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Author Topic: मैत्री भावना कीजिये  (Read 1466 times)

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Offline Pratap Nr.Mishra

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  • राम भी तू रहीम भी तू तू ही ईशु नानक भी तू

ॐ साईं नाथाय नमः

मैत्री भावना कीजिये       

आप धर्म के लिए कष्ट सहन कीजिये और भगवान् से कातर प्रार्थना कीजिये l प्रार्थना में बड़ी शक्ति है, उससे मनुष्य का ह्रदय पलट सकता है l  शरीर का अन्त कर देने से तो दुःख मिटेंगे नहीं, वह तो एक नया भयानक अपराध होगा और उसका बड़ा भीषण परिणाम परलोक में भोगना पड़ेगा l यह सत्य है कि चरों ओर से ठुकराए जाने पर मनुष्य का चित्त अत्यन्त विकल हो जाता है और उसे बुराई ही सूझती है; परन्तु ऐसी स्थिति में ही धैर्य कि आवश्यकता है l आप अपने मन से किसी को विरोधी न मानकर अपना कर्मफल मानिए और बार-बार सद्भावना करके उन लोगों के मन के जहर को मारिये l  यदि प्रतिदिन मनुष्य कम-से-कम पाँच मिनट उस व्यक्ति के लिए, जो अपने से विरोध रखता है तथा बुरा बर्ताव करता है, भगवान् से प्रार्थना करे कि 'भगवन ! उसके चित्त से मेरे प्रति जो द्वेष है, उसे आप दूर करके निकाल दीजिये और मेरे मन में कभी उसके प्रति दुर्भाव न आये, मैं उसे अपना विरोधी मानूँ ही नहीं, मुझे उसके  अन्दर आप का मधुर दर्शन हो और उसकी क्रिया में आपका मंगल-विधान दिखाई दे - ऐसी शक्ति दीजिये l मेरा कोई वैरी न हो, सब के प्रति मेरे मन में मित्रभाव हो l '  तो इस प्रकार प्रार्थना और सद्भाव करने पर विरोधी व्यक्तियों का विरोध नष्ट हो जाता है और धीरे-धीरे वे मित्र बनने लगते हैं l अपने मन की विरोध-भावना विरोधियों की संख्या तथा विरोधी भाव बढाती है और अपने मन की मैत्री-भावना मित्रों की संख्या तथा मैत्री-भावना बढाती है l  यह अटल सत्य है, प्रयोग करके देखिये l  आत्महत्या की तो बात ही सोचना पाप है l  धैर्य रखिये, भगवान् के नाम का जप कीजिये और कातर भाव से  विश्वासपूर्वक भगवान् से प्रार्थना कीजिये l शेष भगवत्कृपा  l

ॐ साईं राम

 


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