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Author Topic: आज का चिन्तन  (Read 162654 times)

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Offline Ramesh Ramnani

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Re: आज का चिन्तन
« Reply #90 on: August 14, 2007, 10:45:39 PM »
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  • जय सांई राम।।।

    देश की आजादी का आध्यात्मिक आजादी से क्या संबंध है?

    स्वतंत्रता दिवस के शुभ अवसर पर आप सबको मेरी हार्दिक शुभकामनाएँ

    भारत को स्वतंत्र हुए 60 वर्ष हो गए। यानी उम्र की परिपक्व अवस्था। यह जड़ों की ओर लौटने का समय है। आखिर इतने संघर्ष और कुर्बानियों के बाद जो राजनैतिक आजादी हमने पाई, उसका लाभ हमारे आध्यात्मिक और दार्शनिक जीवन को मिला?

    आजादी की नींव उसी समय पड़ जाती है जब कोई आजाद रूप से सोचना-विचारना शुरू करता है। स्वतंत्र और मौलिक चिंतन वाला मनुष्य कही-सुनी बातों को तर्क की कसौटी पर परखता है। वह अंधानुकरण नहीं करता। लकीर का फकीर नहीं बनता। अपने स्वतंत्र चिंतन के बल पर वह सीधा सार या निचोड़ को पाने की कोशिश करता है।

    स्वतंत्र चिंतन और तर्क, सच और झूठ की परख कराते हैं। स्वतंत्र चिंतन वाला मनुष्य सही-गलत की पहचान रखता है। उससे उपजी आध्यात्मिक प्रेरणा जीवन के महत्व का एहसास कराती है। वह सभी मनुष्यों का सम्मान करना सिखाती है और सभी जीवों के प्रति करुणा जगाती है। स्वतंत्र विचार व आध्यात्मिक चिंतन हमें जीवन के शाश्वत सत्य, सांसारिक जीवन की नश्वरता और मृत्यु का ज्ञान कराते हैं।

    जब हमें भौतिक वस्तुओं की नश्वरता का अहसास रहता है, दुखों का ज्ञान रहता है, कृत्रिम एवं आडम्बरपूर्ण उपलब्धियों की पहचान रहती है, तो वह स्वतंत्र चिंतन करने वाले नागरिक को मोह वासना से मुक्ति यानी मन की स्वतंत्रता की ओर ले जाती है।

    गीता में कहा गया है कि स्वाधीन अंत:करण वाला मनुष्य राग-द्वेष से रहित अपने वश में की हुई इन्द्रियों द्वारा विषयों को भोगता हुआ आंतरिक प्रसन्नता और निष्कलुष मन को प्राप्त होता है। वहाँ तो कर्मों के फल की कामना से भी मुक्ति की बात कही गई है।

    गांधी भी गीता के आसक्ति से मुक्ति के संदेश पर बल देते थे। और भगत सिंह भी एक जगह लिखते हैं- बिना किसी स्वार्थ के यहाँ या वहाँ के बाद पुरस्कार की इच्छा के बिना मैंने अनासक्त भाव से अपने जीवन को स्वतंत्रता के ध्येय पर समपिर्त कर दिया है। सभी स्वतंत्र महान विचारकों ने लालच, क्रोध, ईर्ष्या, द्वेष जैसे विचारों से मुक्ति पर बल दिया है, जो आध्यात्मिक मनोबल से ही संभव है। बौद्ध धर्म का भी यही संदेश है कि हर व्यक्ति बुरे विचारों से मुक्ति पाने के लिए मानसिक अभ्यास करे। जैन धर्म भी आत्मा की विकारों से मुक्ति पर बल देता है।

    कबीर ने भी यही कहा- कामी, क्रोधी, लालची इनसे भक्ति न होय। भक्ति करे कोई सूरमा, जाति वरन कुल खोय।।

    स्वतंत्र और उन्मुक्त चिंतन से उपजा सच का एहसास, सच व झूठ के बीच अंतर कर पाने की क्षमता, आध्यात्मिक चेतना से उत्पन्न सभी के जीवन का सम्मान और सभी जीवों के प्रति प्रेम व करुणा की भावना मनुष्य में समतापूर्ण दृष्टि विकसित करती है। यह समतापूर्ण दृष्टि ही स्वतंत्रता का आधार है। वास्तविकता स्वतंत्रता वहीं संभव है जहाँ सबको समान माना जाए, भेदभाव न हो।

    स्वतंत्रता में विश्वास रखने वाला मनुष्य शोषण, आधिपत्य, गुलामी और बंधनों से सबकी मुक्त चाहेगा और इसके लिए प्रयास करेगा। वह सभी के प्रति संवेदना रखेगा, सबको सम्मान की दृष्टि से देखेगा, सभी के कष्ट दूर करने का प्रयास करेगा। हमारी आजादी की लड़ाई ऐसे ही उदात्त उद्देश्यों वाले लोगों का वीरतापूर्ण संघर्ष रही है।

    स्वतंत्रता के लक्ष्य को समर्पित मनुष्य तभी अपने को स्वतंत्र मानेगा, जब अन्य जीव भी स्वतंत्र होंगे। उसके लिए स्वतंत्रता तभी मायने रखेगी जब अन्य लोग भी शोषण और अन्याय से मुक्ति पाएंगे। इस दृष्टि से देखा जाए तो स्वतंत्रता का संघर्ष आज भी जारी है। भगत सिंह ने यह आशा प्रकट की थी कि जिस दिन हमें ऐसे लोग मिलेंगे जो अपने जीवन को सिर्फ पीडि़त मानवता के उद्धार के लिए लगाएंगे, उसी दिन मुक्ति के युग का शुभारम्भ होगा।

    सबके लिए स्वतंत्रता, समता, न्याय लाने की यह जद्दोजहद आध्यात्मिक मनोबल पर टिकी है। यही मनोबल हमारे स्वतंत्रता सेनानियों की ताकत रहा है। यही हमारे लिए प्रेरणा है!

    अपना सांई प्यारा सांई सबसे न्यारा अपना सांई

    ॐ सांई राम।।।
    अपना साँई प्यारा साँई सबसे न्यारा अपना साँई - रमेश रमनानी

    Offline Ramesh Ramnani

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    Re: आज का चिन्तन
    « Reply #91 on: August 15, 2007, 09:01:45 PM »
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  • जय सांई राम।।।

    अन्दर की दौलत और बाहर की

    हर इंसान चाहता है कि उसकी जिंदगी सुख-चैन से भरी हो। बहुत से लोग सोचते हैं कि हमारे पास दौलत होगी, तो सारे दुख-दर्द दूर हो जाएंगे। सोचते हैं कि अगर हम अमीर हो गए तो हम जो चाहेंगे उसे पा सकेंगे। लेकिन जिनके पास सुख-चैन है, वे सब बाहर की दौलत के नहीं, बल्कि अन्दर की दौलत के मालिक हैं।

    एक दौलत बाहर की दुनिया की है- वह दौलत, जिसके द्वारा हम दुनिया की चीजें और दुनिया का सुख-चैन पाने की कोशिश करते हैं। ज्यादातर लोग इसे ही असली दौलत समझते हैं। पर एक दूसरी दौलत भी है, वह अंदरूनी दौलत है। वह दौलत जो संतों-महात्माओं के पास होती है। वह दौलत, जिसे पाकर जिंदगी में न कोई दर्द रहता है, न कोई गम।

    संत रविदास जूते बनाने का काम करते थे। वे संतों-महात्माओं को बड़े आदर भाव से मिलते थे और उनकी सेवा किया करते थे। एक संत उनके व्यवहार से बहुत खुश हुए। जब जाने लगे तो रविदास को एक पारस पत्थर दिया। उसका महत्व बताने के लिए उन्होंने पत्थर को रविदास जी के जूते गांठने वाले लोहे के सुए से छुआ दिया। वह सोने का बन गया। रविदास ने कहा कि अब मैं जूते किससे बनाऊँगा? संत ने कहा कि क्या जरूरत है? जब भी पैसे चाहिए हों, इसको किसी लोहे से लगा देना, वह सोना बन जाएगा। रविदास ना-नुकुर करने लगे, लेकिन संत ने बड़ा जोर डाला। उन्होंने पत्थर झोपड़ी के धरन में खोंस दिया और कहा कि आप इससे साग-सत्तू का इंतजाम करो या मंदिर बनवाओ, जो जी चाहे करो। मैं खुश हूँ, इसलिए दिए जा रहा हूँ।

    समय गुजरता गया। एक साल बाद संत जी फिर उसी राह से गुजरे और फिर वही कुटिया देखी तो जिज्ञासा से पहुँचे। रविदास ने फिर पहले की ही तरह बड़े आदर भाव से उनकी सेवा की। संत ने पूछा, तुम अभी तक इसी कुटिया में बैठे हो? मैं तो तुम्हें पारस पत्थर दे कर गया था। सोचा कि अब यहाँ बहुत बड़ा मंदिर होगा। पर तुम तो अब भी जूते ही बना रहे हो। रविदास ने कहा, अगर मैं उस पत्थर का इस्तेमाल करता रहता तो, जो समय मुझे अन्दर की दौलत पाने के लिए मिला था, वह निकल जाता। पत्थर जहाँ छप्पर पर आप रख कर गए थे वहीं पड़ा है।

    जिन्हें अन्दर की दौलत मिली होती है उनका नजरिया बदल जाता है। अन्दर की दौलत अपने आपको जानने में है। ज्यादातर लोग सोचते हैं कि हम अकेले हैं, हम सबसे अलग हैं, मुसीबतों ने हमें घेर लिया है, हमें कोई सहारा नहीं मिल रहा। इसीलिए हम में से ज्यादातर लोग दुखी हो जाते हैं।

    जब हम छोटे होते हैं तो जहाँ भी रहते हैं, वहाँ हमारे अनेक दोस्त बन जाते हैं। हम उनसे मिलते हैं, उनके साथ खेलते हैं। पर बाद में कोई उधर चला जाता है, कोई इधर रह जाता है। जिंदगी में भी कई बदलाव आने शुरू हो जाते हैं। अगर माँ-बाप की मृत्यु हो गई तो संपत्ति का बंटवारा होता है, उसमें किसी को लगता है कि मुझे कम मिला है तो झगड़े होने शुरू हो जाते हैं। जब हम काम पर जाते हैं तो लगता है हमारी काबिलियत की कोई कद्र नहीं हो रही। उससे हमें खुशियां नहीं मिलतीं।

    हम में से हर एक को रोजाना चौबीस घंटे ही मिलते हैं, किसी को पच्चीस या तेईस नहीं मिलते। हम उन चौबीस घंटों का इस्तेमाल किस तरह करते हैं, उस पर निर्भर रहता है कि हमारी जिंदगी कैसी है। हम में से ज्यादातर की जिंदगी में वैसे ही घर-परिवार, दुख-सुख और गृहस्थ जीवन के लफड़े होते हैं। इसीलिए महापुरुष समझाते हैं कि अन्दर की ओर ध्यान करो। अगर यह अनुभव कर लिया कि हम में से हर एक प्रभु का अंश है, तो फिर जिंदगी सुख- चैन और खुशी से ही गुजरेगी। 

    अपना सांई प्यारा सांई सबसे न्यारा अपना सांई

    ॐ सांई राम।।।
    अपना साँई प्यारा साँई सबसे न्यारा अपना साँई - रमेश रमनानी

    Offline Ramesh Ramnani

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    Re: आज का चिन्तन
    « Reply #92 on: August 17, 2007, 11:52:06 PM »
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  • जय सांई राम।।।

    जरूरत है आत्मविश्वास की

    कोई कहता है- अगर अंगूठी पहन लोगे, तो लक्ष्मी तुम्हारे घर आ जाएगी। और आदमी अंगूठी पहन लेता है तो उसका थोड़ा सा आत्मविश्वास बढ़ जाता है। वह कहता है, हां इस अंगूठी के कारण यह काम हुआ है। परन्तु अंगूठी के कारण नहीं हुआ। क्योंकि अंगूठी तो अंगूठी है। यदि अंगूठी पहनने से लक्ष्मी घर में आ जाती तो अंगूठी बेचने वाला खुद ही न पहन ले? उसे बेचने की क्या जरूरत है? हर एक उंगली में पहन ले, पैर की उंगली में भी पहन ले और मालामाल हो जाए। परन्तु ऐसा होता नहीं हैं।

    अंगूठी में जो हीरा-पन्ना लगाते हैं, वह खुद ही अपने आप जमीन से बाहर नहीं निकल पाता। मिट्टी के नीचे सदियों तक दबा रहता है, फिर उसे कोई पत्थरों को तोड़ कर बाहर निकालता है। ये एक समय क्या था? वह कोयला था, प्रकृति और समय के दबाव ने उसे हीरा बना दिया। अरे, जब वह खुद ही अपने आप का कुछ नहीं कर सकता, तुम्हारा क्या करेगा? परंतु बात है आत्मविश्वास की! आत्मबल चाहिए मनुष्य को। छोटे से छोटे से आदमी को यदि थोड़ा सा आलम्बन मिल जाए- क्योंकि असफल व्यक्ति को, कमजोर आदमी को सारा संसार कहता है कि तू किसी काम का नहीं है। तू लख चौरासी जाएगा। तू पापी है, तू दुष्ट है।

    पर मैं नहीं कहता लोगों से कि तुम दुष्ट हो। मैं नहीं कहता हूँ लोगों से कि तुम पापी हो। मैं कहता हूँ कि तुम को भगवान ने बनाया है। मुस्कुराओ। ये काया जो तुम को दी है, ये भगवान ने दी है। जैसी भी दी है, उसने दी है। मुस्कुराओ कि भगवान ने तुम पर इतनी कृपा की है। तुम भगवान के बनाए हुए आशीर्वाद हो। तुम को किसी ऐरे-गैरे नत्थू खैरे ने नहीं बनाया है।

    उसी बनाने वाले ने आपके अंदर आनंद प्राप्ति की एक चाह डाली है। अगर सारी कामनाएं पूरी हो जाएं, तो भी मनुष्य के अंदर एक प्यास हमेशा बनी रहती है। एक शाश्वत चाह कि वह अपने जीवन को सफल करे। इस संसार के अंदर अनगिनत बीज हैं। आपके अंदर भी एक बीज है। अपने जीवन को सफल करने का बीज आपके अंदर है। जब ज्ञान की बारिश होगी आपके जीवन में, तो वो बीज उपजेगा और यह जीवन सफल होगा।

    दुनिया के लोग एक-दूसरे को पहचानने के लिए तैयार हो जाते हैं। एक-दूसरे का नाम क्या है, उसके लिए लोग एड्रेस बुक बनाते हैं। तो एड्रेस बुक में क्या लिखा जाता है? सब लोगों का नाम व पता। परंतु अपना क्या पता है? अपना क्या नाम है? क्या नाम था उस समय जब किसी भी प्रकार का होश नहीं था, जब आँखें बंद थी और सांस चल रही थी? सब कुछ होने के बावजूद एक नाम था। जिस दिन दुनिया से चले जाओगे, वह नाम भी खत्म हो जाएगा। फिर भी कोई चीज तो रहेगी? वह चीज क्या है? वह चीज जो तुम्हारे आने के पहले भी थी और तुम्हारे जाने के बाद भी रहेगी। वह आज भी हम सब के अंदर विराजमान है, जिसका कोई पता नहीं है, सिर्फ हृदय को ही उसका पता है। उसका वर्णन किताबों में नहीं मिलेगा। वह चीज है अनुभव करने की।

    अनुभव क्या चीज होती है? जैसे रोटी बनाने के लिए जब तवा आग पर रखते हैं, तो वह गरम हुआ या नहीं, यह जानने के लिए उसे छूते हैं। जल्दी से छूते हैं तो पता लग जाता है। इतनी सरल बात है परमानंद के अनुभव की, जो सब जगह व्याप्त है, वह तुम्हारे हृदय में भी व्याप्त है।

    अपने अंदर जो परमपिता है उसका दर्शन करो। कहा है- घट में है सूझे नहीं, लानत ऐसी जिद। जिस चीज की तुमको खोज है, वह तुम्हारे अंदर है और जब इस चीज का अनुभव हो जाएगा, तब सच्चे मायने में आत्मविश्वास की नींव मजबूत होगी जो कि बहुत जरूरी है और फिर किसी भी प्रकार की अंगूठी पहनने की जरूरत नहीं रहेगी। 

    अपना सांई प्यारा सांई सबसे न्यारा अपना सांई

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    अपना साँई प्यारा साँई सबसे न्यारा अपना साँई - रमेश रमनानी

    Offline Ramesh Ramnani

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    Re: आज का चिन्तन
    « Reply #93 on: August 20, 2007, 09:07:42 AM »
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  • जय सांई राम।।।

    देवराज इन्द्र ने कहा- चलते रहो, चलते रहो  

    (देवराज इंद्र द्वारा राजा हरिश्चन्द्र के पुत्र रोहित को उपदेश के रुप में संस्कृत में दिए गये श्लोक का हिंदी में अर्थ )

    श्रम से थककर चूर हुए बिना किसी को धन संपदा प्राप्त नहीं होती। बैठे-बिठाये पुरुष को पाप धर दबोच लेता है। इंद्र उसी का मित्र है, जो चलता रहता है-थककर, निराश होकर बैठ नहीं जाता। इसीलिये चलते रहो।

    जो व्यक्ति चलता रहता है उसकी पिंडलियाँ (जांघें) फल देतीं हैं (अन्य लोगों से उसको सेवा प्राप्त होती हैं)। उसकी आत्मा वृद्धिगंत होकर आरोगयादी फल की भागी होती है तथा धर्मार्थ प्रभासादी तीर्थों में सतत चलने वाले के अपराध और पाप थककर सो जाते हैं, अंतत: चलते रहो।

    बैठने वाले की किस्मत बैठ जाती है और चलने वाले का भाग्य उतरोत्तर चमकने लग जाता है। अत: चलते रहो।

    सोने वाला पुरुष मानो कलियुग में सोता है, अंगडाई लेने वाला व्यक्ति द्वापर में और उठकर खड़ा हुआ व्यक्ति त्रेता में पहुंच जाता है। आशा और उत्साह के साथ अपने निश्चित मार्ग पर चलने वाले व्यक्ति के सामने सतयुग उपस्थित हो जाता है, अंतत: चलते रहो।

    उठकर कमर कसकर चल पड़ने वाले पुरुष को ही मधु मिलता है। निरन्तर चलता हुआ व्यक्ति ही फलों का आनन्द प्राप्त करता है; सूर्यदेव को देखो सतत चलते रहते हैं, क्षणभर भी आलस्य नहीं करते। इसलिये जीवन में भौतिक और आध्यात्मिक मार्ग के पथिक को चाहिए कि बाधाओं से संघर्ष करता हुआ चलता ही रहे,आगे बढ़ता ही रहे।

    अपना सांई प्यारा सांई सबसे न्यारा अपना सांई

    ॐ सांई राम।।।
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    Offline POOJA LOHANI

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    Re: आज का चिन्तन
    « Reply #94 on: August 20, 2007, 11:19:37 PM »
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  • some beautiful thoughts very nicely put........actually this spirit of care,concern & cooperation is the need of the hour in our families ,societies & country as a whole...
                                                                                God bless
                                                                                        om sai ram
                                                                                                         pooja

    Offline Ramesh Ramnani

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    Re: आज का चिन्तन
    « Reply #95 on: August 23, 2007, 09:23:21 PM »
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  • जय सांई राम।।।

    मन को मुक्त करने वाले कर्म करें

    कभी सोचा ईश्वर जीव से क्या चाहते हैं? वे जीव से चाहते हैं कि बस तू मेरा हो जा। भक्त, दुश्मन, प्रेमी, सखा, भाई, शिष्य- जो रिश्ता तू रखना चाहे, रख, लेकिन तू मेरा हो जा। कहने का तात्पर्य यह है कि आपका हर कर्म भगवान से जुड़ा हुआ होना चाहिए। संसार में जो भी करो, भगवान से ही युक्त होकर करो।

    हमारा कर्म ऐसा यज्ञ कब बनेगा? इसके लिए तीन बातें ध्यान में रखनी पड़ेंगी। इन तीनों को यदि आचरण में लाते हैं, तो हमारा प्रत्येक कर्म यज्ञ बन जाएगा। पहली बात है तदर्थ कर्म। तदर्थ कर्म का अर्थ है भगवान के निमित्त कर्म। इसका मतलब यह हुआ कि जो भी कर्म तुम करने जा रहे हो, उससे पहले जरा सोचो कि क्या मेरा यह कर्म भगवान को प्रसन्न करने वाला है? इस कर्म से भगवान प्रसन्न होंगे- ऐसी श्रद्धा जब मन में जगे, तब ही वह कर्म करो, वरना मत करो।

    जब तुम पूजा में बैठते हो या यज्ञ में बैठते हो तब तुम्हारे हाथ में पंडित जी जल, अक्षत, फूल रखते हैं, फिर संकल्प कराया जाता है। आरंभ में ही पंडित जी तीन बार भगवान के नाम का उच्चारण करते हैं। तीन बार भगवान के नाम का उच्चारण क्यों करते हैं? वह इसलिए कि पूजा अथवा यज्ञ करने जा रहे हो, उससे पहले ईश्वर को याद करके उनके लिए कर्म करो। जो भी कर्म अपने हाथ से हम करना प्रारंभ करेंगे, उसमें 'ईश्वर के लिए मेरा यह संकल्प है' ऐसी इच्छा मन में जगनी चाहिए।

    तुम यह क्यों भूलते हो कि यह सृष्टि भी भगवान का एक यज्ञ है। उसका आरंभ भगवान के संकल्प से हुआ है। कौन सा संकल्प? मैं एक हूं, मैं अनेक हो जाऊँ। संकल्प जितना श्रेष्ठ होगा, कर्म उतना ही श्रेष्ठ होगा। यदि संकल्प मलिन है, तो कर्म भी मलिन होगा और वह मलिन कर्म पतन की ओर ले जाएगा। यह संकल्प कहां से उठता है? और यह करने वाला कौन है? कहते हैं संकल्प मन से उठता है। फिर सवाल उठता है कि संकल्प कैसा है? उत्तम है? श्रेष्ठ है? या बुरा संकल्प है? इसका आधार तुम्हारा मन है।

    इसलिए मन शुद्ध होना चाहिए। अब मजे की बात तो यह है कि सत्कर्म करते करते ही मन शुद्ध होता है। यदि मन में मलिनता है, तो संकल्प भी मलिन होगा। मन में मलिन संकल्प जागेगा तो इस संकल्प को पूर्ण करने के लिए दिमाग लगाना पड़ेगा और वह दिमाग गलत रास्ते पर जाता है। उसके अनुसार तुम कर्म करते हो, तो तुम्हारा कर्म भी मलिन हो जाएगा। फिर वह कर्म, यज्ञ नहीं होगा। वह तुम्हें पतन की ओर ले जाएगा, तुम्हें दुखी करेगा। इसलिए कर्म करने में ज्यादा महत्वपूर्ण हिस्सा मन का है। इसलिए शास्त्रों में भी कहा गया है कि बंधन और मुक्ति का मुख्य कारण मन है।

    तुम्हारा मन ही तुम्हें मुक्त करता है। मन ही तुम्हें बंधन में बांधता है। इसलिए शास्त्र के बताए मार्ग पर चलना ही शास्त्रोक्त कर्म है। तुम पूजा करो, नित्य पाठ करो, माला जपो, स्वाध्याय करो- ये शास्त्र विहित कर्म हैं। मनुष्य के लिए शास्त्र विहित पांच प्रकार के यज्ञ हैं, जिन्हें पंचयज्ञ कहते हैं। इनके अतिरिक्त जो कर्म हैं, वही तुम्हें बांधेंगे। पंचयज्ञ में प्रथम है ब्रह्मयज्ञ, दूसरा है देवयज्ञ, तीसरा है मनुष्य यज्ञ, चौथा है पितृयज्ञ और पांचवां है भूतयज्ञ। नित्य ये पांचों यज्ञ करना प्रत्येक गृहस्थ का कर्तव्य है।

    अब कर्म के भी तीन प्रकार हैं। एक है नित्यकर्म, दूसरा है नैमित्तिक कर्म, तीसरा है निषेध कर्म। जो कर्तव्य कर्म है, वह करना चाहिए। जो निषेध कर्म है, वह नहीं करना चाहिए। इन कर्मों से बचना चाहिए। निषेध कर्म करोगे, तो दोष लगेगा। नहीं करोगे तो दोष से बच जाओगे। तो फिर कर्तव्य कर्म क्या है? जिसको न करने से दोष लगता है, करोगे तो बहुत बड़ा पुण्य होने वाला हो- यह बात नहीं है, लेकिन नहीं करोगे तो पाप जरूर लगेगा। इसको नहीं करने से पाप लगता है और करने से पुण्य नहीं होता है, ऐसा क्यों? क्योंकि यह तो तुम्हारा कर्तव्य ही है। जैसे मां-बाप की सेवा करना कर्तव्य है। तुम नहीं करोगे तो तुम्हें पाप लगेगा, करते हो तो तुम्हारा फर्ज ही है। 

    अपना सांई प्यारा सांई सबसे न्यारा अपना सांई

    ॐ सांई राम।।।
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    Re: आज का चिन्तन
    « Reply #96 on: August 23, 2007, 10:08:39 PM »
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  • ॐ सांई राम~~~

    भूल~~~

    बात बहुत पुरानी है , जब सुन्दरता और कुरूपता दो बहनें हुआ करती थी ।एक दिन दोनों अपने अपने कपड़े किनारे पर रख कर एक नदी में स्नान कर रही थी । तैरते -तैरते थक जाने पर कुरूपताजल्दी ही किनारे पर आ गई और अपनी बहन सुन्दरता के वस्त्र पहन कर वहाँ से चलती बनी ।

    थोड़ी देर बाद जब सुन्दरता नदी से बाहर आई तो उसने पाया कि उसके कपड़े गायब हैं।वह कुरूपता की चालाकी समझ गई पर अब उसके सामने कोई और चारा नहीं था। लाचार हो कर तन ढ़ाकने के लिए उसने अपनी बहन कुरूपता के कपड़े पहन लिए और घर की ओर चल दी ।

    इस घटना को घटित हुए आज हज़ारों साल भीत चुके हैं । इतना समय बीत जाने के बाद भी संसार के अधिकतर लोग केवल वस्त्रों के आधार पर सुन्दरता को कुरूपता और कुरूपता को सुन्दरता समझने की भूल आज भी किए जा रहें है तथा उन्हें वास्तविक सुन्दरता एवं कुरूपता का बोध नहीं रहा ।


    जय सांई राम~~~
    "लोका समस्ता सुखिनो भवन्तुः
    ॐ शन्तिः शन्तिः शन्तिः"

    " Loka Samasta Sukino Bhavantu
    Aum ShantiH ShantiH ShantiH"~~~

    May all the worlds be happy. May all the beings be happy.
    May none suffer from grief or sorrow. May peace be to all~~~

    Offline Ramesh Ramnani

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    Re: आज का चिन्तन
    « Reply #97 on: August 28, 2007, 11:09:34 PM »
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  • JAI SAI RAM!!!

    I have read that if flies are placed in a jar with air holes in the lid, they will fly around frantically, banging into the lid, desperately trying to escape from their prison. If left there long enough, eventually they will stop hitting the lid. Later, if the lid is removed, they won't even try to escape. Somehow they have been conditioned "to feel and believe" that there is no escape. They just keep circling in the cramped jar.

    Many people are like this. Somewhere in their past, through a frightening and traumatic experience, such as being raped, sexually, physically, or emotionally abused or rejected as a child, they have been conditioned to believe at an unconscious level that they, too, are trapped and that there is no way out of their dilemma. And they end up going in circles with their life and/or relationships.

    To be freed from this endless cycle of defeat, those of us who have been abused need the healing touch of BABA SAI—and want it with all of our heart. As a general rule BABA uses other people to bring this healing. It begins with acknowledging our problem (often best detected by the symptoms we experience), genuinely wanting to be healed, being willing to face the agony of confronting these painful memories and damaged emotions, and getting the help we need (qualified counseling is often needed).

    Dear BABA...
    thank you...
    that you care about ...
    my pain...
    and where I have been hurt...
    in my past....
    In many ways...
    my life is in chaos...
    and I have failed....
    miserably ...
    in my closest relationships....

    Please give me...
    the courage...
    to face...
    any and all painful memories...
    connect to them ...
    and bring them ...
    to the light ....
    for your healing....

    Please lead me ...
    to the help ....
    I need ....
    whatever that may be....
     
    Dear BABA Thank you for hearing and answering my prayer.

    OM SAI RAM!!!
    अपना साँई प्यारा साँई सबसे न्यारा अपना साँई - रमेश रमनानी

    Offline tana

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      • Sai Baba
    Re: आज का चिन्तन
    « Reply #98 on: August 30, 2007, 02:13:43 AM »
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  • ॐ सांई राम~~~


    धर्ममार्ग: जीवन का उद्देश्य


    प्रत्येक व्यक्ति के जीवन केउद्देश्य और उसके प्रति दृष्टिकोण में भिन्नता होती है। एक व्यक्ति के जीवन का उद्देश्य धनार्जन के लिए संघर्ष करना है वहीं दूसरे व्यक्ति का उद्देश्य यश और प्रतिष्ठा को प्राप्त करना है। लाखों व्यक्ति ऐसे है जो अपने संपूर्ण जीवन की दो तिहाई उम्र दोनों समय का भरपेट भोजन जुटा पाने के लिए संघर्ष करते हुए व्यतीत कर देते है। ऐसे व्यक्तियों के जीवन का उद्देश्य अपना और अपने परिवार का अस्तित्व बनाए रखने के लिए भोजन प्राप्त करना होता है। ऐसे व्यक्तियों के मन, शरीर और आत्मा की अपारशक्ति और विवेक अंत में अर्थहीन जीवन के साथ समाप्त हो जाता है। कुछ व्यक्ति धनी बनने की स्पर्धा में अपना समय और क्षमता नष्ट कर देते है। उनके पास जलपान और भोजन के लिए भी समय नहीं बचता। उनमें से कुछ तो ऐसे व्यक्ति भी होते है जो घर से जाते और आते समय बच्चों को सोता ही पाते है। लोग धन तो बहुत अíजत कर लेते है, किंतु उसका पूरा उपभोग किए बिना ही संसार से विदा हो जाते है। यद्यपि उनका जीवन प्रशंसनीय होता है।

    प्रत्येक व्यक्ति के चिंतन का प्रभाव उसकी जीवन-शैली को निर्धारित करता है। यदि भोग ही जीवन का उद्देश्य है तो फिर इतने कष्ट क्यों? इतनी प्राकृतिक विपदाएं और विविध रोग क्यों? भारतभूमि वह भूमि है, जहां धन से अधिक धर्म का और भोग से अधिक योग का महत्व है। भारतीय धारणा के अनुसार जीवन का अर्थ निरंतर संघर्ष ही है। यह संघर्ष व्यक्ति केवल अपने लिए नहीं करता, वरन् दूसरों के सुख की भी चिंता करता है। यदि व्यक्ति नदी तैरकर जा सकता है तो वह पुल बनाने की आवश्यकता अनुभव नहीं करेगा, लेकिन वह पुल बनाने की कला का प्रदर्शन करते हुए दूसरों को लाभ पहुंचाना चाहता है। ईश्वर का सृष्टि की रचना के पीछे मानव-कल्याण के महान उद्देश्य की पूíत करना है। प्रत्येक व्यक्ति और मानवता के अस्तित्व का उद्देश्य किसी-न-किसी महान लक्ष्य को प्राप्त करना है। भारतीय दर्शन के अनुसार मनुष्य की शारीरिक और मानसिक उन्नति उसकी आध्यात्मिक प्रगति पर ही आधारित है। यही उसके जीवन के शाश्वत सत्य का पथ है।


    जय सांई राम~~~
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    Offline Ramesh Ramnani

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    Re: आज का चिन्तन
    « Reply #99 on: August 31, 2007, 01:16:17 AM »
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  • JAI SAI RAM!!!

    THINK ABOUT IT......

    THE MAN WHO WILLED HIMSELF TO DIE


    There was a man who worked for the railroad. One day as he went into the freezer compartment to do his routine work, the door accidentally closed and he found himself trapped in the compartment. He shouted for help but no one heard him since it was past midnight. He tried to break down the door but he could not. As he lay in the freezer compartment, he began to feel colder, and colder. Then he began to feel weaker, and weaker, and he wrote on the wall of the compartment, "I am feeling colder, and colder; and I am getting weaker, and weaker. I am dying, and this may be my last words". In the morning when the other workers opened up the compartment they found him dead. The sad twist to the above story is that the freezing apparatus in the compartment had broke down a few days earlier. The poor worker did not know about the damaged freezing apparatus and in his mind the freezing apparatus was working perfectly. He felt cold, got weaker and literally willed himself to die.

    Our sub-conscious mind can be cheated. The sub-conscious mind can only accept and act on information passed to it by the conscious mind. It has no capacity to reject or decline any instructions or information passed to it by the conscious mind. In the case of the poor worker, he consciously thought that he was getting colder, weaker and dying and the sub-conscious mind accepted the above instructions and affected his physical body. That was how he willed himself to die.

    "Every now and then go away, have a little relaxation, for when you come back to your work your judgment will be surer. Go some distance away because then the work appears smaller and more of it can be taken in at a glance and a lack of harmony and proportion is more readily seen."


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    Offline Ramesh Ramnani

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    Re: आज का चिन्तन
    « Reply #100 on: September 18, 2007, 10:18:31 AM »
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    नींद और जागरण

    आनंद कई दिनों से पूछना चाह रहे थे। बुद्ध के साथ वह निरंतर यात्रा पर थे और रात्रि विश्राम के समय उनके बगल में ही सोया करते थे। सुबह बुद्ध की आंखें खुलीं तो आनंद के मुख पर उत्सुकता और हैरानी के भाव देखकर मुस्करा उठे। आखिरकार आनंद ने पूछ ही लिया, “भगवन, मैं सोते समय रोज देखता हूं आपको। मेरी नींद रात में कई बार उचटती है और आप पर निगाह जाती है। मैं बार-बार करवटें बदलता रहता हूं। लेकिन आप जिस मुद्रा, जिस करवट में सोते हैं, उसी करवट, उसी मुद्रा में ही सुबह जगते हैं। बीच में एक बार भी आप की नींद नहीं उचटती, न ही आप कभी करवट बदलते हैं।” बुद्ध बोले, “मैं जब सोता हूं तो पूरी तरह सो जाता हूं। मेरे शरीर और किसी अंग को हिलने या करवट बदलने की अनुमति नहीं होती। मन नींद में पूरी तरह से शांत और शून्य रहता है।”

    शरीर और मन नींद में भी, पूरी तरह से काबू में रहे, यही तो बुद्धत्व है। बुद्धत्व एक क्षण की अनुभूति नहीं है। यह हर क्षण का साक्षीभाव है। यह पूर्ण जागरण की अवस्था है। जो सोते समय पूरी तरह सो जाता हो, वही जागते समय पूरी तरह जगा रह सकता है। ऐसा ही व्यक्ति बुद्धत्व को उपलब्ध हो सकता है।

    कुछ क्षणों के लिए तो बहुत-से लोग बुद्ध बन सकते हैं, लेकिन बुद्धत्व के स्थायी स्वभाव में प्रतिष्ठित हो पाना, स्थितप्रज्ञ बनना अत्यंत कठिन है। बड़े से बड़े सिद्ध- तपस्वी, ऋषि-मुनि, महात्मा-संत विचलित, क्रोधित, पतित और शापित होते देखे गए हैं। लेकिन सहजता, संतुलन और साक्षीभाव को सदैव कायम रख पाना केवल बुद्ध के लिए ही संभव है। यह रास्ता छुरे की धार पर चलने जितना कठिन है। यह निरंतर अभ्यास से ही सिद्ध होता है।

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    Re: आज का चिन्तन
    « Reply #101 on: September 21, 2007, 06:25:16 AM »
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    जीवन में प्रेम भाव रखना जरूरी~~~


     धर्म का पालन करने का सबसे सरल और आसान रास्ता है दूसरे व्यक्तियों के साथ वैसा व्यवहार करना चाहिए जैसा तुम दूसरों से अपने लिए अपेक्षा करते हो। किसी को मान-सम्मान देकर ही हम अपने लिए इज्जत अर्जित कर सकते हैं। दुनिया में आपसी प्रेमभाव के साथ रहकर ही वातावरण को सुखमय बनाया जा सकता है। दूसरों को सुख पहुंचाकर ही मनुष्य को सुख मिलता है। सभी लोग प्यार और सम्मान चाहते हैं, प्यार और सम्मान किसी से जबरदस्ती नहीं लिया जा सकता है दूसरों को सम्मान और प्यार देकर ही उनसे प्यार प्राप्त किया जा सकता है।

     प्रत्येक जीव प्यार का भूखा है। प्यार के दो बोल आदमी के जीवन की धारा को बदल देने में कामयाब हो जाते हैं। सृष्टि के आदि शासक मनु महाराज से उनके समकालीन ऋषियों ने कहा कि हम धर्म के विषय पर चर्चा करते हुए एक गुत्थी में उलझ कर रह गए हैं। आप इस गुत्थी को सुलझाने में हमारी मदद करें। मनु महाराज ने उनकी समस्या जाननी चाही तो ऋषियों ने कहा कि मनुष्य को धर्म का पालन करने के लिए क्या करना चाहिए। महर्षि मनु ने उनकी समस्या का समाधान करते हुए बताया कि मनुष्य धर्म का पालन करने के लिए सभी प्राणियों के साथ वैसा ही व्यवहार करना चाहिए जैसा तुम अपने साथ चाहते हो। दूसरों को दुख देने वाला व्यक्ति कभी सुखी नहीं रह सकता है।

     पशु-पक्षी भी प्यार की भाषा को समझते हैं प्यार के सहारे भयंकर से भयंकर हिंसक पशु को भी अपने वश में किया जा सकता है। दुनिया में ऐसे कई उदाहरण हैं कि शेर और चीते जैसे हिंसक प्राणियों को निहत्थे मनुष्य ने अपना कहना मानने पर मजबूर कर दिया। दुनिया में प्यार के बल पर कठिन से कठिन कार्य को भी मिनटों में किया जा सकता है, जो लोग ताकत के बलबूते पर अपने काम कराना चाहते हैं उन्हें ताकत कम हो जाने पर बहुत कष्ट झेलने पडते हैं।
     
    जय सांई राम~~~
    « Last Edit: September 21, 2007, 07:03:59 AM by tana »
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    Offline Ramesh Ramnani

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    Re: आज का चिन्तन
    « Reply #102 on: September 30, 2007, 12:41:57 AM »
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    देखा देखी भक्ति

    देखा देखी भक्ति का, कबहूँ न चढ़सी रंग
    विपत्ति पडे यों छाड्सी, केचुली तजत भुजंग


    देखा-देखी की हुई भक्ति का रंग कभी भी आदमी पर नहीं चढ़ता और कभी उसके मन में स्थायी भाव नहीं बन पाता। जैसे ही कोई संकट या बाधा उत्पन्न होती है आदमी अपनी उस दिखावटी भक्ति को छोड़ देता है। वैसे ही जैसे समय आने पर सांप अपने शरीर से केंचुली का त्याग कर देता है।

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    Re: आज का चिन्तन
    « Reply #103 on: October 05, 2007, 11:05:54 AM »
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    न पशु रहे और न देवता बन सके

    जल थल तथा आकाश में व्याप्त जीवन का विभाजन तीन प्रकार से किया गया है- पहला पशु, दूसरा मानव और तीसरे देवता। देवता वह, जिसके मन का दीपक जल गया है और जिसके जीवन में आनंद का प्रकाश हो गया है। पशु तन के स्तर पर जीते हैं, इसलिए वे पिछड़े हुए हैं। मनुष्य चूंकि मन के धरातल पर जीता है, इसलिए उसे मानव कहते हैं। संसार में ज्यादा तादाद पशुओं की है। पशु केवल चार पैर वाले जीव ही नहीं होते। मनुष्यों में भी अनेक व्यक्ति अपने कर्मों और करतूतों के कारण पशुओं की ही श्रेणी में आते हैं, जैसा कि गुरु अर्जन देव जी का फरमान है- करतूति पसु की माणस जाति। जो लोग चिंतन, सूझबूझ और विचार के स्तर पर जीते हैं वे मानव हैं।

    इस धरती पर मनुष्यों की तादाद पशुओं से कम है। सबसे कम देवता हैं- बहुत थोड़े। तन के धरातल पर जीने वालों से जंगल भी भरे हुए हैं और शहर भी। मन के धरातल पर जीने वाले मानव भी हर शहर में होते हैं। हर शहर में व्यापारी, कारोबारी, दार्शनिक और चिंतक मिलते हैं। लेकिन, हर शहर में देवता नहीं होते- साध न पुर पुर माही। मिसाल के तौर पर ज्यों-ज्यों हम पहाड़ की चढ़ाई चढ़ते जाते हैं, त्यों-त्यों सतह घटती जाती है। शिखर पर पहुंच कर तो सतह बिल्कुल ही कम रह जाती है। ठीक इसी प्रकार देवता जीवन की शिखर अवस्था है।

    पशु मन से नीचे जीता है, देवता मन से आगे जीता है। मनुष्य मध्य में जीता है। पशुओं के जीवन में लोभ नहीं होता। उनके अंदर दुख-संताप महसूस करने लायक मन भी नहीं होता। इसलिए वे सुख में जीते हैं। नानक जी कहते हैं कि ये पक्षी दिन भर दाना चुग कर शाम को अपने घोंसले में गाना गाते हुए आते हैं। उनके पास अगले दिन के लिए कुछ नहीं होता। फिर भी गाना गाते हुए ही वे सो जाते हैं। गाना गाते हुए ही सुबह उठ बैठते हैं और गाते हुए दाने की तलाश में निकल पड़ते हैं। इस प्रकार उनका जीवनक्रम चलता रहता है। जाहिर है, पक्षियों का सोना और जागना पूरी तरह से प्राकृतिक है। इसीलिए गुरु अर्जन देव जी बार-बार पक्षियों पर बलिहार जाते हुए फरमाते हैं- बलिहारी तिना पंखीआं।

    दूसरी ओर मनुष्य हजारों तरह की आहें भरता हुआ शाम को घर लौटता है। हजारों चिंताएं लेकर रात को सोता है और हजारों रोने लेकर सुबह जागता है। पशु सुख में जीते हैं, देवता आनंद में जीते हैं। दुखी है तो केवल मनुष्य। एक, यानी पशु मन से नीचे जी रहा है, दूसरा, यानी देवता मन से आगे चला गया है। केवल मनुष्य ही है जो अर्धचेतन अवस्था में जी रहा है। उसके मन का केवल थोड़ा सा भाग जागा हुआ है। मनुष्य जागा हुआ है पदार्थ और परिवार के प्रति, लेकिन सोया हुआ है परमात्मा के प्रति। वह जागा हुआ है धन-दौलत के प्रति, लेकिन सोया हुआ है धर्म के प्रति। अब सोकर तो संबंध टूट जाते हैं- जागत सोइआ जनम गवाइआ।

    मानव जितना सयाना होगा उतना ही दुखी होगा। मूर्ख अचेत है इसलिए वह दुखी नहीं होता। एक मामूली सी सुई चुभ जाए तो जबर्दस्त पीड़ा होती है। डॉक्टर बेहोशी की दवा सुंघाकर बड़े-बड़े ऑपरेशन कर देता है, लेकिन मरीज को पीड़ा का एहसास तक नहीं होता। इसी प्रकार जिस मानव का मन सोया हुआ है, उसे दुख महसूस नहीं होता। बेचैनी, परेशानी, फिक्र, पीड़ा, संवेदना आदि सब सयाने मनुष्य की पहचान हैं।

    इस स्थिति में क्या करें? या तो पूरे जाग जाएं देवता की तरह। या फिर पूरे सो जाएं पशु की तरह। इस संसार में हर बंदा दुख की गठरी है। जैसा कि गुरु नानक कहते हैं- नानक दुखीआ सब संसार। आप किसी को अपना एक दुख सुनाकर देखिए। वह आपके सामने अपने हजार दुख खोलकर रख देगा। कहीं हजार मनुष्य बैठे हों तो समझ लीजिए सभी दुख की गठरियां हैं। उनके चेहरे पर मत जाइए। ये हंसती-गाती आंखें अपने भीतर न जाने कितने रुदन लिए हुए हैं। यही कारण है कि सयाने लोग कभी अपना दुख किसी के आगे प्रकट नहीं करते। 

    अपना सांई प्यारा सांई सबसे न्यारा अपना सांई

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    Offline Ramesh Ramnani

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    Re: आज का चिन्तन
    « Reply #104 on: November 09, 2007, 06:37:53 AM »
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  • जय सांई राम।।।

    'अवसर'

    कर्म में यकीन रखने वाले लोग अक्सर दूसरों को यह नसीहत देते हैं कि 'अवसर' सिर्फ एक बार दरवाजा खटखटाता है, जो उसे झपट ले वही सफलता की मंजिल चूमता है और जो सोया रह जाए वह जीवन में पीछे छूट जाता है। 'अवसर' के बारे में यह सूक्ति मगर अधूरी और थोड़ी पिछड़ी हुई जान पड़ती है, क्योंकि अगर गौर किया जाए तो अवसर सिर्फ एक बार दरवाजा नहीं खटखटाता, बल्कि वह हर कदम पर हमारे सामने होता है, बशर्ते हम उसे पहचान पाएं। घर से निकल कर भीड़ भरी बस में सफर करते हुए किसी के लिए सीट छोड़ देना, मुसीबत में किसी आदमी के काम आना, दफ्तर में काम करते हुए हमेशा आगे बढ़कर चुनौतियां स्वीकार करना और विकट से विकट परिस्थिति में भी जीवन के प्रति सकारात्मक नजरिया बनाए रखना- ये कुछ ऐसी बातें हैं जो खुद में नए अवसर पैदा करने में पूरी तरह समर्थ हैं। ऐसे व्यक्ति के लिए 'अवसर' सिर्फ एक बार नहीं, बार-बार दरवाजा खटखटाता है और बार-बार वह झपट लिया जाता है।

    अपना सांई प्यारा सांई सबसे न्यारा अपना सांई

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