बोलता |
“आज बाबा को तेल नहीं देना हैं--
सभी ने मन में यह विचार निश्चित कर रखा था।

ऐसे उत्तर सुनकर श्री साईं को बड़ा आश्चर्य हुआ।
इन लोगों के सरासर असत्य वचन सुनकर श्री साई तनिक भी असहज नहीं हुए
और उन्होंने मन-ही-मन कहा-
“ये लोग झूठ बोलकर अपनी इंसानियत को चुल्लू-भर पानी में डुबो रहे हें।
ऐसा करके ये ईश्वर से दूर हो रहे हैं
और इनका नैतिक स्तर नीचे की ओर गिर रहा है।
एक-चौथाई पैसे का भी तेल नहीं,
परन्तु उसके लिए भी ये झूठ बोलकर कर्म के बोझ के नीचे दब रहे हैं।
अपने कर्मों की चपेट में आकर इंसान अपना पतन कर लेता है।

जो व्यक्ति झूठ बोलता है,
वह पापियों का सरताज है, वह पापियों का बादशाह है।
ऐसे व्यक्ति को कभी भी भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त नहीं होती,
उसे वैभव और समृद्धि भी प्राप्त नहीं होती ।

जो व्यक्ति सत्य वचन बोलता है,
उसे अपार वैभव एवं सुख की शीतल छाया प्राप्त होती है।
जप, तप आदि सकल अनुष्ठान भी सत्य वचनों का मुकाबला नहीं कर सकते |
सत्य वचन पुण्य का घट है, मोक्ष का रास्ता है,
आनंद की नदी है, अतः सत्य वचन से दूर कभी न हटो |”

“तेल के बिना दीपक कैसे जलेंगे'--
इस बारे में दुकानदार परस्पर बातें करने लगे और मस्जिद पहुँच गये ।
उन्होंने देखा कि श्री साई मस्जिद की दीवारों पर दीपक रख रहे हैं
और उसमें कपड़े की बाती डाल रहे हैं|

एक दुकानदार बोला-
“लगता है, यह फकीर आज दीपक जलाकर ही सॉँस लेगा ।”
दूसरा दुकानदार बोला-
“अरे! यह तो बिल्कुल ही पागल हो गया है।
तेल है नहीं और दीपक जलाने का उपक्रम कर रहा है।”
तीसरा दुकानदार बोला-
“यह फकीर तो पत्थर में बीज उगाने की सोच रहा है।
यह फकीर तो बाँझ औरत से भी बच्चा पैदा होने का सपना देखता है।
हे दुकानदार भाइयों! ऐसी इच्छा क्या कभी पूरी हो सकती है?
चौथा दुकानदार बोला-
“यह फकीर पागलों का बादशाह है, यह मूर्खो का सरताज है।
तेल की एक बूँद नहीं, और इच्छा करता है दीपों को ज्योतिर्मय करने की |”

साईं ने तेलपात्र में पानी डालकर उसे आधा भरा।
फिर वही जल उन्होंने आत्माराम को अर्पित किया।
तेल-मिश्रित पानी को पुनः तेलपात्र में डाला।
शांत भाव से, इस जल का थोड़ा-थोड़ा अंश दीपों में भरा, बाती डाली, उसे गीला किया।
श्री साईं ने स्नेह-पुंज से दीप प्रज्ज्वलित किए |

पानी से दीप जले और ये रात-भर जलते रहे |
चारों और खड़े लोगों ने श्री साई का यह अद्भुत चमत्कार देखा।
लोगों ने मन में सोचा-
“श्री साई के पास यह कैसा असाधारण अधिकार है?
ऐसा अधिकार तो केवल ईश्वर के पास ही होता है।
निश्चित ही, श्री साई ने ईश्वर के रूप में जन्म लिया है।
सचमुच, साई ईश्वर के अवतार हैं ।

शिरडी के लोग श्री साईं के श्रीचरणों में नत हो गये ।
दुकानदारों ने श्री साईं के चरणों में सर रखकर कहा-
“हमने झूठ बोलकर आपकी अवज्ञा की है,
हमने आपके प्रति अपराध किया है,
फिर भी आप हम पर कृपित नहीं हुए।
आपके लिए तो हम आपके ही बच्चे हैं, आप ही हमारी माँ हैं।
आप कृपा के सागर हैं, आप ज्ञान-गगन के सूर्य हैं,
आप सदगुणों की सरिता हैं, आप शांति के पर्वत हैं।
हे कपानिधि! आप हमारे अपराधों को क्षमा करें।”

दुकानदारों से श्री साई ने कहा-
“मेरी एक बात इस समय ध्यानपूर्वक सुन लो |
तुम ऐसा व्यवहार और आचरण करो, जिससे तुम पर श्रीहरि सदा प्रसन्न रहें |
कभी भी असत्य वचन न बोलो, सत्य बोलो और सत्य को ही आचरण में उतारो।
किसी के साथ कभी धोखाघड़ी न करो |
सत्कार्यों के अलावा कहीं भी व्यर्थ का खर्च न करो |
धर्म संबंधी कार्यो में अपनी सामर्थ्य के अनुसार धन का खर्च करो ।
ऐसा करने पर तुम्हारा हित होगा, कल्याण होगा, तुमपर ईश्वर प्रसन्न होंगे ।
तुम्हें श्रीहरि से भेंट होगी यानि तुम्हें ईश्वर के दर्शन होंगे।
मेरे ये वचन चिरन्तन सत्य हैं, इन वचनों को सदा अपने मन में अंकित रखो |

सत्य वचन सत्कर्म है, हरि को सत्य पसन्द |
सत्य पुण्य का स्रोत है, सत्य ही ब्रह्मानंद | |

निष्ठा हो यदि सत्य में, ईश्वर देता साथ |
करता तेरा हित वही, रखता सर पर हाथ ।।

श्री साई ज्ञानेश्वरी के छठे अध्याय में तीसरा संवाद “श्री साई चांदोरकर संवाद' है।
यहाँ हमें ईश्वर की सर्वज्ञता का संकेत मिलता है।
ईश्वर को अतीत, वर्तमान एवं भविष्य तीनों काल का पूर्ण ज्ञान रहता है।
कब क्या होगा-- इसे केवल ईश्वर ही जानता है।

तो आइये, सर्वप्रथम “श्री साई चांदोरकर संवाद' का पारायण करते हें।

भूत भविष्यत्‌ वर्तमान, कब क्‍या होगी बात।
साई तो सर्वज्ञ हैं, सब साई को ज्ञात।।

श्री साई ने नारायण गोविंद चांदोरकर से कहा-
“पहले भोजन कर लो, फिर अपने गन्तव्य के लिए प्रस्थान करो |
भोजन करने के पश्चात्‌ नगर जाओ और वहाँ से ट्रेन पकड़ो |”

श्री साई का आदेश सुनकर नाना साहब के पाँव रूक गये।
श्री साई के आदेश की अनुपालना करने के लिए उन्होंने कानगांवकर को कहा-
“चलो, पहले भोजन करते हैं, फिर यहाँ से प्रस्थान करेंगे |”

चांदोरकर और कानगांवकर ने ट्रेन के समय की परवाह नहीं की |
उनके साथ आए हुए अन्य दो व्यक्ति
रामदास हरिदास और बापू नगरकर बिना भोजन ग्रहण किए चल पड़े,
उन्हें अंदेशा था कि कहीं ट्रेन छूट न जाए।

भोजन के बाद चांदोरकर ने श्री साई के दर्शन किए |
श्री साई ने चांदोरकर से कहा-
“रामदास हरिदास और बापू नगरकर को देखो!
कैसा तरीका है उनका?
जिन साथियों के साथ शिरडी आए, उन्हें ही छोड़कर यहाँ से चल निकले |
वे बड़े होशियार हैं, उन्हें सिर्फ अपने स्वार्थ की चिंता है।

हे चांदोरकर! ऐसे मित्रों को साथ रखो
जो संसार के अंत तक तुम्हारा साथ न छोड़ें |
फूलों की खुशबू की तरह मित्र होना चाहिए जिसकी सुवास कभी मन्द न पड़े |

अब तुम प्रस्थान करो
मैंने जो कहा है, उसे सदा ध्यान रखना ।
तुम्हारी रेलगाड़ी के आने में अभी भी काफी समय शेष है।"

चांदोरकर जब स्टेशन पहुँचे तो उन्होंने देखा कि
उनके दोनों मित्र भूखे-प्यासे बैठे हैं,
वे ट्रेन की प्रतिक्षा कर रहे हैं
क्योंकि ट्रेन तीन घंटे विलंब से चल रही है।

साई आज्ञा से करें, शिरडी से प्रस्थान ।
विध्न हटे, संकट कटे, बाबा रखते ध्यान |।

अगला भाग आगे पढिये।
©श्री राकेश जुनेजा की अनुमति से पोस्ट किया है।

 


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