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Author Topic: बाबा की यह व्यथा  (Read 161504 times)

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Offline ShAivI

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  • बाबा मुझे अपने ह्र्दय से लगा लो, अपने पास बुला लो।
Re: बाबा की यह व्यथा
« Reply #240 on: August 05, 2011, 04:27:31 AM »
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  • OM SAI RAM SAI SEWIKA JI,

    Beautiful !!!

    We missed you a lotttttt.

    साईं सेविकाजी मेरे पास शब्द नहीं है. क्या कहू?   आपने जो सपना दिखाया है न, उस सपने से जागने को सचमुच दिल ही नहीं करता.

    ॐ साईं राम श्री साईं राम जय जय साईं राम ! :)

    If you are sad n in pain, Be as the ocean, and release. The ocean tides don't pause and hold in anything, they ebb...and then they flow. Only briefly holding on top of a wave for a moment. If something from your past bubbles up, simply take a deep breath, and let it go. More love!
       :-* :-* :-*

    Offline saisewika

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    Re: बाबा की यह व्यथा
    « Reply #241 on: August 05, 2011, 12:44:14 PM »
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  • OM SAI RAM


    Thank you Ishvaryaji and Shaiviji for your kind and inspiring words.

    Thank you Saibji for your encouraging words and reading between the lines and interpreting them so beautifully.....

    Thank you Pratap ji for reminding us the teachings of Baba Sai. Truely Baba tought us to LOVE every creature of this universe.
     

    JAI SAI RAM

    Offline saisewika

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    Re: क्या पता?
    « Reply #242 on: August 19, 2011, 10:38:36 PM »
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  • ॐ साईं राम


    क्या पता?

    क्या पता जब बाबा देह में थे
    तब मैं भी देहधारी ही थी
    बाबा के संग संग रहती थी
    मैं बाबा जी की प्यारी थी
    क्या पता?

    क्या पता॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰
    नित शिरडी में आना जाना था
    या शिरडी में ही रहती थी
    बाबा की वाणी सुनती थी
    और दिल की बातें कहती थी
    क्या पता?

    क्या पता॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰
    कोई चिडिया कीट पतँगा थी
    मस्जिद में उडती फिरती थी
    किसी दिए से जा कर टकराती
    मैं श्री चरणों में गिरती थी
    क्या पता?

    क्या पता॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰
    कोई कूकर, शूकर या मोटी गाय
    बाबा के पास मँडराती थी
    या मक्खी या तितली बनकर
    बाबा का दर्शन पाती थी
    क्या पता?

    क्या पता॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰
    वो बूढा बाघ थी जिसने
    श्री चरणों मे मुक्ति पाई थी
    या फिर वो छिपकली थी शायद
    जो औरँगाबाद से आई थी
    क्या पता?

    क्या पता॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰
    शिरडी के अनगिन लोगों में
    मैं भक्त थी अपने देवा की
    मैंने भी पाँव दाब कर के
    अपने मालिक की सेवा की
    क्या पता?

    क्या पता॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰
    चुनकर सुँदर और ताजे फूल
    मैं सुँदर हार बनाती थी
    प्रभु प्यारे को अर्पित कर
    मैं मन ही मन मुस्काती थी
    क्या पता?

    ऐसी ही अनगिन सँभावनाऐं
    उठती हैं चँचल चित्तवन में
    मैं भाव विह्वल हो जाती हूँ
    खुश हो लेती हूँ मन में

    क्या पता ये मेरा भरम ना हो
    कुछ सच में हुआ हो ऐसा ही
    सपना जो देखा है मन ने
    कुछ घटा हो सच में वैसा ही

    बाबा भी तो ये ही कहते हैं
    जन्मों का नाता है अपना
    फिर क्यूँ ना सोते जगते में
    मैं देखूँ ये सुन्दर सपना

    जय साईं राम

    Offline PiyaSoni

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    Re: बाबा की यह व्यथा
    « Reply #243 on: August 19, 2011, 11:59:23 PM »
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  • OmsaiRam

    Saisewika ji Thanks for sharing this loving poem with all of us , truely said words   "क्या पता"

    Baba always bless yu with his divine love and grace ..

    Sai Samarth..........Shraddha Saburi
    « Last Edit: September 07, 2011, 01:53:17 AM by piyagolu »
    "नानक नाम चढदी कला, तेरे पहाणे सर्वद दा भला "

    Offline Pearl India

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    Re: बाबा की यह व्यथा
    « Reply #244 on: September 06, 2011, 07:46:55 AM »
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  • om sai ram...

    thats a lovely poem....

    एक भक्त के मन क भाव आपने सहज ही एक कविता में पिरो दिए है...कई बार मन में सच ऐसे ही विचार उठते हैं...

    बोहोत सुंदर कविता है

    ...straight to the heart.
    thank u fr sharing it wd us all.

    om sai ma
    EK HAI IS DUNIYA KA DAATA,JAANE SABKE MANN KI
    MANN MEIN HAI VISHWAS TO BANDE, BHAKTI MEIN HAI SHAKTI

    Offline saisewika

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    Re: बाबा की यह व्यथा
    « Reply #245 on: September 29, 2011, 12:17:02 PM »
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  • OM SAI RAM

    Thank you Piyagoluji and Suhaniji.

    May Baba bless you always.

    JAI SAI RAM

    Offline saisewika

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    Re: बाबा की यह व्यथा
    « Reply #246 on: September 29, 2011, 12:21:28 PM »
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  • ॐ साईं राम


    तुझसे शुरू करते हैं
    तुझपे खत्म करते हैं
    जब भी बातें करते हैं
    तेरी बातें करते हैं


    तेरा सिमरन करते हैं
    तेरी माला जपते हैं
    जब भी बातें करते हैं
    तेरी बातें करते हैं


    तेरी लीला सुनते हैं
    तेरी गाथा कहते हैं
    जब भी बातें करते हैं
    तेरी बातें करते हैं


    तेरा नाम लिख लिख कर
    कोरे कागज़ भरते हैं
    जब भी बातें करते हैं
    तेरी बातें करते हैं


    तुझपे श्रद्धा रखते हैं
    विश्वास तुझी पर धरते हैं
    जब भी बातें करते हैं
    तेरी बातें करते हैं


    उनकी मँज़िल तू ही है
    वो तेरे मार्ग पे चलते हैं
    जब भी बातें करते हैं
    तेरी बातें करते हैं


    बात तेरी कर हँसते हैं
    और तेरी याद में रोते हैं
    साईं तेरे प्यारे भक्त
    ऐसे ही तो होते हैं


    जय साईं राम

    Offline saikripa.dimple

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    • Om Sai Ram
    Re: बाबा की यह व्यथा
    « Reply #247 on: September 30, 2011, 06:12:11 AM »
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  • Om SAi Ram,
    Beautiful, really well said....

    thanks a lot , (4 sharing this )

    aisa lag raha hai jaise mere man ki sari bhawanaye is kavita me sama gai ho.......
    kai baar aisa khyaal aata hai , kii kya hum bhi honge us pal waha....sang baba ke,,,,,,,,

    ho na ho kuch toh sachchai hogi is khwaab me tabhi toh is janam me baba ke charno me thoda sathaan mila hai aur aap logo jaisa sai parivaar mila hai....

    thanks babaji,,,,,,

    Love You Babaji

    Sai in my heart


    ॐ साईं राम


    क्या पता?

    क्या पता जब बाबा देह में थे
    तब मैं भी देहधारी ही थी
    बाबा के संग संग रहती थी
    मैं बाबा जी की प्यारी थी
    क्या पता?

    क्या पता॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰
    नित शिरडी में आना जाना था
    या शिरडी में ही रहती थी
    बाबा की वाणी सुनती थी
    और दिल की बातें कहती थी
    क्या पता?

    क्या पता॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰
    कोई चिडिया कीट पतँगा थी
    मस्जिद में उडती फिरती थी
    किसी दिए से जा कर टकराती
    मैं श्री चरणों में गिरती थी
    क्या पता?

    क्या पता॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰
    कोई कूकर, शूकर या मोटी गाय
    बाबा के पास मँडराती थी
    या मक्खी या तितली बनकर
    बाबा का दर्शन पाती थी
    क्या पता?

    क्या पता॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰
    वो बूढा बाघ थी जिसने
    श्री चरणों मे मुक्ति पाई थी
    या फिर वो छिपकली थी शायद
    जो औरँगाबाद से आई थी
    क्या पता?

    क्या पता॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰
    शिरडी के अनगिन लोगों में
    मैं भक्त थी अपने देवा की
    मैंने भी पाँव दाब कर के
    अपने मालिक की सेवा की
    क्या पता?

    क्या पता॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰
    चुनकर सुँदर और ताजे फूल
    मैं सुँदर हार बनाती थी
    प्रभु प्यारे को अर्पित कर
    मैं मन ही मन मुस्काती थी
    क्या पता?

    ऐसी ही अनगिन सँभावनाऐं
    उठती हैं चँचल चित्तवन में
    मैं भाव विह्वल हो जाती हूँ
    खुश हो लेती हूँ मन में

    क्या पता ये मेरा भरम ना हो
    कुछ सच में हुआ हो ऐसा ही
    सपना जो देखा है मन ने
    कुछ घटा हो सच में वैसा ही

    बाबा भी तो ये ही कहते हैं
    जन्मों का नाता है अपना
    फिर क्यूँ ना सोते जगते में
    मैं देखूँ ये सुन्दर सपना

    जय साईं राम

    Jai Sai Ram
    Sai teri "Kami" bhi hai, tera "Ehsaas" bhi hai....

    Sai tu "Door" bhi hai mujhse par "Paas" bhi hai......

    Khuda ne yun nwaza hai teri "Bhakti" se mujhko.....

    Kii.............

    Khuda ka "Shukr" bhi hai aur khud pe "Naaz" bhi hai..

    Offline saisewika

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    Re: बाबा की यह व्यथा
    « Reply #248 on: October 12, 2011, 04:52:25 PM »
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  • OM SAI RAM

    Thank You Saikripa.dimpleji

    sach me  aisa hi khayaal aata hai kai baar...........

    May Baba bless you always

    JAI SAI RAM

    Offline saisewika

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    Re: बाबा का निर्वाण दिवस-१
    « Reply #249 on: October 12, 2011, 04:54:44 PM »
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  • ॐ साईं राम


    समय॰॰॰॰॰॰॰ २॰३० दोपहर
    दिवस॰॰॰॰॰॰॰विजयादशमी १९१८
    स्थान॰॰॰॰॰॰॰शिरडी
    भाव॰॰॰॰॰॰॰॰॰सभी शिरडी वासियों के



    सीमोंल्लंघन करके साईं
    चले गए तुम आज
    ना मुडके देखा हमको
    ना तुमने दी आवाज़

    गरीबों का मसीहा
    दुखियों का था सहारा
    बस छोड गया देह को
    किया सबसे ही किनारा

    कितनी ही आँखें भीगी
    कितने ही प्राण छूटे
    कितने ही ख्वाब बिखरे
    कितने ही सपने टूटे

    ना चिडिया कोई चहकी
    ना फूल मुस्कुराए
    ग़मों के काले साऐ
    हर ज़िन्दगी पे छाए

    दसों दिशाऐं सिसकीं
    पृथ्वी का सीना काँपा
    दुनिया के हर ज़र्रे में
    दुखों का सागर व्यापा

    तुम चल दिए तो चल दिया
    दुनिया का नूर सारा
    चहूँ ओर ही फैला है
    कालरात्री का अँधियारा

    वो करुणामयी आँखे
    आशिश में उठा हाथ
    श्री चरणों की शरण वो
    उन सब का छूटा साथ

    वो भक्ति भाव लहरी
    हर हृदय में थी रहती
    शिरडी के हर कूचे में
    साईं नाम धुन थी बहती

    मस्जिद में गूँजता वो
    शँख नाद न्यारा
    हर पल धधकती धूनि
    प्रवचन वो प्यारा प्यारा

    कैसे जिऐंगे देवा
    तुम इतना तो बता दो
    तुम्हारे बिना जीने की
    तुम हमको ना सजा दो

    निवेदन है तुम्हीं से
    ये भक्ति भाव भीना
    ले जाओ हमें सँग में
    हमको नहीं है जीना

    जय साईं राम

    Offline saisewika

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    Re: विजयादशमी को महासमाधि
    « Reply #250 on: October 13, 2011, 01:52:28 PM »
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  • ॐ साईं राम


    साईं प्रभु जी हो गए
    महासमाधि में लीन
    अश्रुपूरित नयन लिए
    भक्त खडे बन दीन

    काल कराल आन खडा
    द्वारकामाई के द्वारे
    स्वयं प्रभु की आज्ञा हो तो
    यम भी कैसे टारे

    विजयादशमी का दिवस चुना
    महाप्रयाण के हेत
    परम ईश में प्रभु मिले
    साधन सभी समेट

    सावधान किया साईं ने
    भक्त जनों को आप
    अन्तस दानव मार कर
    हो जाओ निष्पाप


    मार सको तो मार दो
    अपनी "मैं" का रावण
    सदगुरू साईं की शिक्षा को
    कर लो हृदय में धारण

    भेदभाव की भेद कर
    मन में खडी दीवार
    मानव मानव से करे
    भातृवत अति प्यार

    काम क्रोध मद मत्सर लोभ
    वैर द्वेष कुविचार
    अहंकार सब त्याग कर
    क्षमा हृदय में धार

    यही दशहरा पर्व है
    दमन करो निज पाप
    दलो सभी विकार को
    बनो शुद्ध और पाक

    जय साईं राम

    Offline saisewika

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    Re:महासमाधि की ओर
    « Reply #251 on: October 14, 2011, 08:57:09 PM »
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  • ॐ साईं राम
     
     
    २८ सितम्बर १९१८ के दिन
    बाबाजी को ताप चढा
    मानों काल ने दस्तक दी
    दबे पाँव था काल बढा
     
     
    भक्तों के कष्टों को ढोते
    पावन काया जीर्ण हुई
    जन जन की व्याधि को ओढे
    दुर्बल काया क्षीण हुई
     
    महा निर्वाण के दिवस का आगम
    साईं नाथ ने भाँपा था
    किंतु भीष्ण और कटु सत्य को
    बडे जतन से ढाँपा था
     
    तो भी धर्म की प्रथा के हेतु
    श्री वझे को बुलवाया
    'राम विजय' का पाठ निरँतर
    चौदह दिन तक करवाया
     
    शाँत बैठ गए बाबाजी फिर
    आत्मस्थित हो मस्जिद में
    पूर्ण सचेत बाबा भक्तों को
    ढाँढस धैर्य देते थे
     
    १५ अक्टूबर निर्वाण दिवस को
    मध्याह्ण की आरती के बाद
    साईं देव भक्तों से बोले
    वाणी में भर प्रेम अगाध
     
    जाओ मेरे प्यारे भक्तों
    अपने अपने घर जाओ
    विश्राम करो कुछ देर और फिर
    भोजन कर वापिस आओ
     
    तत्पश्चात श्री बाबाजी ने
    लक्ष्मी शिंदे को बुलवाया
    बडे प्रेम से उनको देखा
    और श्री मुख से फरमाया
     
    बडे जतन औेर प्रेम भाव से
    तुमने की सेवा मेरी
    मुझको मालिक समझा, खुद को
    सदा कहा मेरी चेरी
     
    यह कह कर प्रभु प्यारे जी ने
    अपनी जेब में डाला हाथ
    नौ रुपये का महादान उसे
    दिया स्व आषिश के साथ
     
    कोई नहीं साईं सम सदगुरु
    उद्धारक और ईश महान
    नवधा भक्ति दे लक्षमी को
    देव किया उसका कल्याण
     
    तत्पश्चात दिया बाबा ने
    मानो भक्तों को आदेश
    वो अँतिम इच्छा थी उनकी
    और वही अँतिम सँदेश
     
    "मेरे प्यारे भक्तों मुझको
    तुमसे इतना कहना है
    दिल नहीं लगता मशिद में मेरा
    मुझे यहाँ नहीं रहना है"
     
    "बूटी के पत्थर वाडे में
    भक्तो मुझको ले जाओ
    सुख पाऊँगा वाडे में मैं
    तुम भी सँग सँग सुख पाओ"
     
    इतना कहते देवा की देह
    बयाजी पर झुक गई
    भूमँडल और पृथ्वी सारी
    मानों थम कर रुक गई
     
    दसों दिशाऐं मर्माहत हो
    चीत्कार करने लगी
    बाबा के प्यारों की आँखे
    झरने सम झरने लगीं
     
    हाहाकार मचा चहुँ ओर
    घर घर में मातम आया
    भक्तों के जीवन पर छाया
    दुखों का कलुषित साया
     
    देह को त्याग परम आत्मा
    परमात्मा में लीन हुई
    किंतु साईं कृपा दृष्टि से
    सँगत नहीं विहीन हुई
     
    उसी दिवस कृपालु भगवन
    दासगणु के सपने में आए
    देह त्याग सँदेश दिया और
    मधुर वचन ये फरमाए
     
    "सुँदर ताजे फूलों की माला
    गणु एक बना लो तुम
    शिरडी आकर मम शरीर पर
    स्वँय हाथ से डालो तुम"
     
    अगले दिन श्री बाबाजी ने
    मामा जोशी को स्वप्न दिया
    हाथ खींच कर उन्हें उठाया
    और फिर ये आदेश दिया
     
    "मृत ना समझो मुझको तुम
    शीघ्र मशिद में जाओ तुम
    धूप दीप का थाल सजाकर
    काँकण आरती गाओ तुम"
     
    पूजन अर्चन का क्रम ना टूटा
    सुँदर लीला थी साईं की
    बूटी वाडे में बनी समाधि
    साईं सर्व सहाई की
     
    शिरडी पावन धाम बन गया
    भक्तों का काशी काबा
    वहीं समाधि मँदिर में
    रहते हैं प्यारे बाबा
     
    जय साईं राम

    Offline saisewika

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    Re: बाबा की यह व्यथा
    « Reply #252 on: October 20, 2011, 09:59:25 AM »
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  • ॐ साईं राम


    कई बार ऐसा होता है
    बिलख बिलख कर दिल रोता है
    मैं ख़ुद पर ही झल्लाती हूँ
    मन मार कर रह जाती हूँ

    क्यूँ ना हो पाया ये साईं
    तुम ही कह दो सर्वसहाई
    जब तुम देह में थे हे दाता
    तब क्यूँ ना जन्मी मैं विधाता

    जो मैं शिर्डी वासी होती
    तुम्हें निरख कर हंसती रोती
    तव चरणों की रज मैं पाती
    दर्शन करते नहीं अघाती 

    सुप्रभात होती या रैन
    तक तक तुम्हें ना थकते नैन
    सरल साधारण सादा जीवन
    क्यूँ ना मिल पाया सहचर धन

    सुवचन नित्त सुनती तव मुख से
    जीवन कट जाता अति सुख से
    सुभक्तों की संगत पाकर
    धन्य धन्य हो जाती चाकर

    मैं भी तुमको चंवर ढुलाती
    अपनी किस्मत पर इतराती
    पश्चाताप बड़ा है भारी
    क्यूँ अब जन्मी साईं मुरारी

    काश मैं यंत्र ऐसा कोई पाऊँ
    समय चक्र को पुन: घुमाऊं
    आ पहुंचू मैं तेरे द्वारे
    साक्षात दर्शन हों न्यारे

    हाथ थाम लूँ साईं तेरा
    जनम सफल हो जाए मेरा


    जय साईं राम

    Offline saisewika

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    आभार
    « Reply #253 on: December 08, 2011, 01:17:48 PM »
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  • ॐ साईं राम


    हाथ जोड कर नमन करें
    देवा बारम्बार
    साईं नाम धन दान दे
    किया परम उपकार

    व्यक्त करें आभार हम
    चरणों में धर शीश
    धन्य धन्य चाकर हुए
    पाकर तुम सा ईश

    कुकर्मों से मुक्त किया
    काटे सारे बन्ध
    दुर्गुण अवगुण मेट कर
    पापाग्नि की मँद

    श्रद्दा और सबूरी का
    देकर अनुपम ज्ञान
    करी प्रकाशित आत्मा
    साईं नाथ भगवान

    अपने प्यारे भक्तों के
    सारे दोष निवार
    भक्ति पथ का पथिक बना
    कृपा करी अवतार

    कृतज्ञ रहें उस नाथ के
    जो परम मोक्ष का द्वार
    जिसका लक्ष्य एक था
    भक्तों का उद्धार

    अनुग्रहीत हमको किया
    देव पकड कर हाथ
    धन्यवाद करते तेरा
    चरणों पर रख माथ

    जन्म जन्म तक ऋणी रहें
    माने तव उपकार
    नख से शिख कृतार्थ हम
    तेरे अपरम्पार

    शुक्रगुज़ार रहें सदा
    श्रद्धा मन में धार
    रोम रोम इस काया का
    व्यक्त करे आभार

    जय साईं राम

    Offline saisewika

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    Re: नव वर्ष का निवेदन
    « Reply #254 on: January 02, 2012, 11:16:07 AM »
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  • ॐ साईं राम


    साईं नव वर्ष में हमको
    अनुपम ये उपहार दे दो
    मोह माया छूटे इस जग की
    आँचल भर कर प्यार दे दो

    जीवन का हर क्षण तुम ले लो
    भक्ति रस का सागर दे दो
    श्रद्धा और सबूरी भर लूँ
    दृढ निश्चय की गागर दे दो

    तृषित नेत्र शीतल हो जाऐं
    दर्शन प्यारा प्यारा दे दो
    किसी की आस ना हो इस मन में
    अपना एक सहारा दे दो

    अजपा जाप चले सदा भीतर
    साईं नाम धन दान दे दो
    आशा तृष्णा लोभ को मेटो
    सब्र शुक्र की खान दे दो

    अँतरमुख हो जाऐं स्वामी
    हमको ये वरदान दे दो
    बन्धन को पहचाने दाता
    विरक्त भाव का ज्ञान दे दो

    आसक्ति के भ्रम को तोडो
    मोक्ष प्राप्ति की इच्छा दे दो
    मुड मुड जीव ना आए धरा पर
    मुक्ति की शुभेच्छा दे दो


    जय साईं राम

     


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