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Author Topic: रामायण – किष्किन्धाकान्ड - वानरों द्वारा सीता की खोज  (Read 1285 times)

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Offline JR

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लक्ष्मण की प्रेरणा से सुग्रीव ने अपने यूथपतियों के साथ रामचन्द्र जी से मिलने के लिये प्रस्थान किया। एक पालकी मँगा कर उसमें पहले लक्ष्मण को बिठाया और फिर स्वयं बैठा। शंखों और नगाड़ों के घोष और सहस्त्रों वीरों के शंखों की झंकार के साथ सुग्रीव लक्ष्मण को आगे कर श्री राम के पहुँचा और हाथ जोड़ कर विनीत भाव से उनके सम्मुख खड़ा हो गया। रामचन्द्र जी ने प्रसन्न हो कर सुग्रीव को गले लगाया और फिर उसकी प्रशंसा करते हुये कहा, "हे कपीश! जो राजा समय पर अपने सम्पूर्ण शुभ कार्यों को करता है, वह वास्तव में शासन करने के योग्य होता है और जो भोग विलास में लिप्त हो कर इन्द्रयों के वशीभूत हो जाता है, वह अन्त में विनाश को प्राप्त होता है। अब तुम्हारे उद्योग करने का समय आ गया है। अतएव जैसा उचित समझो, वैसा करो ताकि सीता का पता मुझे शीघ्र प्राप्त हो सके।"

श्री रामचन्द्र जी के ये नीतियुक्त वचन सुन कर सुग्रीव ने कहा, "हे प्रभो! मैं आपके उपकार को कभी नहीं भूल सकता। मैं आपका अकिंचन दास हूँ। जनकनन्दिनी की शीघ्र खोज की जा सके, इसलिये मैं इन सहस्त्र वानर यूशपतियों को ले कर यहाँ उपस्थित हुआ हूँ। इन सबके पास पृथक-पृथक सेनाएँ हैं और ये स्वयं भी इन्द्र के समान पराक्रमी हैं। आपकी आज्ञा पाते ही ये लंकापति रावण को मार कर सीता को ले आयेंगे। इन्हें आप इस कार्य के लिये आज्ञा प्रदान करें।"

सुग्रीव की उत्साहवर्द्धक बात सुन कर राम बोले, "राजन्! सबसे पहले तो इस बात का पता लगाना चाहिये कि सीता जीवित भी है या नहीं। यदि जीवित है, तो उसे कहाँ रखा गया है? रावण का निवास स्थान कहाँ है? उसके पास कितनी और कैसी सेना है? वह स्वयं कितना पराक्रमी है? इन समस्त बातों के ज्ञात हो जाने पर ही आगे की योजना पर विचार किया जायेगा। यह कार्य ऐसा है जिसे न मैं कर सकता हूँ और न लक्ष्मण। केवल तुम ही अपनी सेना के द्वारा करवा सकते हो।"

राम की योजना से सहमत होते हुये सुग्रीव ने बड़े-बड़े यूथपतियों को बुला कर आज्ञा दी, "हे वीर महारथियों! अब मेरी लाज और श्री रामचन्द्र जी का जीवन तुम लोगों के हाथ में है। इसलिये तुम दसों दिशाओं में जा कर जानकी जी की खोज कराओ। सभी पर्वत की दुर्गम कन्दराओं, वनों, नदी तटों, समुद्री द्वीपों, उपत्यकाओं और उन गुप्त स्थानों को छान मारो जहाँ उनके होने की तनिक भी सम्भावना हों। आकाश, पाताल, भूमण्डल का कोई भी स्थान छिपा नहीं रहना चाहिये। एक मास के अन्दर जानकी जी का पता मिल जाना चाहिये। यदि इस अवधि में उनका पता न लगा सके तो तुम स्वयं को मरा समझो। इससे अधिक मैं और कुछ नहीं कहना चाहता।"

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