Join Sai Baba Announcement List


Author Topic: BIRTH OF ANJANEYA  (Read 8939 times)

0 Members and 1 Guest are viewing this topic.

Offline ShAivI

  • Members
  • Member
  • *
  • Posts: 12140
  • Blessings 56
  • बाबा मुझे अपने ह्र्दय से लगा लो, अपने पास बुला लो।
« on: January 29, 2013, 10:35:54 AM »
  • Publish

  • OM SAI RAM !!!


    Anjana was a lovely young Vaanara* maiden. One day as she
    was strolling in the sylvan gardens of Kishkindha, the wind
    god Vayu came hurriedly and swept her garland away. Anjana
    was startled and about to get angry with the god, but by then the
    strong and energetic wind god had realized his folly and returned to
    apologise. As he cast his eyes on her, he was struck by Manmatha,
    the god of love. He apologized to her delicately and Anjana was
    taken in very much by this handsome young man. They married.

    *Vaanaras = Monkey people

    In time, they had a lovely baby boy. He was called Anjaneya or
    Anjana's son. He was as intelligent as he was mischievous. Vayu
    had immense responsibilities and he could not keep them waiting
    any longer. Having bestowed upon his son his own powers, Vayu
    bid farewell to a tear-filled Anjana and his lovely young son.

    Anjaneya was growing to be an unmanageable child. One day, he
    saw the sun at the break of dawn. He was tempted by what he
    thought was a luminous orange fruit and leapt skyward to catch it.
    Surya, the Sun laughed thinking that the little monkey was going to
    fall down to the earth and hurt himself, but nothing of that sort
    happened. Instead, the monkey came closer and closer to the sun
    and he was not even getting scorched!

    Comprehending the situation it a little too late, Surya ran to Indra,
    the king of gods, for help. Indra mounted Airavata, his elephant, and
    rushed towards Anjaneya. The little monkey now excitedly turned his
    attention to this elephant. But sadly, just then, Indra's thunderbolt
    struck him and he fell down!

    Vayu sensed that something was wrong and rushed just in time to
    hold his son in his arms. He learnt what had happened and was outraged.
    He broodingly retired into a cave deep in to the earth.

    The three worlds began to choke and struggle for want of air. The gods
    panicked and rushed to the creator Brahma for help. Brahma went to Indra
    and asked him to apologise to Vayu, for he had struck a mere little child with
    his tremendous thunderbolt. Indra, realizing his folly, did so. Vayu yielded to
    Indra's apology. Brahma revived Anjaneya. He was now called Hanuman,
    one whose chin is broken (by the thunderbolt).

    Vayu asked the little monkey to pay his obeisance to Brahma. The
    mischievous one did so and when the pleased Brahma told him to ask
    for a boon, he cleverly asked, 'Give me all the wisdom you have!'

    Brahma, understanding the magnitude of the little boon, smilingly granted
    him the boon. For giving away wisdom only multiplied it and did not make the
    giver any poorer for it! Further, Brahma granted that he would, because of his
    wisdom, be a Chiranjeevi or an eternal being.

    ॐ अतुलितबलधामं नमो नमामि ,
    ॐ हेमशैलाभदेहं नमो नमामि ,
    ॐ दनुज वन कृशानुं नमो नमामि ,
    ॐ ज्ञानीनामग्रगण्य नमो नमामि ।
    ॐ सकलगुणनिधानं नमो नमामि ,
    ॐ वानराणामधीशं नमो नमामि ,
    ॐ रघुपतिप्रियभक्तम नमो नमामि ,
    ॐ वातजातं नमो नमामि ॥

    ॐ हनुमत: नमो नमामि ॥
    ॐ हनु हनुमत: नमो नमामि ॥


    JAI SAI RAM !!!

    Offline PiyaSoni

    • Members
    • Member
    • *
    • Posts: 7719
    • Blessings 21
    • ੴ ਸਤਿ ਨਾਮੁ
    « Reply #1 on: February 01, 2013, 11:31:14 PM »
  • Publish

  • OM SAI RAM!!!


    While in exile, Bhima once had to go out by himself on a mission. Passing through the dense forest along a narrow path, he came by a small old monkey lazing wayside with its long tail stretched out on the path.

    Looking at Bhima, the monkey addressed him thus: Are you not the great Bhima? My salutations to you!

    Bhima was, understandingly, surprised to come by a talking monkey and said with pride: Well, I am glad you recognise me. Now move your tail away so I can pass by. It is not wont of me to walk across any creature.

    The monkey said: Oh, dear, don't you see how old and sick I am? Will you please oblige and move the tail yourself?

    Bhima, thinking it rather unpleasant to touch a monkey and that too its tail, stuck out the little finger of his left hand and pushed it. But the tail did not move. Hiding his surprise, he used his whole left hand and tried pushing it. Yet it did not budge a mustard seed's width. To one endowed with the strength of eight thousand elephants, this was too much! Feeling crushed, yet hiding it, he used both his hands to push the tail but to no avail. Suddenly it dawned upon his not-so-brilliant intelligence that it was no ordinary monkey that he was dealing with.

    He fell at the monkey's feet and said: Oh, mighty one! I beg of you to reveal your true identity to me. I am your humble servant!

    Shedding his disguise, Chiranjeevi Maruti, son of the Wind god and Bhima's brother, revealed himself.

    He blessed Bhima saying: Shed your pride and take refuge in the Lord. You shall be victorious! My power shall always be with the Pandavas. I shall ride upon Arjuna's flag.

    Bhima bowed down to his brother in all humility.

    संकट - मोचन नाम तव, संकट में मम प्राण
    सुमिरत संकट नसत है, हरु संकट हनुमान !

    « Last Edit: February 02, 2013, 01:26:48 AM by PiyaGolu »
    "नानक नाम चढदी कला, तेरे पहाणे सर्वद दा भला "

    Offline PiyaSoni

    • Members
    • Member
    • *
    • Posts: 7719
    • Blessings 21
    • ੴ ਸਤਿ ਨਾਮੁ

    OM SAI RAM!!!

    हनुमान पूजा के सामान्य नियम

    शास्त्रों के अनुसार कलियुग में हनुमानजी सबसे जल्दी प्रसन्न होने वाले देवता बताए गए हैं !! जिन लोगों पर बजरंग बली कृपा करते हैं उनकी किस्मत रातोंरात बदल जाती हैं !! यदि आप भी हनुमानजी की कृपा प्राप्त करना चाहते हैं तो यहां बताई जा रही कुछ नियमों का विशेष ध्यान रखें-

    १. बजरंग बली को लाल या पीले रंग के फूल विशेष रूप से अर्पित किए जाने चाहिए !! इन फूलों में कमल, गेंदा, गुलाब आदि विशेष महत्व रखते हैं !! हनुमानजी की पूजा या मंदिर में शुद्धता एवं पवित्रता का विशेष ध्यान रखना चाहिए !! ध्यान रखें हनुमानजी को केसर के साथ घिसा लाल चंदन का तिलक लगाना चाहिए !!

    २. हनुमानजी को प्रसन्न करने के लिए हनुमान चालीसा का पाठ या सुंदरकांड का पाठ करना श्रेष्ठ उपाय है !!

    ३. सुबह के समय हनुमानजी प्रसाद के रूप में गुड़, नारियल, लड्डू चढ़ाया जाना चाहिए!!

    ४. दोपहर के समय बजरंग बली को गुड़, घी, गेहूं के आटे से बनी रोटी का चूरमा अर्पित किया जा सकता है !!

    ५. शाम के समय हनुमानजी को फल जैसे आम, केले, अमरूद, सेवफल आदि का भोग लगाना चाहिए !!

    ६. बजरंग बली के श्रृंगार में या चोला चढ़ाते समय तिल के तेल या चमेली के तेल में मिला हुआ सिंदूर लगाना चाहिए !!

    ७. भगवान को भोग लगाने के बाद भक्त को प्रसाद अन्य भक्तों में वितरित करके स्वयं भी ग्रहण करना चाहिए !!

    ८. सप्ताह में दो दिन मंगलवार और शनिवार को हनुमानजी के निमित्त विशेष पूजन-अर्चन करना चाहिए !! इन दिनों में बजरंगबली की विशेष कृपा प्राप्त होती है !!

    श्री गुरु चरण सरोज रज ,
    निज मन मुकुर सुधार .
    बरनौ रघुवर विमल यश
    जो दायक फल चार ,
    बुद्धहीन तनु जानिके ,
    सुमिरौं पवन कुमार .
    बल-बुद्धी-विद्या देहुं मोही ,
    हरहू क्लेश विकार !!
    जय बजरन्गबली -

    "नानक नाम चढदी कला, तेरे पहाणे सर्वद दा भला "

    Offline PiyaSoni

    • Members
    • Member
    • *
    • Posts: 7719
    • Blessings 21
    • ੴ ਸਤਿ ਨਾਮੁ

    OM SAI RAM!!!

    भक्ति के महाद्वार हैं हनुमान

    विश्व-साहित्य में हनुमान के सदृश पात्र कोई और नहीं है। हनुमान एक ऐसे चरित्र हैं जो सर्वगुण निधान हैं। अप्रतिम शारीरिक क्षमता ही नहीं, मानसिक दक्षता तथा सर्वविधचारित्रिक ऊंचाइयों के भी यह उत्तुंग शिखर हैं। इनके सदृश मित्र, सेवक ,सखा, कृपालु एवं भक्तिपरायणको ढूंढनाअसंभव है। हनुमान के प्रकाश से वाल्मीकि एवं तुलसीकृतरामायण जगमग हो गई। हनुमान के रहते कौन सा कार्य व्यक्ति के लिए कठिन हो सकता है?

    दुर्गम काज जगत के जेते।

    सुगम अनुग्रह तुम्हरेतेते॥

    तो आप अगर किसी कष्ट से ग्रस्त हैं, किसी समस्या से पीडित हैं, कोई अभाव आपको सता रहा है तो देर किस बात की! हनुमान को पुकारिए, सुंदर कांड का पाठ कीजिए, वह कठिन लगे तो हनुमान-चालीसा का ही परायण कीजिए और आप्तकामहो जाइए। हनुमान की प्रमुख विशेषताओं को गोस्वामी ने इन चार पंक्तियों में समेटने का प्रयास किया है-





    अतुलित बलशाली, सोने के पर्वत के सदृश विशाल कान्तिमान् शरीर, दैत्य (दुष्ट) रूपी वन के लिए अग्नि-समान, ज्ञानियोंमें अग्रगण्य, सम्पूर्ण गुणों के खान, वानराधिपति,राम के प्रिय भक्त पवनसुतहनुमान का मैं नमन करता हूं।

    अब ढूंढिएऐसे चरित्र को जिसमें एक साथ इतनी विशेषताएं हों। जिसका शरीर भी कनक भूधराकारहो, जो सर्वगुणोंसे सम्पन्न भी हो, दुष्टों के लिए दावानल भी हो और राम का अनन्य भक्त भी हो। कनक भूधराकारकी बात कोई अतिशयोक्ति नहीं, हनुमान के संबंध में यह यत्र-तत्र-सर्वत्र आई है।

    आंजनेयंअति पाटलाननम्




    अंजना पुत्र,अत्यन्त गुलाबी मुख-कान्ति तथा स्वर्ण पर्वत के सदृश सुंदर शरीर, कल्प वृक्ष के नीचे वास करने वाले पवन पुत्र का मैं ध्यान करता हूं। पारिजात वृक्ष मनोवांछित फल प्रदान करता है। अत:उसके नीचे वास करने वाले हनुमान स्वत:भक्तों की सभी मनोकामनाओंकी पूर्ति के कारक बन जाते हैं। आदमी तो आदमी स्वयं परमेश्वरावतारपुरुषोत्तम राम के लिए हनुमान जी ऐसे महापुरुष सिद्ध हुए कि प्रथम रामकथा-गायक वाल्मीकि ने राम के मुख से कहलवा दिया कि तुम्हारे उपकारों का मैं इतना ऋणी हूं कि एक-एक उपकार के लिए मैं अपने प्राण दे सकता हूं, फिर भी तुम्हारे उपकारों से मैं उऋण कहां हो पाउंगा?


    उस समय तो राम के उद्गार सभी सीमाओं को पार कर गए जब हनुमान के लंका से लौटने पर उन्होंने कहा कि हनुमान ने ऐसा कठिन कार्य किया है कि भूतल पर ऐसा कार्य सम्पादित करना कठिन है, इस भूमंडल पर अन्य कोई तो ऐसा करने की बात मन में सोच भी नहीं सकता।

    कृतंहनूमताकार्यसुमहद्भुविदुलर्भम्।मनसापियदन्येनन शक्यंधरणी तले॥

    गोस्वामी जी हनुमान के सबसे बडे भक्त थे। वाल्मीकि के हनुमान की विशेषताओं को देखकर वह पूरी तरह उनके हो गए। हनुमान के माध्यम से उन्होंने राम की भक्ति ही नहीं प्राप्त की, राम के दर्शन भी कर लिए। हनुमान ने गोस्वामी की निष्ठा से प्रसन्न होकर उन्हें वाराणसी में दर्शन दिए और वर मांगने को कहा। तुलसी को अपने राम के दर्शन के अतिरिक्त और क्या मांगना था? हनुमान ने वचन दे दिया। राम और हनुमान घोडे पर सवार, तुलसी के सामने से निकल गए। हनुमान ने देखा उनका यह प्रयास व्यर्थ गया। तुलसी उन्हें पहचान ही नहीं पाए। हनुमान ने दूसरा प्रयास किया। चित्रकूट के घाट पर वह चंदन घिस रहे थे कि राम ने एक सुंदर बालक के रूप में उनके पास पहुंच कर तिलक लगाने को कहा। तुलसीदास फिर न चूक जाएं अत:हनुमान को तोते का रूप धारण कर ये प्रसिद्ध पंक्तियां कहनी पडी-

    चित्रकूट के घाट पर भई संतनकी भीर।तुलसीदास चन्दन रगरैतिलक देतराम रघुबीर॥

    हनुमान ने मात्र तुलसी को ही राम के समीप नहीं पहुंचाया। जिस किसी को भी राम की भक्ति करनी है, उसे प्रथम हनुमान की भक्ति करनी होगी। राम हनुमान से इतने उपकृत हैं कि जो उनको प्रसन्न किए बिना ही राम को पाना चाहते हैं उन्हें राम कभी नहीं अपनाते। गोस्वामी ने ठीक ही लिखा-

    राम दुआरेतुम रखवारे।

    होत न आज्ञा बिनुपैसारे॥

    अत:हनुमान भक्ति के महाद्वार हैं। राम की ही नहीं कृष्ण की भी भक्ति करनी हो तो पहले हनुमान को अपनाना होगा। यह इसलिए कि भक्ति का मार्ग कठिन है। हनुमान इस कठिन मार्ग को आसान कर देते हैं, अत:सर्वप्रथम उनका शरणागत होना पडता है। भारत में कई ऐसे संत व साधक हुए हैं जिन्होंने हनुमान की कृपा से अमरत्व को प्राप्त कर लिया। रामायण में राम और सीता के पश्चात सर्वाधिक लोकप्रिय चरित्र हैं हनुमान जिनके मंदिर भारत ही नहीं भारत के बाहर भी अनगिनत संख्या में निर्मित हैं। धरती तो धरती तीनों लोकों में इनकी ख्याति है

    "नानक नाम चढदी कला, तेरे पहाणे सर्वद दा भला "

    Offline PiyaSoni

    • Members
    • Member
    • *
    • Posts: 7719
    • Blessings 21
    • ੴ ਸਤਿ ਨਾਮੁ
    « Reply #4 on: June 04, 2013, 02:08:46 AM »
  • Publish

  • OM SAI RAM!!!


    Fulfilling the promise given to his father, King Dasaratha, Rama along with Seeta and Lakshmana went in exile. They lived their ascetic lives blissfully in the forest and the fourteen year exile was drawing to a close when Ravana, the king of Lanka, having heard much of Seetha's beauty and desiring to possess her, used cunning means and carried her away.

    Rama, when he discovered Seeta's absence, was inconsolable. With Lakshmana's mature advice and help, they began their search for Seeta. Fortunately, she had been noticed being carried away by many and the brothers took this trail until they reached Kishkindha, the abode of the Vanaras.

    Here, they befriended Sugreeva and helped him ascend the throne. Sugreeva, in return, promised all help to find Seeta. Rama was shown a small bundle of jewels that was described by Sugreeva's men as having fallen from the sky. Rama instantly recognized them as Seeta's.

    Hanuman was Sugreeva's generalissimo. Earlier he had saved Sugreeva from a mad elephant by holding it by its trunk and flinging it away, earning him the position he held presently. Sugreeva's army was divided in four and each battalion went in each of the four directions. Hanuman, instinctively, opted to go south with his men.

    He reached the southern shores of Bharata and there he learnt that Ravana of Lanka had carried Seeta away to the island in a flying chariot. He stood atop a mountain, said his prayers to his father, Vayu, and with a roar that shook the earth, leaped across the ocean. He landed safe in Lanka but not before vanquishing a terrible sea-monster en-route.

    In beautiful Lanka, bearing all the insignia of a flourishing kingdom, Hanuman wandered in the guise of a little monkey. He went hither and thither looking carefully at each woman to see if she was Seeta. Finally, having looked in the houses and the market places, in the palaces and in the harems, Hanuman reached a garden called Ashokavana.

    Here he found a beautiful woman humming sad sweet notes. Upon moving closer, he understood that she was pining for her Lord to come and take her back. Understanding that she was none other than Seeta, he looked about to find if somebody was watching and seeing none, sprang up before her, startling her. He held his palms together and paid obeisance to her. To assure her that he was there on a mission for Rama, he showed her Rama's ring which he had carried along.

    Although Hanuman was powerful enough to carry Seeta and a hundred others like her together back with him, he yielded to Seeta's wish that Rama come and fight Ravana, liberate all those that were unjustly held there and then take her back.

    Hanuman was wise by Brahma's boon. He knew that war begets only sorrow even for the victor. He desired a peaceful settlement. With this intent he went to Ravana's court, introduced himself and sought peace. A haughty Ravana and his misled men laughed at the sight of a mere monkey being the ambassador for peace.

    Ravana sat on the throne set at an elevated level. Simply to exhibit to Ravana that he was not pitted against somebody that could be crushed, Hanuman coiled up his tail so high that it was higher than Ravana's throne and sat upon it. Ravana was angered and ordered his men to set this audacious monkey's tail on fire.

    The men set Hanuman's tail on fire. Exclaiming that the heat of the fire was nothing but the angst of Mother Seeta, Hanuman went all over Lanka and set everything on fire. With Lanka burning, Hanuman went to the ocean and dipped in his tail, thereby extinguishing the fire.

    He now returned to Rama with the promising news of Seeta's presence in Lanka.

    हम पर भी कृपा करो देवा -
    दो भक्ति-दान सबको देवा
    है पास न अपने फल मेवा -
    स्वीकारो स्वामी नयन नीर
    जय जय बजरंगी महाबीर

    हे संकटमोचन हरो पीर

    "नानक नाम चढदी कला, तेरे पहाणे सर्वद दा भला "

    Offline ShAivI

    • Members
    • Member
    • *
    • Posts: 12140
    • Blessings 56
    • बाबा मुझे अपने ह्र्दय से लगा लो, अपने पास बुला लो।

    ॐ साईं राम!!!

    बात त्रेता युग की है, श्रीराम कि वानर सेना प्रभु आज्ञा से
    सेतुबंधन का कार्य कर रही थी,
    सभी जीव अपनी अपनी क्षमतानुसार सेतुबंधन में सहयोग प्रदान कर रहे थे |
    महावीर हनुमान बड़ी बड़ी शिलाओं पर रामनाम लिख रहे थे |
    अकस्मात श्री हनुमान का ध्यान एक अत्यंत छोटे जीव पर पड़ा
    जो यहाँ से वहा चक्कर लगा रहा था,
    हनुमान ने देखा कि वह छोटा जीव गिलहरी थी |
    गिलहरी समुद्र किनारे रेट में लोट लगाती और
    अपने बालों में चिपकी उस रेट क ओसमुद्र में आकर झटक देती,
    गिलहरी के इन क्रियाकलापों से विस्मित हनुमान ने
    उसे अपने हाथ में उठा लिया और पूछा
    " इतने बड़े बड़े प्राणियों के बीच तुम क्या कर रही हो?
    कही इनके पैरो के नीचे आ मारी गयी तो?
    गिलहरी बोली " हे हनुमान रामकाज में प्राण निकले
    इससे बड़ी उपलब्धि क्या हो सकती है,
    मैं तो केवल सेतुबंधन में प्रभु की सहायता करना चाहती हूँ |
    मेरे बड़े बड़े हाथ तो है नहीं इसलिए ऐसे ही
    अपने शरीर के बालों में चिपकी रेत से ही सहायता कर रही हूँ,
    इतना कह कर गिलहरी हनुमानजी के हाथों से उछल कर नीचे आ गयी
    और पुनह तल्लीन हो अपना कार्य करने लगी|
    हनुमानजी गिलहरी की भक्ति भरी बातें सुन,
    तथा उसके श्रीराम के प्रति प्रेम देख भावविभोर हो उठे,
    उनकी आँखों से प्रेमाश्रु झरने लगे. हनुमानजी ने सोचा
    ऐसी परम भक्त को भगवन से अवश्य ही मिलाना चाहिए|
    परन्तु गिलहरी प्रभु का कार्य बीच में नहीं छोड़ेगी यह वे जानते थे|
    उन्होंने सोचा की यदि किसी प्रकार गिलहरी को संकट में डाला जाये तो
    भक्तवत्सल श्री राम अवश्य उसे बचाने आयेंगे, ये सोच कर हनुमानजी ने
    अपने पैर के नाख़ून से गिलहरी की पूँछ जोर से दबाई.
    पीड़ा से विकल गिलहरी श्रीराम का स्मरण करने लगी,
    इधर भक्त की पीड़ा से विकल भगवन राम तुरंत उठकर गिलहरी के पास आये
    तथा उसे अपने हाथों में उठाकर सहलाने लगे,
    हनुमानजी की ओर रोष से देखते हुए उन्होंने गिलहरी से पुछा
    " कहो हनुमान को क्या दंड दिया जाये? "
    प्रभू के हाथों में पहुच अपने भाग्य को धन्य समझती गिलहरी ने
    भगवन से कहा के हनुमान जी को क्षमा किया जाये
    क्यूंकि ये सब उन्होंने उसे भगवन से मिलाने के लिए किया है|
    गिलहरी की बातों से प्रसन्न श्रीराम ने गिलहरी को बहुत प्रकार से स्नेह किया|
    श्रीराम के आशीर्वाद स्वरुप आज भी उनकी उँगलियों के चिन्ह
    गिलहरी प्रजाति के शारीर पर देखे जा सकते है.

    बोलो भक्त और भगवान की जय.

    ॐ साईं राम, श्री साईं राम, जय जय साईं राम!!!

    JAI SAI RAM !!!

    Offline PiyaSoni

    • Members
    • Member
    • *
    • Posts: 7719
    • Blessings 21
    • ੴ ਸਤਿ ਨਾਮੁ
    « Reply #6 on: June 03, 2014, 01:21:10 AM »
  • Publish

    Om Sai Ram


    Despite many attempts by Sri Rama and his men to come to a peaceful settlement with Ravana, this did not materialize. Filled with egoistic pride and egged on by his un-wise ministers, he declared war. So war it was, quick-killing and enervating, sapping all energy - physical and mental.

    Both armies suffered - Ravana's because its king wanted war and Rama's because its leader wanted peace. Stark distinction in intent apart, nothing was different in the fate with which they met. Barren land that was the meeting ground for the two armies was now drenched in blood; men lay everywhere broken, pierced and torn in every limb, every muscle, every bone, every nerve; they lay there alive, half-alive, barely-alive, nearly-dead and dead; writhing and twitching in pain until they could no more writhe and twitch.

    With the coming of Indrajit, Ravana's son, who had the ability to make himself invisible and who wielded terrible weapons of boon from the gods, the scenario was turning bad in Rama's camp. Even Lakshmana lay in a swoon. There remained only Rama, Hanuman and Vibheeshana to lead and not many beyond finger-count among the soldiers.

    When everything seemed apparently lost, Jambavan asked Hanuman to bring some herbs from the Sanjeevani Mountain. So, with an urgent mission on hand, Hanuman leapt skyward and flew north like lightning. Having spotted the Sanjeevani, he alighted upon it, only to see that it was densely forested, difficult to distinguish one herb from another. Instantly he decided that instead of trying to discover the herbs needed, he would carry the mountain itself back to Lanka!

    Growing to an enormous size with his powers of Mahima, he dug his hand deep beneath the mountain and with a thunderous, "Jai Sri Rama," he uprooted it from its base, held it in his hand and flew south. It was spectacular to see a whole mountain descend upon Lanka's battle-field. Jambavan took the herbs and revived the dying men. Even men from Ravana's camp were treated. These grateful men, who would otherwise have died neglected and in anonymity, now insisted upon fighting for Rama.

    With the herbs from Sanjeevani now available, Indrajit was killed by Lakshmana and Ravana by Rama. Lanka was liberated, Vibheeshana was crowned king and the land, now sanctified by Rama's advent and Vibheeshana's coronation, came to be called Sri Lanka. Seeta was reunited with her Lord and, the exile period now over, they returned to Ayodhya.

    "नानक नाम चढदी कला, तेरे पहाणे सर्वद दा भला "

    Offline Gauri21

    • Member
    • Posts: 1012
    • Blessings 14
    • baba i love you
    « Reply #7 on: June 03, 2014, 02:07:59 AM »
  • Publish
  • Jai shri ram.
    sai gauri

    Offline sunita d/obhuvana

    • Member
    • Posts: 394
    • Blessings 1
    « Reply #8 on: June 11, 2014, 02:27:13 AM »
  • Publish
  • jai sri ram
    jai sri ram
    jai sri ram

    jai hanuman (kripa karo hanuman ji )
    om sai ram


    Facebook Comments