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Author Topic: इस जगत के मिथ्यात्व का बोध कराने वाला ध्यान  (Read 1847 times)

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Offline sai ji ka narad muni

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  • दाता एक साईं भिखारी सारी दुनिया

माया खूब नाचा रही हैं,
कभी गुरु कृपा से जो दृष्टा भाव आजाये
माया की क्या बात जो हमे नचा जाये

यह शास्त्र सम्मत ध्यान आपके सारे दुःख भुला जाये ऐसी मेरी हरी से प्रार्थना हैं।
गुरु साईं जी की कृपा से यह अत्यंत गुह्य योग आज आप भक्तो के समक्ष प्रकट होने जा रहा हैं कृपया इसका लाभ उठाये  ,भले ही जीवन दुखो से भरा हो या सुखो से।।।

वेदांत और भक्ति पृथक नही हैं, ज्ञान भक्ति रहित नही रहता इसिलिय कोई भक्ति का खंडन करे और स्वयं को वेदांती बताये तो समझ लेना की कच्चा वेदांती हैं।
इसिलिय मिथ्या का बोध सुख दुःख से परे रखे और भक्ति हमारे मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करे ये ही वेदान्त का सार हैं। मेने भोले भाले भक्तो के लिय वेदांत को सरलतम शब्दों में व्यक्त करने का प्रयत्न किया हैं

साईं  राम





साईं
साईं हरी साईं
एकांत में बैठे
और चिन्तन करे
भगवान कब से हैं?
जब कुछ नही था केवल नारायण थे
तब काल जैसी भी कोई चीज़ नही थी, कितने वर्ष नारायण ने उस नीर में शयन किया ये गणना असम्भव हैं
कब से नारायण हैं अब बताये
सृष्टि की रचना हुई
कितने ऐसे कलयुग बीते अब तक
प्रलय कितनी बार आई हैं
अब अपने आस पास हर चीज़ देखे
प्रलय से पहले सौ वर्ष वर्षा होती हैं
सब कुछ गल जाता हैं
यह भी गल जाएगा
फिर सौ वर्ष सूखा पड़ता हैं
जो लोहे आदि की भी चीज़े हैं सब पानी हो जाएगा
पूरी पृथ्वी पानी में घुल जायेगी
अभी हम उसी हरी के उदर में हैं
जैसे किसी बच्चे के पेट में कीड़े हो
तब व्ह उन कीड़ो से पृथक नही
हम चैतन्य हैं
उस विराट पुरुष की चेतनता से ही
उस चैतन्यता के अलावा सब पंचमहाभूत से निर्मित हैं
हमारा देह भी और पूरा जगत भी
कर्म देह ने किया देह ही भोगेगा
आत्मा दृष्टा हैं, दृश्य नही
पर ये सब तो घुल ही जाना हैं इसिलिय दृश्य और दृष्टा में पृथकत्व नही हैं
साईं मै हु साईं को पूजने वाला भी मै
कहने वाला मै हूँ ,कहा हुआ शब्द मै हूँ ,जो कहा जा रहा हैं वह भी मै हूँ
आत्मा अत्यंत निर्मल हैं
कर्म का सुख दुःख होता हैं ऐसा मूर्ख लोग देह के मोह के कारण मानते हैं
कर्म नितांत जड़ हैं और आत्मा शुद्ध हैं
कर्म सिमित हैं और आत्मा अनंत हैं
आत्मा ही नित्य ह अत: मै नित्य हु
जो भी इन्द्रियो से ग्रहण हो रहा हैं सभी मिथ्या हैं
केवल हरी की माया से भास् रहा हैं
जैसे पानी में सूरज का प्रतिबिंब हिलता हुआ प्रतीत होता हैं उसी प्रकार शुद्ध नित्य आत्मा में यह जगत भास् रहा हैं
मेरा सच्चा स्वरुप आनन्दमय हैं
मै नित्यमुक्त हूँ
ये देहाभिमान मुझे फसाये रखता हैं इसके कर्म फ्लो से मिलने वाले सुख दुःख में
मेरे गुरु साईं मेरे अज्ञान का आवरण हटा कर मेरे सत्य सवरूप का दर्शन करायेंगे
अत: मै गुरुदेव की सहरन ग्रहण करता हूँ
जो मुझसे अलग नही हैं
पुरुष से प्रक्रति भिन्न हैं और सारा सुख दुःख उसी के पास हैं
सुख दुःख केवल मायिक हैं यह ज्ञान जिसे हो गया वह उसी क्षण संसार भय का भ्रम त्याग देता हैं
ब्रह्म आनन्दरूप में केवल एक ही हैं
मेरा भाई
मेरा  पिता
मेरी माँ
मेरी बहन
मेरी प्रेमिका
मेरा प्रेमी
आस्तिक
नास्तिक
हिन्दू मुस्लिम पारसी इसाई बोद्ध
मेरा दुश्मन
महादेव
साइ बाबा
देवता इंद्र,चन्द्र, ब्रह्मा,  दिक्पाल
सब एक ही हैं और अभी अलग भासते हुए भी एक दिन एक ब्रह्म में समा
जायेंगे
उसी प्रकार ये सारा जगत और सभी देह एक हैं
जड़ चेतन सब ब्रह्मस्वरूप हैं
आत्मा अद्वैत हैं
आत्मा ज्ञानस्वरूप स्वयमप्रकाश अविकारी अविनाशी हैं
आत्मा अकर्ता अभोक्ता उदास और निनिर्वेश निजात्म रूप हैं
उसकी देह नही हैं
उसके नेत्र कान नही हैं
उसका कोई नही हैं
आत्मा के सिवा सब कुछ अनित्य हैं
और जब एक आत्मा ही हैं तो क्या नित्य अनित्य
क्या गुण और दोष
जब एक आत्मा ही हैं तो क्या ज्ञान और अज्ञान
दो बाते या एक भी बात वहां सम्भव हैं जहां कुछ तुलना के लिय हो
अब तुम देह आदि जो भी कुछ मिथ्या निंदनीय तिरस्कार योग्य हैं उसका अपने चित्त से स्पर्श न होने दो
उससे अलिप्त होकर तुम परमार्थी बनो
यह देह कैसे बना हैं
कहां से बना हैं
जो नित्य का मूत्रालय हैं
रजस्वला स्त्री के गंदे रक्त से यह शरीर बनता हैं और गंदे रक्त से पुरुष का जन्म होता हैं फिर भी वह अपने को पवित्र कहता हैं
गर्भवास से अधिक दुःख कोनसा हैं
परन्तु नर देह ही कर्म योनि हैं
अन्य योनियो में केवल फल भोगने को ही हैं
इसिलिय
ऐसा नरदेह प्राप्त होते हुए जो ब्रह्मसुख की साधना नही करता वह जन में महामूर्ख तथा देवताओं में विश्वासघाती समझा जाता हैं
निजात्म्प्राप्ति के लिय ही भगवान ने मनुष्य योनि की योजना की है ।
पितरों की इच्छा यही रहती हैं की हमारा बेटा हरिभक्त हो तथा सारे कुल का उद्धार करे लेकिन विषयासक्ति से वह सबपर पानी फेर देता हैं
मेने अपने पितरों के लिय क्या किया
अपने उद्धार के लिय अब तक क्या किया???
कया मुझे विश्वास हैं की मेने अभी प्राण त्यागे तो मुझे मुक्ति मिलेगी??.?
क्या अभी प्रलय आया तो मै इस लायक हूँ की हरी मुझे स्वयं बचा ले?????

क्या मै अपनी सन्तानो को मुक्ति का मार्ग दिखाने के योग्य हूँ।।।

मै आज से ही भजन करूंगा
इस माया के जाल में न फस
केवल साईं को भजुगा
और अपना कर्तव्य करते हुए जल्द मुक्त हो जाउंगा

जय साईं राम
जिस कर्म से भगवद प्रेम और भक्ति बढ़े वही सार्थक उद्योग हैं।
ॐ साईं राम

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Offline sai ji ka narad muni

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  • दाता एक साईं भिखारी सारी दुनिया
क्या एक शराबी कबाबी एक पवित्र वैष्णव की तुलना कर सकता हैं????

कुछ भी देख लेने वाला पुरुष उस चरित्रवान की तुलना कर सकता हैं जिसकी नजर पर सत्री के चरणों में ही पड़े??

क्या एक वैश्या पतिव्रता की तुलना कर सकती हैं??

इसिलिय गोविन्द देव गिरी जी महाराज कहते हैं जैसे हमारी हड्डिया क्या दधिची जी जैसी हैं??नही। कही से कुछ भी उठाकर खालेने वाला और पूर्ण सयम रखने वाले अलग हैं इसिलिय व्यवहार में एकनाथ जी कहते हैं की सबकी अलग मर्यादा हैं।।।

जिस कर्म से भगवद प्रेम और भक्ति बढ़े वही सार्थक उद्योग हैं।
ॐ साईं राम

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Offline sai ji ka narad muni

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ॐ साईं राम
ॐ साईं हरी ॐ
हरी हरी हरी हरी हरी

मा अया माया हमारे भीतर हम अज्ञानी जीवो पर हावी हैं ऐसा उपनिषदों का कथन हैं।
आज हम केवल इसके मिथ्यात्व का चिन्तन करेंगे ,
संसार ; एक बाहर हैं और एक हमारे
भीतर . बाहर का अत्यंत क्षणभंगुर हैं, हमारे सनातन धर्म में सत्य सनातन को ही माना गया हैं जो की केवल परमात्मा हैं। har vyakti apne स्तर se baat khta hai jaise adi shankaracharya ne kaha
Brahm satyam jagat mithya jivo brahmev na parah
To unka apna level tha parantu sunne vala apne स्तर से इसे समझता हैं। शायद इसिलिय शास्त्रों ने इसके मिथ्यात्व से भी क्षणभंगुरता पर जोर देकर समझाने की कोशिश की।( i can be wrong here, but i felt that they've emphasized too much on this)
Aur hum sbhi k liy kshanbhangurta ka concept smajhna bht hi saral h....
Hm jise jaante the kuch saal pehle use ab bhul chuke hai
Jisko best friend batate the ab uska pta bhi nahi pta
Jo ata hai chala jata hai
Har aakarshan kshnik hai
Jo smoothie kal khai bht achhi lagi vo aaj so so lagti hai
Jis jagah jaane k liy baba se pray karte the vaha pahuchkar aanand ni aata
Hm sbhi shanti se ek jagah tik kar bhajan ni krte bhagte rehte h kbhi kisi k piche to kbhi kisi chiz k parantu kabhi chintan kare to samajh aata hai sb kuch atyant kshanbhangur h.maya khub nachati h parantu mithyatv kya h !!!
Mithya bhitar ka sansar humare bas m hai
Bahar ka sansar to mere apke hari k haath m hai parantu andar ka sansaar hmare hi bas m hai.aur sachha yogi vahi hai jiska bhitar ka sansaar samapt ho gya hai....
Example
First I'll apologize for writing in English letters .transliteration takes time.

Karm to ek hi hota hai par bhav aur asar alag alag hota h bhogi aur yogi k jivan m.
 Shirdi samadhi mandir itne log jaate hain, kuch ko bas vaha ka gold aur chadhava (donations) hi dikhta hai. Aur bhakt baba k alawa aur kuch soch hi nahi pate,

Jab andar hi sansaar ho to hm bhale hi band kamre m life bita de , hm mayik hi kehlaayenge parantu logo ki vishyo ki bhid m agar hmare andar ka sansar samapt ho chuka hai to koi chinta nahi parantu hm sadhako ko prati kshan ki savdhani baratni chahiye q ki bhagwad prapti hone tak maya ko halke m nhi lena chahiye ahenkar k karan.matlab ye ki jitna sang hoga utna prabhav padne ka khatra bna rehta h.
Jaise nattu ram ek baar akele kirtan kar rha tha hare ram hare ram ram ram hare hare .......
Bada aanand aarha tha use ..... ( abhi sansar nahi h bhitar)
Fir kamre m pota aagya ghutne k bal chalta chalta aur apne dada nattu i pith k bal khada hone lga , ab nattu kaka ka dhyan naam kirtan se hatkar pote m lg gya muh se to jaap h keval ratna par man m pota hai....
Isiliy jab tak bhitar ka sansaar bana h tab tak bahar ka sansaar khatarnaak h .... isiliy ekant sevan karo sadhako k liy shastro ki aagya hai.hume unnecessarily contact nhi rkhna h
- parikari devi



जिस कर्म से भगवद प्रेम और भक्ति बढ़े वही सार्थक उद्योग हैं।
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