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Author Topic: बाबा की यह व्यथा  (Read 161515 times)

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Offline nitin_super

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  • ॐ साईं राम
Re: बाबा की यह व्यथा
« Reply #195 on: April 07, 2010, 12:59:02 AM »
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  • Jai Sai Ram
    Om Sai Ram

    Mere Baba hum sab ke paap ka kasht kam karke hume sidhi saadhi zindagi jine ki prerna dijiye. Baba shanti dijiye apane bhakto ke man ko. Aap ki jagat ke bhag vidhaata ho, aap ke dum se ye kudrat hai. Tum hi ek malik ho hum sabake. Hum sab tumari santaan. Apane bachcho pe daya drishti banaye rakhna..

    Om Sai Ram
    -- BABA, Bless all of your devotees. Calling your poor nitin from the valley of sorrow...!

    Offline saisewika

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    ब्रह्मज्ञान
    « Reply #196 on: May 05, 2010, 03:58:56 PM »
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  • ॐ साईं राम
     
     
    ब्रह्मज्ञान की इच्छा रख
    धनी महाशय एक
    साईं नाथ के सन्मुख आ
    बोले माथा टेक
     
     
    दिया बहुत कुछ ईश ने
    धन सँपत्त और दास
    जो थी पूर्ण हो गई
    हर इच्छा हर आस
     
     
    अब तो बस ये चाहूँ मैं
    ब्रह्मज्ञान मिल जाए
    जल्दी से पा जाऊँ तो
    जनम सफल हो जाए
     
     
    साईं मैंने है सुना
    देते हो तुम ज्ञान
    ब्रह्म दर्शन करवा कर के
    कर दो मम कल्याण
     
     
    बाहर ताँगा है खडा
    दिन जाता है ढलता
    जल्दी ज्ञान मिल जाए तो
    मैं वापिस हूँ चलता
     
     
    मँद मँद मुस्काकर के
    साईं ने फरमाया
    धन्य हुआ जो मैंने आज
    दर्शन आपका पाया
     
     
    कितने ही जन आते यहाँ
    इच्छा लिए अनेक
    ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति को
    आप ही आए एक
     
     
    यहाँ विराजो मित्र तुम
    देता हूँ मैं ज्ञान
    विरले पिपासु आए तुम
    भक्ति भाव की खान
     
     
    साईं नाथ महाराज ने फिर
    बालक एक बुलाया
    पाँच रुपये उधार लाने को
    उसको था दौडाया
     
     
    खाली हाथ लौटा था बालक
    एक नहीं कई बार
    कई जगह पर जा कर भी
    लाया नहीं उधार
     
     
    धनी महाशय हुए अधीर
    होती देख अबेर
    बोले ब्रह्मज्ञान दो साईं
    होती है मुझे देर
     
     
    तब देवा ने श्री मुख से
    मधुर वचन फरमाया
    इस सारे नाटक से तुमको
    समझ नहीं कुछ आया?
     
     
    ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति का
    सहज नहीं उपाय
    मोह माया से ग्रसित जन
    कैसे उसको पाय
     
     
    ब्रह्मज्ञान का अधिकारी
    सो ही जानो आप
    पाँच वस्तुऐॅ त्यागे जो
    हो जावे निष्पाप
     
     
    पाँच प्राण, पाँच इन्द्रियाँ,
    मन, बुद्दि, अहँकार
    मुमुक्षु जन त्यागे इन्हें
    समझे जीवन सार
     
     
    बँधन माने माया को
    होना चाहे मुक्त
    प्रयत्न करे सँकल्प से
    हो भक्ति से युक्त
     
     
    उदासीन हो लोक से
    चाहे ना धन मान
    विरक्त रहे सँसार से
    रमा रहे हरि नाम
     
     
    अन्तर्मुखी हो मन से जो
    इधर उधर ना डोले
    लीन रहे परमात्म में
    मुख से अमृत घोले
     
     
    सभी दुष्टता त्याग दे
    पाप कर्म को छोडे
    पूर्ण शाँत और स्थिर होवे
    नाता ईश से जोडे
     
     
    सत्यवान हो, त्यागी हो
    वश में कर ले मन
    चित्त शुद्ध हो, सरल हो
    उज्जवल होवे तन
     
     
    ऐसे जीवन साध कर
    गुरू कृपा जब होवे
    ईश कृपा भी मिले उसे
    जग के बँधन खोवे
     
     
    ब्रह्मज्ञान मिलता नहीं
    लोभ मोह के सँग
    मन की काली चादर पे
    चढे ना कोई रँग
     
     
    पाँच रुपये के पचास गुना
    धरे तुम्हारे पास
    लेकिन धन की तृष्णा की
    बुझी ना तेरी प्यास
     
     
    धनी महाशय द्रवित हुए
    पाकर मधुर उपदेश
    श्री चरणों पर मस्तक टेक
    पाया ज्ञान विशेष
     
     
    जय साईं राम
     

    Offline nitin_super

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    • ॐ साईं राम
    Re: बाबा की यह व्यथा
    « Reply #197 on: May 09, 2010, 05:27:55 AM »
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  • Jai Sai Ram
    Om Sai Ram

    Sabka Malik Ek Sai..

    Apane bachho pe daya karna Sai.
    Unke dosho ko maaf kar dena Baba..

    Tumhi ho mata, pita tumhi ho
    Tumhi ho bandhu, sakha tumhi ho....

    Om Sai Ram
    -- BABA, Bless all of your devotees. Calling your poor nitin from the valley of sorrow...!

    Offline saisewika

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    ॐ साईं राम


    साईं तेरे भक्त जनों को क्या चाहिए
    तेरे श्री चरणों में बस जगह चाहिए

    तेरे श्री दर्शन का एक बहाना चाहिए
    शिरडी धाम में अपना आना जाना चाहिए

    श्रद्धा और सबूरी का भँडार चाहिए
    और ज़रा सा साईं तुमसे प्यार चाहिए

    भक्त जनों के मस्तक पे तेरा हाथ चाहिए
    हमको हरदम देवा तेरा साथ चाहिए

    तेरी लीला लखने का हर मौका चाहिए
    तुझसे जुड जाए जीवन ऐसा चोखा चाहिए

    गुणगान तेरा करने को मधुर सी वाणी चाहिए
    रूप तेरा जो निरखे, आँख नूरानी चाहिए

    करे जो तेरे कारज साईं तन वो चाहिए
    रमा रहे जो तुझमें, सुँदर मन वो चाहिए

    तेरी लीला सुने जो हरदम कर्ण वो चाहिए
    चले जो तेरे पथ पर, हमको चरण वो चाहिए

    जीवन गाथा लिखे तेरी, कलम वो चाहिए
    भाए तेरे मन को, चाल चलन वो चाहिए

    समझे तेरा इशारा, ऐसी बुद्धि चाहिए
    तुझको सौंप सकें, वो जीवन शुद्धि चाहिए

    तेरी रज़ा में खुशी मिले, ज्ञान वो चाहिए
    मिले तेरे दरबार में, हमको मान वो चाहिए

    तेरे नाम से जुडे, वही पहचान चाहिए
    साईंमय धरती और आसमान चाहिए


    जय साईं राम

    Offline saisewika

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    तू सुने या ना सुने
    « Reply #199 on: July 07, 2010, 09:35:08 AM »
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  • ॐ साईं राम


    तू सुने या ना सुने
    मैं पुकारूँगी
    तू स्वीकारे ना स्वीकारे
    तन मन वारूँगी

    तू देखे या ना देखे
    शीश नवाऊँगी
    तू चाहे तो दुत्कारे
    दूर ना जाऊँगी

    तू चाहे तो मुख फेरे
    दर ना छोडूँगी
    तुझसे जो जोडा नाता
    मैं ना तोडूँगी

    तू चाहे प्रेम ना कर
    मैं प्रीत निभाऊँगी
    मैं भक्ति भाव की गँग में
    बहती जाऊँगी

    तू चाहे आशिष ना दे
    चरण पखारूँगी
    तू इम्तिहाँ ले मेरा
    मैं ना हारूँगी

    तू चाहे तो आज़मा ले
    ना घबराऊँगी
    मैं तेरा दामन थामें
    भव तर जाऊँगी


    जय साईं राम
    « Last Edit: July 07, 2010, 09:45:53 AM by saisewika »

    Offline Dipika

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    Re: बाबा की यह व्यथा
    « Reply #200 on: July 07, 2010, 09:45:42 AM »
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  • OMSAIRAM!Saisewika aaj tuney mere man ki bat keh di

    I just cudnt express 2 baba...but u did it so beautifully

    तू चाहे आशिष ना दे
    चरण पखारूँगी
    तू इम्तिहाँ ले मेरा
    मैं ना हारूँगी

    तू चाहे तो आज़मा ले
    ना घबराऊँगी
    मैं तेरा दामन थामें
    भव तर जाऊँगी


    जय साईं राम


    Thanks Saisewika ...ur a real Sai sent messenger for me  ;D


    Baba bless Saisewika with whatever she wamts in life  ;D

    Bow to Sri Sai!

    Sai baba let your holy lotus feet be our sole refuge.OMSAIRAM




    « Last Edit: July 07, 2010, 09:48:05 AM by diPika »
    साईं बाबा अपने पवित्र चरणकमल ही हमारी एकमात्र शरण रहने दो.ॐ साईं राम


    Dipika Duggal

    Offline saib

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    Re: बाबा की यह व्यथा
    « Reply #201 on: July 08, 2010, 02:32:20 AM »
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  • Dipika Ji,

    Don't know I am right or not, But just feel, Asish ki iccha rakhna hi galat hai, Guru par itna vishvas hona chahiye ki woh jo denge uchit hi hoga, Yeh icchayen hi to dukh ka karan hai..................sara sansar icchaon ki aag mai jalta hai, Sai ki sharan me aakar bhi mukat na hue, to aisa mauka baar baar nahi milta.................!

    om sri sai ram !
    om sai ram!
    Anant Koti Brahmand Nayak Raja Dhi Raj Yogi Raj, Para Brahma Shri Sachidanand Satguru Sri Sai Nath Maharaj !
    Budhihin Tanu Janike, Sumiro Pavan Kumar, Bal Budhi Vidhya Dehu Mohe, Harahu Kalesa Vikar !
    ........................  बाकी सब तो सपने है, बस साईं ही तेरे अपने है, साईं ही तेरे अपने है, साईं ही तेरे अपने है !!

    Offline saisewika

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    Re: बाबा की यह व्यथा
    « Reply #202 on: July 08, 2010, 06:12:17 AM »
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  • OM SAI RAM

    SAIRAM  Dipikaji

    You are absolutely right.....we are all messenger of Baba. He talks to us, advises us, guides us, consoles us, shower his blessings upon us through all of us (as the fortunate members of online SAI temples). We get signs of his will through each other's views, articles, prayers and sometimes through poems. We all are the agents of his SUPREME WILL.

    SAIRAM Saibji

    You are also absolutely right.....Baba knows what we require and what is best for us.....

    Isi liye to kaha hai...


    तू चाहे आशिष ना दे......


    But still I think that spiritual wishes can not do any harm in the spiritual development of a person.....

    JAI SAI RAM

    Offline Dipika

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    Re: बाबा की यह व्यथा
    « Reply #203 on: July 08, 2010, 07:09:03 AM »
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  • Dipika Ji,

    Don't know I am right or not, But just feel, Asish ki iccha rakhna hi galat hai, Guru par itna vishvas hona chahiye ki woh jo denge uchit hi hoga, Yeh icchayen hi to dukh ka karan hai..................sara sansar icchaon ki aag mai jalta hai, Sai ki sharan me aakar bhi mukat na hue, to aisa mauka baar baar nahi milta.................!

    om sri sai ram !


    OMSAIRAM!Saib bhai i dnt agree on this ...becoz some devotees use to go to Shyama for getting blessings from deva...BABA blessed Dr Pilley and removed his sufferings in 10 days...let BABA decide ...let it be between deva and devotee

    take example of Mrs. Aurangabadkar ..Shama, "I know the power of Your word and blessing. Your word will give her a string or series of children. You are wrangling and not giving real blessing".

    The parley went on for a while. Baba repeatedly ordering to break the coconut and Shama pleading for the gift of the unbroken fruit to the lady. Finally Baba yielded and said, "She will have an issue". "When?" asked Shama. "In 12 months" was the reply. The cocoa-nut was therefore broken into two part, one was eaten by the two, the other was given to the lady.

    The Shama turned up to the lady and said, "Dear madam, you are a witness to my words. If within 12 months you do not get any issue, I will break a cocoa-nut against this Deva's head and drive him out of this Masjid. If I fail in this, I will not call myself Madhav. You will soon realize what I say".

    She delivered a son in one year's time and the son was brought to Baba in his fifth month. Both husband and wife, prostrated themselves before Baba and the grateful father (Mr. Aurangabadkar) paid a sum of Rs.500/- which was spent in constructing a shed for Baba's house "Shyamakarna".

    http://www.saibaba.org/satcharitra/sai36.html

    agreed we should ask deva to give us what is best for us...let BABA decide being our father what is gud for his kid..:)

    BABA doesnt like any other person interfering in devotion as quoted in SSC

    let it be between deva and his devotee...what He gives will be ultimately gud for us  ;D

    Baba's Characteristics -- His Dependency on Bhaktas

    Baba allowed His devotees to serve Him in their own way, and did not like any other persons interfering in this. To quote an instance, the same Mavsibai was on another occasion, kneading Baba's abdomen. Seeing the fury and force used by her, all the other devotees felt nervous and anxious. They said, "Oh mother, be more considerate and moderate, otherwise you will break Baba's arteries and nerves". At this Baba got up at once from His seat, dashed His satka on the ground. He got enraged and His eyes became red like a live charcoal. None dared to stand before or face Baba. Then He took hold of one end of the Satka with both hands and pressed it in the hollow of his abdomen. The other end He fixed to the post and began to press His abdomen against it. The satka which was about two or three feet in length seemed all to go into the abdomen and the people feared that the abdomen would be ruptured in a short time. The post was fixed and immovable and Baba began to go closer and closer to it and clasped the post firmly. Every moment the rupture was expected, and they were all dismayed, did not know what to do, and stood dumb with wonder and fear. Baba suffered this ordeal for the sake of His Bhakta. The other devotees wanted only to give a hint to the Mavsibai to be moderate in her service and not cause any trouble or pain to Baba. This they did with good intention, but Baba did not brook even this. They were surprised to see that their well-intentioned effort had resulted in this catastrophe; and they could do nothing but to wait and see. Fortunately, Baba's rage soon cooled down. He left the satka and resumed His seat. From this time onward, the devotees took the lesson that they should not meddle with anybody but allow him to serve Baba as the chooses, as He was capable to gauge the merits and worth of the service rendered unto Him.

    Bow to Shri Sai - Peace be to all

    Sai baba let your holy lotus feet be our sole refuge.OMSAIRAM

    « Last Edit: July 08, 2010, 07:26:29 AM by diPika »
    साईं बाबा अपने पवित्र चरणकमल ही हमारी एकमात्र शरण रहने दो.ॐ साईं राम


    Dipika Duggal

    Offline saib

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    Re: बाबा की यह व्यथा
    « Reply #204 on: July 08, 2010, 08:14:22 AM »
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  • Dear Dipika,

    It was just what I think, so shared. Need not to agree or disagree. It was just a thought.

    But do you Remember story of Bhai Manjh, You shared a few days ago.

    http://forum.spiritualindia.org/bhai-manjh-t36077.0.html

    and in your own words, Let baba decide.

    Baba ki Leela Baba hi Jane!

    Dear Saisewika,

    But still I think that spiritual wishes cannot do any harm in the spiritual development of a person.....

    Wish is a dangerous word, one should have aim to attain spiritual development, but how should leave completely on Guru. e.g. If you go to learn computer from a real master, He will take you step by step, We might wish to adopt as per own interest, but It is only Master who ensures to move from basic to advance!

    also I feel I should not interfere in (individual) devotion of others, All possess different knowledge, If 5 people Read Sai satcharitra all will interpret differently as per their inner nature and spiritual level. I think it is a lesson, and I should take care in future.

    Thanks to both of you! :)

    om sri sai ram!
    om sai ram!
    Anant Koti Brahmand Nayak Raja Dhi Raj Yogi Raj, Para Brahma Shri Sachidanand Satguru Sri Sai Nath Maharaj !
    Budhihin Tanu Janike, Sumiro Pavan Kumar, Bal Budhi Vidhya Dehu Mohe, Harahu Kalesa Vikar !
    ........................  बाकी सब तो सपने है, बस साईं ही तेरे अपने है, साईं ही तेरे अपने है, साईं ही तेरे अपने है !!

    Offline Dipika

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    Re: बाबा की यह व्यथा
    « Reply #205 on: July 08, 2010, 09:42:39 AM »
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  • OMSAIRAM!Saib bhai whenever i read Sai Satcharitra it feels like i m learning some new lessons.

    i used to think that we should ask BABA to give what is best for us and not what we may desire,but today i listened to reading of Chapter 36 from SSC by Veena Maa..2 instances i quote her showing how BABA gives us what HE tHINKS IS BEST

    Baba did not allow Bhagat Mhalsapati to make any money, nor gave him anything from the Dakshina amount,Once a kind and liberal merchant named Hansaraj gave a large amount of money to Mhalsapati in Baba's presence, but Baba did not allow him to accept it.


    The other instance is of Mrs. Aurangabadkar

    Shama, "I know the power of Your word and blessing. Your word will give her a string or series of children. You are wrangling and not giving real blessing".

    The parley went on for a while. Baba repeatedly ordering to break the coconut and Shama pleading for the gift of the unbroken fruit to the lady. Finally Baba yielded and said, "She will have an issue". "When?" asked Shama. "In 12 months" was the reply. The cocoa-nut was therefore broken into two part, one was eaten by the two, the other was given to the lady.

    The Shama turned up to the lady and said, "Dear madam, you are a witness to my words. If within 12 months you do not get any issue, I will break a cocoa-nut against this Deva's head and drive him out of this Masjid. If I fail in this, I will not call myself Madhav. You will soon realize what I say".

    She delivered a son in one year's time and the son was brought to Baba in his fifth month. Both husband and wife, prostrated themselves before Baba and the grateful father (Mr. Aurangabadkar) paid a sum of Rs.500/- which was spent in constructing a shed for Baba's house "Shyamakarna".

    Bow to Shri Sai - Peace be to all

    so let baba decide what is best for us....like in the case of Bhagat Mhalsapati and Mrs. Aurangabadkar


    Bow to Sri Sai!

    Sai baba let your holy lotus feet be our sole refuge.OMSAIRAM





    साईं बाबा अपने पवित्र चरणकमल ही हमारी एकमात्र शरण रहने दो.ॐ साईं राम


    Dipika Duggal

    Offline saisewika

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    मौसी बाई कौजलगी
    « Reply #206 on: July 12, 2010, 06:03:30 AM »
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  • SAIRAM Dipikaji

    Thanks for being inspiration behind these lines.


    ॐ साईं राम


    मौसी बाई कौजलगी
    बाबा की थी भक्त
    साईं नाथ की सेवा का
    पाया था शुभ वक्त

    चरण दाब करती थी सेवा
    ऐसे थे अहोभाग
    हँसी ठिठोली भी चलती थी
    भक्त जनों के साथ

    एक दिवस फिर हुआ था ऐसा
    मस्ज़िद माई के द्वार
    प्रभु और भक्त का सँबँध बताने
    लीला की करतार

    बडे भाव से एकाग्र चित्त हो
    अँगुलियाँ जोड दो हाथ की
    वेणु मौसी पेट मसल कर
    सेवा करती नाथ की

    देख रहे थे भक्त सभी
    मौसी को करते सेवा
    ज्यों ज्यों पेट मसलती मौसी
    इधर उधर सरकें देवा

    वशीभूत हो प्रेम भाव से
    व्यग्र हुए थे भक्त तभी
    परामर्श देने मौसी को
    ऐसा कहने लगे सभी

    "मौसी कष्ट ना हो साईं को
    धीरे धीरे हाथ चलाओ
    अँतडी नाडी टूट ना जाए
    कृप्या हौले से सहलाओ"

    कह भी ना पाए थे इतना
    और मुख में थी आधी बात
    अति क्रोधित होकर आसन से
    उठ बैठे थे साईं नाथ

    आँखो से अँगार टपकता
    गुस्से से मुख दमका था
    सूरज जैसे आसमान में
    आग उगल कर चमका था

    साईं नाथ ने थामा सटका
    नाभि पर रक्खा इक छोर
    दूजा रक्खा धरती पर और
    लगे लगाने पूरा ज़ोर

    पेट से देते धक्का उसको
    साईं क्रोधित होते थे
    भयभीत हो भक्त सभी
    सौ सौ आँसू रोते थे

    कहीं जो सटका धँस गया अँदर
    टूटेगी विपदा भारी
    डरी हुई सी सहमी सी
    खडी रही सँगत सारी

    धीरे धीरे शाँत हो गया
    परम गुरू का सारा क्रोध
    दिखा के तेवर बाबाजी ने
    भक्त जनों को दिया ये बोध

    जैसे जिसके श्रद्धा भाव
    वैसी सेवा कर ले दास
    और किसी का हस्तक्षेप
    सहन नहीं देवा को आप

    मौसी बाई को भक्त जनों ने
    शुद्ध भाव से रोका था
    पर देवा का 'भक्त प्रेम' भी
    सबसे अलग अनोखा था

    ना कोई ज़्यादा ना कोई कम
    सारे भक्त समान हैं
    वो सब प्यारे हैं साईं को
    जो भक्ति की खान हैं

    जय साईं राम
    « Last Edit: July 12, 2010, 10:24:20 AM by saisewika »

    Offline Dipika

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    Re: बाबा की यह व्यथा
    « Reply #207 on: July 12, 2010, 07:16:58 AM »
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  • SAIRAM Dipikaji

    Thanks for being inspiration behind these lines.


    ॐ साईं राम


    मौसी बाई कौजलगी
    बाबा की थी भक्त
    साईं नाथ की सेवा का
    पाया था शुभ वक्त

    चरण दाब करती थी सेवा
    ऐसे थे अहोभाग
    हँसी ठिठोली भी चलती थी
    भक्त जनों के साथ

    एक दिवस फिर हुआ था ऐसा
    मस्ज़िद माई के द्वार
    प्रभु और भक्त का सँबँध बताने
    लीला की करतार

    बडे भाव से एकाग्र चित्त हो
    अँगुलियाँ जोड दो हाथ की
    वेणु मौसी पेट मसल कर
    सेवा करती नाथ की

    देख रहे थे भक्त सभी
    मौसी को करते सेवा
    ज्यों ज्यों पेट मसलती मौसी
    इधर उधर सरकें देवा

    वशीभूत हो प्रेम भाव से
    व्यग्र हुए थे भक्त तभी
    परामर्श देने मौसी को
    ऐसा कहने लगे सभी

    "मौसी कष्ट ना हो साईं को
    धीरे धीरे हाथ चलाओ
    अँतडी नाडी टूट ना जाए
    कृप्या हौले से सहलाओ"

    कह भी ना पाए थे इतना
    और मुख में थी आधी बात
    अति क्रोधित होकर आसन से
    उठ बैठे थे साईं नाथ

    आँखो से अँगार टपकता
    गुस्से से मुख दमका था
    सूरज जैसे आसमान में
    आग उगल कर चमका था

    साईं नाथ ने थामा सटका
    नाभि पर रक्खा इक छोर
    दूजा रक्खा धरती पर और
    लगे लगाने पूरा ज़ोर

    पेट से देते धक्का उसको
    साईं क्रोधित होते थे
    भयभीत हो भक्त सभी
    सौ सौ आँसू रोते थे

    कहीं जो सटका धँस गया अँदर
    टूटेगी विपदा भारी
    डरी हुई सी सहमी सी
    खडी रही सँगत सारी

    धीरे धीरे शाँत हो गया
    परम गुरू का सारा क्रोध
    दिखा के तेवर बाबाजी ने
    भक्त जनों को दिया ये बोध

    जैसे जिसके श्रद्धा भाव
    वैसी सेवा कर ले दास
    और किसी का हस्तक्षेप
    सहन नहीं देवा को आप

    मौसी बाई को भक्त जनों ने
    शुद्ध भाव से रोका था
    पर देवा का 'भक्त प्रेम' भी
    सबसे अलग अनोखा था

    ना कोई ज़्यादा ना कम
    सारे भक्त समान हैं
    वो सब प्यारे हैं साईं को
    जो भक्ति की खान हैं

    जय साईं राम


    OMSAIRAM!Dear SaiSewika i am just a humble servant of BABA..

    ITS baba's leelas..HE alone sings HIS leelas through blessed kids like you

    BABA bless u to write many more leelas in a poetic form

    these lines moved me to tears...

    पेट से देते धक्का उसको
    साईं क्रोधित होते थे
    भयभीत हो भक्त सभी
    सौ सौ आँसू रोते थे

    ना कोई ज़्यादा ना कम
    सारे भक्त समान हैं
    वो सब प्यारे हैं साईं को
    जो भक्ति की खान हैं


    Sai baba bless us all


    Bow to Sri Sai!

    Sai baba let your holy lotus feet be our sole refuge.OMSAIRAM


    साईं बाबा अपने पवित्र चरणकमल ही हमारी एकमात्र शरण रहने दो.ॐ साईं राम


    Dipika Duggal

    Offline saisewika

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    बूझो क्या है उसका नाम?
    « Reply #208 on: July 15, 2010, 10:20:28 AM »
  • Publish
  • ॐ साईं राम


    वो जो सब का पालनकर्ता
    वो दुख हरता
    वो सुख करता
    क्या है उसका नाम?
    बूझो क्या है उसका नाम?

    शिरडी धाम में बसने वाला
    सँत फकीर बडा निराला
    भक्त जनों का जो रखवाला
    क्या है उसका नाम?
    बूझो क्या है उसका नाम?

    तात्या और शामा का प्यारा
    मेघा को जिसने था तारा
    मस्जिद माई जिसका द्वारा
    क्या है उसका नाम?
    बूझो क्या है उसका नाम?

    वैद्यों का जो वैद्य महान
    सँस्कृत भाषा का विद्वान
    अष्टाँग योग का जिसको ज्ञान
    क्या है उसका नाम?
    बूझो क्या है उसका नाम?

    धूनि जिसने सदा जलाई
    आधि व्याधि मार भगाई
    वो ही सबका सर्व सहाई
    क्या है उसका नाम?
    बूझो क्या है उसका नाम?

    जिसने जल से दीप जलाए
    श्री चरणों से स्त्रोत बहाए
    भेद भाव ना जिसे सुहाए
    क्या है उसका नाम?
    बूझो क्या है उसका नाम?

    जिसे चाहिए श्रद्धा पूरी
    चाहे धीरज और सबूरी
    भक्तों से ना रखता दूरी
    क्या है उसका नाम?
    बूझो क्या है उसका नाम?

    भिक्षा लेता, टाट पे सोता
    हाथ में थामें रहता सोटा
    हँसता कभी, कभी वो रोता
    क्या है उसका नाम?
    बूझो क्या है उसका नाम?

    महाप्रसाद में भस्म जो बाँटे
    पाप ताप सँताप जो काटे
    कभी दुलारे कभी वो डाँटे
    क्या है उसका नाम?
    बूझो क्या है उसका नाम?

    हर प्राणी में देखे ईश
    निर्मल पावन वो जगदीश
    झुकता जिसके दर हर शीश
    क्या है उसका नाम?
    बूझो क्या है उसका नाम?

    जिसको हमने सब कुछ माना
    सबका वो जाना पहचाना
    पहेली तो बस एक बहाना
    जपने को साईं नाम
    आओ जप लें उसका नाम
    बोलो साईं राम, साईं राम, साईं राम

    जय साईं राम

    Offline arti sehgal

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    • sai ke charno me koti koti pranam
    Re: बाबा की यह व्यथा
    « Reply #209 on: July 16, 2010, 12:07:35 AM »
  • Publish
  • jai sairam
    sabke dil me baste hi ushe sai sai kehte hai
    jai sainath

     


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