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Author Topic: साईकथा का अचिंत्यदानी फल -जिस जिस पथ पर भक्त साई का वहां खडा है साई।  (Read 513 times)

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Offline suneeta_k

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हरि ॐ.
साईकथा  का अचिंत्यदानी फल -जिस जिस पथ पर भक्त साई का वहां खडा है साई।

ॐ कृपासिंधु श्रीसाईनाथाय़ नम: ।

श्रीसाईसचरित में साईकथा पढ्ते हुए हमें साईकथा को अपने जीवन में कितनी अहमियत देनी चाहिए, ये कथा पढकर हमें साईबाबा के पथ पर हमारे साईबाबा की उंगली थामकर कैसे चलना है, बिना किसी झिझक से, बिना किसी संदेह से ! इन बातों की तरफ गौर फर्माना अत्यंत आवश्यक है ।  हमें श्रीसाईसच्चरित में साईबाबा की कथाएं पढकर छोड नहीं देना है, या भूल नहीं जाना है । जब कोई भक्त साईनाथ की कथा श्रवण कर रहा होता है, उन कथाओं का पठन कर रहा होता है, उनका मनन, चिन्तन कर रहा होता है, साई प्रेम में अपनी सूध बूध खो बैठता है और सिर्फ साईबाबा को ही प्यार से निहारता है, साईबाबा की लीलाओं के रसपान में ही पूरी तरह डूब जाता है , पूरी तरह से तल्लीन हो जाता है, तो ऐसे समय उस भक्त को अपनी चिंता करने की जरूरी नहीं होती क्यों कि साईनाथ खुद अपने ऐसे भक्तों का ध्यान सदैव रखते ही हैं। हम सामान्य मानव ही, आगे क्या घटना घटित होने वाली है, हम इसके प्रति कुछ मालूम नहीं हो सकता ,परन्तु बाबा मात्र सबकुछ जानते हैं इसीलिए हम पर जब कोई संकट-मुसीबत आनेवाला होता है, तब हम साईकथा में, उनकी लीलाओं में खोये रहने के कारण स्वयं साईनाथ ही उस संकट को, उस मुसीबत को मुझ तक आने से पहले ही उस संकट का, मुसीबत का निवारण कर चुके होते हैं। उनकी योजना ही कुछ ऐसी होती है कि वह संकट अथवा मुसीबत हमें छू भी नहीं सकते हैं।


साईनाथ की इस भक्तवत्सलता के बारे में और उनकी बिना किसी हेतू से अपने भक्तों की भलाई ही करने के स्वभाव के बारे में कुछ अनोखी बातें पढने में आई , जिससे मेरे साईबाबा का मेरे प्रति कितना प्यार रहता है, हमेशा मेरी भलाई हो, मेरे रास्ते के मुसीबत मुझे जरा सी भी तकलीफ भी ना पहुचाए इसिलिए मेरे साईबाबा ही कितनी सभानता रखतें हैं , हमारे लिए हमारे साईबाबा के कितना परिश्रम करतें हैं ,कितनी कठोर मेहनत करतें हैं , इसका अंदाजा आया और साई के चरणो  के प्रति और जादा प्यार उमड आया । लेखक महोदयजीने अपने लेख में -
http://www.newscast-pratyaksha.com/hindi/shree-sai-satcharitra-adhyay2-part15/
 

इस बात को उजागर किया है भली भांति से कि -
मान लो की मेरी उपासना अथवा सेवा में उस समय इतनी शक्ती नही है कि उससे मेरे प्रारब्धभोग का समूल नाश हो सके, तब साईनाथ ऐसी योजना करते हैं कि, उस मुसीबत की घड़ी में मुझे हर प्रकार की सहायता अपने आप मिलते रहती है। लेखक जी ने रोजाना की जिंदगी में आनेवाली आकस्मिक मुसीबत के बारे में बताकर हमें बहुत ही सुंदरता से समझाया है कि मेरे साईबाबा कैसे हर पल मेरा साथ निभाते हैं ।  उस कथा को लेखकजी के जुबानी पढना, सुनना जादा मुनासिब रहेगा । इसिलिए आप सभी उपर दिए हुए लिंक पर जाकर उसें पढें ।

भले ही मेरे पास भक्ती का , उपास्ना का , सेवा का कोई भी पुण्य नहीं जुटा है , फिर भी ऐसा इंसान जब साईबाबा की चौखट पें अपना सिर रखता है, तभी साईबाबा उसे धुतकारतें नहीं, या वापस लौटातें नहीं , बल्कि अपनी  कृपा से उसके प्रारब्धभोग का समूल नाश कर देंते हैं और उसकी फटी झोली खुद ही  सिलाकर अपनी करूणा से, क्रुपा से भर देतें हैं ।  यही बात दिखलाती है भीमाजी पाटील की कथा ।     


अध्याय १३ में भीमाजी पाटील की कथा में हम यह बात अच्छी तरह देख सकतें हैं कि भीमाजी पहले सुखी जीवन बिता रहें हैं , उन्हें कोई दुख नहीं है,ना कोई परेशानी ।  घर में मानो सुख के भांडार भरें पडे है, पर उस समय भीमाजी को भगवान की याद नहीं आती । फिर यकायक उनके जीवन में क्षय की जानलेवा बीमारी आ जाती है। अनगिनत कोशिशों के बावजूद या दवा की कोशिशों के बावजूद  भीमाजी अपने जीने की आशा खो बैठतें हैं और तभी अचानक उन्हें अपने दोस्त नाना चांदोरकरजी की याद उन्हें खुद साईनाथ ही दिलातें हैं - यह है मेरे साईबाबा का अनोखा प्लान ! भीमाजी नाना चांदोरकरजी का खत पढतें ही साईबाबा को मिलाने शिरडी जातें हैं और करूणा के सागर, कृपासिंधु साईबाबा बिना किसी औषधी के सिर्फ अपनी कृपादृष्टी से ही भीमाजी को ठीक कर देतें हैं । रात में दो विचीत्र सपने में आकर साईबाबा इस बीमारी से उन्हें मुक्ती दिलातें हैं ।यहां हमें हमारी साईबाबा का अपने बच्चों के प्रति लगाव , और अनोखा प्यार समझ में आता है ।

यह हो गयी बीमारी या जानलेवा खतरे की बात । किंतु मेरा साईनाथ अगर मैं अपनी सुध्द-बुधा खोकर भक्ती करना चाहता है , तो वहां भी वो खडा रहता ही है, अपने बच्चे की सहायता के लिए तत्पर खडा रहत है, हाजिर रहता है । भले ही उसका वो बच्चा उसे अपनी मुसीबत की घडी में आवाज देकर, बुहार लगाकर, पुकार कर बुलाने में समर्थ ना हो , फिर भी साईनाथ अपने उस बच्चे का खयाल रखने के लिए वचनबध्द है ही -

 जिस जिस पथ पर भक्त साई का , वहां खडा है साई ।


अध्याय २२ में हेमाडपंतजी हमें अपने स्वंय का अनुभव सुनातें हैं कि वो काका दीक्षितजी के मकान पर रात को "रामकथा " का पाठ सुनने जातें हैं और रामकथा सुनने में इतने मगन होजाते है कि अपनी सुध -बुध खो बैठतें हैं । तब उनके दाहिने कांधे पर के उपरण में एक बिच्छू आकर बैठ जाता है। परन्तु रामकथा के चलते काफी समय  बितने के बावजूद भी बिच्छू वहाँ पर बैठे रहने पर भी वह उन्हें दंश नहीं कर सकता है। हेमाडपंत का ‘ध्यान(मन)’ पूर्णत: रामकथा सुनने में मगन  हो गया था, वह बिच्छू कब आकर उनके उपरण में बैठ गया इस बात पर उनका ध्यान भले ही न हो, परन्तु जो हरिकथा में दक्ष है उसकी ओर साईबाबा का पूरा ध्यान है। बाबा ही फ़िर समय रहते ही हेमाडपंत का ध्यान इस ओर आकर्षित करते हैं और उस संकट से उन्हें बचाते हैं। बिच्छू उनके उपरण में इतने समय तक बैठे रहने के बावजूद भी वह हेमाडपंत को दंश नहीं कर सका।   
हेमाडपंतजी यह बात बतातें हैं कि -
यहाँ पर भी बाबा का ध्यान। मेरा न था वहाँ पर ध्यान।
पर जो हरिकथा में दक्ष। उसके संरक्षक हरि स्वयंता॥


यह बात हमें सिखाती हैं -

मेरे साईबाबा की कथा मुझे  कैसा बिना सोचा हुआ - अचित्यदानी फल देती है और मेरे साईबाबा कैसे मेरे हर पल , हर कदम पर मेरे साथ है ही -१०८ % सच बात -
 जिस जिस पथ पर भक्त साई का वहां खडा है साई !!! 

ॐ साईराम .

धन्यवाद.

 


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